क्या आपको जानकारी है कि एक बहुत पुरानी परंपरा के अनुसार दूल्हा बारात में षामिल होने से पहले मां का दूध पीता है? यह परंपरा अब लुप्त प्रायः हो गई है। अधिसंख्य को तो इसकी जानकारी तक नहीं है। इस परंपरा का कुछ क्षेत्रों और लोककथाओं में इसका रूपकात्मक उल्लेख मिलता है। इसे माँ के ऋण की अंतिम स्वीकृति की संज्ञा दी जा सकती है। लोकधारणा में माना जाता है कि माँ के दूध का ऋण चुकाया नहीं जा सकता। बारात में जाने से पहले दूध पीना या उसका प्रतीक यह दर्शाता है कि बेटा जीवन के सबसे बड़े मोड़ पर माँ के उपकार को स्मरण कर रहा है। एक तरह से यह कृतज्ञता और विनम्रता का भाव है। यह मातृत्व से गृहस्थ जीवन की ओर प्रस्थान का क्षण है। विवाह को दो जन्मों के बीच की रेखा माना गया है। पहला जन्म माँ की गोद और दूसरा जन्म पत्नी के साथ गृहस्थ जीवन का आरंभ। माँ के दूध का स्मरण या प्रतीकात्मक सेवन यह बताता है कि अब पुत्र माँ की छाया से निकल कर अपनी नई जिम्मेदारियों की ओर बढ़ रहा है।
कुछ लोक कथाओं में माँ का दूध बल, संस्कार और नैतिक शक्ति का स्रोत माना गया है। बारात एक तरह से युद्ध की ओर उन्मुख होना है, जिसकी लंबी यात्रा में जोखिम व अनजान भविष्य छिपा है। ऐसे में माँ के दूध का स्मरण मातृ-आशीर्वाद का कवच
समझा जाता था। आज यह प्रथा अधिकतर कहावत, कथा या रस्म के प्रतीक के रूप में रह गई है। कहीं-कहीं दूध, दही या मिठाई माँ के हाथ से खिलाई जाती है। असल उद्देश्य भावनात्मक होता है, शाब्दिक नहीं। यह परंपरा शरीर से ज्यादा मन की रस्म है। दूल्हा दूध नहीं, माँ का आशीर्वाद, संस्कार और जीवन-भर का ऋण अपने साथ लेकर बारात में जाता है।