तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, अक्तूबर 06, 2017

वसुंधरा को अब समझ आया कि पांच दिन का हफ्ता गलत है

मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे को अपने दूसरे कार्यकाल के आखीर में समझ में आया है कि राज्य सरकार के दफ्तरों में पांच दिन का हफ्ता ठीक नहीं है और छह दिन का हफ्ता किया जाना चाहिए। अजमेर के निकटवर्ती कस्बे में सर्व समाज के प्रतिनिधियों से संवाद करते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि सरकारी दफ्तरों में अब जल्द ही सिक्स डे वीक शुरू होगा। उनका कहना था कि मौजूदा समय में पांच दिन का सप्ताह महज चार दिन का रह गया है। हालत ये है कि दफ्तरों में शुक्रवार दोपहर से सोमवार दोपहर तक ज्यादातर कर्मचारी नहीं मिलते। इससे जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
यहां उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में सरकार के जाते-जाते कर्मचारियों के वोट हासिल करने के लिए पांच दिन का हफ्ता किया था। सच्चाई ये है कि पांच दिन के सप्ताह का फैसला न तो आम जन की राय ले कर किया गया था और न ही इस तरह की मांग कर्मचारी कर रहे थे। बिना किसी मांग के निर्णय को लागू करने से ही स्पष्ट था कि यह एक राजनीतिक फैसला था, जिसका फायदा तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती थीं। उन्हें इल्म था कि कर्मचारियों की नाराजगी की वजह से ही पिछली गहलोत सरकार बेहतरीन काम करने के बावजूद धराशायी हो गई थी, इस कारण कर्मचारियों को खुश करके भारी मतों से जीता जा सकता है। हालांकि दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया। असल बात तो ये है कि जब वसुंधरा ने यह फैसला किया, तब खुद कर्मचारी वर्ग भी अचंभित था, क्योंकि उसकी मांग तो थी नहीं। वह समझ ही नहीं पाया कि यह फैसला अच्छा है या बुरा। हालांकि अधिकतर कर्मचारी सैद्धांतिक रूप से इस फैसले से कोई खास प्रसन्न नहीं हुए, मगर कोई भी कर्मचारी संगठन इसका विरोध नहीं कर पाया।
अब जब कि पांच दिन के सप्ताह की व्यवस्था को काफी साल हो गए हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि इससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। पांच दिन का हफ्ता करने की एवज में प्रतिदिन के काम के घंटे बढ़ाने का कोई लाभ नहीं हुआ है। कर्मचारी वही पुराने ढर्ऱे पर ही दफ्तर आते हैं और शाम को भी जल्द ही बस्ता बांध लेते हैं। कलेक्ट्रेट को छोड़ कर अधिकतर विभागों में वही पुराना ढर्ऱा चल रहा है। कलेक्ट्रेट में जरूर कुछ समय की पाबंदी नजर आती है, क्योंकि वहां पर राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों व मीडिया की नजर रहती है। आम जनता के मानस में भी आज तक सुबह दस से पांच बजे का समय ही अंकित है और वह दफ्तरों में इसी दौरान पहुंचती है। कोई इक्का-दुक्का ही होता है, जो कि सुबह साढ़े नौ बजे या शाम पांच के बाद छह बजे के दरम्यान पहुंचता है। यानि कि काम के जो घंटे बढ़ाए गए, उसका तो कोई मतलब ही नहीं निकला। बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों को यह समझ में आ गया था कि छह दिन का हफ्ता ही ठीक था। इस बात को जानते हुए उच्च स्तर पर कवायद शुरू तो हुई और कर्मचारी नेताओं से भी चर्चा की गई, मगर यह सब अंदर ही अंदर चलता रहा। मगर हुआ कुछ नहीं।
बहरहाल, यदि तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो केन्द्र सरकार के दफ्तरों में बेहतर काम हो ही रहा है। पांच दिन डट कर काम होता है और दो दिन मौज-मस्ती। मगर केन्द्र व राज्य सरकार के दफ्तरों के कर्मचारियों का मिजाज अलग है। केन्द्रीय कर्मचारी लंबे अरसे से उसी हिसाब ढले हुए हैं, जबकि राज्य कर्मचारी अपने आपको उस हिसाब से ढाल नहीं पाए। वे दो दिन तो पूरी मौज-मस्ती करते हैं, मगर बाकी पांच दिन डट कर काम नहीं करते। कई कर्मचारी तो ऐसे भी हैं कि लगातार दो दिन तक छुट्टी के कारण बोर हो जाते हैं। दूसरा अहम सवाल ये भी है कि राज्य सरकार के अधीन जो विभाग हैं, उनसे आम लोगों का सीधा वास्ता ज्यादा पड़ता है। इस कारण हफ्ते में दो दिन छुट्टी होने पर परेशानी होती है। यह परेशानी इस कारण भी बढ़ जाती है कि कई कर्मचारी छुट्टी के इन दो दिनों के साथ अन्य किसी सरकारी छुट्टी को मिला कर आगे-पीछे एक-दो दिन की छुट्टी ले लेते हैं और नतीजा ये रहता है कि उनके पास जिस सीट का चार्ज होता है, उसका काम ठप हो जाता है। अन्य कर्मचारी यह कह कर जनता को टरका देते हैं कि इस सीट का कर्मचारी जब आए तो उससे मिल लेना। यानि कि काम की रफ्तार काफी प्रभावित होती है।
खैर, अपने दूसरे कार्यकाल में चुनाव से करीब एक साल पहले वसुंधरा को समझ आ गया है कि सिक्स डे वीक किया जाना चाहिए। देखते हैं, वे ये निर्णय कर लेती हैं और इसकी प्रतिध्वनि क्या होती है?
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, अक्तूबर 05, 2017

