शुभ-अशुभ संकेत जाना जाता है, मन का संशय दूर किया जाता है, बड़े निर्णय से पहले दैवी संकेत लिया जाता है और पारंपरिक आस्था के अनुसार मार्गदर्शन लिया जाता है। फार डालना ज्योतिष से अधिक लोक-विश्वास पर आधारित प्रक्रिया है। सिंधी समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और विशेषकर विवाह, यात्रा, व्यापार प्रारंभ, रोग या संकट जैसे समयों में आज भी प्रचलित है। सिंधी समाज में फार डालने की एक बहुत प्रचलित और सरल विधि “कौड़ी की फार” मानी जाती है। इसे आज भी कई परिवारों में श्रद्धा के साथ अपनाया जाता है। सिंधी परंपरा के अनुसार 5 या 7 साबुत कौड़ियां, लाल कपड़ा या साफ थाली, दीपक आदि लिए जाते हैं। हाथ-पैर धोकर शांत चित्त से बैठते हैं। मन में उस घटना या प्रश्न को स्पष्ट रूप से सोचते हैं, जिसका फल जानना है। सिंधी परंपरा में प्रायः कहा जाता है, “झूलेलाल साईं, सच्चो फार बुधायो बतायो”। कुछ लोग अपनी कुल देवी का स्मरण करते हैं। सभी कौड़ियों को दोनों हथेलियों में लेकर प्रश्न दोहराते हैं। फिर कौड़ियों को लाल कपड़े या थाली पर एक साथ गिरा देते हैं। यदि अधिक कौडियां खुली हों तो इसे षुभ संकेत मानते हैं। सभी कौडियां खुली हों तो कार्य को सिद्ध माना जाता है यानि उसमें कोई विलंब नहीं होगा।
अधिक कोडियां बंद हों तो माना जाता है कि कार्य में रुकावट आएगी। सभी कौडियां बंद हों तो यह अर्थ निकाला जाता है कि कार्य को स्थगित कर दीजिए। खुली और बंद कौडियां लगभग बराबर हों तो इसका अर्थ है कि परिणाम अनुकूल तो होगा, लेकिन उसके लिए धैर्य पूर्वक प्रयास करने होंगे।
अगर कौड़ियां एक-दूसरे पर चढ़ जा तो इसका मतलब है कि कार्य में बाहरी हस्तक्षेप होगा या भ्रम की स्थिति बनेगी। कोई कौड़ी थाली से बाहर गिरे, तो इसका मतलब है कि प्रश्न पुनः पूछना उचित नहीं है। फार तीन बार से अधिक नहीं डालते। कुल मिला कर फार को अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि दैवी संकेत माना जाता है। एक ही प्रश्न बार-बार नहीं दोहराया जाता। कुछ लोग सुपारी की फार व चावल-दाने की फार डालते हैं।
