तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

गुरुवार, जून 15, 2017

मोदी का गृहराज्य गुजरात अब उतना आसान नहीं

हालांकि देश की राजनीति में इन दिनों मोदी ब्रांड धड़ल्ले से चल रहा है, ऐसे में यही माना जाना चाहिए कि उनका खुद का गृह राज्य गुजरात तो  सबसे सुरक्षित है, मगर धरातल का सच ये है कि भाजपा के लिए वहां हो रहे आगामी विधानसभा चुनाव बहुत आसान नहीं है। बेशक जब तक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब तक उन्होंने वहां अपनी जबरदस्त पकड़ बना रखी थी, मगर प्रधानमंत्री बनने के बाद वहां स्थानीय नेतृत्व सशक्त नहीं होने के कारण भाजपा का धरातल कमजोर हुआ है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा को अपने सशक्त किले में ही मुख्यमंत्री को बदलना पड़ गया। हालांकि वहां अब भी भाजपा जीतने की स्थिति में है, मगर अंतर्कलह संकट का कारण बनी हुई है। गुजरात की राजनीति में थोड़ी बहुत समझ रखने वाले जानते हैं कि मोदी के पीएम बनने के बाद से ही राज्य में अमित शाह, आनंदीबेन पटेल और पुरुषोत्तम रूपाला की गुटबाजी बढ़ी है।
गुजरात में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती आदिवासी नेताओं की उपेक्षा व भिलीस्तान हैं। गुजरात के अधिसंख्य राजनीतिक विशेषज्ञों के ताजा आलेखों पर नजर डालें तो वहां भाजपा के लिए पाटीदारों और दलितों के बाद आदिवासी समुदाय मुसीबत का बड़ा सबब बन सकता। आदिवासी इलाकों में भिलीस्तान आंदोलन खड़ा किया जा रहा है, जिसमें कुछ राजनीतिक दल एवं धार्मिक ताकतें आदिवासी समुदाय को हवा दे रही हैं। अब जबकि चुनाव का समय सामने है यही आदिवासी समाज जीत को निर्णायक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। हर बार चुनाव के समय आदिवासी समुदाय को बहला-फुसलाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की तथाकथित राजनीति इस बार असरकारक नहीं होगी। क्योंकि गुजरात का आदिवासी समाज बार-बार ठगे जाने के लिए तैयार नहीं है। इस प्रांत की लगभग 23 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह गुजरात के आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन-यापन करने को विवश हैं। यूं भले ही गुजरात समृद्ध राज्य है, मगर आदिवासी अब भी समाज की मुख्य धारा से कटे नजर आते हैं। इसका फायदा उठाकर मध्यप्रदेश से सटे नक्सली उन्हें अपने से जोड़ लेते हैं। महंगाई के चलते आज आदिवासी दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी नहीं खरीद पा रहे हैं। वे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। अगर भिलीस्तान आंदोलन को नहीं रोका गया तो गुजरात का आदिवासी समाज खण्ड-खण्ड हो जाएगा। इसके लिए तथाकथित हिन्दू विरोधी लोग भी सक्रिय हैं। इन आदिवासी क्षेत्रों में जबरन धर्मान्तरण की घटनाएं भी गंभीर चिंता का विषय है। यही ताकतें आदिवासियों को हिन्दू मानने से भी नकार रही है और इसके लिए तरह-तरह के षडयंत्र किये जा रहे हैं।
ऐसे में आदिवासियों का रुख मुख्यमंत्री विजय रूपाणी व भाजपा अध्यक्ष जीतू वाघानी के लिए तो चुनौती है ही, मोदी के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है। मोदी हालात से अच्छी तरह से वाकिफ हैं, इस कारण वे एक दर्जन बार गुजरात की यात्रा कर चुके हैं। मोदी ने आदिवासी कॉर्निवल में आदिवासी उत्थान और उन्नयन की चर्चाएं की, मगर धरातल तक राहत पहुंचने में वक्त लग सकता है। ऐसे में तेजी से बढ़ता आदिवासी समुदाय को विखण्डित करने का हिंसक दौर आगामी विधानसभा चुनावों का मुख्य मुद्दा बन सकता है और एक समाज और संस्कृति को बचाने की मुहिम इन विधानसभा चुनावों की जीत का आधार बन सकती है।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, जून 14, 2017

बडे पैमाने पर तोडफ़ोड़ उलटी भी पड़ सकती है भाजपा को

विधानसभा चुनावों को लेकर इन दिनों भाजपा की जो तोडफ़ोड़ की नीति है, उसी के तहत इस बार राजस्थान में भी बड़े पैमाने पर कांग्रेस में सेंध मारने की योजना है। उस पर प्रारंभिक काम भी शुरू हो गया है, जिसके चुनाव से छह माह पहले तेजी पकडऩे की संभावना है। मगर जैसा कि यहां का राजनीतिक माहौल है, यह नीति भाजपा को उलटी भी पड़ सकती है।
वस्तुत: यह बात भाजपा हाईकमान अच्छी तरह से जानता है कि भले ही मोदी के नाम का असर अपना काम करेगा, मगर राजस्थान में भाजपा का परफोरमेंस कुछ खास अच्छा न होने और एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर की वजह से मौजूदा सीटों से ग्राफ गिर कर सौ के अंदर भी ठहर सकता है। जनता भाजपा को बिलकुल पलटी खिला देगी ऐसा भी नहीं दिखता, मगर हाईकमान चाहता है कि जीत किसी भी स्थिति में सुनिश्चित होनी ही चाहिए। भले ही हाईप क्रिएट करने के लिए लक्ष्य 180 का बनाया गया है, मगर अंदरखाने पता है कि स्पष्ट बहुमत के लिए भी पूरी मेहनत करनी होगी। इसी के तहत इस बार एक बड़ा प्रयोग ये किया जाना है कि काफी बड़ी तादात में मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाएंगे। एंटी इन्कंबेंसी से निपटने के लिए इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है। दूसरा ये कि भाजपा हाईकमान का कांग्रेस में बड़े पैमाने पर तोडफ़ोड़ का मानस है। इस पर काम शुरू भी हो गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को न्यौता दिए जाने की अफवाह भी इसी कड़ी का हिस्सा है। जानकारी के अनुसार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की नजर दूसरी और तीसरी पंक्ति के कांग्रेस नेताओं पर भी है। सुविज्ञ सूत्रों के अनुसार एक पूर्व विधायक व जिला प्रभारी से तो शाह की मीटिंग भी हो चुकी है। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति के अन्य नेताओं व टिकट के दावेदारों की भी पूरी निगरानी की जा रही है। ऐन चुनाव के वक्त उनमें से सशक्त दावेदारों को टिकट का लालच भी दिया जाएगा। अनुमान है कि चुनाव से छह माह पहले काफी अफरातफरी फैलाई जा सकती है। समझा जाता है कि कांग्रेस के भीतर भी इसका आभास है। वे दावेदार, जो कि खुद को टिकट मिलने की संभावना कुछ कम समझ रहे हैं, वे या तो भाजपा से न्यौते के इंतजार में रहेंगे या अभी से भाजपा के मीडिएटरों से तार जोड़े हुए हैं।
कुल जमा बात ये है कि भाजपा की यह नीति उलटी भी पड़ सकती है। वे मौजूदा विधायक, जिनका कि टिकट कटेगा, वे बगावत या भीतरघात कर सकते हैं। दूसरा ये कि कांग्रेस से तोड़ कर लाए गए नेताओं को भाजपा का कार्यकर्ता कितना स्वीकार करेगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। असल में अन्य राज्यों की तुलना में राजस्थान का राजनीतिक सिनोरियो अलग किस्म का हैं। यहां दलबदल हुए तो हैं, मगर आम तौर पर दलबदल चलन में नहीं है। कांग्रेस व भाजपा के बीच ऐसी गहरी सीमा रेखा है कि दलबदल को अच्छा नहीं माना जाता। कार्यकर्ता परंपरागत तौर पर या भावनात्मक रूप से अपनी-अपनी पार्टी से जुड़े हुए हैं। एक मात्र यही वजह है कि यहां तीसरी ताकत खड़ी नहीं हो पाई और भाजपा व कांग्रेस ही वजूद में हैं। मौजूदा विधायक का टिकट कटने पर कदाचित कार्यकर्ता उतना रिएक्ट न करे और भाजपा के ही नए नेता का साथ दे दें, मगर कांग्रेस से लाए नेता को टिकट देने पर वह निष्ठा से काम करेगा ही, इसको लेकर संदेह है। भावनात्मक रूप से वह उसका साथ देने से कतरा सकता है। शायद यह स्थिति भाजपा के बड़े नेताओं से छिपी हुई नहीं है, मगर चुनाव जीतने की जिद में ज्यादा उठापटक की गई तो हो सकता है कि भाजपा खता भी खा जाए।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, जून 07, 2017

मोदी के तीन साल : आम आदमी को तो कुछ नहीं मिला

पिछली 26 मई को नरेन्द्र मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर मोदी फैस्ट के जरिए उल्लेखनीय सफलताओं का दावा किया जा रहा है। कदाचित आंकड़ों की भाषा में वह सच हो, मगर धरातल की सच्चाई ये है कि आम आदमी की जिंदगी में राहत के तनिक भी लक्षण नजर नहीं आ रहे।
अकेले न खाऊंगा, न खाने दूंगा के जुमले की बात करें तो भले ही प्रत्यक्षत: कोई बड़ा घोटाला उजागर नहीं हुआ हो, मगर समीक्षकों का मानना है कि घोटाले तो हुए हैं, मगर बाहर नहीं आने दिए गए। नोटबंदी की ही बात करें तो वह अपने आप में एक घोटाला है। पूरा देश जानता है कि उसमें किस कदर लूट मची। न केवल बैंक वालों ने कमीशन खा कर नोट बदले, अपितु दलालों की भी पौ बारह हो गई। इस तथ्य को कोई भी नहीं नकार सकता। केंद्रीय सूचना आयोग के आयुक्त श्रीधर आचार्यलु ने नोटबंदी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सूचना को रोके रखने से अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों में शंकाएं पैदा हों रही हैं। ज्ञातव्य है कि प्रधानमंत्री कार्यालय, रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय नोटबंदी के पीछे के कारणों संबंधी जानकारी मांगने वाली सभी आरटीआई याचिकाओं को हाल में खारिज कर चुके हैं। सीधी सट्ट बात है कि आप कोई जानकारी बाहर ही नहीं आने देंगे तो पता ही कैसे चलेगा कि घोटाला हुआ है या नहीं।
नोटबंदी जैसे देश को बर्बाद कर देने वाले कदम को भी सरकार ने ऐसे प्रस्तुत किया मानो उससे देश का बहुत भला हुआ हो। जहां लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा बिछाए गए विकास के दावों के मायाजाल में फंसा हुआ है, वहीं जमीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। न तो महंगाई कम हुई है, न रोजगार बढ़ा है और ना ही आम आदमी की स्थिति में कोई सुधार आया है। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है और किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं।
जहां तक न खाने देने का सवाल है, हर कोई जानता है कि स्थिति जस की तस है। प्रशासनिक तंत्र अब भी भ्रष्टाचार में उसी तरह आकंठ डूबा हुआ है, जैसा पहले था। किसी भी महकमे पर नजर डाल लें, कहीं भी सुविधा शुल्क की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया है। हर कोई जानता है कि हर जगह रिश्वतखोरी वैसी की वैसी है, जैसे पहले थी। इस तथ्य को साबित करने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि यह स्वयंसिद्ध है। न तो रिश्वतखोरों के मन में कोई डर उत्पन्न हुआ है और न ही आम आदमी को किसी प्रकार की राहत मिली है।
दूसरी उल्लेखनीय बात ये है कि पाकिस्तान के साथ तो संबंध पहले से ज्यादा बिगड़े हैं। कश्मीर की हालत भी सुधरने की बजाय दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। केवल झूठी वाहवाही और बड़ी-बड़ी डींगे हांकने का माहौल है। जो मोदी विपक्ष में रहते पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की बात करते थे, वही आज चुप बैठे हैं। सबक सिखाना तो दूर पाकिस्तान का हौसला और बढ़ गया है। अफसोस कि आत्ममुग्ध सरकार सर्जिकल स्ट्राइक का ढिंढोरा पीट रही है। कश्मीर के संबंध में सरकार की नीति का नतीजा यह हुआ है कि लड़के सड़कों पर निकल कर पत्थर फेंक रहे हैं। कश्मीर के लोगों से संवाद स्थापित करने में सरकार की विफलता के कारण, घाटी में हालात खराब होते जा रहे हैं।
मोदी के कार्यकाल की तीसरी उल्लेखनीय बात ये है कि भले ही वे आज भी एक आइकन के तौर पर देखे जाते हैं, मगर इस दौर में सत्ता का प्रधानमंत्री के हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ है। मोदी के सामने वरिष्ठ से वरिष्ठ मंत्री की भी कुछ कहने तक की हिम्मत नहीं होती और ऐसा लगता है कि कैबिनेट की बजाए इस देश पर केवल एक व्यक्ति शासन कर रहा है।
चुनाव प्रचार के दौरान जो सबसे बड़ा वादा मोदी ने किया था, वह पूरी तरह से झूठा साबित हुआ। विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रुपए जमा करने का भाजपा का वायदा, सरकार के साथ-साथ जनता भी भूल चली है।
सामाजिक समरसता की स्थिति ये है कि पवित्र गाय को राजनीति की बिसात का मोहरा बना दिया गया है। गाय के नाम पर कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है। सरकार जिस तरह से गोरक्षा के मामले में आक्रामक रुख अपना रही है, उसके चलते, गोरक्षक गुंडों की हिम्मत बढ़ गई है और वे खुलेआम मवेशियों के व्यापारियों और अन्य के साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं।
कुल मिला कर देश को मोदी के नाम पर भले ही ऐसा चुंबकीय व्यक्ति मिला हुआ है, जो भाजपा को बढ़त दिलाए हुए है, मगर धरातल पर आम आदमी को कुछ भी नहीं मिला है। सार्वजनिक रूप से भले ही भाजपाई इस तथ्य को स्वीकार न करें, मगर कानाफूसी में वे भी स्वीकार करते हैं कि जिस परिवर्तन के नाम पर भाजपा सत्ता में आई, वैसा कोई परिवर्तन कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, जून 03, 2017