कांग्रेस के हमले तेज, मोदी का बचाव करने में जुटे समर्थक

-तेजवानी गिरधर-
ऐसा देखा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर कांग्रेस के हमले काफी तेज हो गए हैं। बेशक ये आईटी सेल का ही काम होगा। इसके अतिरिक्त भद्दी टिप्पणियां भी खूब शेयर की जा रही हैं। इन हमलों की तीव्रता ठीक उतनी ही है, जितनी पहले भाजपाइयों के सोनिया गांधी व राहुल गांधी पर हमलों में हुआ करती थी। मोदी की एक-एक हरकत का छिद्रान्वेषण किया जा रहा है। ऐसे में मोदी समर्थक यकायक रक्षात्मक मुद्रा में आने लगे हैं। हालांकि मोदी का आईटी सेल भी कांग्रेस पर हमले जारी रखे हुए हैं, मगर अब मोदी का बचाव करने पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी समर्थक तनिक चिंतित हैं कि कांग्रेस की रणनीति ठीक उसी तरह से काम न कर जाए, जैसी उन्होंने मोदी की ब्रांडिंग करते वक्त अपनाई थी। मोदी का बचाव करते वक्त कई बार तर्कविहीन बातें भी कही जा रही हैं।
पेट्रोल के भावों में आई ताजा तेजी को ही लीजिए। मीडिया में यह स्पष्ट हो चुका है कि विश्व बाजार में क्रूड ऑइल की कीमत काफी घटी है, फिर भी भारत वासियों को बहुत महंगा पेट्रोल लेना पड़ रहा है। इसके लिए पेट्रोल को जीएसटी से बाहर रखने का तर्क दिया जा रहा है। हालांकि इसकी सटीक काट नहीं है, फिर भी जो तर्क दिया जा रहा है, उससे समझा जा सकता है कि उसमें कितना दम है। एक बानगी देखिए:-
तीस रुपए का पेट्रोल सरकार सत्तर में क्यों बेच रही है, ऐसा पूछने वाले एक बार ये भी तो पूछें कि 16 रुपए में गेहूं खरीद कर सरकार दो रुपए में क्यो बेचती है? पचास रुपए का केरोसिन पंद्रह में क्यों बेचती है? चालीस की शक्कर छब्बीस में क्यों बेचती है? पच्चीस का चावल खरीद कर एक रुपए में क्यों बेचती है? लाखों रुपये टीचरों को तनख्वाह देकर बच्चों को मुफ्त क्यों पढ़वाती है? 6 करोड़ शौचालय मुफ्त में क्यों बनवाती है? 3 करोड़ गैस चूल्हे मुफ्त में क्यों बाटती है?
सवाल ये उठता है कि इस प्रकार की सारी सुविधाएं पहले भी थीं, तब पेट्रोल के भाव तनिक बढऩे पर आसमान सिर पर क्यों उठाया जाता था?
मोदी के प्रति हमदर्दी लिए एक टिप्पण देखिए:-
गुजरात के मोहनदास करमचन्द गांधी राष्ट्र के पिता हो सकते हैं...! जवाहर लाल नेहरू सबके चाचा हो सकते हैं...! मायावती सबकी बहन हो सकती है...! ममता बनर्जी सबकी दीदी हो सकती हैं...! जयललिता सबकी अम्मा हो सकती हैं...! सोनिया गांधी देश की बहू हो सकती है...! केवल नरेंद्र मोदी इस देश का बेटा नहीं हो सकता...!! इतनी नफरत क्यों है भाई?
बढ़ती महंगाई के जवाब में तल्खी देखिए-दिक्कत यह नहीं है कि दाल महंगी हो गयी है...! दिक्कत यह है कि किसी की गल नहीं रही है।
