दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरूप कहा जाता है, इसके बिना लक्ष्मीजी की आराधना पूरी नहीं मानी जाती। समुद्र मंथन के दौरान 14 रत्नो में से ये एक रत्न है। सुख-सौभाग्य की वृद्धि के लिए इसे अपने घर में स्थापित करना चाहिए। शंख में दूध भर कर रुद्राभिषेक करने से समस्त पापों का नाश होता है। घर में शंख बजाने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है व अतृप्त आत्माओं का वास नहीं होता। दक्षिणावर्ती शंख से पितरों का तर्पण करने से पितरों की शांति होती है। शंख से स्फटिक के श्री यन्त्र का अभिषेक करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। सोमवार को शंख में दूध भरकर शिवजी पर चढ़ाने से चन्द्रमा ठीक होता है। मंगलवार को शंख बजाकर सुन्दर- काण्ड का पाठ करने से मंगल का कुप्रभाव समाप्त होता है। शंख में चावल भरकर और लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी में रखने से मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है। बुधवार को शालिग्राम जी का शंख में जल व तुलसी जी डाल कर अभिषेक करने से बुध ग्रह ठीक होता है। शंख को केसर से तिलक कर पूजा करने से भगवान् विष्णु व गुरु की प्रसन्ता मिलती है। शंख सफेद कपड़े में रखने से शुक्र ग्रह बलि होता है। शंख में जलभर कर सूर्यदेव को अर्घ्य देने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं।
तीसरी आंख
सोमवार, मई 04, 2026
आरती के समय शंख क्यों बजाया जाता है?
विष्णु एवं लक्ष्मी का प्रतीक शंख भगवान विष्णु के दाएं हाथ में रहता है और इसे मां लक्ष्मी का आवास भी माना गया है। आरती, अभिषेक और यज्ञोपवीत के समय शंखनाद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि शंख ध्वनि से वातावरण की नकारात्मकता दूर होती हैं। युद्ध प्रारम्भ और विजय के बाद भी शंख फूंका जाता था। शंख फूंकने से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, जिससे श्वसन तंत्र मजबूत होता है। इसके नियमित अभ्यास से मुंह, गले और पेट की मांसपेशियां सुदृढ़ होती हैं। ध्वनि तरंगों से हृदय गति का संतुलन होता है। कुछ आयुर्वेदिक मतों के अनुसार शंख का जल पीने से पाचन सुधरता है, क्योंकि शंख में कैल्शियम कार्बोनेट पाया जाता है। शंखनाद की ध्वनि ओम से मिलती-जुलती मानी गई है, जो कॉस्मिक साउंड मानी जाती है। यह ध्वनि सात से नौ हर्ट्ज तक की अल्फा तरंगों जैसी मानी जाती है, जो मस्तिष्क को शांत करती हैं। वास्तु के अनुसार घर में शंख बजाना दोष निवारण में सहायक माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे दिशा-सूचक और जल संचयन उपकरण के रूप में भी उपयोग किया जाता था। महाभारत में प्रत्येक योद्धा का अपना विशिष्ट शंख होता था (जैसे अर्जुन का देवदत्त, भीष्म का पौण्ड्र)। विवाह, जन्म व अन्य संस्कारों में शंखध्वनि सकारात्मकता और समृद्धि की घोषणा मानी जाती है। दक्षिणावर्ती शंख धन व सौभाग्य के लिए (ज्यादातर पूजा में), वामावर्ती शंख यज्ञ एवं अनुष्ठान, गणेश शंख विघ्न निवारण, गौरी शंख स्त्री-संवर्द्धन एवं संतति-कामना, जलाभिषेक शंख अभिषेक के समय बजाया जाता है। कुल मिला कर शंख केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि यह धार्मिक साधन, स्वास्थ्य हेतु लाभकारी अभ्यास, ऊर्जा संतुलन का माध्यम और विजय, उत्साह व आरंभ का प्रतीक है। शंख की आकृति और पृथ्वी की संरचना समान है। नासा के अनुसार शंख बजाने से खगोलीय ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, जो जीवाणु का नाष्ज्ञ कर लोगों को ऊर्जा व शक्ति का संचार करता है। शंख में 100 प्रतिषत कैल्शियम है। इसमें रात को पानी भरकर सुबह पीने से कैल्शियम की पूर्ति होती है। शंख बजाने से योग की तीन क्रियाएं एक साथ होती हैं- कुम्भक, रेचक और पूरक। शंख बजाने से हृदयाघात, रक्तचाप की अनियमितता, दमा और मंदाग्नि में लाभ होता है। शंख बजाने से फेफड़े पुष्ट होते हैं। शंख में पानी रख कर पीने से मनोरोगी को लाभ होता है और उत्तेजना कम होती है। शंख की ध्वनि से दिमाग व स्नायु-तंत्र सक्रिय रहता है।
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