तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, मई 06, 2026

दूध पी कर हम बछडे का हक मार रहे हैं?

यह सवाल अरसे से बहस का विषय रहा है कि गाय-भैंस का दूध किसके लिए है, क्या हम उसे पी कर बछड़े का हक मारते हैं? प्रकृति के अनुसार हर स्तनधारी का दूध उसके नवजात शिशु के लिए ही होता है, यह बात मनुष्य, गाय, बकरी, भैंस, हाथी और व्हेल, सब पर लागू होती है। इस दृष्टि से देखें तो दूध मूलतः बछड़े का अधिकार है। अब सवाल उठता है कि क्या दूध पी कर मनुष्य उसका हक छीन लेते हैं? इसका उत्तर हां और नहीं, दोनों हो सकता है, यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। पारंपरिक देसी पद्धतियों के अनुसार पहले बछड़े को पीने दिया जाता है, उसके बाद ही शेष दूध मनुष्य उपयोग में लेता है। कई स्थानों पर दूध निकालते समय बछड़ा पास खड़ा रहता है, तभी गाय स्तनों में दूध उतारती है। इस व्यवस्था में बछड़े का हक नहीं मारा जाता, सिर्फ अतिरिक्त दूध मनुष्य लेता है।

आधुनिक औद्योगिक डेयरी सिस्टम में नैतिक चिंता बढ़ जाती है। कई बडी डेयरियों में बछड़े को जन्म के कुछ दिन बाद अलग कर दिया जाता है। उसकी हिस्सेदारी सीमित या कभी-कभी कम कर दी जाती है। गाय लगातार गर्भाधान के चक्र में रखी जाती है। यह व्यवस्था कई लोगों को अनैतिक लगती है। यही कारण है कि कई लोग दूध-उद्योग को मांसाहार जैसा शोषण बताते हैं।

एक सवाल यह कि क्या दूध को मांसाहार की श्रेणी में रखा जा सकता है? कुछ लोग उसे भी मांसाहार से जोडते हैं। कई लोग दूध को मांसाहार मानते हुए दूध से बने सभी उत्पादों यथा दही, पनीर व घी आदि का सेवन नहीं करते। यह दो तरह से देखा जाता है। एक धार्मिक-परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार हिंदू, जैन, बौद्ध परंपराओं में दूध को सतोगुणी, शाकाहारी माना गया है। आयुर्वेद में दूध को ओज-वर्धक बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों में दुग्ध-उत्पादों को अहिंसक माना गया है, जब बछड़े को उसका हिस्सा मिलता है।

आधुनिक नैतिक-वीगन दृष्टिकोण में दूध को मांसाहार नहीं, लेकिन पशु-शोषण का हिस्सा अवष्य कहा जाता है। उनका तर्क है कि यदि पशु का दूध मनुष्य ले रहा है, तो वह किसी स्तर पर स्वार्थपूर्ण हस्तक्षेप है। उपयोगकर्ता किस दृष्टिकोण को स्वीकार करता है, यह उसकी संवेदनशीलता और तर्कशक्ति पर निर्भर करता है।

कुल मिला कर हम इस निर्णय पर पहुंच सकते हैं कि प्रकृति ने दूध बछड़े के लिए उत्पन्न किया है। यदि बछड़े को पूरा दूध मिले और अतिरिक्त ही मनुष्य ले, तो यह शोषण नहीं बनता। औद्योगिक डेयरियों में यह संतुलन अक्सर बिगड़ जाता है, यहीं से नैतिक प्रश्न उठते हैं। औद्योगिक पशु-उत्पीड़न के संदर्भ में इसमें आपत्ति की गुंजाइश है। यदि कोई व्यक्ति दूध पीना चाहता है और साथ ही नैतिकता भी बनाए रखना चाहता है, तो यह उपाय अपनाए जा सकते हैं- स्थानीय, देसी, छोटे डेयरी किसानों से दूध लिया जाए, जहां बछड़ा प्राथमिकता पाता है। देशी नस्ल की गायों का दूध, जहां उत्पादन स्वाभाविक रूप से सीमित और प्राकृतिक होता है।


मंगलवार, मई 05, 2026

बहुत महिमा है परिक्रमा की

 हमारे यहां धार्मिक-आध्यात्मिक स्थलों, मंदिरों में मूर्तियों, पेडों आदि की परिक्रमा की परंपरा है। यह सदियों पुरानी है, जिसका वर्णन हमारे वेदों में धर्म ग्रंथों में मिलता है। दरअसल जिन पवित्र स्थानों की परिक्रमा की जाती है, उसके चारों तरफ एक शक्तिशाली आध्यात्मिक आभा ऊर्जा मौजूद होती है, जो हमारे अंदर प्रवेश कर एक दिव्यता प्रदान करती है। परंपरा के अनुसार तीर्थ स्थल व मंदिर के अतिरिक्त नदी, पर्वत, वृक्ष आदि की भी परिक्रमा की जाती है। मनु स्मृति में विवाह के समय वर-वधू अग्नि के चारों ओर 7 बार प्रदक्षिणा करते हैं तो विवाह संपन्न माना जाता है।

कथा है कि एक बार भगवान शंकर की अर्धांगिनी माता पार्वती द्वारा अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगा कर उनके पास वापस लौटने का आदेश दिया गया। यह सुन कार्तिकेय अपनी सुंदर सवारी मोर पर सवार हुए तथा पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़े। उन्हें यह भ्रमण समाप्त करने में युग लग गए, लेकिन दूसरी ओर गणेश द्वारा माता की आज्ञा को पूरा करने का तरीका काफी अलग था, जिसे देख सभी हैरान रह गए। भगवान गणेश ने अपने दोनों हाथ जोड़े तथा माता पार्वती के चक्कर लगाना शुरू कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे और गणेश को अपने सामने पाया तो वह हैरान हो गए। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे गणेश उनसे पहले दौड़ का समापन कर सकते हैं। गणेश जी ने बताया कि उनका संसार तो स्वयं उनकी माता हैं, इसलिए उन्हें ज्ञान प्राप्ति के लिए विश्व का चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं है। पुराण में दर्ज इस कथा के बाद ही हिन्दू धर्म में परिक्रमा करने की रीति का आरंभ हुआ। तब से लेकर आज तक विभिन्न धार्मिक स्थलों पर परिक्रमा करने का रिवाज है।

हिंदू धर्म के अनुसार देवी-देवताओं की पूजा के लिए पेड-पौधों की परिक्रमा का विधान है। वस्तुतः भिन्न-भिन्न पेड-पौधों में अलग-अलग देवी-देवता का वास माना जाता है। आम तौर पर बेल, केले, तुलसी, बरगद, पीपल कर परिक्रमा की जाती है। प्रदक्षिणा घड़ी की सुई की दिशा में करने प्रावधान है। वह इसलिए कि इस तरह से चलते हुए प्रभु हमेशा हमारे दाईं ओर रहते हैं, जिससे हमें सही दिशा में रहने की ही सीख मिलती है।

प्रत्येक देवता के लिए की जाने वाली प्रदक्षिणाओं की न्यूनतम संख्या अलग अलग होती है। गणेश जी की 1, हनुमान जी की 3, शिव जी की आधी, विष्णु जी की 3, अयप्पा जी की 5, कार्तिकेय जी की 6, देवी दुर्गा जी की 9, पीपल के पेड़ की 7 परिक्रमा की जाती है। शिव मंदिर में परिक्रमा करते समय यदि रास्ते में शिवलिंग पर अर्पित किया गया जल, दूध, घी आदि निकासी आती है, तो उसे पार नहीं करना किया जाता। यानि परिक्रमा आधी ही की जाती है। फिर घड़ी की सुई की उल्टी दिशा में घूम जाना चाहिए। एक मान्यता है कि शिवजी की जटा से गंगा प्रवाहित होती है, अतः उसे कैसे पार किया जा सकता है।

प्रदक्षिणा का प्राथमिक कारण सूर्यदेव की दैनिक चाल से संबंधित है। जिस तरह से सूर्य प्रातः पूर्व में निकलता है, दक्षिण के मार्ग से चलकर पश्चिम में अस्त हो जाता है। इसका एक दार्शनिक महत्व यह भी है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह-नक्षत्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा ही जीवन का सत्य है। व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही एक चक्र है। इस चक्र को समझने के लिए ही परिक्रमा जैसे प्रतीक को निर्मित किया गया।


सोमवार, मई 04, 2026

आरती के समय शंख क्यों बजाया जाता है?

 विष्णु एवं लक्ष्मी का प्रतीक शंख भगवान विष्णु के दाएं हाथ में रहता है और इसे मां लक्ष्मी का आवास भी माना गया है। आरती, अभिषेक और यज्ञोपवीत के समय शंखनाद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि शंख ध्वनि से वातावरण की नकारात्मकता दूर होती हैं। युद्ध प्रारम्भ और विजय के बाद भी शंख फूंका जाता था। शंख फूंकने से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, जिससे श्वसन तंत्र मजबूत होता है। इसके नियमित अभ्यास से मुंह, गले और पेट की मांसपेशियां सुदृढ़ होती हैं। ध्वनि तरंगों से हृदय गति का संतुलन होता है। कुछ आयुर्वेदिक मतों के अनुसार शंख का जल पीने से पाचन सुधरता है, क्योंकि शंख में कैल्शियम कार्बोनेट पाया जाता है। शंखनाद की ध्वनि ओम से मिलती-जुलती मानी गई है, जो कॉस्मिक साउंड मानी जाती है। यह ध्वनि सात से नौ हर्ट्ज तक की अल्फा तरंगों जैसी मानी जाती है, जो मस्तिष्क को शांत करती हैं। वास्तु के अनुसार घर में शंख बजाना दोष निवारण में सहायक माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे दिशा-सूचक और जल संचयन उपकरण के रूप में भी उपयोग किया जाता था। महाभारत में प्रत्येक योद्धा का अपना विशिष्ट शंख होता था (जैसे अर्जुन का देवदत्त, भीष्म का पौण्ड्र)। विवाह, जन्म व अन्य संस्कारों में शंखध्वनि सकारात्मकता और समृद्धि की घोषणा मानी जाती है। दक्षिणावर्ती शंख धन व सौभाग्य के लिए (ज्यादातर पूजा में), वामावर्ती शंख यज्ञ एवं अनुष्ठान, गणेश शंख विघ्न निवारण, गौरी शंख स्त्री-संवर्द्धन एवं संतति-कामना, जलाभिषेक शंख अभिषेक के समय बजाया जाता है। कुल मिला कर शंख केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि यह धार्मिक साधन, स्वास्थ्य हेतु लाभकारी अभ्यास, ऊर्जा संतुलन का माध्यम और विजय, उत्साह व आरंभ का प्रतीक है। शंख की आकृति और पृथ्वी की संरचना समान है। नासा के अनुसार शंख बजाने से खगोलीय ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, जो जीवाणु का नाष्ज्ञ कर लोगों को ऊर्जा व शक्ति का संचार करता है। शंख में 100 प्रतिषत कैल्शियम है। इसमें रात को पानी भरकर सुबह पीने से कैल्शियम की पूर्ति होती है। शंख बजाने से योग की तीन क्रियाएं एक साथ होती हैं- कुम्भक, रेचक और पूरक। शंख बजाने से हृदयाघात, रक्तचाप की अनियमितता, दमा और मंदाग्नि में लाभ होता है। शंख बजाने से फेफड़े पुष्ट होते हैं। शंख में पानी रख कर पीने से मनोरोगी को लाभ होता है और उत्तेजना कम होती है। शंख की ध्वनि से दिमाग व स्नायु-तंत्र सक्रिय रहता है। 

दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरूप कहा जाता है, इसके बिना लक्ष्मीजी की आराधना पूरी नहीं मानी जाती। समुद्र मंथन के दौरान 14 रत्नो में से ये एक रत्न है। सुख-सौभाग्य की वृद्धि के लिए इसे अपने घर में स्थापित करना चाहिए। शंख में दूध भर कर रुद्राभिषेक करने से समस्त पापों का नाश होता है। घर में शंख बजाने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है व अतृप्त आत्माओं का वास नहीं होता। दक्षिणावर्ती शंख से पितरों का तर्पण करने से पितरों की शांति होती है। शंख से स्फटिक के श्री यन्त्र का अभिषेक करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। सोमवार को शंख में दूध भरकर शिवजी पर चढ़ाने से चन्द्रमा ठीक होता है। मंगलवार को शंख बजाकर सुन्दर- काण्ड का पाठ करने से मंगल का कुप्रभाव समाप्त होता है। शंख में चावल भरकर और लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी में रखने से मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है। बुधवार को शालिग्राम जी का शंख में जल व तुलसी जी डाल कर अभिषेक करने से बुध ग्रह ठीक होता है। शंख को केसर से तिलक कर पूजा करने से भगवान् विष्णु व गुरु की प्रसन्ता मिलती है। शंख सफेद कपड़े में रखने से शुक्र ग्रह बलि होता है। शंख में जलभर कर सूर्यदेव को अर्घ्य देने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं।

रविवार, मई 03, 2026

ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास?