जोशी के आरसीए अध्यक्ष बनने के बड़े राजनीतिक मायने

बेशक क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में भी राजनीति का बड़ा दखल होता है, मगर उससे राजनीति की दिशा तय होती हो, ऐसा नहीं है। हां, इतना जरूर है कि क्रिकेट की राजनीति इशारा जरूर करती है कि राजनीति का तापमान कैसा है? आरसीए के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
इसमें कोई दोराय नहीं कि प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सी पी जोशी राजनीति के बड़े चतुर खिलाड़ी हैं, मगर उन्हें आरसीए अध्यक्ष बनने की जो कामयाबी हाथ लगी, उसमें कहीं न कहीं भाजपा के अंदरूनी अंतरविरोध ने अपनी भूमिका अदा की। पिछले दिनों जब इस चुनाव के लिए वोटिंग हो चुकी तो इशारे यही थे कि सी पी जोशी का पलड़ा भारी है, मगर समीक्षकों की नजर इस बात पर थी कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा की रुचि कैसी है? माना यही जा रहा था कि चूंकि भाजपा यह नहीं चाहती कि राजस्थान क्रिकेट की राजनीति पर आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी हावी रहें, इस कारण मोदी के पुत्र रुचि मोदी को सत्तारूढ़ दल का साथ मिला होने पर संदेह था। फिर भी चूंकि सारा गेम भाजपा के अंदरखाने चल रहा था, इस कारण समीक्षक यह जानते हुए भी कि जोशी ही जीतेंगे, उनके जीतने पर सवालिया निशान छोड़ रहे थे।
चुनावी गणित कैसा था, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि समीक्षक यह भाषा बोल रहे थे- जो रुझान मिल रहे हैं, उनके अनुसार जीत कांग्रेस के दिग्गज नेता सीपी जोशी की होगी, लेकिन यह तभी संभव है, जब उनके प्रतिद्वंद्वी और आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी के बेटे रुचिर को सरकार का सहयोग नहीं मिला होगा। राजस्थान में ललित मोदी किसके करीबी हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। यदि केन्द्रीय भाजपा की रुचि रुचिर में नहीं थी, इसका सीधा सा अर्थ है कि वह ललित मोदी के बहाने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मजबूत होते नहीं देखना चाहती। इसी कारण इस चुनाव से जुड़ा सरकारी तंत्र असंमस में था। उसने रुचिर का पूरा साथ नहीं दिया और जोशी जीत गए।
यह तो हुई भाजपा की बात। अब अगर इस परिणाम के कांग्रेस में असर पर नजर डालें तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि केन्द्र व राज्य में भाजपा की सत्ता होने के बाद भी अगर एक पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आरसीए का अध्यक्ष बनता है तो इसका प्रभाव कांग्रेस कार्यकर्ता के मनोबल पर भी पड़ता है। वह दिखाई भी दे रहा है। यह भी तय है कि इससे पूर्वोत्तर के दस राज्यों में कांग्रेस का प्रभार संभालने के कारण राजस्थान की राजनीति से कुछ कटे हुए जोशी फिर ताकतवर हुए हैं। वे इस बहाने राजस्थान में अपनी जड़ों को फिर से सींचेंगे। स्वाभाविक रूप से इसका असर कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति पर भी पड़ेगा। निश्चित रूप से कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे की भी इस चुनाव पर नजर रही होगी। उन्हें अब कांग्रेस हाईकमान के निर्देशों के अनुरूप नए सिरे से माथापच्ची करनी होगी। हालांकि जोशी इस जीत के आधार पर कोई बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में नहीं होंगे, मगर इतना जरूर है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए उनके पक्के समर्थकों का उम्मीदें कुछ बढ़ जाएंगी। और अगर राजस्थान से ध्यान हटा कर गुजरात की जिम्मेदारी निभा रहे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थकों का भी साथ मिला तो वे नया समीकरण बनाने की कोशिश करेंगे।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, मई 22, 2017

कांग्रेस की सुनिश्चित जीत पर संशय के बादल

प्रदेश में भाजपा शासन के तीन नकारा सालों और प्रदेश कांगे्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की कड़ी मेहनत की वजह से जो आम धारणा सी बन गई थी कि इस बार सरकार कांग्रेस की बनेगी, उस पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। अगर कांग्रेस बहुमत में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा, अकेले इस सवाल ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि क्या कांग्रेस एकजुट हो कर चुनाव लड़ भी पाएगी?
चूंकि मृतप्राय: कांग्रेस को फिर से जिंदा करने में सचिन की अहम भूमिका है और प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाना है, इस कारण यह आमराय मानी जाती थी कि बहुमत मिलने पर वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे, मगर इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थकों ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि गहलोत भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे तो असंमजस पैदा होना ही था। हालांकि दोनों नेताओं ने कभी इस प्रकार का दावा नहीं किया कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं, वे तो यही कहते रहे हैं कि फैसला हाईकमान को करना है कि मुख्यमंत्री कौन होगा, या किसी को मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट किया भी जाएगा या नहीं, यह भी हाईकमान ही तय करेगा, मगर दूसरी श्रेणी के नेता और कार्यकर्ताओं की खींचतान के चलते यह संदेश जाने लगा है कि कांग्रेस एकजुट नहीं है।
वस्तुत: पिछले कुछ वर्षों का अनुभव ये रहा है कि राज्य की जनता ने बारी-बारी से दोनों दलों को सत्ता सौंपी है, इस कारण यह राय बन गई कि इस बार कांग्रेस सत्ता में आ सकती है। यह राय इसलिए और मजबूत हो गई,  क्यों कि इस बार वसुंधरा सरकार का अब तक कार्यकाल जनता के लिए सुखद नहीं रहा है। जिस उम्मीद में भाजपा को बंपर समर्थन दिया, उसके अनुरूप अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं। यहां तक कि वसुंधरा के इस कार्यकाल में पिछले कार्यकाल की तुलना में राजनीतिक व प्रशासनिक निर्णयों में मजबूती कम दिखाई दी। यह बात भाजपा के लोग भी जानते हैं, इस कारण वे भी लगभग ये मान बैठे हैं कि जनता इस बार पलटी खिला देगी। इस धारणा की वजह से कांग्रेसी भी मान बैठे हैं कि अब उनकी ही सरकार आने वाली है।  पायलट ने भी कांग्रेस में जान फूंकी है। भाजपा हाईकमान को भी यह आशंका है कि इस बार कांग्रेस बाजी न मार जाए। समझा जा सकता है जिस पार्टी की केन्द्र में बहुमत वाली सरकार हो और राज्य में भी तगड़े बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज हो, वह अगर सचिन पायलट को भाजपा में आने का लालच देती है तो इसका अर्थ ये है कि उसे अपने बूते चुनाव जीतने का भरोसा नहीं है।
तस्वीर का दूसरा रुख ये है कि कांग्रेस में एकजुटता की कमी के चलते वह धारणा धुंधली होती दिखाई दे रही है कि कांग्रेस सत्ता में लौटेगी। कांग्रेस  के राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडे व पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत तक यह बयान  दे चुके हैं कि कांग्रेस कार्यकर्ता यह मान कर न बैठ जाएं कि अगली सरकार कांग्रेस की होगी।
बात अगर कांग्रेस कार्यकर्ता की मन:स्थिति की करें तो वह इस बात को लेकर असमंजस में है कि अगर सरकार बनी तो मुख्यमंत्री कौन होगा? ऐसा असमंजस निचले स्तर पर नहीं, बल्कि से ऊपर से आया है। पूर्व प्रभारी कामथ कहते रहे कि अगला चुनाव सचिन के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा तो नए प्रभारी पांडे कहते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में कोई प्रोजेक्ट नहीं होगा और चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इस प्रकार के डिप्लामेटिक बयानों का राज क्या है, ये तो हाईकमान ही जाने, मगर समझा जा सकता है कि इसका असर कार्यकर्ता पर क्या पड़ता होगा? हालांकि कांग्रेस में एकजुटता की कमी तो नजर आ रही है, मगर कार्यकर्ता हताश हुआ है, ऐसा नहीं है।  यदि उसके मन में यह बात बैठ गई कि एकजुट हो कर मेहनत नहीं की तो सत्ता का सपना सपना ही रह जाएगा तो संभव है, वह एकजुट हो जाए। लेकिन फिलहाल इस प्रकार की खुसरफुसर शुरू हो गई है कि कांग्रेस का सत्ता में लौटना आसान नहीं है। विशेष रूप से इस वजह से कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जिस रणनीति के तहत अपना जाल फैलाने वाले हैं, उसे देखते हुए यह लगता है कि संघर्ष जबदस्त होने वाला है।

-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, मई 12, 2017

हटने की अफवाह के बावजूद वसुंधरा का ही दबदबा

तेजवानी गिरधर
नरेन्द्र मोदी भले ही वह कदीमी शख्स हैं, जिसकी लहर पर सवार हो कर भाजपा केन्द्र में सत्तारूढ़ हुई, राजस्थान में भी लोकसभा की सभी पच्चीस सीटों पर उनकी ही बदोलत भाजपा ने कब्जा किया, मगर राज्य में अब भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ही तूती बोलती है। और इसका सबसे बड़ा सबूत है कि ओम प्रकाश माथुर, जो कि मोदी के बेहद करीबी हैं, जिनकी रणनीति गुजरात, हरियाणा व उत्तरप्रदेश में कामयाब रही, उनकी हालत ये है कि राज्य में कोई भी भाजपा नेता व कार्यकर्ता उनके पास फटकने से भी एक बारगी कतराता है। वजह सिर्फ इतनी कि कहीं वसुंधरा मेडम नाराज न हो जाएं। नाराजगी की वजह ये कि वसुंधरा के रहते राज्य में मुख्यमंत्री पद का कोई भी नेता बर्दाश्त नहीं। हालांकि अपवाद स्वरूप पिछले दिनों शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव की ओर से माथुर का स्वागत समारोह गिनाया जा सकता है, मगर उसमें भी किस तरह से बड़े नेता किनारा कर गए, ये सब को पता है। यादव भी इसलिए खुल कर सामने आए क्योंकि वे वाया श्रीकिशन सोनगरा माथुर लॉबी में माने जाते हैं। जानकारी के अनुसार पार्टी के चंद लोगों ने बाकायदा सूची बना कर ऊपर भेजी गई कि कौन-कौन स्वागत करने पहुंचे थे। इसका सीधा सा अर्थ है कि उनके नाम रेखांकित किए गए होंगे।
जो कुछ भी हो, मगर जो व्यक्ति भाजपा का कद्दावर नेता हो, उससे अगर उसी की पार्टी की सरकार के रहते राज्य में कार्यकर्ता दूरी रखने को मजबूर हों तो वह चौंकाता है। खुद माथुर जब राजस्थान आते हैं तो उन्हें लगता होगा कि ये कौन सी दुनिया में आ गए। जिस पार्टी के वे कद्दावर नेता हैं, उसी के कार्यकर्ता मुंह फेर रहे हैं। पिछले दिनों उनके पुष्कर आगमन पर यही स्थिति हुई। हालांकि कहने भर को जरूर यह बात कही गई कि उनके आने की कोई सूचना नहीं थी, मगर सच ये है कि सब को पता था कि वे आने वाले हैं। अजमेर नगर निगम के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत जरूर अपने साथी हितेश वर्मा के साथ आए, मगर इसलिए नहीं कि वे अभी भाजपा में हैं ही नहीं।
राज्य में यह स्थिति पहली बार नहीं आई है। इससे पहले राजस्थान के एक ही सिंह कहलाने वाले भैरोंसिंह शेखावत भी जब उपराष्ट्रपति पद से निवृत्त हो कर राजस्थान लौटे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनकी पूरी जाजम समेट कर ताक पर रख दी थी। उनकी भी हालत ये हो गई थी कि वे राज्य में जहां कहीं भी जाते तो अपने स्वागत के लिए कार्यकर्ताओं को तरस जाते थे। लंबी और कठोर साधना के बाद हासिल मुकाम का यकायक खो जाना जीतेजी मरने के समान है। राजस्थान में आने के बाद काफी दिन तक तो शेखावत सार्वजनिक रूप से नजर ही नहीं आए। और आए तो वसुंधरा के डर से भाजपा के कार्यकर्ता उनसे दूर दूर ही रहते थे। स्थिति ये हो गई कि शेखावत अपनी ही सरकार को घेरने लग गए। इसी के साथ उनका राजनीतिक अवसान हो गया। इतना ही नहीं नरपत सिंह राजवी को भी केवल इसी कारण वसुंधरा राजे की टेड़ी नजर का शिकार होना पड़ा कि वे शेखावत के दामाद थे। इससे समझा जा सकता है कि वसुंधरा राजे किस शैली की राजनीतिज्ञ हैं। अपने इर्द गिर्द वे किसी को पनपने नहीं देतीं।
पिछले कुछ दिनों से भले ही इस प्रकार की अफवाह फैल रही है कि वसुंधरा को हटा कर माथुर को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, मगर फिलवक्त तो यही लगता है कि भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं में वसुंधरा का ही दबदबा है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, मई 07, 2017

राजस्थान में जीत के लिए भाजपा अपनाएगी कई हथकंडे

तेजवानी गिरधर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर पर सवार भाजपा राजस्थान में किसी भी सूरत में सत्ता पर फिर काबिज होने के लिए कई हथकंडे अपनाएगी। आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति क्या होगी, यह भले ही अभी तक गोपनीय है, मगर भाजपा की ओर से साफ तौर पर इशारे आ रहे हैं कि वह तकरीबन डेढ़ साल पहले ही कमर कसना शुरू कर चुकी है।
असल में भाजपा को यह ख्याल में है कि मोदी लहर के बावजूद इस बार राजस्थान में एंटी एस्टेब्लिशमेंट फैक्टर भी काम करेगा। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश व पंजाब इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। विशेष रूप से राजस्थान के बारे में यह धारणा सी बन गई है कि यहां की जनता हर पांच साल बाद सत्ता की पलटी कर देती है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल उनके पिछले कार्यकाल की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर रहा है, इस कारण आम धारणा है कि मतदाता उनके चमकदार चेहरे के आकर्षण में नहीं आएगा। ऐसे में वह अभी से जीत की कुंडली बनाने में जुट गई है। इसी सिलसिले में वसुंधरा को हटा कर केन्द्र में ले जाने और अकेले मोदी के नाम पर चुनाव लडऩे के मानस का खुलासा पिछले दिनों मीडिया में हो रहा था। हालांकि वसुंधरा की ओर यही दावा किया जा रहा है कि अगला चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, मगर पार्टी कार्यकर्ता अभी असमंजस में हैं।
बहरहाल, जीत के प्रति भाजपा हाईकमान इतनी शिद्दत लिए हुए हैं कि पिछले दिनों मीडिया में यह खबर तक आ गई कि राजस्थान में भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट को अपने खेमे में शामिल करना चाहती है। बताया गया कि उन्हें बाकायदा ऑफर भी दी जा चुकी है कि उन्हें केन्द्रीय मंत्री बना दिया जाएगा। यद्यपि सचिन की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। भाजपा के इस हथकंडे से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक तो वह अपनी सेना के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है, तभी तो विरोधी के सेना नायक पर ही हाथ मारने की सोच रही है, दूसरा ये कि इसके लिए वह तोड़-फोड़ की पराकाष्टा भी पार करने को आतुर है। भाजपा जानती है कि पिछले विधानसभा चुनाव में रसातल में पहुंच चुकी कांग्रेस को सजीव करने के लिए सचिन ने एडी से चोटी का जोर लगा रखा है। भाजपा सोचती है कि अगर उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ऐन वक्त पर टक्कर में आ खड़े होने का डर दिखाया जाए तो कदाचित वे डिग भी जाएं। इससे यह तो स्पष्ट है कि भाजपा को अब सत्ता प्राप्ति के लिए दिग्गज कांग्रेसियों को अपनाने से भी कोई परहेज नहीं है। ज्ञातव्य है कि चुनाव से कुछ समय पूर्व ही उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा भाजपा में शामिल हो गई थीं। उसके सकारात्मक परिणाम भी आए।    भाजपा ऐसा ही प्रयोग राजस्थान में करना चाहती है। सचिन पर दाव भले ही दूर की कौड़ी लगता तो, मगर इससे इतना तो तय मान कर चलना चाहिए कि भाजपा निचले स्तर पर असंतुष्ट कांग्रेसी नेताओं को बड़े पैमाने पर तोडऩे का प्रयास करेगी।
भाजपा एक नया प्रयोग और करने जा रही है। वो यह कि हाशिये पर जा चुके पुराने नेताओं को भी जोत रही है। उसे डर है कि कहीं उपेक्षा का शिकार ऐसे नेताओं की निष्क्रियता नकारात्मक असर न डाले। जैसे ही यह फंडा सामने आया विस्तारक बनाए गए पुराने नेताओं में जोश आ गया कि  पार्टी अब उनकी कद्र कर रही है। उन्हें यह भ्रम भी हुआ कि यदि उन्होंने ठीक से काम किया तो टिकट की लॉटरी लग सकती है। और कुछ नहीं तो टिकट वितरण में तो उनकी भूमिका रहेगी ही। भ्रम होना ही था, उन्हें संघ के प्रचारक तरह विस्तारक की संज्ञा जो दे दी गई। भाजपा को अनुमान नहीं था कि ऐसा करके उसने अनजाने ही उनमें फिर से लालसा पैदा कर दी है। नतीजतन हाल ही जब जयपुर में विस्तारकों का दो दिवसीय अधिवेशन हुआ तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को कहना पड़ गया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। विस्तारक का काम केवल अपने आवंटित विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्रों पर जाकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना है। इसके अतिरिक्त विस्तारक टिकट अथवा किसी पद की लालसा न रखें। जाहिर तौर पर इससे विस्तारक हतोत्साहित हुए होंगे, मगर समझा जाता है कि पार्टी जरूर विचार करेगी कि उन्हें कैसी लॉलीपॉप थमाई जाए।
भाजपा की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव ये भी आया है कि जहां पहले यह कहा जा रहा था कि सत्तर साल से अधिक उम्र के नेताओं को टिकट नहीं दिया जाएगा, उसे बढ़ा कर अब पचहत्तर साल कर दिया गया है।  कदाचित सर्वे में यह तथ्य आया हो कि अगर सत्तर साल के नेताओं को संन्यास दे दिया गया तो बड़े पैमाने पर जीतने वाले प्रत्याशियों का अभाव हो जाएगा।
कुल मिला कर भाजपा ने अगले विधानसभा चुनाव की रणभेरी से बहुत पहले ही अपनी सेना को सुसज्जित करना शुरू कर दिया है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