मोदी के बचाव का एक और नमूना देखिए:-
आजकल सोशल मीडिया पर अनेक मैसेज चल रहे हैं कि मोदी ने महंगाई बढ़ा रखी है, व्यापार में दिक्कत है, इन्कम रिटर्न भरने में दिक्कत है वगैरह वगैरह। मित्रों, ये सब कांग्रेस द्वारा फैलाए जा रहे हैं। रही मोदी की दुकान बंद कराने की बात, तो आपको यह पता है कि मोदी जी की उम्र अब 67 वर्ष है और उनके पीछे न परिवार है और न ही  बीवी-बच्चे। उन्होंने जिंदगी में जो पाना था वो पा लिया है। अब अगर आप वोट नहीं भी देंगे और वो हार भी जाएंगे, तब भी वो पूर्व प्रधानमंत्री कहलाएंगे, आजीवन दिल्ली में घर, गाड़ी, पेंशन, एसपीजी सुरक्षा, कार्यालय मिलता रहेगा। दस-पंद्रह साल जीकर चले जाएंगे। लेकिन आप क्या करेंगे जब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी  इस देश का इस्लामीकरण और ईसाईकरण करने में लगी हुई हैं। रोहिंग्याओं को बसाएगी, अंधी लूट करेगी, हर साल लाखों करोड़ों के  घोटाले करेंगी, हिंदुओं के खिलाफ कानून बनेंगे और आतंकवादी सरकारी मेहमान बनेंगे?
मोदी जी तो संतोष के साथ मरेंगे कि मैंने एक कोशिश तो की अपना देश बचाने की, लेकिन आप लोग तो हर दिन मरेंगे, और अंतिम सांस कैसे लेंगे? जो गलती आपने अटल जी को हरा कर करी थी, वो गलती आप दोबारा न करें।
मोदी के बचाव में कट्टर हिंदूवाद का सहारा भी लिया जा रहा है। देखिए- अटल सरकार की तरह मोदी सरकार का पेट मत चीरो मेरे हिन्दू भाइयों। एक बात गांठ बांध के रख लो कि मोदी ही हम हिन्दुओं की आखिरी उम्मीद  बच गए हैं। बात थोड़ी कड़वी है पर कहावत है कि कुत्तों को घी हजम नहीं होता और सूअरों को बढिय़ा पकवान अच्छे नहीं लगते। अगली बार मोदी नहीं आए तो ये सारे सेक्युलर की खाल में बैठे जेहादी मिल के हम हिन्दुओं का ऐसा हश्र करेंगे कि आने वाले पीढिय़ां अपनी बर्बादी पर आंसू बहायेंगी। फिर किसी मोदी जैसे हिन्दुवादी देश-भक्त को दिल्ली तक पहुंचने का सपना देखने में भी डर लगेगा। याद रहे जब तक मुर्गी जिंदा रहेगी तब तक ही अंडे देगी। अटल जी की तरह उसका भी पेट चीर दोगे तो फिर लड़ते रहना इन टोपी वालों से जिंदगी भर।
हे मोदी का विरोध करने वाले हिन्दुओं, आपके असहयोग और अंधविरोध की वजह से अगर सच में मोदी जी का कुछ अनिष्ट हो गया तो आप सभी खून के आंसू रोओगे। हिन्दू घरों की बहन-बेटियां लव-जिहाद की भेंट चढ़ जाएंगी और भारत को पाकिस्तान और अफगानिस्तान बनते देर नहीं लगेगी। 
कुल मिला कर ऐसी टिप्पणियां ये आभास करवाती हैं कि काला धन, महंगाई, बेराजगारी आदि को लेकर किए गए वादे पूरे न होने से फीके हो रहे मोदी ब्रांड का बचाव करने के लिए ही इस तरह के तर्क काम में लिए जा रहे हैं।