कुछ लोग ज्योतिष को अंधविश्वास मानते हैं, वहीं ज्योतिष को विज्ञान मानने वालों की भी कमी नहीं है। इस सिलसिले में विस्तृत चर्चा के दौरान ज्योतिषी व हस्तरेखा विशेषज्ञ राजेन्द्र गुप्ता ने बताया कि ज्योतिष पूर्ण विज्ञान है, क्योंकि हमारी सनातन संस्कृति का आधार वेद है, जो पूर्ण विज्ञान है और ज्योतिष वेदों का छठा अंग माना जाता है। ज्योतिष दो शब्दों ज्योति प्लस अष्क से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है ज्योति पिंड और जो ज्ञान इन ज्योति पिंडों के जड़ चेतन के प्रभाव का अध्ययन करता है उसे ज्योतिष विज्ञान कहते हैं। सबसे पहले इसी विज्ञान ने ब्रह्माण्ड के नक्षत्रों, ग्रहों, राशियों के बारे में विस्तार से बताया। उसका गणितीय संयोजन प्रस्तुत किया, जो आज के खगोल विज्ञान का आधार बना। पृथ्वी पर होने वाली ऋतुओं, तिथि, समय, अंक, समुद्र में ज्वार-भाटे, सूर्य-चन्द्र ग्रहण या धरती पर पर होने वाले सृजन, विकार या विनाश का सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

ज्योतिष पर मुंह बनाने वाले मूढ़मति लोगों को सूर्य सिद्धांत को पढ़ लेना चाहिए, जिसमें न केवल पृथ्वी बल्कि सौरमंडल के ग्रहों का नियमन करने वाली गतियों, उनके प्रभाव आदि का विस्तार वैज्ञानिक आधार पेश किया गया है। लोग जिस न्यूटन का नाम लेते नहीं थकते, उसे भास्कराचार्य ने पहले ही सिद्ध कर दिया था। एक बार आप आर्यभट्ट, वराहमिहिर द्वारा बनाई गई वेधशालाओं के दर्शन ही कर लें, तो ज्योतिष गणना की सटीकता और भारतीय विज्ञान के मुरीद हो जाएंगे। आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने ज्योतिष का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किए। भास्कराचार्य ने न्यूटन से बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था, जिसे उन्होंने अपने ग्रंथ सिद्धांतशिरोमणि में प्रस्तुत किया है। आकृष्ट शक्ति च महीतया, स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या,

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, जिससे वह अपने आस-पास की वस्तुओं को आकर्षित करती है।

आज से करीब दो हजार साल पहले वराहमिहिर ने 27 नक्षत्रों और 7 ग्रहों तथा ध्रुव-तारे को वेधने के लिए एक बड़े जलाशय में स्तंभ का निर्माण करवाया था, इसकी चर्चा भागवतपुराण में है, स्तंभ में सात ग्रहों के लिए सात मंजिलें और 27 नक्षत्रों के लिए 27 रोशनदान काले पत्थरों से निर्मित करवाए थे, इसके चारों तरफ 27 वेधशालाएं मंदिरों के रूप में बनी थीं।

अतः ज्योतिष की सार्थकता और सटीकता पर आंखें बंद करके विरोध करना अज्ञानी या अर्द्धज्ञानी का काम है। इसके पहले आपको वेदों, पुराणों, ज्योतिष शास्त्र का समझें। खास बात, जो लोग ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते, उनको अधिकार भी नहीं की पंचांग की गणना के आधार पर निर्धारित किए जाने वाले होली, दीपावली, बश्चों के नाम, शादियों के मुहूर्त आदि को मानें।

आइये, अब दूसरा पक्ष जानते हैं। रीयल एस्टेट के जानकार रमेश टेहलानी ने एक पोस्ट में अपना मन्तव्य जाहिर किया है कि किसी समय में ज्योतिष सलाह कार्य करने के बहुत बाद में अनुभव किया कि ज्योतिष का असर उन्हीं पर होता है, जो इस पर विश्वास करते हैं। ज्योतिष न मानने वालो पर ग्रहों का कोई असर नहीं पड़ता। वे बताते हैं कि जब वे 17 साल के थे, तो ज्योतिष में गहरी रुचि हो गई थी। उन्होंने कई किताबें पढ़ीं और अनुभवी ज्योतिषियों से मिले। जब वे 18 की उम्र के थे, उस समय उनकी आय का स्त्रोत ज्योतिष सलाह कार्य था। इसी आय से उन्होंने एमबीए किया और फिर बैंक में नौकरी लगी।

उनकी बात को अनुभवसिद्ध मान लिया जाए तो भी सवाल उठता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जो ज्योतिष को नहीं मानते, उन पर ग्रहों का असर नहीं पडता? प्रकृति निरपेक्ष है। ग्रह निरपेक्ष होते हैं। वे उन्हें मानने या न मानने वालों पर समान रूप से असर डालते होंगे। जैसे सूर्य सभी पर समान रूप से तपिश डालता है, भला ऐसे कैसे हो सकता है कि उसे न मानने वाला उस तपिश से बच सकता है? बावजूद इसके अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा है कि ज्योतिष न मानने वालों पर ग्रह असर नहीं डालते तो जरूर कोई मर्म होगा। एक उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करते हैं। जैसे कई लोग अमुक दिन पर दाढी-बाल नहीं कटवाते, और ऐसे भी हैं, जो हर दिन दाढी-बाल कटवाते हैं, उन पर अमुक ग्रहों का असर क्यों नहीं पडता? हमारे यहां अधिसंख्य सैनिक प्रतिदिन दाढी बनाते हैं, उन पर ग्रह कुपित क्यों नहीं होते? एक बात और। ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि हस्तरेखाओं में भले ही कुछ भी लिखा हो, प्रबल कर्म से उनको बदला जा सकता है। इसके अनेक उदाहरण भी मौजूद हैं।


गुरुवार, अप्रैल 30, 2026

उसी तिथी पर श्राद्ध क्यों, जिस पर मृत्यु होती है?

 क्या आपने कभी विचार किया है कि श्राद्ध पक्ष में हम मृतात्मा को उसी तिथी पर श्राद्ध मनाते हुए ब्राह्मण को भोजन करवाते हैं, जिस पर उनकी मृत्यु हुई होती है? वस्तुतः हिंदू परंपरा में जिस तिथि (यानि चंद्र तिथि) पर मृत्यु हुई थी, उसी तिथि पर हर वर्ष श्राद्ध किए जाने के पीछे धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक तीनों तरह के कारण बताए गए हैं।

धार्मिक मान्यता है कि हिंदू पंचांग में तिथि केवल कैलेंडर का दिन नहीं है, बल्कि एक ऊर्जा-चक्र है। जिस तिथि को किसी व्यक्ति का देहांत होता है, उसी तिथि को उसका सूक्ष्म शरीर (यानि पितृ) विशेष रूप से सक्रिय माना जाता है। उस तिथि पर पितरों की सूक्ष्म उपस्थिति अधिक होती है। वे अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण, पिंडदान और भोजन दान (श्राद्ध) को स्वीकार कर पाते हैं। यह भी मान्यता है कि जिस तिथि को मृत्यु हुई, उसी दिन पितर लौकिक जीवन से परलोक की यात्रा पर जाते हैं। शास्त्र कहता है कि उस यात्रा-तिथि को किया गया तर्पण सबसे अधिक प्रभावकारी होता है। इसलिए हर साल वही तिथि “स्मृति-तिथि” बनती है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण भी है। निर्धारित तिथि पर श्राद्ध करने से परिवार में स्मरण, सम्मान और पीढ़ीगत जुड़ाव बना रहता है। हर वर्ष एक निश्चित दिन पर आयोजन होने से भूलने, टालने की संभावना कम होती है। इसका भावनात्मक पक्ष यह है कि किसी प्रिय व्यक्ति का निधन जिस दिन होता है, वह परिवार की स्मृति में गहराई से अंकित होता है। उसी दिन श्राद्ध करने से मन को शांति मिलती है।

इसका सांस्कृतिक एवं पारिवारिक कारण भी है। भारतीय घरों में कुल परंपरा का बड़ा महत्व है। हर व्यक्ति का अपना वार्षिक श्राद्ध-दिवस होना परिवार की वंशावली को व्यवस्थित रखता है। पुराने समय में लोग पूरी तरह कृषि-आधारित जीवन जीते थे। निश्चित तिथि पर श्राद्ध होने से आस-पड़ोस व रिश्तेदारों को भी पता रहता था कि किस घर में कब वर्ष-श्राद्ध है, कब अमावस्या-श्राद्ध या महालया होगा।

यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के वर्ष के अतिरिक्त वर्षों में पितृपक्ष (यानि महालया) के दौरान श्राद्ध करवाना चाहे तो वह भी मान्य है। लेकिन पारंपरिक व्यवस्था में व्यक्तिगत श्राद्ध उसी मृत्यु-तिथि पर किया जाता है।

सोमवार, अप्रैल 27, 2026

एक ही जगह व समय पर होने वाले बच्चों का भाग्य अलग क्यों?

एक ही अस्पताल, एक ही वार्ड, यहां तक कि एक ही समय पर जन्म लेने वाले बच्चों का भाग्य बिल्कुल अलग क्यों होता है, यह प्रश्न सदियों से ज्योतिष, दर्शन और मनोविज्ञान में चर्चा का विषय है। वस्तुतः कुंडली समय व स्थान के आधार पर बनाई जाती है, ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो जन्म-क्षण एक जैसा होने पर भी लग्न भिन्न हो सकती है। उसकी वजह यह है कि जन्म का सटीक समय सेकंड तक रिकॉर्ड नहीं होता। एक दो मिनट का अंतर भी लग्न, नवांश आदि में बड़ा अंतर ला देता है। लग्न हर 2-2.5 घंटे में बदलता है, नवांश चार्ट हर 13-14 मिनट में बदलता है। इससे दोनों के जीवनपथ, संघर्ष, अवसर, मानसिकता सब बदल जाते हैं। सटीक जन्मस्थान बराबर होने पर भी ‘जन्म-पार्थिव कारक’ अलग होते हैं। ज्योतिष में केवल ग्रह ही नहीं, बल्कि

कुल-परिवार, वातावरण, संस्कार, कर्मसंचय भी महत्वपूर्ण होते हैं। दो बच्चों का जन्मस्थान एक हो सकता है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति, शिक्षा का माहौल, पालन-पोषण अलग होने से भाग्यफल पूरी तरह बदल जाता है।

वेदांत और पारंपरिक ज्योतिष कहता है कि प्रत्येक जीव अपने पूर्व जन्म के संस्कार लेकर आता है। इसलिए भले ही दो लोग एक ही समय पर जन्में, उनके पूर्व जन्म के कर्मसंचय अलग होते हैं। इससे एक को अवसर जल्दी मिलता है, एक को संघर्ष ज्यादा, एक का मन रचनात्मक होता है और दूसरा साहसवादी होता है। ये सब ग्रहों की एक ही स्थिति होने पर भी फल को अलग बना देते हैं, क्योंकि कर्मसंस्कार अलग होते हैं।

एक बात और। दो बच्चों की महादशाएं तो समान हो सकती हैं, परंतु 

अंतर्दशा, प्रत्यंतर, सूक्ष्म दशा का प्रारंभ कुछ सेकंडों के अंतर से बदल जाता है। इससे पूरे जीवन में घटनाओं के समय अलग-अलग हो जाते हैं और यहीं से भाग्य का अंतर शुरू हो जाता है।

भले ही सामान्य जन्मपत्री समान लगे, परंतु चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, अष्टकवर्ग के अंक, भिन्न ग्रहों का बल, भाव के अंष्ज्ञ, इनमें छोटा सा अंतर भी पूरी भविष्यवाणी बदल देता है। केपी और नाड़ी ज्योतिष में सेकंड के स्तर तक अंतर माने जाते हैं। व्यक्तित्व जन्म के बाद के परिवेश से बनता है। अवसरों की उपलब्धता भाग्य को बदल देती है। सोच और प्रतिक्रियाएं एक ही घटना को दो लोग अलग तरह से लेते हैं।

कुल जमा भाग्य समान नहीं, सम्भावनाएं समान होती हैं। जन्म केवल शुरुआती ढांचा देता है, लेकिन मनुष्य का चुनाव, कर्म, दिशा भाग्य को आकार देते हैं। संक्षेप में एक ही समय पर जन्मे बच्चों का भाग्य अलग होता है क्योंकि जन्म का समय सूक्ष्म रूप से अलग होता है, लग्न एवं विभाजित कुंडलियाँ बदल जाती हैं, पूर्व-जन्म कर्मसंस्कार अलग होते हैं, पालन-पोषण और परिवेश अलग होता है, दशाएं-उपदशाएं अलग-अलग समय पर चलती हैं, ग्रहों का बल और अंश सूक्ष्म रूप से भिन्न होता है। परिवार और वातावरण अलग होते हैं, भले ही जन्म समय समान हो, पर एक बच्चा संपन्न परिवार में जा रहा है, दूसरा संघर्षशील परिवार में, किसी के माता-पिता का स्वभाव अलग है, किसी को शिक्षा, अवसर, पोषण अलग मिलेगा। किसे कितना प्रेम मिला, किसे कितनी सुरक्षा मिली, किस पर कितना अनुशासन या स्वतंत्रता हुई, ये सब भविष्य पर गहरा असर डालते हैं।

इसे यूं भी समझा जा सकता है कि दो पेड़ एक ही दिन लगाए जा सकते हैं, लेकिन मिट्टी, पानी और धूप अलग हो तो उनकी बढ़त भी अलग हो जाती है। इसी प्रकार पास-पास पैदा हुए दो नवजात शिशुओं की जीवन यात्रा दो नदियों की तरह अपनी-अपनी दिशा पकड़ लेती है।


शुक्रवार, अप्रैल 24, 2026

क्या है चरण स्पर्श करने की कीमिया?

भारतीय परंपरा में प्राचीनकाल से माता-पिता, गुरुओं, बडे बुजुर्गों आदि के चरण स्पर्श करने का चलन है। ऐसी मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति कितना ही क्रोधी स्वभाव का हो, अपवित्र भावनाओं वाला हो, यदि उसके भी चरण स्पर्श किये जाते हैं, तो उसके मुख से आषीर्वाद, दुआएं, सदवचन ही निकलता है। वस्तुतः मनुष्य के शरीर में उत्तरी ध्रुव यानि सिर से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर दक्षिणी धु्रव यानी पैरों में ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। हाथों और पैरों की अंगुलियों और अंगूठों के पोरों में यह ऊर्जा सर्वाधिक रूप से रहती है। सामान्य तौर पर जब हम किसी का चरण स्पर्श करते हैं, उसके हाथ सजह ही हमारे सिर पर जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे ज्ञान, बुद्धि और विवेक का विकास सहज होने लगता है। आपकी जानकारी में होगा कि जब भी हम मंदिर जाते हैं, तो वहां ताम्रपात्र में रखा तुलसी दल, केसर, चंदन से बना चरणामृत प्रसाद के रूप में पाते हैं। भगवान का चरणामृत वह तत्व है जो ऊर्जा, उत्साह, शक्ति और दीर्घायु प्रदान करता है। चरणों की महिमा देखिए, गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या श्राप के कारण पत्थर की मूरत बन गई थी और भगवान के चरण स्पर्श से शाप मुक्त होकर वापिस मानव रूप में आ गई। 

आपको ख्याल में होगा कि प्राचीन समय में जब ऋषि, मुनि या संतजन किसी राज दरबार में आते थे तो राजा महाराजा पहले शुद्ध जल से उनके पैर धोते थे। उसके बाद ही चरण स्पर्श की परंपरा पूर्ण करते थे। चरण स्पर्श से पहले चरण धोने के पीछे संभवत, यह वैज्ञानिक कारण रहा होगा कि चरण में एकत्रित विद्धुत चुंबकीय उर्जा चल कर आने से अत्यधिक तीव्रता से प्रवाहित और गर्म होती है। शीतल जल से धोने से यह सामान्य अवस्था में आ जाती है। एक बात और। किसी के पैर छूने का मतलब है, उसके प्रति समर्पण भाव जगाना। जब मन में समर्पण का भाव आता है, तो अहंकार खत्म हो जाता है। पैर छूना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा नहीं है। यह एक वैज्ञानिक क्रिया है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ी है। पैर छूने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि बड़ों के स्वभाव की अच्छी बातें भी हमारे अंदर उतर जाती है।

पैर छूने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे शारीरिक कसरत होती है। झुक कर पैर छूने से हमारी कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। घुटने के बल बैठकर पैर छूने से हमारे शरीर के जोड़ों पर बल पड़ता है, जिससे जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है। साष्टांग प्रणाम की विधि में शरीर के सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए सीधे तन जाते हैं, जिससे शरीर का स्ट्रेस दूर होता है। इसके अतिरिक्त झुकने से सिर का रक्त प्रवाह व्यवस्थित होता है, जो हमारी आंखों के साथ ही पूरे शरीर के लिए लाभदायक है।


गुरुवार, अप्रैल 23, 2026

पेन को पकडने का सही तरीका क्या है?