तिवाड़ी ने दिखाई परनामी को हैसियत

वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी का यह कहना कि जब वे विधायक थे, तब परनामी राजनीति में कुछ नहीं थे, वे उस समय सिर्फ अगरबत्ती बेचते थे, इसके गहरे मायने हैं। प्रदेश अध्यक्ष के बारे में इतनी बेबाक टिप्पणी करने का अर्थ है कि तिवाड़ी आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं। इतना ही नहीं, इससे ये संकेत भी मिलते हैं कि पार्टी के भीतर कुछ न कुछ पक रहा है, वरना प्रचंड बहुमत के साथ सरकार चलाने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ खुल कर आने का दुस्साहस नहींं करते।
ज्ञातव्य है कि पार्टी लाइन से हट कर चल रहे जयपुर की सांगानेर सीट के वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी को राष्ट्रीय अनुशासन समिति की ओर से अनुशासनहीनता का नोटिस जारी किया गया है। समिति के अध्यक्ष गणेशीलाल ने यह कार्यवाही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी की शिकायत पर की है और दस दिन में जवाब मांगा है।
नोटिस की प्रतिक्रिया में तिवाड़ी और मुखर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी जिस दीनदयाल वाहिनी के गठन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व को मेरी अनुशासनहीनता की शिकायतें कर रहे हैं, उसका गठन 29 साल पहले सीकर में उस समय हो गया था, जब मैं विधायक था और परनामी राजनीति में कुछ नहीं थे। वे उस समय सिर्फ अगरबत्ती बेचते थे। उन्होंने कहा कि वे न तो डरेंगे और न ही झुकेेंगे। भ्रष्ट सरकार के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे। अपनी ही पार्टी की सरकार को भ्रष्ट करार देना कोई मामूली बात नहीं है। हालांकि एक समय में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने तत्कालीन वसुंधरा सरकार के खिलाफ मुहिम का आगाज किया था, मगर तब वसुंधरा बहुत मजबूत थीं। मजबूत भी इतनी कि हाईकमान से भी टक्कर ले रही थीं। मगर अब हालात पहले जैसे नहीं हैं। अब केन्द्र में भाजपा की सरकार है और हाईकमान बहुत मजबूत। ऐसे में तिवाड़ी का मजबूती के साथ ये कहना कि कुछ दिनों पहले मुझे दिल्ली में एक नेता ने कहा था कि आप राजस्थान में मौजूदा नेतृत्व को स्वीकार कर लो, सब ठीक हो जाएगा, लेकिन मैं नहीं माना, इसलिए अब नोटिस का डर दिखाया जा रहा है। मैं ऐसे नोटिस से डरने वाला नहीं हूं, गहरे अर्थ रखता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

तिवाड़ी को दो साल से क्यों झेलते रहे?

पार्टी लाइन से हट कर चल रहे जयपुर की सांगानेर सीट के वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी को आखिर राष्ट्रीय अनुशासन समिति की ओर से अनुशासनहीनता का नोटिस जारी कर दिया। समिति के अध्यक्ष गणेशीलाल ने यह कार्यवाही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी की शिकायत पर की है और दस दिन में जवाब मांगा है।
नोटिस में गौर करने लायक बात ये है कि उसमें साफ तौर कहा गया है कि वे पिछले दो साल से लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों एवं पार्टी के विरुद्ध बयानबाजी करने में संलग्न हैं। पार्टी द्वारा आयोजित बैठकों में वे उपस्थित नहीं हो रहे और विपक्षी दलों के साथ मिलकर मंच साझा कर रहे हैं। इसके साथ ही नोटिस में यह भी बताया गया है कि वे समानांतर राजनीतिक दल का गठन करने के प्रयास में जुटे हैं।
सवाल ये उठता है कि दो साल तक पार्टी उनको क्यों झेलती रही? दो साल का वक्त बहुत होता है। इस दरम्यान अनेक बार उनकी गतिविधियों व बयानों से पार्टी की किरकिरी हो चुकी है। यदि भाजपा की सरकार सीमित बहुमत वाली होती तो भी समझ में आ सकता था कि पार्टी उनको खोने का खतरा मोल नहीं लेना चाहती, मगर भाजपा तो प्रचंड बहुमत के साथ सरकार चला रही है। केन्द्र में भी भाजपा सरकार है। ऐसे इक्का दुक्का नेता अगर पार्टी छोड़ कर चले जाएं या निकाल दिए जाएं तो बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। ऐसे में पार्टी को उनके बारे निर्णय करने में इतना वक्त क्यों लगा, यह चौंकाता तो है?
ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी हाईकमान काफी सोच विचार के बाद इस पार या उस पार वाली स्थिति में आया है। अभी चुनाव दूर हैं। अगर पार्टी को उनको खोना पड़ता है तो उनकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त वक्त है। अगर अब भी कार्यवाही नहीं की जाती है तो इससे अन्य असंतुष्टों के हौसले बुलंद हो सकते हैं।
बहरहाल, अब देखने वाली बात ये है कि घनश्याम तिवाड़ी क्या जवाब देते हैं और क्या पार्टी की अनुशासन समिति उनके जवाब से संतुष्ट होती है या नहीं। अगर उनको पार्टी से निकालने की नौबत आती है तो निश्चित रूप से राज्य में भाजपा के समीकरण में कुछ बदलाव आएगा। इसके अतिरिक्त यह भी साफ हो जाएगा कि कौन उनके साथ है और पार्टी के साथ। बाकी एक बात जरूर है कि आज जब कि पार्टी अच्छी स्थिति में है, उसके बाद भी तिवाड़ी ने जो दुस्साहस दिखाया है तो वह गौर करने लायक है।
ज्ञातव्य है कि भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी अपने बेटे अखिलेश तिवाड़ी के नेतृत्व में नई पार्टी दीनदयाल वाहिनी का गठन करने में जुटे हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, मई 02, 2017

भाजपा विस्तारक कर पाएंगे संघ प्रचारकों की तरह सेवा?

भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक नया प्रयोग शुरू किया है, जिसके तहत पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए पार्टी के विस्तारकों को जिम्मेदारी दी जा रही है। परिकल्पना ये है कि जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में प्रचारक अपना घर छोड़ कर नि:स्वार्थ भावना से काम करते हैं, ठीक वैसे ही पार्टी के पुराने नेता बिना किसी राजनीतिक लाभ की कामना किए हुए पार्टी को जमीन पर मजबूत करें। कहने और बताने में लगता तो यह अच्छा है, मगर यह एक आदर्श स्थिति है, धरातल पर यह प्रयोग कामयाब होगा, इसको लेकर पार्टी के भीतर ही संशय है।
ज्ञातव्य है कि हाल ही जयपुर के केशव विद्यापीठ में भाजपा के प्रदेश भर के विस्तारकोंं का दो दिवसीय शिविर हुआ। इसमें मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उपदेश दिया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। विस्तारक का काम केवल अपने आवंटित विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्रों पर जाकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना है। इसके अतिरिक्त विस्तारक टिकट अथवा किसी पद की लालसा न रखें। इतना ही नहीं पहले चरण में लगातार छह माह तक आवंटित क्षेत्र में ही रहना पड़ेगा। कोई विस्तारक अपने गृह जिले में नहीं रहेगा। वसुंधरा ने जोर देकर यह इसलिए कहा कि वे जानती हैं कि जो भी व्यक्ति सक्रिय राजनीति में है या रह चुका है, वह बिना स्वार्थ के काम नहीं करेगा। करेगा तभी, जब उसकी एवज में उसे कुछ न कुछ मिले। बहरहाल, इसी के साथ विस्तारक बनाए गए पुराने नेताओं के सपनों पर पानी फिर गया। जब वे विस्तारक बनाए गए तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वे हाशिये पर नहीं हैं, बल्कि पार्टी उनकी कद्र कर रही है, मगर यदि बिना किसी लालच के काम करना है तो वह तो वे अपने कार्यकर्ता काल में कर चुके हैं, तो ऐसा विस्तारक का तमगा लगाने से क्या फायदा, अब तो राजनीतिक ईनाम की उम्मीद है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि भाजपा ही एक मात्र राजनीतिक संगठन है, जिसके बारे में ऐसी धारणा है कि उसका कार्यकर्ता घर की रोटी खा कर और अपनी जेब का पेट्रोल भाग-दौड़ करता है। विशेष रूप से संघनिष्ट कार्यकर्ता तो वाकई तन, मन और यथासंभव धन से सेवा कार्य करता है। यह कुछ हद तक सही है, मगर उसमें अब परिवर्तन आने लगा है। वो जमाना गया, जबकि पार्टी थी ही विपक्ष में। सत्ता व सत्ता का सुख एक सपना ही था। तब न तो पार्टी के पास इतना धन था कि वह कार्यकर्ताओं पर खर्च करे, और न ही पार्टी के नेता ऐसी स्थिति में थे। वह संघर्ष का दौर था। लेकिन अब जबकि पार्टी नेता सत्ता का स्वाद चख चुके हैं, कार्यकर्ता भी लाभ की उम्मीद करता ही है। ऐसे में सत्ता का तनिक सुख भोग चुके पुराने नेताओं से फोकट में घिसने की आशा करना बेमानी ही है।
बात अगर संघ के प्रचारकों की करें तो वे वाकई घर का परित्याग कर समर्पित भाव से जुटे रहते थे। मगर अब वह आदर्श स्थिति नहीं रही। हालांकि अब भी कुछ प्रचारक परंपरागत तरीके के ही हैं, मगर अनेक ऐसे भी हैं, जो पार्टी नेताओं की मिजाजपुर्सी पसंद करने लगे हैं। और उसकी एक मात्र वजह ये है कि भाजपा की असली ताकत संघ में ही मानी जाती है। अगर उसे रिमोर्ट कंट्रोल की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संघ की सिफारिश पर टिकटों का बंटवारा होता है। संघ प्रचारक व पदाधिकारी भी जानते हैं कि वे तो नींव की ईंट बने हुए हैं, मगर उनकी कृपा से सत्ता पर काबिज नेता सुख भोग रहे हैं। ऐसे में वे भी अतिरिक्त सम्मान की उम्मीद करते हैं।
पार्टी में यह सोच बनी है कि जिस प्रकार संघ के प्रचारक आदर्श जीवन जीते हैं, ठीक वैसे ही पार्टी के पुराने नेता भी नि:स्वार्थ जीवन जीएं।  मगर धरातल का सच ये है कि जिस नेता ने एक बार सत्ता का सुख भोग लिया या किसी साथी को सत्ता सुख भोगते हुए देख लिया, उसमें नि:स्वार्थ भाव पैदा होना कठिन है। मुख्यमंत्री वसुंधरा भले ही कितना भी जोर दें, मगर ऐसे विस्तारक तैयार करना बेहद कठिन है। वसुंधरा ने यह कह कर और पानी फेर दिया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। अगर ऐसा है तो टिकट का दावेदार भला उसे क्यों गांठेगे? अगर उनकी रिपोर्ट पर किसी को टिकट नहीं मिलेगा तो विधायक बनने बनने वाला उसका अहसान भी क्यों मानेगा?
ऐसा नहीं है कि वसुंधरा अथवा पार्टी के बड़े नेता इस स्थिति से अनभिज्ञ हैं। वे भलीभांति जानते हैं कि यह टास्क कठिन है। ऐसे में संभव है कि विस्तारकों को कोई न कोई लॉलीपॉप पर विचार किया जाए।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, अप्रैल 30, 2017

भाजपा बड़े पैमाने पर काटेगी मौजूदा विधायकों के टिकट?

हालांकि मोटे तौर पर यही माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी के नाम में अब भी चमत्कार है और मोदी लहर अभी नहीं थमी है, बावजूद इसके स्वयं भाजपा का मानना है कि एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर भी अपना काम करता है, जिसका ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश व पंजाब हैं। उत्तर प्रदेश में चूंकि भाजपा को बंपर बहुमत मिला, इस कारण उसे मोदी लहर की संज्ञा मिल गई, मगर सच्चाई ये थी कि मायावती व अखिलेश की सरकारों के प्रति जो असंतोष था, वहीं मोदी लहर में शामिल हो गया। उधर पंजाब में मोदी लहर नाकायाब हो गई, क्योंकि वहां एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर पूरा काम कर गया। ऐसे में पार्टी केवल इसी मुगालते में नहीं रहना चाहती कि चुनाव जीतने के लिए केवल मोदी का नाम ही काफी है।
सूत्रों के अनुसार भाजपा के अंदरखाने यह सोच बन रही है कि अगले साल होने जा रहे राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी मोदी फोबिया के साथ एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर काम करेगा। इसके अतिरिक्त विशेष रूप से राजस्थान के संदर्भ में यह तथ्य भी ध्यान में रखा जा रहा है कि यहां की जनता हर साल पांच साल बाद सत्ता बदल देती है। हालांकि मौजूदा मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे चूंकि क्षेत्रीय क्षत्रप हैं और उनका भी अपना जादू है, मगर समझा जाता है कि वह भी अब फीका पड रहा है। हालांकि भाजपा का एक बड़ा खेमा यही मानता है कि वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल संतोषजनक रहा है, मगर फिर भी यह आम धारणा बन गई है कि उनका मौजूदा कार्यकाल पिछले कार्यकाल की तुलना में अलोकप्रिय रहा है। इसकी एक वजह ये रही है कि इस बार भाजपा के पास ऐतिहासिक बहुमत था, इस कारण सभी विधायकों को संतुष्ट नहीं किया जा सका, जिसकी छाया आम जनता में भी नजर आती है। ऐसे में भाजपा के लिए चिंता का विषय है कि राजस्थान में सत्ता विरोधी पहलु से निपटने के लिए क्या किया जाए?
सूत्रों के अनुसार भाजपा हाईकमान की सोच है कि एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर तभी कमजोर किया जा सकता है, जबकि बड़े पैमाने पर पुराने चेहरों के टिकट काटे जाएं। चेहरा बदलने से कुछ हद तक पार्टी के प्रति असंतोष को कम किया जा सकता है। पार्टी के भीतर भी मौजूदा विधायक के विरोधी खेमे का असर तभी कम किया जा सकता है, जबकि चेहरा ही नया ला दिया जाए। पार्टी का मानना है कि विशेष रूप से दो या तीन बार लगातार जीते हुए विधायकों के टिकट काटना जरूरी है। हालांकि ऐसा करना आसान काम नहीं है, और उसकी कोई ठोस वजह भी नहीं बनती, मगर फार्मूला यही रखने का विचार है। बस इतना ख्याल जरूर रखा जा सकता है कि सीट विशेष पर यदि किसी विधायक का खुद का समीकरण बहुत मजबूत है तो उसे फिर मौका दिया जा सकता है।
भाजपा हाईकमान ने ऐसे पुराने चेहरों को भी हाशिये पर रखना चाहती है, जो कि पूर्व में विधायक, सांसद या प्रभावशाली रहे हैं। इसके लिए संघ प्रचारकों की तर्ज पर पार्टी में भी विस्तारकों की टीम तैयार की गई है। पिछले दिनों ऐसे विस्तारकों को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने साफ तौर पर कहा कि न तो वे टिकट मिलने की आशा रखें और न ही इस गलतफहमी में रहें कि उनके रिपोर्ट कार्ड पर टिकट दिए जाएंगे। उनका काम केवल पार्टी का जनाधार बढ़ाना है। इसका मतलब साफ है कि पार्टी इस बार बिलकुल नए चेहरों पर दाव खेलना चाहती है।
सूत्रों का मानना है कि अगर चेहरे बदलने के फार्मूले पर ही चुनाव लड़ा गया तो तकरीबन साठ से सत्तर फीसदी टिकट काटे जाएंगे, जिनमें मौजूदा विधायक और पिछली बार चुनाव हारे प्रत्याशी शामिल होंगे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, अप्रैल 25, 2017