शुक्रवार, सितंबर 29, 2017

क्या यशवंत सिन्हा का बयान मात्र कुंठा है?

हाल ही जब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने आर्थिक हालात को लेकर एक डरावनी तस्वीर पेश की है, उसको लेकर  सरकार व भाजपा हाईकमान में खलबली मच गई है। विपक्षी अगर आरोप लगाए, जो कि लगाया भी जा रहा है तो उसमें यही माना जाता है कि उसने तो विरोध मात्र के लिए ऐसा किया है, मगर यदि अपनी ही पार्टी का कोई बड़ा नेता सरकार की नीति के खिलाफ बोलता है तो गंभीर होना स्वाभाविक ही है। विशेष रूप से तब जबकि वह आर्थिक मामलों का गहन जानकार हो। निश्चित रूप से सिन्हा के बयान से सरकार दुविधा में आई है, मगर सरकार व भाजपा के पैरोकारों का मानना है कि सिन्हा के बयान में उनकी खीझ और कुंठा अधिक दिख रही है। वे मानते हैं कि उनका इरादा आर्थिक स्थिति की समीक्षा करना कम, वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ भड़ास निकालने का अधिक था।
इस तर्क को मान भी लिया जाए तो सिन्हा ने जो कुछ कहा है, उसे सिरे से भी नहीं नकारा जा सकता। आखिरकार वे भी वित्त मंत्री व आर्थिक मामलों के जानकार रहे हैं। केवल खीज निकालने मात्र के लिए हवाई अथवा अतथ्यात्मक बात नहीं कर सकते। जनता तो सब समझ रही है, क्योंकि वह भोग रही है, मगर वे कुंठा निकालने मात्र के लिए अपनी प्रतिष्ठा को दाव पर नहीं लगा सकते। अगर उनका मकसद केवल वित्त मंत्री को विफल बताना है, तो भी ऐसे ही तर्कों का सहारा लेंगे न, जो कि आसानी से गले उतर जाएं।
यूं भी यह कोई रहस्य नहीं कि जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई है और जीएसटी पर अमल के बाद आर्थिक सुस्ती का माहौल बना है। यह पहले से स्पष्ट था भी कि जीएसटी पर अमल के दौरान बाधाएं आएंगी और उसका कुछ न कुछ असर आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ेगा। यह भी पहले से स्पष्ट था कि नोटबंदी का कुछ न कुछ विपरीत असर जीडीपी के आंकड़ों पर दिखेगा। इस परिपेक्ष में भी सिन्हा का बयान उचित प्रतीत होता है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि कालेधन की अर्थव्यवस्था पर लगाम लगाने और कर व्यवस्था में सुधार करने की जरूरत के तहत ही नोटबंदी व जीएसटी के प्रयोग किए गए, इसको लेकर सरकार पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते, मगर पुख्ता बंदोबस्त किए बिना ही जल्दबाजी में लागू किए जाने के कारण समस्याएं उत्पन्न हुई है। हुआ ये कि पहले तो बिना सोचे समझे नोटबंदी लागू की, जिससे बाजार का हाल बेहाल हो गया, फिर यकायक जीएसटी भी लागू कर दी, नतीजा ये हुआ कि बाजार संभलता, उससे पहले ही उसे एक और बड़ा झटका लग गया। यह सरकार भी समझ ही रही होगी। विशेष रूप से जीडीपी में गिरावट आने के बाद तो यह स्पष्ट हो ही गया कि त्रुटि हो गई है। हां, भले ही जेटली ने अर्थव्यवस्था को डुबोने के लिए ऐसा सायास नहीं किया हो, जैसा कि सिन्हा के बयान में कहा गया है, मगर इतना तो तय है कि गलत कदम का नुकसान देश भुगत रहा है।
 यदि यह मान भी लिया जाए कि टैक्स देने वालों की संख्या बढ़ी है, सब्सिडी का दुरुपयोग रुका है और वित्तीय समावेशन का दायरा बढ़ा है, मगर दूसरी ओर आर्थिक हालात बिगड़े हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता। सिन्हा का बयान कुंठा मान कर यदि सरकार आंख मूंदने की कोशिश करती है तो यह एक और बड़ी गलती होगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, सितंबर 26, 2017