 मनोवैज्ञानिकों में यह सवाल चर्चा का मुद्दा रहा है कि पेन पकडने का सही तरीका क्या है? ज्योतिष व सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार लिखते समय पेन को चारों अंगुलियां व अंगूठा स्पर्श करना चाहिए। इससे आपकी लेखनी में सभी ग्रहों का सहयोग होता है और उसमें पूर्णता आती है। यह एक आदर्श स्थिति है। वैसे मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर पेन या पेंसिल पकड़ते समय आपका अंगूठा आपकी तर्जनी अंगुली के ऊपर आता है तो यह दर्शाता है कि आप बहुत कलात्मक हैं। बहुत छोटी-छोती बातें आपको परेशान या खुश करती है। अंगूठे के तर्जनी अंगुली को ढकने की मुद्रा का अर्थ यह है कि आप अपने जीवन में असामान्य इच्छाएं रखते हैं। आपको खुश रहने के लिए दूसरों की जरूरत पड़ती है, आप अकेले नहीं रह सकते। ऐसे लोग बहुत ज्यादा सोचने वाले होते हैं।

तर्जनी और अध्यमा अंगुली के बीच पेन पकडने वाले लोग अपने सामाजिक जीवन का बहुत लाभ उठाते हैं। मांफ करना, भूलना और फिर अपने रास्ते पर आगे बढना, यही इनका मूलमंत्र है। ये किसी के साथ कोई ईर्ष्या या द्वेष नहीं रखते। सच्चा और ईमानदार इंसान होना आपकी खूबी भी है और खामी भी। इसके अलावा आपके भीतर जो जिज्ञासा है उसे शांत करना भी बहुत मुश्किल है। आपको सबकुछ जानना है, चाहे उसका आपसे संबंध हो या नहीं। वैसे तो आप बहुत बातूनी हैं, अपनी बात दिल में नहीं रखते, लेकिन जब किसी से दिल की बात कहनी होती है तो आप अपनी भावनाओं को दबाकर रखना ही सही मानते हैं।

अंगूठे के ऊपर अंगुलिया रखकर लिखने वाले लोग बहुत चुस्त और सचेत होते हैं, इस खूबी की वजह से ये अपनी अलग पहचान भी रखते हैं। ये अपनी वास्तविक भावनाएं किसी को नहीं बता पाते।

यदि अंगूठा सभी अंगुलियों को ढकता है तो इसका अर्थ है कि आप अत्यधिक टैलेंटेड हैं, आपके भीतर एक अलग सा आकर्शण है, जो दूसरों को आपकी ओर खींच लाता है। 

एक समय था जब अलग-अलग तरह के पेन होते थे और तो और सभी पेन को पकडने का तरीका भी उतना ही अलग हुआ करता था। 

एक मान्यता यह भी है कि यदि पेन पकडते समय तर्जनी अंगुली पृथक होती है तो परिवार की एकता टूटती है, उसमें बंटवारे की स्थिति उत्पन्न होती है। इस मान्यता के अनुसार कोई भी वस्तु पकडते वक्त अंगुली अलग नहीं होनी चाहिए। कदाचित यह मान्यता सामुद्रिक शास्त्र से आई है।


मंगलवार, अप्रैल 21, 2026

क्या भगवान के नाम पर नाम रखना गुनाह है?

आजकल बच्चों के नाम अलग तरह से रखे जाने लगे हैं। कोई संस्कृत भाषा का नाम तलाशता है तो कोई अंग्रेजीदां। कोई महाभारत कालीन या रामायण कालीन पात्रों के नाम रखता है तो कोई अत्याधुनिक अंग्रेजी नाम रखता है। जैसे भीष्म, कुन्ती, कर्ण, युधिष्ठिर, भीम, नकुल, कौस्तुभ या अर्जुन और दशरथ, सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान इत्यादि। कुछ साल पहले रमेश, वैभव, अनिल, मुकेश टाइप के नाम रखे जाते थे। नए चलन में आदि, अयान, आर्यन इत्यादि टाइप के नाम रखे जाने लगे हैं। कुछ पीछे चलें तो अमूमन भगवान के नामों में से कोई नाम रखा जाता था। जैसे राम लाल, राम दास, राम चन्द्र, गणेशी लाल, कृपाशंकर इत्यादि। अर्थात भगवान के नाम के साथ लाल या दास जोड़ा जाता था। हालांकि कुछ लोग गोविंद, सुरेन्द्र जैसे नाम भी रखते रहे हैं। जहां तक भगवान के नामों में से कोई नाम रखने की परंपरा का सवाल है, उसके पीछे कारण ये रहता होगा कि किसी को पुकारने के बहाने भगवान का नाम तो उच्चारण में आएगा। सोच यह भी रहती होगी कि ऐसा करने भगवान का स्मरण आने से उनके गुण हमारे में भी आ जाएंगे। हालांकि हकीकत ये है कि जब भी हम किसी को भगवान के किसी नाम से पुकारते हैं, तो वह केवल हमारी जुबान पर होता है, उसका उच्चारण करते वक्त भगवान की छवि हमारे जेहन में नहीं होती। 

इस बारे में एक दिलचस्प जानकारी आयतुल कुर्सी से मिली। आयतुल कुर्सी कुरान की एक आयत है, जो भूत-प्रेत आदि को भगाने या उससे बचाव के लिए पढ़ी जाती है। उसके दूसरे जुमले में कहा गया है कि वही हमेशा जिंदा और बाकी रहने वाला है। हय्य के मानी अरबी ज़ुबान में जिसको कभी मौत न आये, हमेशा जिंदा रहने वाला और कय्यूम के माने हैं, जो खुद कायम रहे और दूसरों को भी कायम रखता और संभालता हो और कय्यूम अल्लाह तआला की ख़ास सिफत है, जिसमें कोई भी उस का शरीक नहीं क्योंकि जो चीज़ें अपने बाक़ी रहने में दूसरे की मोहताज हों, वो किसी दूसरे को क्या संभाल सकती हैं। इसलिए किसी इंसान को क़य्यूम कहना जायज़ नहीं, बल्कि अब्दुल कय्यूम अर्थात कय्यूम का बंदा कहना चाहिए। जो लोग अब्दुल कय्यूम की जगह सिर्फ कय्यूम बोलते हैं, वे गुनाहगार होते हैं। यही वजह है कि खुदा की ओर संकेत करने वाले नामों के साथ कोई न कोई लफ्ज जरूर जोड़ा जाता है।

इसका मतलब ये है कि इस्लाम में खुदा की किसी खासियत वाले नाम को रखने की मनाही है। मकसद यही है कि खुदा के नाम की मर्यादा या पाकीजगी के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। ठीक इसी तरह जो लोग राम दास, राम लाल आदि नाम रखते थे, उसके पीछे वजह ये रहती होगी कि अकेले भगवान के नाम पर नाम रखने की बजाय उसका दास या लाल कहा जाए। वाकई यह सोच बहुत ही गहरी है। हम भला भगवान के बराबर कैसे हो सकते हैं।


शनिवार, अप्रैल 18, 2026

कपूर में छिपे हैं चमत्कारी गुण

कपूर हमें एक सामान्य सा पदार्थ लगता है। यह हर घर में होता है। खासकर घर के मंदिर में। लेकिन इसमें चमत्कारी गुण मौजूद हैं। कर्पूर या कपूर उडऩशील दिव्य वानस्पतिक द्रव्य है। कर्पूर जलाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। इसे अक्सर आरती के बाद या आरती करते वक्त जलाया जाता है, जिससे वातावरण में सुगंध फैल जाती है और मन एवं मस्तिष्क को शांति मिलती है। कपूर को संस्कृत में कर्पूर, फारसी में काफूर और अंग्रेजी में कैंफर कहते हैं। वास्तु एवं ज्योतिष शास्त्र में भी कपूर का बहुत महत्व और उपयोग के बारे में बताया गया है। मान्यता है कि देवी-देवताओं के समक्ष कर्पूर जलाने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन सुबह और शाम घर में संध्या वंदन के समय कपूर जरूर जलाएं। वस्तुतः कपूर जलाने से सकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है। यदि आप चाहते हैं कि घर में सकारात्मक उर्जा और शांति-समृद्धि बनी रहे तो प्रतिदिन सुबह और शाम कर्पूर को घी में भिगोकर जलाएं और संपूर्ण घर में उसकी खुशबू फैलाएं। ऐसा करने से घर की नकारात्मक उर्जा नष्ट हो जाएगी। दुःस्वप्न नहीं आएंगे और घर में अमन शांति बनी रहेगी है।

इससे देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि हमें शायद पितृदोष है या काल सर्पदोष है। दरअसल, यह राहु और केतु का प्रभाव मात्र है। इसको दूर करने के लिए घर के वास्तु को ठीक करें। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो प्रतिदिन सुबह, शाम और रात्रि को तीन बार घी में भिगोया हुआ कर्पूर जलाएं। घर के शौचालय और बाथरूम में कर्पूर की 2-2 टिकियां रख दें। बस इतना उपाय ही काफी है।

ज्योतिश षास्त्र के अनुसार आकस्मिक घटना या दुर्घटना का कारण राहु, केतु और शनि होते हैं। इसके अलावा हमारी तंद्रा और क्रोध भी दुर्घटना का कारण बनते हैं। इसके लिए रात्रि में हनुमान चालीसा का पाठ करने के बाद कर्पूर जलाएं। प्रतिदिन सुबह और शाम जिस घर में कर्पूर जलता रहता है, उस घर में किसी भी प्रकार की आकस्मिक घटना और दुर्घटना नहीं होती। रात्रि में सोने से पूर्व कर्पूर जलाकर सोना तो और भी लाभदायक है।

वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह भी ज्ञात हुआ है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता। यदि घर के किसी स्थान पर वास्तु दोष निर्मित हो रहा है तो वहां कर्पूर की 2 टिकियां रख दें। जब वह टिकियां गलकर समाप्त हो जाए तब दूसरी दो टिकिया रख दें। इस प्रकार बदलते रहेंगे तो वास्तुदोष निर्मित नहीं होगा।

सलाह दी जाती है कि पानी में कर्पूर के तेल की कुछ बूंदों को डाल कर नहाएं। यह आपको तरोताजा तो रखेगा ही आपके भाग्य को भी चमकाएगा। यदि इस में कुछ बूंदें चमेली के तेल की भी डाल लेंगे तो इससे राहु, केतु और शनि का दोष नहीं रहेगा।

 


https://youtu.be/1bqmmsc0PgY

शुक्रवार, अप्रैल 17, 2026

भूत होते हैं या नहीं?

मानव जाति ने बहुत विकास किया है। हम बहुत ज्ञानी और सुशिक्षित हो गए हैं, मगर एक गुत्थी ऐसी है, जिसे आज भी पक्के तौर पर सुलझाया नहीं जा सका है। वो है- भूत होते हैं या नहीं? पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इसको लेकर खूब बहस होती रहती है। कुछ लोगों का दावा होता है कि उन्होंने भूत देखा है, उसकी झलक देखी है या उसके वजूद को महसूस किया है। इसके अनेक प्रकरण संज्ञान में आए हैं। चूंकि भूत को वैज्ञानिक नजरिये से साबित नहीं किया जा सका है, इस कारण अधिसंख्य लोग ऐसे हैं, जो ये कहते हैं कि भूत कोरा वहम है, उसको कोई अस्तित्व नहीं है। यदि हम मान भी लें कि भूत नहीं होते हैं, तो भी इस बात को तो स्वीकार करते हैं कि अमुक स्थान पर जाने पर भय प्रतीत होता है। वह क्या है? समझा जाता है कि ऐसा वहां उपस्थित नेगेटिव एनर्जी की वजह से होता है।

इसी बीच इस मुद्दे पर विज्ञान ने भी काम आरंभ कर दिया है। अब तक के अध्ययन के अनुसार नकारात्मक एनर्जी को भूत कहा जा सकता है। बाकायदा एक तकनीकी डिवाइस बना ली गई है, जो नेगेटिव एनर्जी का पता लगा लेती है। यह डिवाइस इलैक्टोमेग्नेटिव फोर्स को डिटेक्ट करती है। वस्तुतः डिवाइस को मोबाइल फोन से कनैक्ट करके एक ऐप के जरिए उस दिशा में चला जाता है, जिस में ऐसा प्रतीत होता है कि वहां कुछ अज्ञात हरकत हो रही होती है। एप रेडिएशन को पकड लेता है। डिजिटल रिकॉर्डर को अईवीपी मशीन भी कहा जाता है। भूत खोजने वाले इसे भूतों वाली जगहों पर रहस्यमयी आवाजें सुनने के लिए इस्तेमाल करते हैं। कई इन्वेस्टिगेटर्स का मानना है कि इस डिजिटल रिकॉर्डर की आवाज से आत्माओं को फॉलो किया जा सकता है। कई व्लॉगर्स ने इस पर काम किया है। 

वैज्ञानिकों ने ईएमएफ मीटर बनाया है, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड और आत्माओं की एक्टिविटी को ट्रेस कर सकती है। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर्स का कहना है कि परालौकिक शक्तियों में मैग्नेटिक फील्ड को बदलने की ताकत होती है। मैग्नेटिक फील्ड के बदलते ही ये ईएमएफ मीटर इसे ट्रैक कर लेता है। पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर्स के बीच ये डिवाइस काफी फेमस है। वैज्ञानिकों ने घोस्ट बॉक्स बनाया है, जिसे फ्रैंक बॉक्स भी कहा जाता है। वह एक तरह का पोर्टेबल रेडियो है। इससे एमएम और एफएम बैंड भी कनेक्ट होता है। माना जाता है कि कई रहस्यमयी ताकतें ऑडियो संकेतों की मदद से अपना मैसेज देती हैं। इस डिवाइस का डिजिटल रिकॉर्डर की तरह उपयोग किया जा सकता है।