आडवाणी के फंसने से है सिंधियों को मोदी पर गुस्सा

हालांकि पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी सिंधी हैं, मगर वे अकेले सिंधी समाज के नेता नहीं हैं, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पृष्ठभूमि के होने की वजह से हिंदुत्व में ज्यादा यकीन रखते हैं। असल में वे सिंधी समाज से कहीं ऊपर उठ कर हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। बावजूद इसके सिंधी समाज उन्हें अपना नेता मानता है। इतना मानता है कि एक बार जब उन्होंने कह दिया कि सिंधी पुरुषार्थी हैं और उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं है तो उसके बाद सिंधी समाज ने कभी इस मांग पर जोर नहीं दिया। आज जब वे बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की अपील पर फिर से आपराधिक साजिश के आरोपी बन गए हैं तो सिंधी समाज में गुस्सा है। गुस्सा इस वजह से है कि भाजपा में हाशिये पर धकेल दिए जाने के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार बने तो ताजा मामला आड़े आता दिखाई दे रहा है।
यूं तो पिछले कुछ माह से सिंधियों के कुछ संगठन सोशल मीडिया पर आडवाणी को राष्ट्रपति बनाए जाने की मुहिम छेड़े हुए हैं ही, मगर ताजा हालात में वह मुहिम गुस्से में तब्दील होने लगी है। चूंकि सोशल मीडिया बेलगाम है, इस कारण यूं तो कई प्रकार की आपत्तिजनक टिप्पणियां पसरी पड़ी हैं, मगर उनका निचोड़ इन चंद लाइनों में पेश है:-
आडवाणी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए देशभर में राम रथ यात्रा की और उसका परिणाम ये है कि जिस पार्टी की संसद में केवल दो ही सीटें थीं, वह तीन सौ तक पहुंच गई। जब प्रधानमंत्री बनने की बारी आई तो कट्टर हिंदुत्व का चेहरा आड़े आ गया और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए। गोधरा कांड में जब वाजपेयी ने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की नसीहत दी तो आडवाणी ने उनको बचाया। मगर आज वही मोदी अहसान फरामोश हो कर आडवाणी के राष्ट्रपति बनने में आड़े आ रहे हैं। उनके इशारे पर ही सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर बाबरी मामले की फिर से सुनवाई के आदेश जारी करवा दिए। कैसी विडंबना है कि जिस शख्स ने पार्टी को खड़ा किया, आज वही अपनी पार्टी के शासन में अपराधी कर श्रेणी में खड़ा है, जबकि यूपीए के शासन काल में ऐसा नहीं हुआ।
सिंधी समाज आडवाणी को अपना आइकन मानता है। उनकी ही वजह से आज बहुसंख्यक सिंधी भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है, मगर भाजपा ने सिंधियों का इस्तेमाल केवल सत्ता हासिल करने के लिए किया है। सिंधी समाज को चाहिए कि वह मोदी व भाजपा को सबक सिखाए, ताकि उनकी अक्ल ठिकाने आए।
हालांकि सिंधी समाज का कोई सशक्त राष्ट्रीय संगठन नहीं है और अगर हैं तो भी वे कहीं न कहीं संघ या भाजपा विधारधारा के ही नजदीक हैं। ऐसे में कोई भी मोदी के विपरीत जा कर सांगठनिक रूप से आडवाणी के लिए दबाव नहीं बना पाएगा, मगर इस प्रकार की मुहिम आम सिंधियों की भावना को तो प्रदर्शित करती ही है। यह बाद दीगर है कि ऐसी मुहिम के कामयाब होने की संभावना कम ही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, अप्रैल 24, 2017

मोदी के अश्वमेघ यज्ञ को कोई बाधा मंजूर नहीं?

-तेजवानी गिरधर-
देश के इतिहास में पहली बार जिस प्रकार भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को ब्रांड बना कर सत्ता पर कब्जा किया है, उस सफल प्रयोग ने भाजपा की मानसिकता बना दी है कि भले ही कॉमन सिविल कोड, राम मंदिर, कश्मीर में धारा 370 सहित कट्टर हिंदुत्व के अन्य एजेंडे समानांतर रूप से कायम रखे जाएं, मगर यदि इस देश की जनता व्यक्तिवाद में विश्वास रखती है तो बेहतर ये है कि मोदी ब्रांड को ही आगे रखा जाए। भाजपा को समझ में आ चुका है कि वह जिन मुद्दों को लेकर वर्षों से चल रही है, वे प्रभावी तो हैं, मगर ऐसे वैचारिक आंदोलन सत्ता हासिल करने के लिए नाकाफी हैं। सालों के मंथन व उतार-चढ़ाव देखने के बाद अलादीन के चिराग से निकले मोदी ब्रांड को वह तब तक भुनाना चाहती है, जब तक कि वे मंद पड़ता न दिखाई दे। ऐसे ही इरादों को मन में रख कर भुवनेश्वर में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह कहा कि अभी पार्टी अपने चरम पर नहीं पहुंची है और स्वर्णिम काल तब आएगा जब पूरे देश में पंचायत से लेकर हर प्रांत एवं संसद तक उसका शासन होगा।
तेजवानी गिरधर
ये इरादे यही इंगित करते हैं कि भाजपा उन राज्यों में भी अपनी दमदार उपस्थिति चाहती है, जहां वह सत्ता से दूर है। ओडिशा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी का आयोजन भी इसी बात को रेखांकित करता है।
असल में हाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा को जिस फार्मूले से सफलता मिली, उसके बाद उसने तय कर लिया है कि एक तो मोदी ब्रांड को ज्यादा से ज्यादा चमकाया जाए और दूसरा ये कि अगर जीत के लिए घोर विरोधी कांग्रेस के नेता भी पार्टी में शामिल करने पड़ें तो उससे परहेज न किया जाए। लब्बोलुआब, मोदी के अश्वमेघ यज्ञ में उसे कोई बाधा मंजूर नहीं। न पार्टी के भीतर की और न ही बाहर की। यहां तक कि उसे पार्टी के क्षेत्रीय क्षत्रप भी मंजूर नहीं। उन्हें भी ताश के पत्तों की तरह फैंट रही है। गोवा के क्षत्रप मनोहर पर्रिकर को केन्द्र में बुला कर रक्षा मंत्री बनाना और जरूरत पडऩे पर वापस गोवा का मुख्यमंत्री बनाना इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। बात राजस्थान की करें तो श्रीमती वसुंधरा राजे भी तो क्षेत्रीय क्षत्रप हैं। प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता का संचालन करने वाली पार्टी की चमकदार चेहरे वाली वसुंधरा राजे तक को यहां से हटा कर केन्द्र में ले जाने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। मोदी के नाम पर जीत की शिद्दत कितनी मजबूत है, उसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि एंटी इंकंबेंसी के चलते जरा सी चूक से कहीं सत्ता हाथ से न निकल जाए, वह राजस्थान में अगला विधानसभा चुनाव मोदी के नाम पर ही लडऩे का मानस बना चुकी है।
इतना ही नहीं, अगर देश की राजधानी से इस प्रकार की खबरें आती हैं कि उसने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट तक को भाजपा में शामिल होने पर केन्द्रीय मंत्री पद ऑफर किया है तो समझा जा सकता है कि सत्ता के लिए उसे घोर विरोधियों को भी अपने भीतर समा लेने से कोई गुरेज नहीं। सत्ता के विस्तार के लिए अश्वमेघ यज्ञ इसी का तो नाम है। ऐसा प्रयोग उसने उत्तर प्रदेश में भी किया था। वहां की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा को उनके कांग्रेस में तनिक असंतुष्ट दिखाई देते ही तुरंत हाथ मारा। कदाचित रीता बहुगुणा को भी हालात के मद्देनजर कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में जाना ज्यादा फायदे का सौदा लगा। कुछ इसी प्रकार सचिन को वह यह डर दिखा कर कि कहीं उनकी सारी मेहनत के बाद भी अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना दिया जाए, तो क्या करेंगे, बेहतर ये है कि भाजपा में चले आने का निमंत्रण दे रही है। जानकारी के अनुसार इसी कड़ी में महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा व नारायण राणे पर डोरे डाले जा रहे हैं।
बात अगर विपक्ष की करें तो वह मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित है। एक के बाद एक प्रमुख विपक्षी नेता भाजपा के खिलाफ एकजुट होने को वक्त की जरूरत बता रहे हैं। स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश में भी बिहार की तरह गठबंधन बनने के आसार बढ़ गए हैं। पहले मायावती ने ऐसे किसी गठबंधन की संभावना को रेखांकित किया और फिर अखिलेश यादव ने भी। वैसे इस प्रकार की एकजुटता देश के लोकतंत्र के लिए बेहतर है। क्षेत्रीय दलों की भीड़ के कारण केन्द्र व राज्यों में ब्लैकमेलिंग के अनेक उदाहरण सामने हैं। हालात अगर देश को द्विदलीय राजनीतिक व्यवस्था की ओर ले जाते हुए दिख रहे हैं, तो यह राजनीति के हित में है। राजनीतिक दलों की भारी भीड़ का कोई औचित्य नहीं। इसमें हर्ज नहीं कि समान विचारधारा वाले दल गोलबंद हो जाएं, लेकिन यह गोलबंदी विचारों के आधार पर होनी चाहिए।

गुरुवार, अप्रैल 20, 2017

कानून के शिकंजे में जकड़ा भाजपा का शीर्ष पुरुष

जैसा कि मीडिया में आशंका जाहिर की जा रही है कि लाल कृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी को राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर करने की खातिर ही सोची समझी साजिश के तहत बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमा चलाया जा रहा है, अगर ये सच है तो राजनीति वाकई निकृष्ठ चीज है। भले ही सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से यह स्थापित हो रहा हो कि कानून सब के लिए समान है, मगर भाजपा के शीर्ष पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के लिए यह जीते जी मर जाने के समान है। जिस राम मंदिर आंदोलन के वे सूत्रधार रहे, उसने देश की दशा व दिशा बदली, उसी की परिणति में भाजपा दो सीटों से बढ़ कर आज सत्ता पर काबिज है, मगर उसी की परिणति में वे खुद उम्र के इस पड़ाव पर भी कानून के शिकंजे में जकड़े हुए हैं। कैसी विडंबना है कि जिस राम के नाम पर कुछ नेता आज सत्ता का सुख भोग रहे हैं, और आगे और भी ज्यादा ताकतवर होना चाहते हैं, उन्हीं राम की खातिर आडवाणी के हाथों हुआ कथित कृत्य उनको सलाखों के करीब ले आया है। यह तब और ज्यादा दर्दनाक हो जाता है कि जब पार्टी की खातिर किए गए बलिदान की एवज में ईनाम का मौका आया तो उन्हें उससे वंचित रखने के लिए अपने ही लोग नए सिरे से शिकंजे में कसना चाहते हैं। उस पर तुर्रा ये कि औपचारिकता निभाते हुए पार्टी आपके साथ खड़ी है।
बाबरी मस्जिद के विध्वंस की साजिश में अगर वे शामिल थे, यह कोर्ट में साबित हो जाता है तो उन्हें सजा होनी ही है, होनी ही चाहिए, मगर क्या यह सच नहीं है कि उसी विध्वंस ने हिंदुओं को लामबंद किया, ऊर्जा भरी और उसी सांप्रदायिक धु्रवीकरण की बदौलत भाजपा आज पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है। कोर्ट को यह तो दिख जाएगा कि साजिश करने वाले कौन थे, मगर उसे यह कदापि नजर नहीं आएगा कि उसी साजिश के परिणामस्वरूप  पार्टी के कुछ और नेता सत्तारूढ़ हो कर इठला रहे हैं। बकौल आडवाणी,  राम मंदिर आंदोलन से वे गौरवान्वित हैं, मगर उसी आंदोलन की वजह से बने मार्ग पर चल कर सुशोभित तो कुछ और रहे हैं।
यह भी एक संयोग या भाजपा के लिए सुयोग है कि मुकदमे में रोज सुनवाई होगी और जब तक फैसला आने वाला होगा तब तक प्रतिदिन राम मंदिर का नाम सुर्खियों में रहेगा, जिसका लाभ स्वाभाविक रूप से भाजपा उठाएगी ही। अगर आरोपित बरी हो गए तो ठीक, नहीं तो इसे हिंदुओं के लिए शहादत के रूप में भुनाया जाएगा। यानि कि भुगतेंगे शहादत देने वाले और भोगेंगे कंगूरे।
इस कष्ट की पीड़ा कितनी गहरी होगी, ये तो आडवाणी ही जानते होंगे कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वे न केवल हाशिये पर धकेल दिए गए, अपितु अनुशासन के नाम पर उनका मुंह भी सिल गया है। वे अपना ब्लॉग तक लिखना छोड़ चुके हैं। संगठन के हित को लेकर कभी कुछ टिप्पणी भी की और मौजूदा नेतृत्व को रास नहीं आया तो उन्होंने न बोलने का फैसला कर लिया। यहां तक कि भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी या कार्यसमिति तक में उन्होंने चुप्पी साधे रखी है।
देश के सर्वोच्च पद के मुहाने पर खड़े शख्स को यदि सामने सलाखें नजर आ जाएं तो उसकी मन:स्थिति की व्याख्या करना नितांत असंभव है। मरने के बाद पीछे क्या होता है, किसी ने नहीं देखा, मगर जीते जी अपनी दुर्गति देखने वाले को शायद मृत्यु से भी हजारों गुणा भयंकर पीड़ा होती होगी। तभी कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्ग और नर्क कहीं ऊपर नहीं, यहीं धरती पर है, यहीं पर है।
तेजवानी गिरधर
सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय से जहां हमारी न्यायिक व्यवस्था पर गर्वानुभूति होती है, उसी व्यवस्था पर शर्म भी आनी चाहिए कि 25 साल तक  मुकदमा चलने के बाद भी उसका फैसला नहीं आया। अभी दो साल और इंतजार करना होगा। इस बीच साजिश रचने के 21 आरोपियों में से 8 तो इस दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। धन्य है।
और उधर उमा भारती को देखिए, उन्हें तो कोई मलाल ही नहीं। कहती हैं-कोई साजिश नहीं हुई, साजिश तो अंधेरे में होती है, वहां तो जो हुआ, खुल्लम-खुल्ला हुआ...। अयोध्या में राम मंदिर के लिए फांसी चढऩे को भी तैयार हूं। कोई माई का लाल मंदिर बनने से रोक नहीं सकता।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, अप्रैल 19, 2017

क्या ऐसा आडवाणी को राष्ट्रपति पद से दूर रखने के लिए हुआ?

तेजवानी गिरधर
बाबरी विध्वंस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के बुधवार को आए अहम फैसले को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले आगामी चुनाव के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया तो इस सवालों से अटा पड़ा है कि क्या ऐसा पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को इस पद की दौड़ से अलग करने के लिए किया गया है? उल्लेखनीय है कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत 12 नेताओं पर आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने के आदेश हुए हैं और दूसरी ओर आडवाणी राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार माना जाते है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट व सीबीआई पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, ऐसे में मूल रूप से इस तरह का सवाल बेमानी है, मगर पिछले सालों में सीबीआई की भूमिका को लेकर जिस तरह से प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं, इस कारण लोगों को इस तरह की संभावना पर सहसा यकीन भी हो जाता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने तो बाकायदा अपने बयान में ऐसा कह ही दिया, जिसकी प्रतिक्रिया में भाजपा के रविशंकर प्रसाद की ओर से इतना भर जवाब आया कि वे खुद व खुद के परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर ध्यान दें। एक बात और। वो यह कि इस फैसले से यह संदेश भी तो गया ही है कि सरकार सीबीआई व सुप्रीम कोर्ट के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती, भले ही भाजपा के दिग्गजों का मसला हो।
ज्ञातव्य है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी सरीखों को जिस तरह से मार्गदर्शक मंडल के नाम पर हाशिये पर रख छोड़ा गया है, पार्टी के अधिसंख्य लोगों के लिए यह तकलीफ है कि जिन नेताओं ने पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा है, उनकी यह दुर्गति ठीक नहीं है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस तरह एक तानाशाह की तरह मजबूत बने हुए हैं, उनको पार्टी में कोई चुनौति देने वाला नहीं है, मगर फिर भी आडवाणी व जोशी जैसे नेताओं के कुछ न कुछ गड़बड करने का अंदेशा बना ही रहता है। इस कारण पार्टी के भीतर इस प्रकार की राय बनाई जाने लगी कि आडवाणी को राष्ट्रपति बना कर उपकृत कर दिया जाए। इससे वह काला दाग भी धुल जाएगा कि पार्टी में वरिष्ठों को बेकार समझ कर अलग-थलग कर दिया जाता है। मगर साथ यह भी ख्याल रहा कि अगर आडवाणी सर्वोच्च पद पर बैठा दिए गए तो कहीं वे सरकार के कामकाज में दिक्कतें न पैदा करते रहें। चाहे कुंठा की वजह से ही, मगर आडवाणी का इस प्रकार का स्वभाव सामने आता रहा है। कदाचित प्रधानमंत्री मोदी की भी यही सोच हो, इस कारण उन्हें उलझा दिया है, ताकि उन्हें राष्ट्रपति बनाने का जो दबाव बन रहा है, उसकी हवा निकल जाए। इसी सिलसिले में पिछले दिनों जिस तरह से संघ प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की मांग उठी है, उसे भी इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है, ताकि आडवाणी के नाम से ध्यान हटे। ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों मुस्लिम युवा आतंकवाद विरोधी समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष शकील सैफी ने अजमेर में सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हाजिरी दे कर यह दुआ मांगी कि भागवत को राष्ट्रपति बनाया जाए। अगर मुस्लिम ही हिंदुओं के शीर्षस्थ नेता को राष्ट्रपति बनाने की मंशा जाहिर करें तो वह वाकई चौंकाने वाला था। जियारत की प्रस्तुति से ही लग रहा था कि यह सब प्रायोजित है।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से सब भौंचक्क हैं। हर कोई अपने हिसाब से आकलन कर रहा है। कुछ का कहना है कि ऐसा उन नेताओं को शिकंजे में रखने के लिए किया गया है, जिनकी राम मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका है और इसी वजह पार्टी में उनकी अलग ही अहमियत रहती है। मोदी कभी नहीं चाहते कि बुरे वक्त में पार्टी को खड़ा करने वाले अपने बलिदान के नाम पर उन पर किसी प्रकार कर दबाव बनाए रखें। बतौर बानगी इन्हीं में से एक उमा भारती का बयान देखिए वे तो कह  रही हैं कि बाबरी विध्वंस के लिए साजिश का तो सवाल ही नहीं उठता, जो कुछ हुआ खुल्लमखुल्ला हुआ। उन्हें तो गर्व है कि वे मन, वचन व कर्म से राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई रही हैं। है न बिंदास तेवर।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, अप्रैल 16, 2017

सचिन पायटल पर हाथ मारना चाहती है भाजपा?

तेजवानी गिरधर
जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक हलकों में अफवाहों का बाजार गर्म हो रहा है। बाजारवाद के दौर में मीडिया भी ऐसे बाजार का हिस्सा बनता दिख रहा है। प्रदेश के एक बड़े दैनिक समाचार पत्र में देश की राजधानी से लीड खबर आई कि राजस्थान में भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट को अपने खेमे में शामिल करना चाहती है। बताया गया कि उन्हें बाकायदा ऑफर भी दी जा चुकी है कि उन्हें केन्द्रीय मंत्री बना दिया जाएगा। हालांकि अभी तक सचिन ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। बताया गया है कि भाजपा की कांग्रेस के ऐसे ही कुछ और चेहरों यथा मिलिंद देवड़ा व नारायण राणे पर भी भाजपा की नजर है। है न विस्फोटक खबर या यूं कहिये ब्लास्टिंग अफवाह।
खबर में दम भरने के लिए बाकायदा तर्क भी दिया गया है। वो यह कि पिछले विधानसभा चुनाव में रसातल में पहुंच चुकी कांग्रेस को सजीव करने के लिए सचिन ने एडी से चोटी का जोर लगा रखा है। यह सच भी है। वाकई सचिन की मेहनत के बाद आज स्थिति ये है कि इस धारणा को बल मिलने लगा है कि अगली सरकार कांग्रेस की ही होगी। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक लगातार गहलोत-गहलोत की रट लगाए हुए हैं। अर्थात रोटी तो पकाएं सचिन व खाएं गहलोत। भाजपा सचिन व गहलोत के बीच की कथित नाइत्तफाकी का लाभ लेना चाहती है। वह सचिन के दिमाग में बैठाना चाहती है कि कांग्रेस के लिए दिन रात एक करने के बाद भी ऐन वक्त पर कांग्रेस गहलोत को मुख्यमंत्री बना सकती है। ऐसे में बेहतर ये है कि भाजपा में चले आओ।
राजस्थान वासियों के लिए यह खबर हजम करने के लायक नहीं है, मगर भाजपा ने उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में जो प्रयोग किया, उससे लगता है कि वह सत्ता की खातिर किसी भी हद तक जा सकती है। वैसे भी उसे अब कांग्रेसियों से कोई परहेज नहीं है। भाजपा व मोदी को पानी पी पी कर कोसने वालों से भी नहीं। ज्ञातव्य है कि चुनाव से कुछ समय पूर्व ही उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा भाजपा में शामिल हो गई थीं। उसके सकारात्मक परिणाम भी आए। उन्हें बाकायदा ईनाम भी दिया गया। संभव है भाजपा ऐसा ही प्रयोग राजस्थान में दोहराना चाहती हो। वह जानती है कि सचिन इस वक्त राजस्थान में कांग्रेस के यूथ आइकन हैं। ऊर्जा से लबरेज हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता पर काबिज भी हो सकती है। अगर वह उन्हें तोडऩे में कामयाब हो गई तो राजस्थान में कांग्रेस की कमर टूट जाएगी। वे गुर्जर समाज के दिग्गज नेता भी हैं। उनके जरिए परंपरागत कांग्रेसी गुर्जर वोटों में भी सेंध मारी जा सकती है। हालांकि इस बात की संभावना कम ही है कि सचिन भाजपा का ऑफर स्वीकार करें, मगर इस खबर से यह संकेत तो मिलता ही है कि भाजपा राजस्थान में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस में तोडफ़ोड़ के मूड में है।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, अप्रैल 15, 2017

क्या वसुंधरा का मुख्यमंत्री पद से हटना टल जाएगा?

तेजवानी गिरधर
राजनीति में प्रति पल बदलते समीकरणों के बीच धौलपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को शानदार जीत दिलवाने के बाद क्या श्रीमती वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री पद से हटने की अफवाहों पर विराम लगेगा?ï यह सवाल बदले बदले हालात के कारण राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषया बना हुआ है।
असल में इस चुनाव से पूर्व पिछले दिनों मीडिया में यह खबर आम हो गई थी कि श्रीमती वसुंधरा को मुख्यमंत्री पद से हटा कर केन्द्र में विदेश मंत्री बनाया जाएगा। उनके स्थान पर वरिष्ठ भाजपा नेता ओम माथुर को मुख्यमंत्री सौंपे जाने की चर्चा थी। हालांकि इसकी पुष्टि न होनी थी और न ही हुई, मगर जिस प्रकार मीडिया में बार बार यह खबर उछल रही थी, यह आम धारणा सी बन गई थी कि जल्द ही वसुंधरा को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा रहा है। हाल ही में ओम माथुर के राजस्थान प्रवास के दौरान जिस प्रकार उनके समर्थकों ने उनका स्वागत किया, उससे भी इस धारणा को बल मिला। माथुर ने भी खंडन नहीं किया और यही कहा कि पार्टी जो भी जिम्मेदारी देगी, वे उसका बखूबी निर्वहन करेंगे।
अब जबकि वसुंधरा ने धौलपुर में पार्टी को शानदार जीत दिलवाई दी है तो यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अब भी उनकी सीट को खतरा है? यहां यह कहने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती कि उन्होंने इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था। अपनी पूरी ताकत इसमें झौंक दी थी। हालांकि विधानसभा में उनके पास जितना बंपर बहुमत हासिल है, इस चुनाव में जीत कर एक सीट और हासिल करना उनके लिए कत्तई जरूरी नहीं था, फिर भी उन्होंने जीतने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। वे चाहती थीं कि इस जीत से यह साबित हो जाए कि उनका दबदबा अब भी कायम है, लोग भले ही चर्चा कर रहे हों कि भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। वसुंधरा समर्थक भाजपाइयों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केलिए अब वसुंधरा को हटाना आसान नहीं होगा। उनकी बात में दम भी है, कि जब तीन साल बाद भी वसुंधरा का जादू कायम है तो उन्हें हटाने का क्या औचित्य है। जहां तक स्वयं वसुंधरा का सवाल है तो वे कभी नहीं चाहेंगी कि उन्हें राजस्थान से जाना पड़े। इसके लिए वे एडी चोटी का जोर लगा देंगी। बहुत अधिक दबाव आने पर ही समझिये कि वे केन्द्र में जाने को तैयार होंगी।
दूसरी ओर वसुंधरा के हटने का इंतजार कर रहे भाजपाई मानते हैं कि मात्र एक सीट पर जीतने का तो कोई मसला ही नहीं है। असल मोदी की दूरगामी योजना है और वे आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वसुंधरा को हटाना चाहते हैं। जैसी कि चर्चा है कि अगले चुनाव में जनता भाजपा को पलटी खिला देगी, वे इस संभावना को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहते हैं। उनकी मंशा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल उनके नाम पर ही लड़ा जाए, जिससे जीतने के बाद अपनी पसंद से मुख्यमंत्री बना सकें।
बहरहाल, बहुत जल्द ही साफ हो जाएगा कि क्या राजस्थान में सत्ता  का हस्तांतरण वसुंधरा से माथुर या और किसी और को होगा। इसकी वजह  ये है कि इस प्रकार के परिवर्तन के लिए यही उपयुक्त समय है। पार्टी में ऊर्जा भरने व नई जाजम बिछाने के लिए कम से कम एक-डेढ़ साल तो चाहिए ही। यदि अभी परिवर्तन नहीं हुआ तो बाद में होना मुश्किल हो जाएगा। देखते हैं क्या होता है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, मार्च 28, 2017

सत्ता परिवर्तन को हवा देने के लिए माथुर भी जिम्मेदार

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर लाख मना करें कि राजस्थान में चल रही सत्ता परिवर्तन की बातें सिर्फ राजनीति से प्रेरित हैं और इन बातों को में कोई दम नहीं है, मगर साफ दिख रहा है कि कुछ न कुछ तो गड़बड़ है। और सबसे बड़ी बात ये कि ऐसी गड़बड़ होने के जो कारक हैं, उसके जिम्मेदार वे खुद हैं। न वे समर्थकों को अपने स्वागत में आयोजित समारोह इत्यादि की इजाजत दें और न ही ऐसा माहौल बने। वे चाहें तो समर्थकों को स्वागत करने से इंकार कर सकते हैं। अव्वल तो समर्थकों को पता कैसे लगता है कि वे कब, कितने बजे, कहां से गुजरेंगे।
असल में जब से उत्तर प्रदेश में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला है और मोदी और ताकतवर हुए हैं, तभी से यह माहौल बना हुआ है। रोजाना इस आशय की खबरें छप रही हैं। जब वे जानते हैं कि उनके स्वागत की खबरों से ही यह संदेश जा रहा है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन हो रहा है, तो काहे को स्वागत करवा रहे हैं। आखिरकार वे पार्टी के जिम्मेदार नेता हैं, उन्हें पार्टी के बीच हो रही गुटबाजी को रोकना चाहिए, न कि बढऩे देना चाहिए। स्पष्ट है कि उनकी रुचि इसी बात में है कि स्वागत के बहाने शक्ति प्रदर्शन होता रहे। साथ ही यह भी संदेश जाए कि वे भी मुख्यमंत्री पद की लाइन में हैं। अगर यह मान भी लिया जाए कि भाजपा हाईकमान राज्य में सत्ता परिवर्तन करने के मूड में नहीं है तो भी जिस प्रकार उनका उत्साह से स्वागत हो रहा है, वह इस बात का संकेत है कि भाजपा का एक धड़ा वसुंधरा की जगह उनको देखना चाहता है। और अगर दबाव ज्यादा बना व भाजपा के कर्ताधर्ता नरेन्द्र मोदी जो जच गई कि वसुंधरा को हटाना है तो सत्ता परिवर्तन में देर भी नहीं लगेगी।
एक बात और। भाजपा नेता सत्ता परिवर्तन की संभावना से नकारते हुए कहते हैं कि यह सब मीडिया की ओर से पैदा की गई खबरें हैं। यानि कि पार्टी के भीतर हो रही हलचल को स्वीकार करने की बजाय उसका दोषी मीडिया को बनाया जा रहा है। सवाल ये उठता है कि क्या मीडिया को कोई सपना है कि आपकी पार्टी मेें कुछ चल रहा है। मीडिया उसी खबर को उजागर करता है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं न कहीं वजूद में होती है। कोरी हवा में कोई भी खबर नहीं बनाई जाती।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, मार्च 23, 2017

आगे चल कर मोदी के लिए समस्या बन सकते हैं योगी?