इसी प्रकार लेजर ग्रिड बनाई गई है। कोई अतृप्त आत्मा या शक्ति होने पर लेजर बीम जलने लगती है। इसे सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही कैमरा और कैम रिकॉर्डर भी लगाया जाता है। मार्केट में कई डिफ्रेंट फीचर्स वाले लेजर ग्रिड उपलब्ध हैं।

सामान्य आंखों से न दिखाई देने वाली आकृतियों को देखने के लिए मोशन डिटेक्टर या मोशन सेंसर का इस्तेमाल किया जाता। मान्यता है कि इस डिवाइस से ऐसी शक्तियों का आसानी से पता चल जाता है। मोशन सेंसर्स बहुत सेंसिटिव मूवमेंट्स को भी आसानी से ट्रैक कर लेते हैं।

वैज्ञानिक नजरिया है कि विद्युत आवेश से युक्त किसी वस्तु द्वारा उत्पन्न भौतिक क्षेत्र विद्युतचुम्बकीय क्षेत्र कहा जाता है। ऐसे क्षेत्र में स्थित किसी आवेशित वस्तु पर बल लगता है, चाहे यह वस्तु स्थिर हो या गतिमान। विद्युतचुम्बकीय अंतर्कि्रया प्रकृति में विद्यमान चार मूलभूत बलों में से एक है।

ज्ञातव्य है कि शार्क मछली रास्ता खोजने के लिए मैग्नेटिक फील्ड का उपयोग करती हैं। वैज्ञानिकों को अभी तक यह पता था कि समुद्री कछुए चुंबकीय संकेतों के जरिए यह जान पाते हैं कि उन्होंने हजारों दूर मील कहां अपने अंडे छिपा रखें हैं, लेकिन अभी तक यह पता नहीं चल सका था कि शार्क आखिर हजारों किलोमीटर दूर की यात्राओं में अपना रास्ता कैसे पता लगा लेती हैं। शोधकर्ताओं का पता चला है कि इसके लिए वे भी मैग्नेटिक फील्ड पर निर्भर करती हैं। वे पृथ्वी की मैग्ननेटिक फील्ड का उपयोग उनका रास्ता खोजने में करती हैं। यह एक तरह का प्राकृतिक जीपीएस है।


गुरुवार, अप्रैल 16, 2026

ताली बजाने की कीमिया बहुत दिलचस्प है

 आपको ख्याल में होगा कि जब भी आरती, भजन अथवा कीर्तन होता है तो, उसमें सभी लोग तालियां बजाते हैं। क्या आपको ख्याल है कि ताली बजाई क्यों जाती है? उसके रहस्य को जाने बिना ही परंपरा के अनुसार ताली बजाते हैं। बडी दिलचस्प बात है कि आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि जिस प्रकार व्यक्ति अपने बगल में कोई वस्तु छिपा ले और यदि दोनों हाथ ऊपर करे तो वह वस्तु नीचे गिर जायेगी। ठीक उसी प्रकार जब हम दोनों हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाते है, तो जन्मों से संचित पाप, जो हमने स्वयं अपने बगल में दबा रखे है, नीचे गिर जाते हैं अर्थात नष्ट होने लगते हैं। बताया तो यहां तक जाता है कि जब हम कीर्तन के समय हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाने में काफी षक्ति लगती है और हमारे हाथों की रेखाएं तक बदल जाती हैं।

जब हम ताली बजाते हैं, तो हथेलियां बड़ी गति से टकराती हैं और हवा का दाब अचानक बदलने से “पॉप” जैसी ध्वनि पैदा होती है। इस टकराव में लगभग 100-300 न्यूटन तक बल लग सकता है। ध्वनि तरंगें पैदा होकर तेजी से फैलती हैं, जिससे अन्य लोगों में भी ताली बजाने की प्रेरणा होती है। ताली बजाने से डोपामीन (खुशी का हार्मोन) रिलीज होता है। इससे उत्साह, अपनापन और सामूहिक ऊर्जा बढ़ती है। इससे शरीर में रक्त संचार बढ़ता है, तनाव कम होता है। समूह में ताली बजाने से सिंक्ट्रनाइजेशन प्रभाव होता है। लोग एकसाथ जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। ताली मूल रूप से सबसे प्राचीन वाद्य यंत्र है। “ताल” का शब्द ही “ताली” से जुड़ा है। नृत्य, भजन, कथक आदि में ताल संकेत करने का पहला साधन ताली ही है।

वस्तुतः हथेली में 30 से अधिक प्रमुख दबाव बिंदु होते हैं। एक्यूप्रेशर सिद्धांत के अनुसार मनुष्य को हाथों में पूरे शरीर के अंग व प्रत्यंग के दबाव बिंदु होते हैं, जिनको दबाने पर सम्बंधित अंग तक खून व ऑक्सीजन का प्रवाह पहुंचने लगता है और धीरे-धीरे वह रोग ठीक होने लगता है।

ताली में बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ की चारों अंगुलियों को एक साथ तेज दबाव के साथ इस प्रकार मारा जाता है कि दबाव पूरा हो और आवाज अच्छी आए। इस प्रकार की ताली से बाएं हथेली के फेफड़े, लीवर, पित्ताशय, गुर्दे, छोटी आंत व बड़ी आंत तथा दाएं हाथ की अंगुली के साइनस के दबाव बिंदु दबते हैं और इससे इन अंगों तक खून का प्रवाह तीव्र होने लगता है। इस प्रकार की ताली को तब तक बजाना चाहिए जब तक कि हथेली लाल न हो जाए। इस प्रकार की ताली कब्ज, एसिडिटी, मूत्र, संक्रमण, खून की कमी व श्वांस लेने में तकलीफ जैसे रोगों में लाभ पहुंचाती है।

दूसरे किस्म की ताली:- दोनों हाथों के अंगूठा-अंगूठे से कनिष्का-कनिष्का से तर्जनी-तर्जनी से यानी कि सभी अंगुलियां अपने समानांतर दूसरे हाथ की अंगुलियों पर पड़ती हों, हथेली-हथेली पर पड़ती हो। इस प्रकार की ताली की आवाज बहुत तेज व दूर तक जाती है। इस प्रकार की ताली कान, आंख, कंधे, मस्तिष्क, मेरूदंड के सभी बिंदुओं पर दबाव डालती है। इस ताली का सर्वाधिक लाभ फोल्डर एंड सोल्जर, डिप्रेशन, अनिद्रा, स्लिप डिस्क, स्पोगोलाइसिस, आंखों की कमजोरी में पहुंचता है। इस ताली से अन्य अंगों के दबाव बिंदु सक्रिय हो उठते हैं।यह ताली सम्पूर्ण शरीर को सक्रिय करने में मदद करती है। यदि इस ताली को तेज व लम्बा बजाया जाता है तो शरीर में पसीना आने लगता है, जिससे शरीर के विषैले तत्व पसीने से बाहर आकर त्वचा को स्वस्थ रखते हैं। अतः ताली बजाना एक उत्कृष्ट व्यायाम है। रक्त का शुद्धिकरण बढ़ जाता है और हृदय रोग, रक्त नलिकाओं में रक्त का थक्का बनना रुकता है। रक्त के श्वेत रक्तकण सक्षम तथा सशक्त बनने के कारण शरीर में चुस्ती, फुर्ती तथा ताजगी का एहसास होता है। रक्त में लाल रक्तकणों की कमी दूर होकर वृद्धि होती है और स्वास्थ्य सुधरता है। इस तरह ताली दुनिया का सर्वोत्तम एवं सरल सहज योग है और प्रतिदिन नियमित रूप से ताली बजाकर कई रोग दूर किए जा सकते हैं।


सोमवार, अप्रैल 13, 2026

पूजा के दौरान नारियल खराब निकलना अशुभ अथवा शुभ

पूजा के दौरान नारियल खराब यानि अंदर से सूखा, काला या सड़ा हुआ निकलने को कुछ लोग षुभ मानते हैं तो कुछ लोग अषुभ। अक्सर लोगों को अशुभ लगता है, लेकिन इसका अर्थ पूरी तरह नकारात्मक नहीं होता। इसके पीछे धार्मिक और व्यावहारिक, दोनों तरह की व्याख्याएं हैं। धार्मिक दृष्टिकोण के अनुसार नारियल को “श्रीफल” कहा जाता है। यह भगवान को अर्पित सबसे पवित्र फल माना जाता है। मान्यता है कि नारियल फोड़ना अहंकार त्यागने का प्रतीक है। यदि नारियल खराब निकलता है, तो कुछ लोग इसे ऐसे मानते हैं कि भगवान ने आपकी कोई नकारात्मक ऊर्जा या बाधा अपने ऊपर ले ली, यानी यह अशुभ नहीं, बल्कि शुद्धिकरण का संकेत भी हो सकता है। इसलिए कई पंडित इसे “बाधा टलने” का संकेत मानते हैं, न कि दुर्भाग्य।

कुछ परंपराओं में इसे पूजा में कमी, मन की अशुद्धि या संकेत माना जाता है। खासकर यदि बार-बार ऐसा हो, तो लोग इसे सावधानी का संकेत समझते हैं। लेकिन ये मान्यताएँ स्थानीय और परंपरागत हैं, कोई सार्वभौमिक नियम नहीं।

जहां तक व्यावहारिक यानि वैज्ञानिक कारण का सवाल है कि नारियल लंबे समय तक रखने से अंदर से सूख या खराब हो सकता है। बाहर से सही दिखने के बावजूद अंदर खराब होना प्राकृतिक प्रक्रिया है। यानी इसका पूजा या भाग्य से सीधा संबंध जरूरी नहीं।

अब सवाल यह कि क्या करें अगर नारियल खराब निकले? घबराएं नहीं, इसे अशुभ मानकर डरने की जरूरत नहीं। भगवान से प्रार्थना करके दूसरा नारियल अर्पित कर सकते हैं। मन में सकारात्मक भावना रखें, भाव ही सबसे महत्वपूर्ण है। कुल मिला कर नारियल खराब निकलना न तो पूरी तरह अशुभ है, न निश्चित रूप से शुभ। यह अधिकतर आपकी श्रद्धा और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। धर्म में “भाव” प्रधान होता है, वस्तु नहीं।


रविवार, अप्रैल 12, 2026

क्या सपना सच हो सकता है?

 नींद और स्वप्न दोनों ही रहस्यमय लगते हैं, इसलिए जब कोई सपना सच निकल आता है, तो स्वाभाविक सा प्रश्न उठता है कि क्या सपने सचमुच भविष्य का पूर्वानुमान होता है? क्या सपना सच हो सकता है?

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सपना दिमाग की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि पैटर्न-रिकॉग्निशन है। दरअसल हमारा दिमाग दिनभर की घटनाओं, चिंताओं, इच्छाओं और अधूरे कामों को नींद में व्यवस्थित करता है। इस दौरान वह संभावित भविष्य के परिदृष्यों का भी ‘सिमुलेशन’ करता है, जैसे अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा। कभी-कभी यह ‘सिमुलेशन’ वास्तविक जीवन की किसी घटना से मेल खा जाता है। हमें लगता है कि सपना सच हो गया, जबकि वास्तव में यह दिमाग की संभावनाओं का अनुमान था, भविष्य का ज्ञान नहीं। इसे मनोविज्ञान में प्रोस्पेक्टिव डीमिंग कहा जाता है, अर्थात वह सपना देखना, जिसमें दिमाग भविष्य की संभावनाओं को मिलाकर कोई दृश्य बनाता है।

कभी-कभी हम जीवन में कुछ संकेत पहले ही देख-समझ चुके होते हैं, जैसे किसी की तबियत बिगड़ना, किसी घटना के संकेत, रिश्तों में तनाव, पर जागृत अवस्था में उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। अवचेतन इन्हीं संकेतों को जोड़ कर सपना बना देता है। वास्तविक घटना होने पर लगता है कि सपना भविष्यवाणी था। यह अंतर्ज्ञान या इंन्ट्यूषन और इम्प्लिसिट लर्निंग का मामला है, न कि अलौकिक पूर्वज्ञान।

भारतीय परंपरा में तो स्वप्न विज्ञान का विस्तृत उल्लेख है। बाकायदा षुभ व अषुभ स्वप्न का वर्णन है। विस्तार में जाएं तो हर सपने का फल बताया जाता है। हालांकि उसका वैज्ञानिक आधार नहीं है, मगर उस पर लोगों का बहुत यकीन है। 

सपनों के दो प्रकार बताए गए हैं। एक दैनिक चिंताओं के सपने, जो सामान्य व अर्थहीन माने जाते हैं। वस्तुतः वह मनोवैज्ञानिक लिहाज से वह अवचेतन की अभिव्यक्ति है। दूसरा, आंतरिक चेतना का संकेत और शुभ-अशुभ स्वप्न, जिसका आध्यात्मिक साहित्य में वर्णन मिलता है। ये पूर्वानुमान नहीं, बल्कि चेतन-अवचेतन संवाद माने गए हैं।

हालांकि अब तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि सपने भविष्य की घटनाओं को देख सकते हैं, लेकिन सपनों में भावी डर, भविष्य की योजना और संभावित घटनाओं का अनुमान अवश्य शामिल होता है, जिसे हम कभी-कभी पूर्वानुमान समझ बैठते हैं। कुल मिला कर सपने भविष्य नहीं बताते, लेकिन दिमाग भविष्य के बारे में सोच कर जो दृश्य बनाता है, वह कभी सच्चाई से मिलता-जुलता हो जाता है। इसे हम “पूर्वानुमान” समझ लेते हैं, जबकि यह अवचेतन की संभावनाओं का खेल होता है।

आइये, कुछ विश्व-प्रसिद्ध सपनों के उदाहरण देखें, जो साकार हुए।

डीएनए की संरचना खोजने में लगे जेम्स वाटसन ने एक रात सांपों के दो फंदों के रूप में कुंडलित होकर घूमने का सपना देखा। इससे उन्हें डबल हेलिक्स संरचना की प्रेरणा मिली। अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन ने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले सपना देखा कि व्हाइट हाउस में एक ताबूत रखा है और लोग रो रहे हैं। उन्होंने यह बात पत्नी और मित्रों से भी कही थी। कुछ ही दिनों बाद उनकी हत्या हो गई। भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन बताते थे कि कई बार उन्हें देवी नामगिरी सपने में गणितीय सूत्र बताती थीं। जागने पर वे उन्हें लिखते और वे सही साबित होते।


शनिवार, अप्रैल 11, 2026

ज्योतिषी के लिए आस्तिक होना जरूरी नहीं?

क्या आपको इस बात पर यकीन होगा कि कोई नास्तिक भी ज्योतिश का प्रकांड पंडित हो सकता है। जाहिर है, आप यही कहेंगे कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है। जो आस्तिक नहीं, उसे ज्योतिष का ज्ञान आ ही कैसे सकता है। मगर सच ये है कि ऐसा संभव होते देखा है मैने। मेरे एक अभिन्न मित्र नास्तिक हैं, बचपन से। कभी कोई पूजा-पाठ नहीं करते। न दीया जलाते हैं और न ही अगरबत्ती। एक बार उनकी पत्नी ने मुझ से कहा कि घर में शांति नहीं है, कोई न कोई दोष है, मगर मेरे पति नास्तिक हैं और कोई ज्योतिषीय उपाय या टोना-टोटका करने को तैयार नहीं हैं। आप उन्हें मनाइये। मैने उन्हें जैसे तैसे तैयार किया और एक ज्योतिषी के पास ले गया। रास्ते में उन्होंने कहा कि वे भले ही हमारे कहने पर कोई रत्न धारण लेंगे, मगर उसे पत्थर जान कर। समझा जा सकता है कि वे कितने घोर नास्तिक थे। दिलचस्प बात यह है कि ज्योतिषी के बताए उपाय करने से उनके घर में शांति हो गई, फिर भी वे आस्तिक नहीं हो पाए। आप यह जान कर चकित होंगे कि बाद में नास्तिक होते हुए भी उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया और आज हस्तरेखा व कुंडली के प्रकांड विद्वान हैं। सटीक भविष्यवाणी किया करते हैं। दिलचस्प बात ये है कि खुद टोने-टोटके में यकीन नहीं करते, मगर जिज्ञासु को उसका उपाय बताते हैं। जाहिर है कि भले ही वे ग्रहों और देवी-देवताओं के प्रति आस्था न रखते हों, मगर पूर्व में स्थपित सिद्धांतों का सहारा लेते हैं कि कदाचित वे सही हों। मैं तब अचंभित रह गया, जब उन्होंने एक सुपरिचित ज्योतिषी को उनकी हथेली देख कर बता दिया था अमुक दिन आपका एक बडा ऑपरेशन होगा, जबकि स्वयं ज्योतिषी को इसकी जानकारी नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिष विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है, जैसे एमबीबीएस। एमबीबीएस करने के लिए धार्मिक होने की कोई जरूरत नहीं, ठीक इसी प्रकार ज्योतिर्विद्या सीखने के लिए आस्तिक होना जरूरी नहीं। अधार्मिक व नास्तिक चिकित्सक भी बेहतरीन उपचार कर सकता है। लेकिन साथ ही यह भी दिलचस्प है कि चिकित्सक भी कोई ऑपरेशन करने से पहले यह कहते सुने गए हैं कि मैं उपचार कर रहा हूं, मगर ठीक भगवान की कृपा से होगा।

इस मसले का दूसरा पक्ष यह है कि आस्तिक ज्योतिषी भविष्यवाणी करते वक्त ज्योतिष विज्ञान के साथ अंतर्दृश्टि का उपयोग भी किया करते हैं। इंट्यूशन से भी संकेत हासिल करते हैं। कई ज्योतिषी भविष्यवाणी करते से पहले अपने इष्ट व गुरू का स्मरण करते हैं, ताकि भविष्यवाणी में उनका भी सहयोग मिले और भविष्यवाणी में कोई त्रुटि न हो। कुछ लोगों का मानना है कि अंतर्दृश्टि के लिए धार्मिक होना जरूरी नहीं है। अधार्मिक व नास्तिकों में भी अंतर्दृश्टि होने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। मैं निजता की रक्षा करते हुए नास्तिक ज्योतिषी का नाम उजागर नहीं करूंगा। मेरा मकसद सिर्फ ज्योतिष को विशुद्ध विज्ञान होने को आपसे साझा करना है।


सोमवार, अप्रैल 06, 2026

दुनिया का पहला परमाणु बम छोड़ा था अश्वत्थामा ने

वैज्ञानिक मानते हैं कि महाभारत काल में परमाणु बम का प्रयोग हुआ था। एक शोधकार्य के अनुसार महाभारत के समय जो ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल किया गया था, वह परमाणु बम के समान ही था। संभवतः दुनिया का पहला परमाणु बम छोड़ा था अश्वत्थामा ने। रामायण काल में भी मेघनाद से युद्ध हेतु लक्ष्मण ने जब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि अभी इसका प्रयोग उचित नहीं, क्योंकि इससे पूरी लंका साफ हो जाएगी। यह अस्त्र रामायण काल में छूटने से बच गया, लेकिन महाभारत काल में कौरव और पांडवों के युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया।

महाभारत का युद्ध आज से लगभग 5,300 वर्ष पूर्व हुआ था। उस दौरान गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा ने भगवान कृष्ण के मना करने के बावजूद ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। असल में अपने पिता के मारे जाने के बाद अश्वत्थामा बदले की आग में जल रहा था। उसने पांडवों का समूल नाश करने की प्रतिज्ञा ली और चुपके से पांडवों के शिविर में पहुंचा और कृपाचार्य तथा कृतवर्मा की सहायता से उसने पांडवों के बचे हुए वीर महारथियों को मार डाला। केवल यही नहीं, उसने पांडवों के पांचों पुत्रों के सिर भी काट डाले। अंत में अर्जुन की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की उसे याद आई। पुत्रों की हत्या से दुखी द्रौपदी विलाप करने लगी। अर्जुन ने जब यह भयंकर दृश्य देखा तो उसका भी दिल दहल गया। उसने अश्वत्थामा के सिर को काटने की प्रतिज्ञा ली। अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर अश्वत्थामा वहां से भाग निकला। श्रीकृष्ण को सारथी बनाकर अर्जुन ने उसका पीछा किया। अश्वत्थामा को कहीं भी सुरक्षा नहीं मिली तो अंत में उसने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाना तो जानता था, पर उसे लौटाना नहीं जानता था। उस अति प्रचंड तेजोमय अग्नि को अपनी ओर आता देख अर्जुन भयभीत हो गया और उसने श्रीकृष्ण से विनती की। श्रीकृष्ण बोले, है अर्जुन! तुम्हारे भय से व्याकुल होकर अश्वत्थामा ने यह ब्रह्मास्त्र तुम पर छोड़ा है। इस ब्रह्मास्त्र से तुम्हारे प्राण घोर संकट में हैं। इससे बचने के लिए तुम्हें भी अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा, क्योंकि अन्य किसी अस्त्र से इसका निवारण नहीं हो सकता। दोनों द्वारा छोड़े गए इस ब्रह्मास्त्र के कारण लाखों लोगों की जान चली गई थी। अश्वत्थामा ने पांडवों के समूल नाश के लिए इस अस्त्र के एक रूप का उत्तरा के गर्भ पर भी प्रयोग किया था। जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब कृष्ण ने अश्वत्थामा से कहा- उत्तरा को परीक्षित नामक बालक के जन्म का वर प्राप्त है। उसका पुत्र तो होगा ही। यदि तेरे शस्त्र-प्रयोग के कारण मृत हुआ तो भी मैं उसे जीवित कर दूंगा। वह भूमि का सम्राट होगा और नीच अश्वत्थामा, तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ 3,000 वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध निःसृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।

बताते हैं कि रामायणकाल में जहां यह विभीषण और लक्ष्मण के पास यह अस्त्र था, वहीं महाभारतकाल में यह द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न और अर्जुन के पास था। अर्जुन ने इसे द्रोण से पाया था। द्रोणाचार्य को इसकी प्राप्ति राम जामदग्नेय से हुई थी। ऐसा भी कहा गया है कि अर्जुन को यह अस्त्र इंद्र ने भेंट किया था।


रविवार, अप्रैल 05, 2026

जनेऊ संस्कार का क्या महत्व है?

जनेऊ संस्कार, जिसे उपनयन संस्कार भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह बालक के जीवन में शिक्षा और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। जनेऊ संस्कार में बालक को यज्ञोपवीत यानि जनेऊ धारण कराया जाता है। इसके साथ ही उसे गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है और उसे आधिकारिक रूप से “विद्यार्थी” घोषित किया जाता है। उपनयन यानि उप व नयन, इसका अर्थ होता है, गुरु के पास ले जाना, ज्ञान की ओर अग्रसर करना। परंपरागत रूप से ब्राह्मण बालक का 8 वर्ष के आसपास, क्षत्रिय का 11 वर्ष व वैष्य का 12 वर्ष की उम्र में जनेउ संस्कार होता है। हालांकि आजकल यह उम्र और परंपराएं परिवार अनुसार बदल जाती हैं।

अब जानते हैं कि जनेऊ का महत्व क्या है? जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो कई अर्थों का प्रतीक हैं। एक देव ऋण (ईश्वर के प्रति कर्तव्य),  दूसरा पितृ ऋण (पूर्वजों के प्रति कर्तव्य) और तीसरा ऋषि ऋण (ज्ञान देने वालों के प्रति कर्तव्य)। कुछ लोग इसे सत्त्व, रज और तम (तीन गुणों) का प्रतीक भी मानते हैं। इस संस्कार में पहले स्नान और शुद्धि की जाती है। फिर यज्ञ (हवन) होता है। फिर गुरु द्वारा जनेऊ धारण कराया जाता है। गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है। इसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्वयह है कि यह बचपन से जिम्मेदारी की ओर कदम है। यह व्यक्ति को अनुशासन, अध्ययन और धर्म पालन के लिए प्रेरित करता है। इसे “दूसरा जन्म” (द्विज) भी कहा जाता है। आज के समय में इसे कई लोग सांस्कृतिक परंपरा के रूप में निभाते हैं। कुछ इसे आध्यात्मिक अनुशासन की शुरुआत मानते हैं। वहीं कुछ लोग इसे जाति आधारित परंपरा मानकर इसकी आलोचना भी करते हैं। सिंधी समाज में ब्राह्मण परंपरागत रूप से जनेऊ संस्कार करते रहे हैं,

जबकि अधिकतर सिंधी व्यापारी, भाईबंद, लोहाणा आदि समुदायों में यह परंपरा आम तौर पर नहीं रही। यानी, यह पूरे सिंधी समाज का अनिवार्य संस्कार कभी नहीं रहा। सिंधी समुदाय में विवाह के अवसर पर भी प्रतीकात्मक रूप से जनेउ धारण करवाने की परंपरा है।


सोमवार, मार्च 30, 2026

श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंख क्यों?

आपने देखा होगा कि भगवान श्रीकृष्ण के सभी चित्रों में सिर पर मोर पंख होता है। क्या कभी ख्याल आया कि ऐसा क्यों? वस्तुतः श्रीकृष्ण के सिर पर लगा मोर पंख केवल सजावट नहीं है, इसके पीछे गहरा धार्मिक, प्रतीकात्मक, दार्शनिक और प्राकृतिक अर्थ निहित है। परंपरा, पुराण, लोककथा और मनोविज्ञान, चारों स्तर पर इसके सुंदर अर्थ मिलते हैं। एक कथा के अनुसार एक दिन गोपियां श्रीकृष्ण के लिए फूल चुन रही थीं, ताकि वे उनके लिए सुंदर मुकुट बना सकें। श्रीकृष्ण यह देखकर मुस्कुरा उठे और बोले, “मेरे लिए इतने सुंदर फूल क्यों?” गोपियां बोलीं, “क्योंकि आप हमें प्रिय हैं।” कृष्ण ने उत्तर दिया, “जो भी बिना अहंकार के प्रेम देता है, मैं वही पहनता हूं।” तभी पास खड़ा मोर अपना सुंदर पंख गिरा देता है। श्रीकृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर लगा लिया। इसी क्षण से मोरपंख उनका प्रिय अलंकार बन गया। कथा है कि मथुरा-वृंदावन में मानसून आने पर मोर प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे। श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी बजानी शुरू की। बांसुरी की ध्वनि से मोर इतना मोहित हुए कि नाचते-नाचते उन्होंने अपना सुंदर पंख कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। कृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर रख कर कहा, “यह मेरे मित्र का प्रेम है।” इसलिए उन्हें ‘मोर मुकुटधारी’ कहा जाता है।

ज्ञातव्य है कि पुराणों में मोर पंख को शुभ माना गया है। मोर पंख में तीन आंखों जैसे चिह्न होते हैं, जो कि ज्ञान, कर्म और भक्ति के प्रतीक हैं। मोर पंख सात रंगों से बना है, जो सात चक्रों और सात भावों का प्रतीक है। इसलिए इसे धारण करना धर्म, सौंदर्य और संतुलन का चिन्ह माना जाता है। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि श्रीकृष्ण अपने सिर पर वनमालाएं, वनफूल, तथा मोरपंख का अलंकार धारण करते थे। यह उनके साधारण, सहज, प्रकृति के निकट और सबके मित्र होने का संकेत है।

एक अन्य कथा कहती है कि जब कंस ने कृष्ण की पहचान करने के लिए दूत भेजे, तब नंदगांव के लोगों ने कृष्ण के सिर पर मोरपंख लगाया, ताकि वे साधारण ग्वालबाल की तरह लगें। यही ‘वेशभूषा’ बाद में उनकी अलंकार-परंपरा बन गई। मोरपंख का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मोर पंख जितना सुंदर है, उतना ही हल्का, इसके पीछे यह शिक्षा दी जाती है कि सुंदरता का अहंकार नहीं होना चाहिए। भारतीय परंपरा में मोर पंख को नजर दोष हटाने वाला, सकारात्मक ऊर्जा देने वाला और दिव्य कंपन पैदा करने वाला माना गया है। यही वजह है कि इसे लोग घर के मंदिर में रखते हैं। मोर पंख में सकारात्मक ऊर्जा की वजह से ही तांत्रिक व ओझा झाडफूंक के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसी प्रकार जैन संतों की “पिच्छी” (या पिच्छिका) एक अत्यंत पवित्र और अहिंसक उपकरण है। यह मोर के गिरे हुए पंखों से बनाई जाती है, केवल स्वाभाविक रूप से झड़े हुए पंख, न कि किसी मोर को नुकसान पहुंचा कर। दिगम्बर और श्वेताम्बर परंपराओं में इसके आकार-विन्यास में कुछ अंतर हो सकते हैं, पर सामग्री मोरपंख ही होती है। जैन मुनि इसे अहिंसा के लिए प्रयोग करते हैं, जैसे बैठने से पहले छोटे जीवों को हटाने हेतु ताकि अनजाने में हिंसा न हो।

शनिवार, मार्च 28, 2026

अब भी संजीवनी बूटी मौजूद है?