उत्तर प्रदेश में बंपर बहुमत के बाद जिस नाटकीय ढंग से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ काबिज हुए हैं, उसको लेकर इस आशंका का बीजारोपण हो गया है कि आगे चल कर योगी मोदी के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। यह सवाल इसलिए मौजूं हैं क्योंकि मोदी एक तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं, जो कि फिलहाल भाजपा के लिए मुफीद है, मगर मोदी स्टाइल का दूसरा फायर ब्रांड स्थापित होता है तो वह मोदी के लिए दिक्कत पैदा कर सकता है। हालांकि मोदी अपनी जिस तूफानी लहर पर सवार हो कर प्रधानमंत्री बने हैं और अब भी उनके नाम का जलवा कायम है, मगर योगी के मुख्यमंत्री बनते ही जिस प्रकार उन्हें युवा हिंदू सम्राट के नाम से विभूषित किया जा रहा है, जिस प्रकार कट्टर हिंदूवादी भावना हिलोरें ले रही है, वह इस आशंका को जन्म देती है कि अगर उन्होंने राम मंदिर के अतिरिक्त हिंदू हित पर कुछ अतिरिक्त करके दिखा दिया तो बहुसंख्यक हिंदू समाज में उनकी प्रतिष्ठा मोदी से भी कहीं अधिक न हो जाए।
बात अगर मुख्यमंत्री के चयन को लेकर हो रही कवायद की करें तो मीडिया में यह आमराय थी कि मोदी ने मनोज सिन्हा के नाम पर हरी झंडी दे दी थी। नाम तय होने के साथ ही जिस प्रकार उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत हो रहा था, वह इस बात की पुष्टि करता है। जानकारी के अनुसार इस बीच योगी यकायक सक्रिय हो गए। जीत कर आए भाजपा विधायकों का एक समूह भी दबाव बनाने लगा, जिसे टालना असंभव प्रतीत हो रहा था। संघ ने भी उन्हीं के पक्ष में वीटो जारी कर दिया। ऐसे में मोदी न चाह कर भी योगी के नाम पर सहमति देने को मजबूर हो गए। इस सिलसिले में योगी के शपथग्रहण समारोह में मोदी के चेहरे पर पसरे तनाव को नोटिस किया गया है। बताते हैं कि वे आम दिनों में जिस तरह लोगों से गर्मजोशी के साथ मिलते हैं, वह गर्मजोशी काफूर थी। उलटे होना तो यह चाहिए था कि वे और अधिक उत्साहित होते, क्योंकि उन्हीं की कथित सुनामी पर सवार हो कर भाजपा प्रचंड बहुमत से उत्तरप्रदेश पर काबिज हुई।
बताया जाता है कि मोदी खेमे की ओर से अध्यक्ष अमित शाह का तर्क था कि योगी आक्रामक शैली के कट्टर हिंदूवादी नेता हैं, जो कि मोदी के सबका साथ, सबका विकास के नारे के अनुकूल नहीं है। इस पर संघ की ओर से दलील आई कि छवि तो मोदी की भी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते कट्टर हिंदूवादी की थी, फिर भी दूरगामी सोच रख कर उनको प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया गया। ऐसे में योगी की छवि पर सवाल करना बेमानी है। समझा जाता है कि संघ ने सोची समझी रणनीति के तहत योगी को मुख्यमंत्री पद पर सुशोभित करवाया है। यह संघ के हिंदूवादी बनाम राष्ट्रवादी एजेंडे का हिस्सा है। राजनीतिक विचारकों का मानना है कि ऐसा इसलिए भी किया गया कि अगर मोदी संघ पर हावी होते हैं तो उनका विकल्प पहले से तैयार कर लिया जाए। इसके अतिरिक्त जिन नारों की बदोलत मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वे पूरे होने असंभव हैं, ऐसे में अगर आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी की चमक कम होने लगी तो कट्टर हिंदूवादी चेहरे के मालिक योगी को बहुसंख्यक हिंदुओं को लामबंद आगे ला कर दुबारा चुनाव जीता जा सकता है। कुल मिला कर ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी की योगी नामक संतति पिता से भी अधिक शौर्यवान निकली, जिसे कि कुछ लोग भस्मासुर तक की संज्ञा दे रहे हैं, जिस प्रकार भस्मासुर वरदान प्राप्त करने के बाद शिवजी को ही भस्म करने पर उतारु हो गया था।
योगी का मोदी के पहली पसंद न होने की बात से नाइत्तफाकी रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक हालांकि यहीं कहते हैं कि भाजपा, संघ व मोदी एक लाइन पर ही काम कर रहे हैं और कोई अंतरविरोध नहीं है, मगर वे भी यह बात तो स्वीकार करते ही हैं कि योगी का अभिषेक दीर्घकालिक एजेंडे के तहत दक्षिणपंथी राजनीति का एक बड़ा खिलाड़ी तैयार करना है, जो 2024 में मोदी का उपयुक्त उत्तराधिकारी बन सके। वस्तुत: मोदी ब्रांड के नाम पर फिलहाल भाजपा ने जो इमारत खड़ी की है, उसकी मजबूरी है कि सबका साथ, सबका विकास मंत्र ले कर ही कायम रह पाएगी। मोदी की भूमिका सिर्फ यहीं तक है। हिंदूवाद के अगले लक्ष्य हिंदू राष्ट के लिए योगी जैसा चेहरा ही काम आएगा। जिस प्रकार दो के अंक से दहाई के अंक तक भाजपा को लाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को भूमिका पूरी होने के बाद हाशिये पर रख दिया गया, ठीक वैसे ही मोदी की भूमिका समाप्त होने के बाद उन्हें भी हाशिये पर टांग दिया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। असल में संघ की नजर अपने दर्शन पर रहती है, व्यक्ति उसके लिए गौण होता है, वह साधन मात्र होता है।
तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, मार्च 21, 2017

क्या राजस्थान में भी मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा चुनाव?

उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में किसी का चेहरा सामने रखने की बजाय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर चुनाव लडऩे से मिली बंपर कामयाबी के बाद भाजपा में इस बात पर गंभीरता से विचार हो रहा बताया कि राजस्थान में भी आगामी विधानसभा चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा जाए।
यह लगभग सर्वविदित हो चुका है कि मोदी और राजस्थान की मौजूदा मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के बीच ट्यूनिंग ठीक नहीं है और इसी वजह से यह चर्चा कई बार सामने आई है कि मोदी उनके स्थान पर किसी और को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, बस उन्हें पलटने का मौका नहीं मिला या फिर साहस नहीं हुआ। इस सिलसिले वरिष्ठ भाजपा नेता व मोदी के विश्वासपात्र ओम प्रकाश माथुर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। सांसद भूपेन्द्र सिंह यादव भी लाइन में हैं। हाल ही उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम के बाद भी इस आशय की चर्चा शुरू हुई है। विचार इस बात पर हो रहा है कि ओम प्रकाश माथुर अथवा किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जाए अथवा नहीं। चुनावी रणनीति के रूप में अभी से यह तैयारी कर ली जाए कि आगामी चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा जाए या नहीं। इस सिलसिले में वसुंधरा राजे का वह बयान भी जेहन में रखना होगा कि अगला चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, जो कि उन्होंने सरकार के तीन साल पूरे होने पर दिया था। ज्ञातव्य है कि इसका विरोध घनश्याम तिवाड़ी ने किया था। राजनीतिक पंडित वसुंधरा के बयान के निहतार्थ खोजने में लग गए थे।
बहरहाल, यह आम धारणा है कि चूंकि वसुंधरा राजे के चेहरे में वह आकर्षण नहीं रह गया है, जिसके दम पर पिछली बार कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। हालांकि इस पर भी विवाद था कि वह मोदी लहर थी या वसुंधरा का जलवा। भाजपा भी जानती है कि इस बार वसुंधरा के चेहरे पर चुनाव लडऩे पर अपेक्षित परिणाम आना संदिग्ध है, इस कारण मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा हुई, मगर समस्या ये रही कि उनसे बेहतर चेहरा पार्टी के पास है नहीं। इसी बीच उत्तर प्रदेश के चुनाव हो गए। इसके परिणामों ने पार्टी में यह आम राय कायम होने लगी है कि मोदी के नाम में अब भी जादू है, लिहाजा वसुंधरा राजे की जगह किसी और का चेहरा सामने लाने की बजाय मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ा जाए। इससे एक लाभ ये हो सकता है कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ वाले दावेदारों के बीच खींचतान समाप्त हो जाएगी और पार्टी एकजुट रहेगी। दूसरा ये भी ख्याल है कि जैसे पिछली बार जीत का श्रेय वसुंधरा राजे के लेेने पर तनिक विवाद हुआ था, वह नहीं होगा। उससे भी बड़ी बात ये कि जब मोदी के नाम पर जीत हासिल कर ली जाएगी तो मोदी को अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाने में आसानी रहेगी।
वैसे राजनीति के जानकारों का मानना है कि केवल मोदी के नाम पर चुनाव लडऩे से पहले पार्टी उत्तर प्रदेश व राजस्थान के राजनीतिक समीकरणों की तुलना जरूर करेगी। उसकी वजह ये है कि उत्तर प्रदेश में तो भाजपा को बीस साल की एंटी इन्कंबेंसी का लाभ मिला, जब कि राजस्थान में तो भाजपा का राज और यहां उसके खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी का फैक्टर काम करेगा। एक सोच ये भी है कि मोदी का नाम आने पर एंटी इन्कंबेंसी का फैक्टर गौण हो जाए।
बहरहाल, इतना तय है कि राजस्थान में पार्टी नई रणनीति के तहत ही चुनाव मैदान में उतरेगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

गुरुवार, मार्च 16, 2017

उत्तरप्रदेश ने जातीय राजनीति व क्षेत्रीय दलों को दिया करारा झटका

इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला, जो कि दिल्ली व बिहार की हार के बाद फिर से मोदी कथित लहर का प्रमाण है, मगर इसका असल फायदा देश को हुआ है। एक तो ये कि क्षेत्रीय दलों सपा व बसपा को करारा झटका लगा है, और दूसरा ये कि केवल जातीय राजनीति करके भारतीय लोकतंत्र में छा जाने वालों का गणित छिन्न-भिन्न हो गया।
विषय के विस्तार से पहले आते हैं, भाजपा की जीत पर। चूंकि यहां प्रचार की पूरी कमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही संभाल रखी थी, वे ही स्टार कैंपेनर थे, इस कारण भाजपा की जीत का पूरा श्रेय मोदी के खाते में ही माना जाएगा। इसे मोदी लहर की संज्ञा दी जाती है, मगर तथ्यों का बारीकी से विश्लेषण करें तो इस लहर के भीतर भी कई तरह की लेयर हैं।
असल में उत्तर प्रदेश की जनता सपा व बसपा के पिछले बीस साल के गुंडा राज से त्रस्त थी। दोनों को दो-दो बार आजमाने के बाद ऊब कर परिवर्तन चाहती थी। दूसरा अहम कारण है, हिंदू वोटों का धु्रवीकरण।  हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई पैदा की गई। भाजपा ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। स्वाभाविक रूप से यह हिंदुओं को लामबंद करने का संदेश था। चुनाव के आखिरी दौर में कसाब, श्मशान-कब्रिस्तान, सैफुल्लाह के अतिरिक्त राम-मंदिर का जिस तरह प्रयोग किया गया, वह सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं को एकजुट करने के काम आया। रहा सवाल मुस्लिमों का तो वे सपा-कांग्रेस व बसपा में बंट गए। उसमें भी तीन तलाक के मुद्दे ने मुस्लिम महिला वोटों को भाजपा की ओर आकर्षित किया। रही सही कसर यादव कुनबे में हुई सरे आम जंग ने पूरी कर दी। अखिलेश को उम्मीद थी लोग उनके काम को ख्याल में रखेंगे, मगर वह सब पारिवारिक कलह में धुल गया।
भाजपा की जीत का एक फंडा ये भी है कि मोदी ने बातें तो आदर्शवाद की बहुत कीं, मगर जीतने के लिए जातिवाद और वंशवाद के आधार पर टिकट देते समय आंखें मूंद लीं।
बात मायावती की। उनका खास फोकस मुस्लिम मतदाताओं पर था। इसलिए मायावती ने चुनावों से पहले बाहुबली और आपराधिक छवि के मुख्तार अंसारी तक को अपनी पार्टी में शामिल कराया। मायावती ने इन चुनावों में 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को प्रदेश में टिकट दिया था। लेकिन इससे उनकी वह सोशल इंजीनियरिंग बिगड़ गई, जिसके दम पर वे एक बार सत्ता पर काबिज हो गई थीं।
कांग्रेस की चर्चा का कोई अर्थ इसलिए नहीं है, क्योंकि वह तो अनुसूचित जाति, ओबीसी व मुस्लिम वोट बैंक को खो कर पहले ही बेहद कमजोर हो चुकी थी। तभी तो वहां सपा व बसपा जैसे क्षेत्रीय व जाति आधारित दल उभरे। इन्होंने न केवल उत्तरप्रदेश में दादागिरी की, अपितु केन्द्र के कामकाज में भी खूब टांग अड़ाई। कांग्रेस ने तो अखिलेश के साथ रह कर जिंदा रहने की कोशिश मात्र की, मगर जब अखिलेश ही नहीं तैर पाए तो कांग्रेस को डूबने से कैसे बचाया जा सकता था। शायद कांग्रेस पार्टी को इसका अंदाजा पहले ही हो गया था, इसलिए सोनिया गांधी भी चुनाव प्रचार से दूर रहीं। कांग्रेस के लिए तुरुप का पत्ता माने जानी वाली प्रियंका गांधी भी एक-दो कार्यक्रमों को छोड़कर प्रदेश में ज्यादा सक्रिय नहीं रहीं।
इस चुनाव में नोटबंदी की भी खूब चर्चा रही। आज भले ही नाकाम नोटबंदी पर जनता की मुहर लगने की बात कही जा रही हो, मगर यह मोदी की कलाकारी ही कही जाएगी कि आम आदमी दर दर की ठोकरें खाने के बावजूद इससे खुश था कि धनपतियों की तिजोरियां तो खाली हो गईं।
इन सबके बाद भी अगर इस जीत को मोदी लहर की संज्ञा दी जाती है, तो कदाचित यह कुछ त्रुटिपूर्ण होगा। मूलत: यह एंटी एस्टेब्लिशमेंट फैक्टर था। अगर ये मोदी लहर थी तो वह पंजाब में क्यों नहीं चली? पंजाब कोई यूरोप का प्रांत तो है नहीं। पंजाब में भी एंटी एस्टेब्लिशमेंट फैक्टर ने ही कांग्रेस को जीत दिलवा दी। अगर ये मोदी लहर थी तो मणिपुर, गोवा में उत्तर प्रदेश जैसी प्रचंड क्यों नहीं थी? हां, इतना जरूर है कि मणिपुर में भाजपा का प्रदर्शन पूर्वोत्तर के राज्यों में भी कांग्रेस को चुनौती देता हुई नजर आ रहा है। उत्तराखंड की बात करें तो वहां भी स्थानीय समीकरणों ने भूमिका निभाई। उत्तराखंड में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी की आपसी कलह ने काम किया। उत्तराखंड में कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेता भाजपा में शामिल हो चुके थे। हरीश रावत कांग्रेस में अकेले पड़ गए थे। इसका पूरा-पूरा फायदा उत्तराखंड में भाजपा ने उठाया।
इन सब तथ्यों का निहितार्थ मोदी लहर को नकारना नहीं है। मोदी की लोकप्रियता आज भी कायम है, जैसी लोकसभा चुनावों के वक्त थी। ये तो दिल्ली और बिहार में भाजपा की करारी से मोदी ब्रांड को जो नुकसान हो गया था, वह मजबूती के साथ खड़ा रहे, इस कारण सारे समीकरणों को गड्ड मड्ड कर मोदी लहर बरकरार होने का प्रोजेक्शन मात्र है। मगर साथ ही पार्टी हित में विचार की बजाय व्यक्तिवाद की पूजा करना कितना देश हित में है, इस पर भी तनिक विचार कर लेना चाहिए।
लब्बोलुआब, यदि मोदी लहर को मान भी लिया जाए तो भी उत्तरप्रदेश का चुनाव परिणाम देशहित में है। जो वोट बैंक जातिवाद में फंस कर क्षेत्रीय दलों की प्राणवायु बना हुआ था, वह मुख्य धारा में आया है। यह एक शुभ संकेत है। कम से कम जातीय राजनीति कर क्षेत्र विशेष के हित साधक बने दलों की देश की राष्ट्रीय राजनीति में दखलंदाजी तो कम हुई। वरना यह सर्वविदित है कि सपा-बसपा जैसे दलों ने किस प्रकार केन्द्र की सरकारों को नचाया है। जैसे ईमानदार मनमोहन सिंह को द्रमुक ने बेईमानी के कटघरे में खड़ा कर दिया, वैसे ही अटल बिहारी वाजपेयी को ममता, माया व जयललिता ने आसानी से काम नहीं करने दिया। उचित तो ये रहेगा कि क्षेत्रीय दलों से लोकसभा चुनाव लडऩे का अधिकार छीन लेना चाहिए, भले अपने-अपने राज्यों में सत्ता चला कर क्षेत्रीय हित साधते रहें।
तेजवानी गिरधर
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सोमवार, मार्च 13, 2017

उत्तर प्रदेश में मोदी सुनामी का असर राजस्थान पर भी पड़ेगा?

उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत से जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  और मजबूत हुए हैं, वहीं अनुमान है कि उसका असर राजस्थान पर भी पड़ सकता है। हालांकि राजनीति में जोड़ बाकी गुणा भाग का योग आखिर में क्या निकलेगा, इस बारे में पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता, मगर कयासों से कुछ कुछ इशारे तो मिल ही जाते हैं। जैसे ही जीत का ऐलान हुआ, उसके दूसरे ही दिन बधाई के होर्डिंग्स में मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ ओम प्रकाश माथुर का फोटो चस्पा दिखाई दिया। संभव है यह कृत्य माथुर के निजी समर्थकों का हो, मगर इसी के साथ इस चर्चा को बल मिला है कि राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। माथुर के एक पक्के समर्थक ने तो बाकायदा वाट्स ऐप पर यह चर्चा छेड़ दी है कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है और उनके स्थान पर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भेजा जाएगा व राजस्थान के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश माथुर होंगे। हो सकता है कि यह अफवाह ही हो, मगर भाजपा में कुछ न कुछ पक रहा है, इसके संकेत तो मिल ही रहे हैं।
हालांकि राजस्थान विधानसभा चुनाव में अभी तकरीबन दो साल बाकी हैं, मगर उत्तर प्रदेश में चली मोदी लहर राजस्थान पर क्या असर डालेगी, राजनीतिक पंडित इस पर नजर जमाए हुए हैं। कोई माने या न माने, मगर भाजपा खेमे में एक कौतुहल तो बना हुआ ही है कि क्या अगला चुनाव वसुंधरा के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा? यद्यपि खुद वसुंधरा राजे ने अपनी सरकार के तीन साल पूरे होने पर मनाए जा रहे जश्र के दौरान साफ इशारा किया कि अगला चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनके बीच जिस तरह की कैमेस्ट्री है, उसे देखते हुए कम से कम राजनीतिक प्रेक्षक तो इस बात में संशय ही मानते हैं कि भाजपा उनके चेहरे पर दाव खेलेगी।
हालांकि यह कहना बिलकुल अनुचित होगा कि वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल असफल रहा है, मगर यह एक आम धारणा सी बनती जा रही है कि राजस्थान में वसुंधरा राजे के साथ भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। कम से कम इतना तो तय है कि जनता ने कांग्रेस की सत्ता पलट कर भाजपा को जिस तरह का बंपर समर्थन दिया, उसके अनुरूप यह सरकार खरी नहीं उतरी है। समझा जा सकता है कि जिस मतदाता ने कांग्रेस को हाशिये पर ला खड़ा किया, भाजपा से कितनी अधिक उम्मीदें रही होंगी। हालात जस के तस हैं, सुराज जैसा कुछ कहीं नजर नहीं आता। स्वयं भाजपा के कार्यकर्ता भी मौन स्वीकृति देते दिखाई देते हैं कि वसुंधरा का यह कार्यकाल उनके पिछले कार्यकाल से बेहतर नहीं है। उसकी एक बड़ी वजह भी है। वो यह कि पिछली बार वे अपने आकर्षक चेहरे के दम पर भाजपा को सत्ता में लेकर आई थीं, इस कारण उनके कदमों व निर्णयों में स्वच्छंदता दिखाई देती थी। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व उन पर हावी नहीं था। उलटा ये कहना ज्यादा उचित रहेगा कि वे ही हावी थीं। सर्वविदित है कि जब कुछ कारणों से वे सत्ता च्युत हुईं और उन पर दबाव बनाया गया कि नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ दें तो उन्होंने एकाएक उस निर्देश को मानने से इंकार कर दिया था। बमुश्किल पद छोड़ा। और ऐसा छोड़ा कि उस पद पर किसी को बैठाया ही नहीं जा सका। फिर जब चुनाव नजदीक आए तो विकल्प के अभाव में भाजपा को फिर से उन्हीं को नेतृत्व सौंपना पड़ा।
समझा जा सकता है कि तब वे कितनी ताकतवर थीं।  मगर अब स्थिति उलट है। केन्द्र में भाजपा सत्ता में है और वह भी नरेन्द्र मोदी जैसे चमत्कारिक नेतृत्व के साथ, ऐसे में हर राजनीतिक फैसले से पहले वसुंधरा को केन्द्र की ओर ताकना पड़ता है। स्वाभाविक रूप से वे इस बार स्वच्छंदता के साथ काम नहीं कर पाई हैं। हालांकि इस बार वे जबदस्त बहुमत के साथ सत्ता में हैं, मगर ये माना जाता है कि यह चमत्कार मोदी लहर की वजह से हुआ। लोकसभा चुनाव में भी जब पच्चीस की पच्चीस सीटें भाजपा ने जीतीं और उसका श्रेय वसुंधरा ने लेने की कोशिश की तो नरेन्द्र मोदी को यह नहीं सुहाया था। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में राजस्थान को प्रतिनिधित्व दिलाने में भी वसुंधरा की नहीं चली। बताया जाता है कि तब से ही दोनों के बीच ट्यूनिंग बिगड़ी हुई है। सच क्या है ये तो पार्टी नेतृत्व ही जानें, मगर चर्चाएं तो यहां तक होने लगीं थीं कि मोदी उनके स्थान पर किसी और को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपना चाहते हैं।
इस सिलसिले में वरिष्ठ भाजपा नेता ओमप्रकाश माथुर का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है। उत्तर प्रदेश के परिणामों ने एक बार फिर चर्चा को गरम कर दिया है। यूं भूपेन्द्र सिंह यादव का भी नाम चर्चा में आया है। सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि वसुंधरा को हटाना इतना आसान भी नहीं, जितना कहना आसान है। वस्तुस्थिति ये है कि ग्राउंड पर वसुंधरा ने अपनी पकड़ बना रखी है। हालांकि उनका चेहरा अब पहले की तुलना में निस्तेज हुआ है, मगर फिर भी उनके मुकाबले किसी और चेहरे में चमक नहीं है। बताया जाता है कि बावजूद इसके वसुंधरा के रूप में क्षेत्रीय क्षत्रप की मौजूदगी मोदी को पसंद नहीं। पार्टी की भी यही सोच है कि चुनाव तो मोदी के नाम पर ही लड़ा जाना चाहिए। और ऐसा तभी संभव है जब किसी और को जो कि मोदी का नजदीकी हो, उसे आगे लाया जाए।
इन हालातों के बीच जब पिछले दिनों जब वसुंधरा राजे ने यह कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो यह किसी दुस्साहस से कम नहीं था। आज भी जो फेस वैल्यू वसुंधरा की है, वैसी किसी और भाजपा नेता की नहीं। यह बात खुद वसुंधरा भी जानती हैं और इसी कारण बड़ी हिम्मत के साथ कह दिया। हो सकता है कि उन्होंने ऐसा कंकर फैंक कर उठने वाली लहर को नापने के लिए किया हो, मगर फिलहाल मोदी खेमे से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अलबत्ता रूठे भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी ने आपत्ति की, मगर उस पर किसी ने गौर नहीं किया। बेशक, फिलवक्त शांति है, मगर आगे कुछ भी हो सकता है।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, मार्च 08, 2017

पकड़ ढ़ीली होती जा रही है वसुंधरा की?

किसी समय में भाजपा हाईकमान से भिड़ जाने वाली प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पकड़ क्या अब कमजोर पड़ती जा रही है? पिछले कुछ समय की घटनाओं से तो यही आभास होता है। वे समझौते दर समझौते कर रही हैं। ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि ये परिवर्तन आया कैसे और ये भी कि उनको परेशानी में डालने व चुनौती देने वालों को किस का सपोर्ट है?
जरा पीछे मुड़ कर देखिए। जब राज्य में भाजपा पराजित हुई तो हार की जिम्मेदारी लेने के तहत उनको हाईकमान ने नेता प्रतिपक्ष का पद छोडऩे के निर्देश दिए, जिसे उन्होंने मानने से साफ इंकार कर दिया। बिफर कर उन्होंने न केवल पार्टी की नींव रखने में अहम भूमिका निभाने वाली अपनी मां राजमाता विजयाराजे सिंधिया की याद दिलाई, अपितु विधायकों को लामबंद कर हाई कमान को लगभग चुनौती दे दी। बाकायदा हस्ताक्षर अभियान चलाया। बाद में बमुश्किल मानीं तो ऐसी कि लंबे समय तक यह पद खाली ही पड़ा रहा। जब चुनाव नजदीक आए तो हाईकमान को उनको विकल्प के अभाव में फिर से प्रदेश की कमान सौंपनी पड़ी। प्रदेश पर अपनी पकड़ को उन्होंने बंपर जीत दर्ज करवा कर साबित भी कर दिया। यह दीगर बात है कि इसका श्रेय मोदी लहर को भी दिया गया। वे कितनी प्रभावशाली नेता रही हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजस्थान का एक ही सिंह कहलाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत को पूरी तरह से नकार दिया। वसुंधरा का इतना खौफ था कि पार्टी के कार्यकर्ता व नेता शेखावत के नजदीक तक फटकने से कतराने लगे थे।
खैर, ताजा हालात पर नजर डालें तो पार्टी में ही रह कर लगातार पर बगावती सुर अलापने वाले घनश्याम तिवाड़ी बेलगाम हो चुके हैं, मगर वसुंधरा चुप हैं। वसुंधरा राजे की हां में हां मिला कर चलने वाले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। स्पष्ट है कि वसुंधरा में उनके खिलाफ कार्यवाही करने की आत्मशक्ति नहीं है। पार्टी की ब्राह्मण लॉबी के बगावत कर देने का खतरा बना हुआ है। बीकानेर के दिग्गज राजपूत नेता देवी सिंह भाटी ने भी समय पर अपने वजूद का अहसास कराया है। हाल ही उन्होंने सक्रिय राजनीति से अलग होकर आमजन के साथ आंदोलन शुरू करने की घोषणा की है। उनका कहना है कि कंपनी राज की तरह चल रही वर्तमान प्रजातांत्रिक व्यवस्था से मैं संतुष्ट नहीं हूं। भविष्य में किसी तरह का चुनाव नहीं लडूंगा, न ही किसी तरह के राजनीतिक दल का गठन करूंगा। मैं सात बार एमएलए रहा, बेटा सांसद रहा और कुछ नहीं चाहिए। जब ये पूछा गया कि पार्टी में आपके पास दायित्व रहा है, फिर भी आंदोलन करने जा रहे हैं, इस पर वे कहते हैं कि प्रदेश कार्यकारिणी में दायित्व था, लेकिन वहां सिर्फ मूकदर्शक बनकर रहना पड़ता था। जैसे पिछली बार भूपेंद्र यादव को राज्यसभा के चुनाव के दौरान मैंने पूछ लिया- ये कौन है? तो नेतृत्व की मुझ पर भौंहें तन गईं। वैसे अभी स्वदेशी जागरण मंच से जुड़ा हूं। परदे के पीछे काम नहीं करूंगा। समझा जा सकता है कि वे वसुंधरा के लिए कितना बड़ा सिरदर्द हैं।
एक और उदाहरण देखिए। कभी उनकी ही लॉबी में माने जाने वाले श्रीचंद कृपलानी को जब उन्होंने यूआईटी चेयरमैन बनाने के आदेश दे दिए, तो उन्होंने वह पद लेने से साफ इंकार कर दिया। वे इस बात से नाराज थे कि उन्हें उनके कद के हिसाब से मंत्री क्यों नहीं बनाया गया। काफी जद्दोजहद के आखिरकार मंत्रीमंडल विस्तार में उन्हें केबिनेट मंत्री बनाना पड़ा। मजेदार बात देखिए कि जिसे मात्र यूआईटी के अध्यक्ष के योग्य माना गया, वे राज्यभर के सभी स्थानीय निकायों का मंत्री बन कर माने। हालांकि इसके पीछे का गणित कुछ और लगता है। वो ये कि वे सिंधी कोटे के राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी को हटाना चाहती थीं, मगर संघ का इतना दबाव था कि उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाईं। ऐसे में देवनानी की टक्कर में दूसरा सिंधी नेता खड़ा करने के लिए कृपलानी को मंत्री पद दे कर उपकृत किया। दूसरे सिंधी विधायक को राजी किया तो तीसरे सिंधी विधायक ज्ञानदेव आहूजा पसर गए। उन्होंने मंत्री न बनाए जाने से नाराज हो कर विधानसभा की सभी समितियों से इस्तीफा दे दिया है।
कुल मिला कर लगता है कि शेरनी की उपमा से अलंकृत वसुंधरा का प्रभामंडल कुछ फीका होता जा रहा है। बेशक इस प्रकार के बगावती तेवर उभरने के पीछे कुछ तो राज है। अनुमान है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व संघ लॉबी उनको अंडर प्रेशर रख रही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000