कहते हैं कि हिमालय में एक ऐसी बूटी पाई जाती है, जिसके बल पर मृत व्यक्ति को भी जिंदा किया जा सकता है। “संजीवनी बूटी” के बारे में हमारी जानकारी पुराणों, रामायण और कुछ स्थानीय परंपराओं से आती है। 

वाल्मिकी रामायण अनुसार मूर्च्छित लक्ष्मण के लिए हनुमानजी यह बूटी लेकर आए थे। जब लक्ष्मण मेघनाद (इंद्रजीत) के बाण से घायल होकर बेहोश हो गए थे, तो हनुमानजी को “संजीवनी बूटी” लाने के लिए हिमालय की द्रोणगिरि पर्वत भेजा गया। कहा जाता है, हनुमान पूरे पर्वत को ही उठा लाए क्योंकि उन्हें सही बूटी पहचान में नहीं आई। उस बूटी से लक्ष्मण फिर जीवित हो गए। इसका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इनमें जीवनदायिनी, पुनर्जीवित करने वाली या अत्यंत शक्तिशाली औषधीय गुण पाए जाते हैं।

इस बूटी के दम पर ही शुक्राचार्य ने देवासुर संग्राम में असुरों को जीवित कर दिया था। आजकल वैज्ञानिक पारे, गंधक और आयुर्वेद में उल्लेखित कई प्रकार की जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं और इसके चमत्कारिक परिणाम भी निकले हैं, लेकिन जहां तक सवाल संजीवनी बूटी का है तो यह शोध और खोज का विषय है। वैज्ञानिक दृष्टि से अब तक ऐसी किसी जड़ी-बूटी का पक्का प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि, उत्तराखंड और हिमालय के कई हिस्सों में कुछ दुर्लभ औषधीय पौधे हैं, जिनको “संजीवनी” नाम से जाना जाता है क्योंकि वे सूख जाने पर भी पानी मिलने पर फिर हरे हो जाते हैं और उनमें उच्च औषधीय गुण पाए जाते हैं। जिससे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति बढती है। इससे बुखार, थकान और मानसिक तनाव में राहत मिलती है। यह घाव भरने और कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने में सहायक होती है। इसी प्रकार ऑर्किड वर्ग की जड़ी उत्तराखंड, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती है। चीनी व तिब्बती चिकित्सा में इसे “जीवनवर्धक औषधि” कहा जाता है। यह ऊर्जा, पाचन और प्रतिरक्षा को बढ़ाती है। यह षरीर में जीवन षक्ति संतुलित करती है। इसी प्रकार एरिथ्रिना इंडिका, जिसे हम पारिजात या भारतीय कोरल वृक्ष के रूप में जानते हैं। इसमें एनाल्जेसिक यानि दर्द निवारक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। कभी-कभी लोक चिकित्सा में इसे “संजीवनी वृक्ष” कहा जाता है। हिमालयी क्षेत्र में एंजेलिका ग्लौका जडी पाई जाती है। यह अत्यंत सुगंधित औषधीय पौधा है। तंत्रिका तंत्र और श्वसन तंत्र को सुदृढ़ करता है। 

इसी प्रकार जिनसेंग एक प्रसिद्ध चीनी औषधीय जड़ी है, जिसका उपयोग सदियों से ऊर्जा बढ़ाने, थकान घटाने और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए किया जाता है। इसको अक्सर “मल्टीविटामिन फॉर्मूले” में डाला जाता है, क्योंकि यह शरीर की जीवन शक्ति बढ़ाने में मदद करती है। लोकप्रिय ब्रांड रिवाइटल व एक्सप्लोड में यह पायी जाती है। मगर अत्यधिक सेवन से नींद न आना, उच्च रक्तचाप या बेचैनी जैसी समस्या हो सकती है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं लेना चाहिए। एस्टागेलस मेम्बरानासिइस जड़ी पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग होती है, जैसे कि इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए। पॉलीगोनम मल्टिफोरम जडी पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग होती है, विशेष रूप से “जीर्णता” को धीमा करने के लिए, बालों को काला करने, और लम्बी उम्र के लिए। परन्तु ये सभी पौधे रामायण की “संजीवनी” नहीं माने जा सकते, केवल प्रतीकात्मक रूप से उनसे जोड़े जाते हैं।

शुक्रवार, मार्च 27, 2026

मुण्डन संस्कार क्यों कराया जाता है?

मुण्डन संस्कार को चूड़ाकरण संस्कार या चौलकर्म भी कहते हैं, जिसका अर्थ है, वह संस्कार जिसमें बालक को चूड़ा अर्थात् शिखा दी जाता है। बच्चे का मुण्डन संस्कार कराने के पीछे हमारे ऋषि-मुनियों की बहुत गहरी सोच थी। माता के गर्भ से आए सिर के बाल अपवित्र माने गये हैं। इनके मुण्डन का उद्देश्य बालक की अपवित्रता को दूर कर उसे अन्य संस्कारों वेदारम्भ, यज्ञ आदि के योग्य बनाना है क्योंकि मुण्डन करते हुए यह कहा जाता है कि इसका सिर पवित्र हो, यह दीर्घजीवी हो। अतः यह बालक के स्वास्थ्य व शरीर के लिए नया संस्कार है।

दूसरी बात, गर्भ के बाल झड़ते रहते हैं, जिससे शिशु के तेज की वृद्धि नहीं हो पाती है। इन केशों को मुंडवा कर शिखा रखी जाती है। कहीं-कहीं पर पहले मुण्डन में नहीं वरन् दूसरी बार के मुण्डन में शिखा छोड़ते हैं। शिखा से आयु और तेज की वृद्धि होती है। मुण्डन बालिकाओं का भी होता है, किन्तु उनकी शिखा नहीं छोड़ी जाती है ।

शास्त्रों में जन्मकालीन बालों का बच्चे के प्रथम, तीसरे या पांचवे वर्ष में या कुल की परम्परानुसार शुभ मुहुर्त में मुण्डन करने का विधान है। जन्म से तीसरे वर्ष में मुण्डन संस्कार उत्तम माना गया है। पांचवे या सातवें वर्ष में मध्यम और दसवें व ग्यारहवें वर्ष में मुण्डन संस्कार करना निम्न श्रेणी का माना जाता है। बच्चे का मुण्डन शुभ मुहुर्त में किसी देवी-देवता या कुल देवता के स्थान पर या पवित्र नदी के तट पर कराया जाता है। अपने गोत्र की परम्परानुसार मुण्डन करके बालों को नदी के तट पर या गोशाला में गाड़ दिया जाता है। कहीं-कहीं कुल देवता को ये बाल समर्पित कर फिर उन्हें विसर्जित किया जाता है। सिंधी समाज में एक मुंडन घर पर और दूसरा धर्म स्थल पर करने की परंपरा रही है। मुण्डन करने के बाद बच्चे के सिर पर दही-मक्खन, मलाई या चंदन लगाया जाता है। कुछ लोग मुण्डन के बाद बालक को स्नान करा कर सिर पर स्वास्तिक बना देते हैं। मुण्डन में अपने परिवार की परम्परा और रीतियों के अनुसार ही पूजा-पाठ और दान-पुण्य व अन्य मांगलिक कार्य किए जाते हैं। आचार्य चरक ने मुण्डन संस्कार का महत्व बताते हुए कहा है कि इससे बालक की आयु, पुष्टि, पवित्रता और सौन्दर्य में वृद्धि होती है। मुण्डन संस्कार के अनेक मन्त्रों का भी यही भाव है कि सूर्य, इन्द्र, पवन आदि सभी देव तुझे दीर्घायु, बल और तेज प्रदान करें। कई लोग कोई मनोकामना पूरी होने पर भी भगवान का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए मुंडन करवाते हैं।

भारत में सिर मुंडवाना कई धार्मिक स्थलों और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। तिरुपति बालाजी में मन्नत पूरी होने पर या कृतज्ञता स्वरूप भगवान वेंकटेश्वर को केश अर्पण की परंपरा है। गया में पितृ श्राद्ध और पिंडदान हेतु कई लोग मुंडन कराते हैं।

हरिद्वार में श्राद्ध व अस्थि विसर्जन के समय गंगा स्नान के साथ मुंडन कराया जाता है। प्रयागराज संगम तट पर पितृ कर्म, कल्पवास, कुंभ पर्व पर मुंडन कराया जाता है। वाराणसी मोक्ष नगरी में श्राद्ध, तर्पण और मुंडन कराया जाता है। पुष्कर पितृ कर्म और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान मुंडन की परंपरा है। सोमनाथ में विशेषकर पितृ दोष निवारण के लिए मुंडन करवाते हैं। रामेश्वरम धाम में पितृ तर्पण, सेतु स्नान के साथ मुंडन करवाते हैं। कई लोग उज्जैन के महाकालेश्वर में श्राद्ध और ग्रह शांति के अवसर पर और चित्रकूट में पितृ तर्पण व मुंडन करवाते हैं।

इसी प्रकार जैन धर्म में दीक्षा के समय केश-लोचन कराया जाता है। बौद्ध परंपरा में संन्यास दीक्षा में सिर मुंडन कराया जाता है।

गुरुवार, मार्च 26, 2026

तुलसी वास्तु दोष भी दूर करती है

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपके घर, परिवार या आप पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित तुलसी के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार माना जाए तो ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है, वहां लक्ष्मी जी का निवास नहीं होता। अगर ज्योतिष की माने तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता है। बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। बुध के प्रभाव से पौधे में फल फूल लगने लगते हैं। शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते हैं, उनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से विद्यमान है। सबके गुण अलग अलग है।

विद्वान बताते हैं कि प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते है। घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है। 

शास्त्रों के अनुसार वास्तु दोष को दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व से लेकर वायव्य उत्तर-पश्चिम तक लगा सकते हैं। तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होती है। पूर्व दिशा की खिडकी के पास रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है। यदि घर की कोई सन्तान अपनी मर्यादा से बाहर है, अर्थात नियंत्रण में नहीं है तो पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते किसी ना किसी रूप में सन्तान को खिलाने से सन्तान आज्ञानुसार व्यवहार करने लगती है। कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करने से विवाह जल्दी और अनुकूल स्थान में होता है। यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम में रखे तुलसी कि गमले पर प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करे व मिठाई का भोग रख कर किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से व्यवसाय में सफलता मिलती है।

समानांतर ब्रह्मांड का वजूद है?

पिछले दिनों सपने के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि एक और दुनिया में विचरण कर रहा हूं। मगर ठीक वैसी ही, जैसी कि हमारी दुनिया है। वहां घटनाएं ठीक वैसी घट रही हैं, जैसी इस दुनिया में घट चुकी हैं। फर्क सिर्फ यही है कि वह दुनिया कुछ और रंगीन है, कुछ और सजीव। तब ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी दुनिया की तरह, ठीक इस जैसी दुनिया भी कहीं और मौजूद है? यानि कि इसकी कॉपी है। इस सिलसिले में कुछ विद्वानों से चर्चा की। साथ ही इंटरनेट पर सर्च किया तो पाया कि कुछ वैज्ञानिक पेरेलल यूनिवर्स की अवधारणा रखते हैं, लेकिन उसे अब तक साबित नहीं किया जा सका है। वैज्ञानिक संदर्भ में पेरेलल यूनिवर्स उस विचार को कहते हैं, जिसमें हमारा ब्रह्मांड एक मात्र नहीं है, बल्कि कई ब्रह्मांड मौजूद हैं, जिनमें अलग-अलग नियम, अवस्थाएं या इतिहास हो सकते हैं।

यह विचार मुख्य रूप से कुछ उन्नत भौतिक सिद्धांतों, जैसे स्ट्रिंग थ्योरी, क्वांटम मैकेनिक्स के कुछ व्याख्याओं से आता है। इसे सार्वभौमिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। कुछ प्रमुख सिद्धांतों में यह संभावित व्याख्या के रूप में स्वीकार किया जाता है। अभी तक प्रत्यक्ष रूप से कोई अनुभवजन्य सबूत नहीं मिला है कि समानांतर ब्रह्मांड सच में मौजूद हैं। असल में क्वांटम मल्टीवर्ल्ड इंटरप्रिटेशन क्वांटम भौतिकी की एक व्याख्या है, जिसमें हर क्वांटम घटना के लिए ब्रह्मांड विभाजित हो जाता है। इससे बहु-ब्रह्मांड का ख्याल आता है। लेकिन, यह व्याख्या सत्यापित नहीं हुई है।

कुछ ब्रह्मांड शास्त्रियों ने सुझाव दिया है कि बिग बैंग जैसी घटनाओं से अलग-अलग बबल यूनिवर्स बन सकते हैं। फिर भी अब तक कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं। वैज्ञानिक समुदाय में तीन मुख्य स्थितियाँ पाई जाती हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे संभव मानते हैं, पर असिद्ध। कुछ कहते हैं कि यह व्यर्थ कल्पना है, जब तक कोई परीक्षण नहीं मिल जाता। कुछ मानते हैं कि यह क्वांटम और ब्रह्मांड शास्त्र की बेहतर समझ की दिशा में एक वैध विचार है। कुल मिलाकर वैज्ञानिकों ने इसे विचार के रूप में लिया है। कुछ सिद्धांत इसे संभावित मानते हैं। लेकिन इसे अभी तक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। इस सिलसिले में ब्रह्माकुमारीज का एक प्रमुख सिद्धांत कालचक्र से जुड़ा है। उनके अनुसार यह सृष्टि एक निश्चित, चक्रीय क्रम में चलती है और हर चक्र के बाद वही घटनाएँ, वही आत्माएँ और वही भूमिकाएँ फिर से बिल्कुल उसी प्रकार दोहराई जाती हैं। उनके मतानुसार सृष्टि का एक पूरा चक्र 5000 वर्ष का होता है। इस चक्र में चार युग आते हैं। सतयुग पूर्ण शांति और पवित्रता का युग, त्रेतायुग थोड़ी कमी, पर अभी भी उच्च अवस्था, द्वापरयुग भक्ति और पतन की शुरुआत और कलियुग नैतिक पतन और अशांति का समय। कलियुग के अंत में एक छोटा-सा संगमयुग माना जाता है, जब परमात्मा (उनके अनुसार शिव) ज्ञान देकर आत्माओं को शुद्ध करते हैं और फिर पुनः सतयुग आरंभ होता है। कुल मिला कर ब्रह्माकुमारीज का दावा है कि हर 5000 वर्ष बाद इतिहास हूबहू दोहराया जाता है। आप और मैं भी वही आत्माएँ हैं जो पिछले चक्र में भी थे। हमारी भूमिकाएँ भी बिल्कुल वैसी ही रहती हैं, न कम, न ज्यादा। इसे वे “ड्रामा का सिद्धांत” कहते हैं, जैसे एक फिल्म निश्चित स्क्रिप्ट के अनुसार चलती है।

वैसे परंपरागत पुराणों के अनुसार चारों युगों की अवधि लाखों वर्षों की मानी जाती है, न कि 5000 वर्ष। आधुनिक इतिहास और विज्ञान सृष्टि को अरबों वर्ष पुराना मानते हैं और घटनाओं के हूबहू दोहराव का समर्थन नहीं करते। कुछ दार्शनिक परंपराएँ, जैसे बौद्ध और सांख्य भी चक्रीय सृष्टि की बात करती हैं, लेकिन ठीक वैसी ही पुनरावृत्ति का विचार उतना स्पष्ट नहीं है।

मंगलवार, मार्च 24, 2026

 मान्यता है कि जिस मूर्ति की पूजा कम होती है, अथवा निर्जन स्थान पर मौजूद है, उसकी पूजा करने से त्वरित व अधिक फल मिलता है। यानि वहां सुनवाई तुरंत होती है। यह मान्यता लोकविश्वास मात्र नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार है।

वस्तुतः कम पूजित मूर्ति प्रायः पुराने मंदिरों में, गांव के कोने में या उपेक्षित स्थानों पर होती है। वहां जाने वाला व्यक्ति अक्सर सच्ची मजबूरी या आंतरिक पुकार लेकर जाता है, उसमें औपचारिकता नहीं होती। कम पूजित मूर्ति के सामने जाने वाला भक्त सामान्यतः दिखावे से मुक्त होता है। भीड़ और प्रतिस्पर्धा से दूर होता है। उसका भाव अधिक निजी और गहरा होता है। इसलिए फल अधिक अनुभूत होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जहाँ पूजा कम होती है, वहां अपेक्षा नहीं होती, प्रचार नहीं होता, चमत्कार की अफवाह नहीं होती, इससे मन अहंकार और सौदेबाजी से मुक्त रहता है। ऐसा मन जब प्रार्थना करता है, तो वह भीतर तक उतरती है।

तांत्रिक और भक्ति परंपरा में कई साधना-मार्गों में कहा गया है कि उपेक्षित देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वहां जाने वाला व्यक्ति फल नहीं, संबंध चाहता है। नाम नहीं, शरण चाहता है।

गूढ़ सत्य ये है कि ईश्वर को पूजा की संख्या नहीं, निष्ठा की तीव्रता आकर्षित करती है। भीड़ में भक्ति अक्सर सामाजिक होती है, परंपरागत होती है, जबकि अकेले में भक्ति आत्मिक होती है, मौन होती है, सत्य होती है। कम पूजित मूर्ति की पूजा से अधिक फल इसलिए मिलता है क्योंकि वहां श्रद्धा अधिक शुद्ध होती है, अहंकार कम होता है, संबंध सीधा होता है।

इस बारे में एक कहानी है। गांव के बाहर, पीपल और खेजड़ी के बीच एक पुरानी सी मूर्ति खड़ी थी। न नक्काशी, न रंग, बस पत्थर पर उकेरी एक आकृति। लोग उसे कहते थे बूढ़ा देव। यहां न पुजारी था, न प्रसाद की दुकान। सिर्फ धूप, चुप्पी और हवा की सरसराहट। एक बार गाँव में सूखा पड़ा। लोग बड़े मंदिर गए। मन्नतें मानीं, नारियल चढ़ाए, लंबी कतारें लगीं। सूखा वैसे का वैसे रहा। उसी गांव की एक विधवा थी धन्नो। उसके पास न चढ़ावा था, न मन्नत के शब्द। वह चुपचाप उस बूढ़े देव के पास गई। एक लोटा पानी रखा, और बोली, “मैं बहुत कुछ नहीं जानती, बस इतना जानती हूँ कि तू भी अकेला है, मैं भी।” फिर रोई नहीं। बस बैठी रही। तीसरे दिन बादल आए। पहले उसी कोने में बरसे, जहां बूढ़ा देव खड़ा था। फिर धीरे-धीरे पूरे गांव में। लोग चकित थे। किसी ने कहा संयोग है। किसी ने कहा कि बरसात का मौसम था। पर धन्नो कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि देवता को शब्द नहीं, साथ अच्छा लगता है। तब से गाँव में एक कहावत चल पड़ी, जिस देव के पास भीड़ नहीं, उसके पास भगवान बैठा होता है। और लोग समझ गए कि कम पूजित मूर्ति जल्दी फल देती है, क्योंकि वहां न दिखावा होता है, न सौदा, सिर्फ मन होता है।

सूफी कहते हैं कि खुदा को तलााशने के लिए दरगाह नहीं, दिल चाहिए। सिंध की धरती पर एक फकीर रहता था लाल शाह। उसकी कब्र न मशहूर थी, न उस पर चादरें चढ़ती थीं। रेत में दबी, कंटीली झाड़ियों के बीच, बस एक टूटा हुआ पत्थर था। लोग कहते, यहां कौन जाता है? न करामात है, न शोर। एक दिन एक मुसाफिर आया। बहुत भटका हुआ, बहुत थका हुआ। वह बड़े दरबारों से होकर आया था। हर जगह भीड़, हर जगह मांग। वह इस टूटी कब्र के पास बैठ गया। न फातिहा पढ़ी, न दुआ माँगी। बस बोला, “अगर तू वाकई दोस्त है, तो चुप बैठने दे।” सूफी कहते हैं कि यहीं से मुलाकात शुरू होती है। रात को मुसाफिर को नींद आई। ख्वाब में लाल शाह बोले, “जहां सवाल नहीं होते, वहीं जवाब उतरते हैं।” सुबह वह मुसाफिर बदला हुआ था। उसकी परेशानी बाहर से नहीं, अंदर से हल हो चुकी थी। लोग पूछने लगे, “तुझे वहां क्या मिला, जहां कुछ भी नहीं था?” वह मुस्कराया, “वहां खुुदा था, इसलिए कुछ नहीं था।” सूफियाना हिकमत कहती है, जो दर मशहूर हो जाता है, वहां अक्सर अल्लाह छुप जाता है। और जो दर गुमनाम रहे, वहां अल्लाह खुद बैठा रहता है। इसलिए सूफी कहते हैं कि कम पूजी जाने वाली मूरत, या गुमनाम कब्र जल्दी असर करती है, क्योंकि वहां दिल खाली होकर पहुंचता है।

रविवार, मार्च 22, 2026

क्या पुनः जन्म लेती है आत्मा?

आत्मा के बारे में विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण हैं, और ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप किस परंपरा या विश्वास प्रणाली से आते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार, आत्मा अमर होती है और शरीर के नष्ट हो जाने पर पुनर्जन्म लेती है। आत्मा किसी कब्र या शरीर में स्थायी रूप से नहीं रहती, बल्कि कर्मों के आधार पर उसे नया शरीर प्राप्त होता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से साफ तौर पर यह प्रमाणित करना कठिन है, मगर पुनर्जन्म की ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिन पर विज्ञान मौन हो जाता है। हिंदू धर्म में तो पुनर्जन्म का पूरा विधान है कि आत्मा अगला जन्म कहां लेगी? यहां तक कि सात जन्मों की अवधारणा है। प्रेम के वशीभूत पति-पत्नी सात जन्मों का साथ निभाने की कामना करते हैं। कर्मों के अनुसार अनेक योनियों में जन्म लेने की मान्यता है। रामायण, महाभारत व पुराणों में पुनर्जन्म की अनेकानेक कथाएं प्रचलित हैं। हालांकि वैज्ञानिक नजरिया रखने वाले पुनर्जन्म की घटना को मानसिक विकृति के रूप में परिभाषित करते हैं। इस पर परामनोवैज्ञानिकों ने बहुत काम किया है। 

दूसरी ओर इस्लाम में यह विश्वास है कि मृत्यु के बाद आत्मा को अल्लाह के पास ले जाया जाता है, और कब्र में एक अंतरिम जीवन शुरू होता है, जहां आत्मा अपने कर्मों के अनुसार या तो शांति पाती है या कष्ट उठाती है। परंतु आत्मा कब्र में स्थायी रूप से नहीं रहती, यह एक अस्थायी अवस्था है, जब तक कि कयामत का दिन नहीं आ जाता। ऐसे में इस्लामिक मान्यता के अनुसार, पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया जाता है। इस्लाम में यह विश्वास है कि हर इंसान की एक ही जिन्दगी होती है, और मृत्यु के बाद उसे कब्र में दफनाया जाता है। फिर कयामत या आखिरत के दिन, अल्लाह इंसानों को दोबारा जिंदा करेगा और उनके कर्मों का हिसाब-किताब होगा। अच्छे कर्म करने वालों को जन्नत में और बुरे कर्म करने वालों को जहन्नुम में भेजा जाएगा। हालांकि, अपवादस्वरूप कुछ व्यक्तिगत अनुभव या घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें लोग पुनर्जन्म से जोड़ते हैं, लेकिन वे इस्लामी मान्यताओं के अनुसार नहीं होते। कई बार ऐसे अनुभवों को व्यक्ति की मानसिक स्थिति, या दूसरी संस्कृतियों की मान्यताओं से प्रभावित माना जा सकता है। अगर मुस्लिम समाज में पुनर्जन्म से संबंधित कहीं घटनाएं सामने आती हैं, तो वे व्यक्तिगत धारणाओं या अन्य बाहरी प्रभावों के कारण हो सकती हैं, लेकिन वे इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं होतीं।

ईसाई धर्म में भी आत्मा को अमर माना जाता है। मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग या नर्क में जाती है, और कब्र केवल शरीर के लिए है। आत्मा कब्र में नहीं रहती।

बौद्ध धर्म में आत्मा की अवधारणा थोड़ी भिन्न है, क्योंकि आत्मा को स्थायी नहीं माना जाता। जीवन-मरण का चक्र चलता रहता है और पुनर्जन्म होता है। कब्र का आत्मा से कोई विशेष संबंध नहीं होता। इसलिए, आत्मा कब्र में रहने का विचार केवल कुछ विशेष धार्मिक मान्यताओं में होता है, लेकिन अधिकांश प्रमुख धर्म इसे अस्थायी मानते हैं या आत्मा को कब्र से परे की अवस्था में मानते हैं।

मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर क्यों रखा जाता है?

हमारे यहां मृत्यु से जुड़ी अनेक परंपराए हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक परंपरा है कि मरणासन्न यानि कि मृत्यु जब करीब हो, जब यह निश्चित हो जाए कि मृत्यु आने ही वाली है, किंतु प्राण निकलने में कष्ट अधिक हो रहा हो तो मृत्यु को प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सिर उत्तर दिशा की ओर कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त मौत के बाद मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर रखने की भी रवायत है। इस परंपरा को निभाते तो अधिकतर लोग हैं, लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर ही क्यों रखना चाहिए? मृतक का सिर उत्तर की ओर करके इसलिए रखते हैं कि प्राणों का उत्सर्ग दशम द्वार से हो। चुम्बकीय विद्युत प्रवाह की दिशा दक्षिण से उत्तर की ओर होती है। कहते हैं मरने के बाद भी कुछ क्षणों तक प्राण मस्तिष्क में रहते हैं। अतः उत्तर दिशा में सिर करने से गुरुत्वाकर्षण के कारण प्राण शीघ्र निकल जाते हैं। 

परंपरा के अनुसार मृत्यु के बाद अंत्येष्ठि संस्कार के समय मृतक का सिर दक्षिण की तरफ रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार दक्षिण की दिशा मृत्यु के देवता यमराज की मानी गई है। इस दिशा में शव का सिर रख हम उसे मृत्यु के देवता को समर्पित कर देते हैं।

इसके अतिरिक्त पार्थिव शरीर को ले जाते समय उसका सिर आगे और पैर पीछे रखे जाते हैं। फिर विश्रांत स्थल पर मृत देह को एक वेदी पर रखा जाता है, इसलिए कि अंतिम बार व्यक्ति इस संसार को देख ले। इसके बाद देह की दिशा बदल दी जाती है। फिर पैर आगे और सिर पीछे हो जाता है अर्थात तब मृत आत्मा को श्मशान को देखते हुए आगे बढना होता है। अंत में जब देह को चिता पर लेटाया जाता है तो उसका सिर चिता पर दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं।

हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को सूर्यास्त से पूर्व दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि दी जाती है और सामान्यजन का दाह संस्कार किया जाता है। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा और ओरा लिए हुए होता है, इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है। एक बात और, जीते जी उसकी आत्मा षरीर से पृथक हो जाती, इस कारण उसका दाह संस्कार करने की जरूरत नहीं होती। इसी प्रकार मासूस बच्चे का भी दफनाया जाता है, क्यों कि उसकी आत्मा का शरीर से पक्का संबंध नहीं होता, इस कारण दाह संस्कार की जरूरत नहीं होती। दूसरी ओर आम व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाता है ताकि उसकी अपने शरीर के प्रति आसक्ति छूट जाए।

ऐसी मान्यता है कि अंतिम संस्कार में शामिल होना पुण्य कर्म है। जिस घर में किसी का देहांत हुआ है, उस घर से 100 गज दूर तक के घरों के लोगों को अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहिए। 

श्मशान ले जाने से पूर्व घर पर कुटुंब के लोग मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर की परिक्रमा करते हैं। बाद में दाह संस्कार के समय संस्कार करने वाला व्यक्ति छेद वाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे पार्थिव शरीर की परिक्रमा करता है। जिसके अंत में पीछे की ओर घड़े को गिरा कर फोड़ दिया जाता है। ऐसा मृत व्यक्ति के शरीर से मोहभंग करने के लिए किया जाता है। 

हिंदू धर्मानुसार सूर्यास्त के बाद कभी भी दाह संस्कार नहीं किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई है तो उसे अगले दिन सुबह के समय ही दाह संस्कार किए जाने का नियम है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से मृतक की आत्मा को परलोक में भारी कष्ट सहना पड़ता है और अगले जन्म में उसे किसी अंग में दोष भी हो सकता है।

मंगलवार, मार्च 17, 2026

अगरबत्ती जलाना अनुचित है?