गुरुवार, मार्च 02, 2017

सत्ता पक्ष के विधायकों का गुस्सा, यानि जनाक्रोष की घंटी

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। इस कारण कोई भी सरकार कितना भी जनहित का ध्यान रखे, असंतोष बना ही रहता है। रहा सवाल विपक्ष का तो वह उद्देश्य विशेष से भी विरोध कर सकता है, जो जनाक्रोष मान लिया जाता है, लेकिन अगर सत्ता पक्ष ही विपक्ष की भूमिका अदा करने लगे तो यह शर्तिया मान लिया जाना चाहिए कि जनता में वाकई असंतोष है। राजस्थान विधानसभा सत्र में प्रश्नकाल के दौरान सत्ता पक्ष के ही विधायकों का मंत्रियों का घेरना इसका ताजा उदाहरण है।
असल में सत्ता पक्ष के विधायक आम तौर पर अनुशासन के कारण चुप रहते हैं। यदि कोई विशेष अपेक्षा है भी तो संबंधित मंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिल कर उसका समाधान करवा लेते हैं। चूंकि विपक्ष का तो धर्म ही है सरकार को घेरना तो वे हंगामा करते ही हैं। लेकिन जब सत्ता पक्ष के विधायक पार्टी की नैतिक लाइन तोड़ कर सरकार पर आक्रमण करते हैं, इसका अर्थ ये है कि जनता में इतना गुस्सा है कि उन्हें बोलना पड़ ही रहा है। आखिरकार जिस क्षेत्र से चुन कर आते हैं, वहां की जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। आगामी चुनाव में दो साल से भी कम समय रह गया है। ऐसे में विधायक अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं। जाहिर तौर पर जनआंकांक्षाएं उनकी नजर में आ रही हैं। जनता में पेठ रखने के लिए वे विधानसभा में सक्रिय दिखाई देना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अगर जनता की आवाज नहीं उठाई तो चुनाव में जनता उलाहना देगी कि आपने हमारी फिक्र क्यों नहीं की। एक ओर पार्टी लाइन है तो दूसरी ओर जनता में दुबारा जाने पर होने वाली परेशानी। स्वाभाविक रूप से उन्हें जनता की अपेक्षाओं को तवज्जो देनी पड़ रही है। इसका परिणाम ये है कि जनता का गुस्सा वे विधानसभा में निकाल रहे हैं। प्रश्रकाल में भाजपा के ही विधायकों का अपने मंत्रियों से सवाल जवाब करना इस बात का सबूत है कि वे मजबूर हैं कि जनता की आवाज बन कर सामने आएं। इसका यह सीधा सा अर्थ है कि जनता में सरकार के प्रति असंतोष है। इसे मुख्यमंत्री व भाजपा संगठन को समझना होगा। बेशक अपने ही विधायकों के इस रवैये से सरकार को तकलीफ हो रही होगी, मगर उसे यह भी समझना होगा कि वे खतरे की घंटी बजा रहे हैं। अगर सरकार ने अपने कामकाज को नहीं सुधारा तो भाजपा को आगामी चुनाव में दिक्कत पेश आ सकती है।
इस विषय का एक पहलु ये है कि चूंकि वर्तमान में राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों की संख्या बहुत कम है, इस कारण उनकी आवाज में वह दम नहीं आ पाता, जो कि होना चाहिए। दूसरी ओर चूंकि इस बार भाजपा बंपर बहुमत के साथ विधानसभा में मौजूद है, इस कारण उन्हीं में से कुछ का रवैया ऐसा होने लगा है, मानो वे विपक्ष की भूमिका में हैं। उसकी एक खास वजह है। वो ये कि किसी भी मुख्यमंत्री के लिए इतने सारे पार्टी विधायकों को संतुष्ट रख पाना नितांत मुश्किल है। जैसे हर प्रभावशाली विधायक मंत्री बनना चाहता है, मगर चूंकि मंत्रीमंडल में सदस्यों की संख्या अनुपात के हिसाब से तय है, ऐसे में मंत्री नहीं बन पाए ऐसे विधायक नाराज चलते हैं। इसके अतिरिक्त हर विधायक को बजट अथवा राजनीतिक नियुक्ति के मामले में संतुष्ट नहीं किया जा सकता, ऐसे में वंचित विधायक भी रुष्ठ रहते हैं। वर्तमान में विधानसभा में कमोबेश स्थिति यही है। मुख्यमंत्री अनेक राजनीतिक नियुक्तियां तीन साल बाद भी नहीं कर पाई हैं, जिनमें विधायकों की सिफारिशें लगी हुई हैं। वे सभी विधायक नाराज हैं।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, जनवरी 25, 2017

वसुंधरा के दुस्साहस को दाद देनी होगी

आज जब कि भाजपा में मोदी युग चल रहा है, जहां लालकृष्ण आडवाणी जैसे हाशिये पर धकेल दिए गए हैं, ऐसे में राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का यह कहना कि आगामी विधानसभा चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो यह किसी दुस्साहस से कम नहीं है। आपको याद होगा कि ये वही जिगर वाली नेत्री है, जिसने राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष रहते राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। बाद में दिया तो भी ऐसा दिया कि वह खाली ही रहा, अगला चुनाव आने से कुछ माह पहले न केवल बहुत गरज करवा कर फिर कब्जा किया, अपितु चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने का ऐलान करवाया।
जब चुनाव में भारी बहुमत से जीत दर्ज की तो स्वाभाविक रूप से उसका श्रेय उनके ही खाते में गिना जाना चाहिए था, मगर चूंकि मोदी लहर के चलते अप्रत्याशित सीटें हासिल हुईं तो उनका यह श्रेय लेना मोदी को नागवार गुजरा। समझ लीजिए, तभी से दोनों के बीच एक ऐसी रेखा खिंच गई, जो कि आज भी नजर आती है। अघोषित टकराव का खामियाजा राजस्थान की जनता भुगत रही है। वसुंधरा उतनी स्वतंत्रता से काम नहीं कर पा रहीं, जितना पिछले कार्यकाल में सीमित बहुमत के बाद भी किया था। पांच में से तीन साल गुजरने के बाद भी कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पद खाली ही पड़े हुए हैं। गिनाने को योजनाएं और आंकड़े तो बहुत हैं, मगर धरातल का सच क्या है, ये भाजपाई भी जानते हैं। और यही वजह है कि वे स्वयं समझ रहे हैं कि अगला चुनाव जीतना मुश्किल होगा।
बात भाजपा के अंदरखाने की करें तो ये बात कई बार उठी है कि मोदी किसी न किसी बहाने वसुंधरा की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की फिराक में है, मगर न तो उन्हें उचित मौका मिल पा रहा है और न ही वसुंधरा उन्हें दाव दे रही हैं। एकबारगी वे हिम्मत करके हटा भी दें, मगर समस्या ये है कि उनके पास वसुंधरा का विकल्प नहीं है। आज भी जो फेस वैल्यू वसुंधरा की है, वैसी किसी और भाजपा नेता की नहीं। ऐसे में मोदी चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे। यह बात खुद वसुंधरा भी जानती हैं और इसी कारण हाल ही जब उनकी सरकार के तीन साल पूरे हुए तो उन्होंने बड़ी हिम्मत के साथ कह दिया कि अगला चुनाव भी उनके नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इस पर रूठे भाजपा नेता घनश्याम निवाड़ी ने आपत्ति भी की, मगर ये सच है कि भाजपा में ही बड़ी तादात ऐसे नेताओं की है, जिनकी निष्ठा वसुंधरा में है। समझा जा सकता है कि मोदी जैसे तानाशाही नेता को ये सुन कर कैसा लगा होगा।
वस्तुत: राजस्थान में दो तरह की भाजपा है। एक संघ निष्ठ और दूसरी वसुंधरा निष्ठ। बेशक राष्ट्रीय स्तर पर संघ के हाथ में रिमोट कंट्रोल है, मगर राजस्थान में दोनों के बीच एक संतुलन बैठाया हुआ है, जिसमें वसुंधरा का पलड़ा भारी है। संघ सत्ता में अपना हिस्सा जरूर झटक लेता है, मगर अपर हैंड वसुंधरा का ही रहता है। भला ऐसे में उनमें अगला चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़े जाने के ऐलान का दुस्साहस आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हां, ये बात जरूर है कि पिछली बार ही तुलना में इस शेरनी की दहाड़ कुछ कमजोर है। देखते हैं, चुनाव आते आते समीकरणों में क्य बदलाव आता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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मंगलवार, जनवरी 24, 2017

गहलोत के बाद अब डूडी की चुनौति के मायने?

राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के निवास पर जनसुनवाई के दौरान उनके समर्थकों की ओर से अगला मुख्यमंत्री बनाने संबंधी नारे लगने के बाद इसकी चर्चा राजनीतिक हलकों सहित सोशल मीडिया पर खूब है। कुछ लोग इसे आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार सचिन पायलट के लिए चुनौति मानते हैं तो कुछ इसे महज अचानक हुई एक घटना मात्र, तो कुछ जाट रणनीति का एक हिस्सा। यहां उल्लेखनीय है कि सचिन के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी एक चुनौति के रूप में माने जाते हैं। कांग्रेस का एक खेमा उन्हें अब भी अगला मुख्यमंत्री बनाए जाने के लिए सजीव बनाए हुए है।
सवाल ये उठता है कि क्या गहलोत व डूडी की इन चुनौतियों में गंभीरता कितनी है या फिर ये मात्र शोशेबाजी? असल में कांग्रेस में वही होता है, होता रहा है, जो कि हाईकमान ने चाहा है। बेशक स्थानीय क्षत्रप समय समय पर सिर उठाते हैं, मगर आखिरकार हाईकमान के फैसले के आगे सभी नतमस्तक हो जाते हैं। उसकी वजह ये है कि आमतौर पर क्षत्रपों का खुद का वजूद नहीं होता। वे जो कुछ होते हैं, पार्टी के बलबूते। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जो यह साफ दर्शाते हैं कि चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो, मगर कांग्रेस हाईकमान के विपरीत जाते ही हाशिये पर आ जाता है। ऐसे में अगर हाईकमान अगर चाहता है कि बहुमत आने पर सचिन को ही मुख्यमंत्री बनाना है तो किसी में इतनी ताकत नहीं कि उसे चुनौति दे सके। बेशक दबाव जरूर बना सकते हैं, जैसा कि गहलोत की ओर से बनाया जा रहा है, या फिर अब डूडी के समर्थक बना रहे हैं।
जहां तक गहलोत की ओर से दबाव बनाए जाने का सवाल है तो वह इस वजह से कि वे दो बार मुख्यमंत्री और एक बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। जाहिर तौर पर इस दौरान उन्होंने हजारों समर्थकों को निजी लाभ पहुंचाया होगा। वे गहलोत के गुण गाएंगे ही। यूं उनका कार्यकाल अच्छा ही रहा है, मगर कुछ बड़ी राजनीतिक भूलों और मोदी लहर के चलते पार्टी चौपट हो गई। ऐसे में पार्टी ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने के लिए सचिन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया और इस प्रकार का संदेश भी दिया कि उनके नेतृत्व में ही अगला चुनाव लड़ा जाएगा। स्वाभाविक रूप से पूर्व में स्थापित नेताओं को यह नागवार गुजरा होगा। गहलोत समर्थकों को तो कुछ ज्यादा ही, क्योंकि इससे उनको अपने वजूद का भी खतरा महसूस होने लगा। उसे बचाने कर खातिर वे लामबंद हैं। यही वजह है गहलोत एक चुनौति के रूप में देखे जाते हैं। गहलोत भी भला क्यों नहीं चाहेंगे कि उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनने का मौका मिले, अत: वे यह कह कर अपनी संभावनाओं को सुरक्षित कर लेते हैं कि मुख्यमंत्री का फैसला निर्वाचित विधायक करते हैं। मगर वे स्वयं भी जानते हैं कि अगर हाईकमान की रुचि सचिन में रही तो वे कुछ नहीं कर पाएंगे। कांग्रेस हाईकमान भी ऐसे संकेत देता रहा है कि गहलोत का उपयोग राजस्थान की बजाय दिल्ली या संगठन में किया जाएगा। हाल ही उन्हें उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया गया है। रहा सवाल राजस्थान में उनके दखल तो संभावना यही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में उनके समर्थकों के लिए भी कुछ सीटें रिजर्व रखी जाएंगी। यानि कि हिस्सेदारी उनकी भी होगी। जैसे जब वे मुख्यमंत्री थे तो सी पी जोशी अपनी हिस्सेदारी बनाए हुए थे।
बात अगर डूडी के निवास पर हुई घटना का करें तो यह डूडी से कहीं अधिक किसी जाट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग से जुड़ा हुआ है। डूडी इतने बड़े या सर्वमान्य नेता नहीं कि मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कर दें। वस्तुत: किसी जाट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग अरसे से की जाती रही है। वर्तमान चूंकि डूडी नेता प्रतिपक्ष हैं तो वे ही मांग के केन्द्र में नजर आ सकते हैं। यह सच है कि राजस्थान में जाटों का वर्चस्व रहा है, मगर एक बार भी किसी जाट को मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला। यहां तक कि खांटी नेता परसराम मदेरणा को भी विधानसभा अध्यक्ष तक ही संतुष्ट रहना पड़ा। वे प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इसी प्रकार डॉ. चंद्रभान व नारायण सिंह को भी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। जब प्रदेश अध्यक्ष गुर्जर नेता सचिन पायलट को बनाया तो डूडी को नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया। यानि कि जाटों को नकारा नहीं गया, संतुलन बनाए रखा गया, मगर सत्ता का शीर्ष पद नहीं सौंपा गया। इसके पीछे का क्या गणित है, वो तो पार्टी ही जाने। अगर डूडी के बहाने जाटों ने और दबाव बनाया तो होगा इतना ही कि टिकट वितरण के दौरान वे कुछ ज्यादा झटक लेंगे, इससे ज्यादा कुछ होता नजर नहीं आ रहा।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, जनवरी 22, 2017

सफाई क्यों देनी पड़ी मनमोहन वैद्य को?

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने आखिर खुद ही सफाई देते हुए कहा है कि संघ आरक्षण के खिलाफ नहीं है, मगर ये सवाल तो सवाल ही बना रह गया कि आखिर उनके बयान पर विवाद हुआ ही क्यों कर? क्या मीडिया ने उनके पहले दिए बयान को समझने में गलती की? क्या वे अपने पहले दिए बयान में बात ठीक से कह नहीं पाए, इस कारण मीडिया ने ये अर्थ निकाला कि संघ आरक्षण के खिलाफ है? या फिर मीडिया ने जानबूझकर उनके बयान का गलत अर्थ निकाल कर विवाद पैदा किया, जैसा कि कुछ संघनिष्ठ लोग मान रहे हैं?
यह बात ठीक है कि वैद्य ने बाद में जो बयान दिया है, उसमें उन्होंने अपनी बात को तफसील से समझाया है कि संघ आरक्षण का पक्षधर है। इसकी वजह ये बताई है कि चूंकि एक वर्ग सामाजिक भेदभाव की वजह से पिछड़ा हुआ है, उसे आरक्षण की जरूरत महसूस की गई और चूंकि सामाजिक भेदभाव अब भी जारी है, इस कारण आरक्षण भी जारी रहना चाहिए।
अब जरा उनके पहले दिए बयान पर गौर करें तो उसमें उनका कहना था कि आरक्षण को खत्म करना चाहिए और इसकी जगह ऐसी व्यवस्था लाने की जरूरत है, जिसमें सबको समान अवसर और शिक्षा मिले। वैद्य ने कहा कि अगर लंबे समय तक आरक्षण जारी रहा तो यह अलगाववाद की तरफ ले जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र में हमेशा के लिए ऐसे आरक्षण की व्यवस्था का होना अच्छी बात नहीं है। सबको समान अवसर और शिक्षा मिले।
उनकी इस बात ये तो स्पष्ट है कि संघ सिद्धांतत: आरक्षण के पक्ष में नहीं, मगर चूंकि सामाजिक भेदभाव जारी है, इस कारण यह लागू ही रहना चाहिए। समझा जा सकता है कि विवाद हुआ ही इसलिए कि उन्होंने जितनी स्पष्टता के साथ बाद में बयान दिया, अगर वैसा ही पहले भी कह देते तो विवाद होता ही नहीं। अव्वल तो ऐन चुनाव के वक्त इस विवादास्पद विषय पर बोलते ही नहीं। अगर सवाल का उत्तर देना बहुत जरूरी ही था तो ठीक वैसा ही बोलते, जैसा कि बाद में कहा। जरा देखिए, उन्होंने कितने साफ शब्दों में स्पष्ट किया है कि आरक्षण जरूरी है:-
https://youtu.be/LIic-Nx8JYg
असल में विवाद ने इसलिए तूल पकड़ा क्योंकि इस वक्त उत्तरप्रदेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह बात वैद्य भी जानते रहे होंगे, मगर उनसे यह चूक कैसी हुई, यह समझ से परे है। हालांकि माहौल बिगड़ता देख उन्होंने तुरंत सफाई दी, मगर तब तक पिछड़े तबके में तो यह संदेश चला ही गया कि संघ आरक्षण के खिलाफ है। वह इसलिए भी कि इससे पहले भी बिहार चुनाव के वक्त संघ प्रमुख मोहन भागवत कुछ इसी तरह का बयान दे चुके हैं, जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा।
-तेजवानी गिरधर
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