हमारे यहां धर्म स्थलों व घर के मंदिरों में अगरबत्ती जलाने का चलन है। यह आम बात है। मगर कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ऐसा करना अनुचित है। आइये, जानते हैं कि उसकी क्या वजह है?

वे शास्त्रों के हवाले से सवाल खड़ा करते हैं कि जिस बांस की लकड़ी को चिता में भी जलाना वर्जित है, हम उस बांस से बनी अगरबत्ती को मंदिर में कैसे जला सकते हैं? वे कहते हैं कि शव को भले ही बांस व उसकी खपच्चियों से बनी सीढ़ी पर रख कर श्मशान पहुंचाते हैं, लेकिन जलाते वक्त उसे अलग कर देते हैं, क्यों कि बांस जलाने से पितृ दोष लगता है। उनका तर्क है कि शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं पर भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता। सब जगह धूप करने का ही जिक्र है। ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार हिंदू अगर का धूप करते हैं, वैसे ही मुस्लिम लोबान का धूप जलाते हैं। इससे वातावरण शुद्ध होता है और सकारत्मकता आती है।

अगरबत्ती नहीं जलाने के बारे में वैज्ञानिक तर्क ये है कि बांस में सीसा प्रचुर मात्रा में होता है और उसके जलने पर लेड आक्साइड बनता है, जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है, वह खतरनाक है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती के जलने से उत्पन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केन्मिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है। यह भी स्वांस के साथ शरीर मे प्रवेश करता है, जिससे फेफड़ों को नुकसान होता है। इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर में पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति कैंसर अथवा मस्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। इसी कारण अनेक लोग अगरबत्ती की जगह धूप व विभिन्न प्रकार की धूप बत्तियां काम में लेते हैं।

अगरबत्ती नहीं जलाने के खिलाफ तर्क देने वाले कहते हैं कि यह केवल एक भ्रान्ति है कि बांस की लकड़ी को नहीं जलाया जाता। देश के बहुत से प्रांतों में बांस की लकड़ी के अंदर भोजन बनाया जाता है, जिसमे बांस की लकड़ी ही जलती है।

रविवार, मार्च 15, 2026

क्या उठावने के दिन बारहवां उचित है?

इन दिनों ऐसा चलन में आ रहा है कि कई लोग अपने परिजन के निधन के बाद उठावने अर्थात तीसरे की रस्म के साथ ही बारहवें की रस्म कर इतिश्री कर रहे हैं। वर्तमान दौर में ऐसा लोग समयाभाव के कारण कर रहे हैं, तो ठीक प्रतीत होता है, मगर षास्त्र के जानकारों का कहना है कि ऐसा करना अनुचित है।

ज्ञातव्य है कि उठावना मृत्यु के बाद तीसरे दिन परिवार और समाज के सदस्यों द्वारा मृत आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें मृतक के उत्तराधिकारी को पगडी पहनाई जाती है। इस लिहाज से यह एक सामाजिक कर्म भी है। इसके बाद लोग अपने प्रतिश्ठान खोल कर दैनिक कार्य फिर से आरंभ करते हैं। 

बारहवां मृत्यु के बारहवें दिन किया जाने वाला कर्मकांड है, जिसमें पिंडदान, तर्पण और भोज का आयोजन होता है। इसे मृत आत्मा की सद्गति और परिवार की शुद्धि के लिए किया जाता है। जो परिवार परंपराओं को गहराई से मानते है, तो वे दोनों को अलग-अलग दिन करते हैं। इससे हर अनुष्ठान को पूरी श्रद्धा से निभाने का समय मिलता है।

आधुनिक समय में कई परिवार एक साथ उठावना और बारहवां संपन्न करते हैं। यह समय और संसाधनों की बचत के लिए किया जाता है। लेकिन विद्वान कहते हैं कि दोनों कर्मकांड अलग अलग ही करने चाहिए। दोनों अलग अलग महत्व है। यदि समयाभाव है तो बारहवां छोटे स्तर पर किया जा सकता है।

उक्त सभी के पीछे बहुत गहरा विज्ञान छुपा हुआ है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मृत व्यक्ति का दिमाग तीन दिन तक सक्रिय रहता है। हिन्दू धर्मानुसार, ज्यादा से ज्यादा व्यक्ति की चेतना तीन दिन में लुप्त होकर नया जन्म ले लेती है। यदि कोई बहुत ही स्मृतिवान है तो वह तेरह दिन में दूसरा जन्म ले लेता है या फिर सवा माह में। यदि आसक्ति ज्यादा है तो वर्षभर लगता, लेकिन तब तक व्यक्ति पितरों में शामिल हो जाता है। फिर उस व्यक्ति की आत्मा से छुटकारा पाने हेतु गया में उसकी मुक्ति हेतु पिंडदान किया जाता है। गरुड़ पुराणानुसार, व्यक्ति मरने के बाद ऊपर के लोक में सफर करता है, जिससे कि उसको आपके द्वारा दिए गए तर्पण से ही आगे बढऩे की शक्ति मिलती है।

मंगलवार, मार्च 10, 2026

नंदी के कान में क्यों बताते हैं मनोकामना?

आपने देखा होगा कि कई श्रद्धालु शिवजी के मंदिर में दर्शन को जाते हैं तो मंदिर के गर्भगृह के ठीक बाहर सामने स्थित नंदी की प्रतिमा के कान में कुछ फुसफुसाते हैं। असल वे नंदी को अपनी मनोकामना बताते हैं। विश्वास यह कि नंदी उनकी मनोकामना की जानकारी शिवजी को देंगे और शिवजी उसे पूरा करेंगे। असल में मान्यता है कि नंदी शिवजी के परमभक्त व उनके वाहन हैं। उसके सबसे करीब। अतः अर्जी ठीक मुकाम पर पहुंचेगी। यह ठीक वैसे ही है, जैसे श्रद्धालु दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी के वक्त ख्वाजा साहब से दुआ मांगते हैं, मगर हाजिरी अर्थात जियारत की रस्म खुद्दाम साहेबान अदा करते हैं। इसी प्रकार तीर्थराज पुष्कर में स्नान के दौरान पूजा अर्चना किसी पुरोहित के माध्यम से करवाते है। बेशक अपने इष्ट से सीधे भी संपर्क साधा जा सकता है, मगर माध्यम की जरूरत होती ही है। जैसे मुवक्किल को वकील की जरूरत होती है। किसी सज्जन ने इंटरनेट पर लिखा है कि नंदी के कान में मनोकामना बताने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह आस्था मात्र है। बिलकुल यह प्रथा विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं है। मगर वैज्ञानिक आधार तलााशना भी तो अर्थहीन है। क्या खादिम व पुरोहित की भूमिका का कोई वैज्ञानिक आधार है। नहीं। तो नंदी की अहमियत पर सवाल करना उचित कैसे हो सकता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, शिलाद नाम के मुनि ने संतान प्राप्ति की कामना के साथ भगवान इंद्रदेव को रिझाने के लिए तपस्या की। परंतु, इंद्रदेव ने संतान का वरदान देने में असर्मथता जताते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनुरोध किया। इसके बाद शिलाद मुनि ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। जिसके बाद शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने शिलाद को स्वयं के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। महादेव के वरदान के बाद शिलाद मुनि को नंदी के रूप में संतान प्राप्त हुई। शिवजी के आशीर्वाद के कारण नंदी अजर अमर हो गए। उन्होंने संपूर्ण गणों, गणेश व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक कराया। जिसके बाद नंदी नंदीश्वर कहलाए। भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया कि जहां उनका निवास होगा, वहां स्वयं भी निवास करेंगे। मान्यता है कि तब से ही शिव मंदिर में भगवान शिव के सामने नंदी विराजमान रहते हैं।

सोमवार, मार्च 09, 2026

मौली व कलावा क्यों बांधा जाता है?

भारतीय परंपरा में हाथ की कलाई पर मौली या कलावा बांधने की रस्म सर्वविदित है। क्या आपने कभी ख्याल किया है कि मौली क्यों बांधी जाती है? वस्तुतः यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, मनोविज्ञान, सामाजिक पहचान और प्रतीक-विद्या का सुंदर मेल है। प्राचीन काल में लोग मानते थे कि मौली में मंत्र-संरक्षित शक्ति होती है। यज्ञ, पूजा या संकल्प के समय इसे बांध कर व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा का संकेत दिया जाता था। यह मनोवैज्ञानिक सुरक्षा भी देती है। कलाई पर यह धागा दिखते ही मन में आत्मविश्वास बढ़ता है कि मैं संरक्षित हूं, शुभ कार्य कर रहा हूं। हिंदू कर्मकांड में संकल्प बहुत महत्त्वपूर्ण है। मौली इसी का प्रतीक है। कलाई पर हर बार नजर पड़ने से व्रत और अनुशासन याद रहता है, यह एक मानसिक रिमाइंडर भी है। 

आपको ख्याल में होगा कि कलावा सामान्यतः तीन रंगों में होता है। लाल रंग शक्ति, ऊर्जा व मंगल, पीला ज्ञान, बुद्धि, गुरु-शक्ति और सफेद पवित्रता व सत्य का प्रतीक है। इनका मिश्रण व्यक्ति की देव, धर्म और धर्म-चक्र से जुड़ाव को दर्शाता है। कुछ परंपराएं मानती हैं कि कलाई पर धागा बांधने से नाड़ी बिंदुओं पर हल्का दबाव पड़ता है और रक्त-संचार बेहतर होता है, ध्यान और मन में स्थिरता आती है। हालांकि यह आधुनिक विज्ञान से प्रमाणित नहीं है, पर एक्यूप्रेशर जैसी प्रणालियों में कलाई को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कुल मिला कर मौली सुरक्षा का प्रतीक तो है ही, संकल्प को स्मरण कराता है। मनोवैज्ञानिक सहारा देती है। यह पॉजिटिव रिइन्फोर्समेंट मन में शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाता है।

रक्षा बंधन के दिन बहिन का भाई को राखी या रक्षा सूत्र बांधने के पीछे भी रक्षा का संकल्प लेने का प्रतीक है। रक्षा सूत्र बांध कर बहिन भाई की सुरक्षा की कामना करती है, साथ ही भाई से उसकी सुरक्षा की उम्मीद करती है।

रक्षा-सूत्र अर्थात ऐसा धागा जो हमें किसी न किसी रूप में सुरक्षा प्रदान करता है, शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक।

पुराणों में उल्लेख है कि यज्ञ-कर्म, व्रत, संस्कार, पूजा आदि में पुरोहित दाएं हाथ पर रक्षा-सूत्र बांधता है। इसे प्रोटेक्शन टैग की तरह माना गया। यकीन है कि इससे नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है और शुभ कार्य में व्यवधान नहीं आता। मौली बांध कर यह मंत्र  बोला जाता है - येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः, अर्थात जिस धागे ने बलि और अन्य दैत्य राजाओं की रक्षा की, वही धागा तुम्हारी भी रक्षा करे। मंदिरों, त्योहारों और यज्ञों में सभी को रक्षा-सूत्र बांधा जाता है, यह समानता और सामूहिक आशीर्वाद का प्रतीक है। 

शनिवार, मार्च 07, 2026

गलती होने पर कान क्यों पकड़े जाते हैं?

गलती मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है, किंतु गलती स्वीकार करना और उससे सीखना सभ्य समाज की पहचान मानी जाती है। भारतीय सामाजिक परंपरा में गलती होने पर कान पकड़ना केवल एक दंडात्मक क्रिया नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अर्थों से जुड़ा हुआ प्रतीक है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी अपने मौन संदेश के कारण प्रभावी बनी हुई है।

भारतीय लोकजीवन में कान पकड़ना पश्चाताप और स्वीकारोक्ति का संकेत माना गया है। बचपन में माता-पिता और गुरु द्वारा गलती पर कान पकड़वाने की प्रथा इसी सोच से जुड़ी रही है कि व्यक्ति अपनी भूल को खुले मन से स्वीकार करे। यह एक तरह का सार्वजनिक कथन होता हैकृ“मैंने गलती की है और उसे सुधारने का संकल्प लेता हूँ।” इस क्रिया में न तो हिंसा है और न अपमान, बल्कि आत्मबोध की भावना निहित है।

धार्मिक और दार्शनिक दृष्टि से भी कान पकड़ने का विशेष अर्थ है। भारतीय चिंतन में कान को श्रवणेंद्रिय कहा गया है, जो ज्ञान ग्रहण करने का मुख्य माध्यम है। प्रतीकात्मक रूप से यह माना जाता है कि गलती इसलिए हुई क्योंकि व्यक्ति ने ठीक से सुना, समझा या ध्यान नहीं दिया। कान पकड़कर क्षमा मांगना इस स्वीकारोक्ति का संकेत है कि अब वह व्यक्ति सावधानीपूर्वक सुनेगा और सीखेगा। कुछ मान्यताओं में इसे बुद्धि के जागरण से भी जोड़ा गया है।

मनोवैज्ञानिक स्तर पर कान पकड़ना आत्मदंड की एक कोमल विधि है। जब व्यक्ति स्वयं को दोषी मानते हुए यह क्रिया करता है, तो उसके भीतर अपराधबोध और शर्म का भाव उत्पन्न होता है। यही भाव भविष्य में उसे वही गलती दोहराने से रोकता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के मन में अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है।

आयुर्वेद और एक्यूप्रेशर की मान्यताओं के अनुसार कान में मस्तिष्क से जुड़े अनेक तंत्रिका बिंदु होते हैं। कान को पकड़ने या हल्के से दबाने से चेतना सक्रिय होती है और ध्यान केंद्रित होता है। संभवतः इसी कारण प्राचीन काल में शिक्षा के दौरान भी इस क्रिया का प्रयोग अनुशासन और एकाग्रता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है।

सामाजिक दृष्टि से कान पकड़ना अहंकार के विसर्जन की मुद्रा है। इसमें व्यक्ति स्वयं को छोटा कर सामने वाले को सम्मान देता है। यही कारण है कि यह क्षमा याचना का एक प्रभावी, त्वरित और मौन संकेत बन गया है, जिसे समाज सहज रूप से स्वीकार करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि गलती पर कान पकड़ना केवल भय या दंड का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सीखने की स्वीकृति, आत्मसंशोधन और विनम्रता का प्रतीक है। शायद इसी कारण यह सरल-सी परंपरा आज भी हमारे सामाजिक जीवन में जीवित और प्रासंगिक बनी हुई है।