बंपर बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज भाजपा की जमीन खिसकी

किसी भी सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिए उसका तीन साल का कार्यकाल पर्याप्त होता है। केन्द्र में स्पष्ट बहुमत व राज्य में बंपर बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज भाजपा सरकारों के तीन-तीन साल पर खुफिया व मीडिया में आ रही रिपोर्टों में इस बात के साफ संकेत सामने आ रहे हैं कि  भाजपा का ग्राफ काफी नीचे गिरा है। हालात इतने बदले बताए जा रहे हैं कि दोनों जगह भाजपा का सत्ता में लौटना कठिन हो जाएगा। इतना ही नहीं खुद भाजपा के ही मातृ संगठन आरएसएस के फीडबैक व इंटरनल सर्वे तक में कहा जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव में भाजपा की हालत खस्ता हो सकती है।
अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में छपी रिपोर्ट के अनुसार संघ ने ज्वलंत मुद्दों पर जो फीडबैक लिया है, उससे जाहिर होता है कि आम लोगों में घोर निराशा है। विशेष रूप से नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी की वजह से माहौल खराब हुआ है। यहां तक कि भाजपा मानसिकता का व्यापारी वर्ग भी त्रस्त है और अपनी पीड़ा कानाफूसी के जरिए व्यक्त कर रहा है। जिस काले धन को लेकर नरेन्द्र मोदी ने हल्ला मचा कर सत्ता पर कब्जा किया, उसको लेकर जनता में गहरा रोष है। नोटबंदी के बाद भी जब काला धन सामने नहीं आया तो जनता ठगा सा महसूस कर रही है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस के हमले तेज हो गए हैं। जितनी तीखी व तल्ख टिप्पणियां पहले सोनिया गांधी, राहुल गांधी व मनमोहन सिंह के बारे में देखने को मिलती थीं, ठीक वैसी ही अब मोदी के बारे में आ रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस ने भी भाजपा की तरह अपना आईटी सेल काफी मजबूत कर लिया है। ऐसा कोई मुद्दा नहीं होता, जिस पर कांग्रेस हमला करने से चुकती हो। यहां तक कि आम तौर पर भाजपा के पक्ष में लिखने वाले ब्लागरों का सुर भी अब बदलने लगा है। ऐसे में जनता के बीच जाने वाले निचले स्तर के भाजपा नेताओं को बहुत परेशानी होती है। उनसे सवालों के जवाब देते नहीं बनता।
अब तो मीडिया रिपोर्टें भी इस बात की ताईद कर रही हैं कि भाजपा की लोकप्रियता कम हुई है। राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो जितनी अपेक्षा के साथ जनता के भाजपा को सत्ता सौंपी, उसके अनुरूप कुछ भी नहीं हुआ है। धरातल पर न तो भ्रष्टाचार कम हुआ है और न ही जनता को कोई राहत मिली है। भाजपा हाईकमान के साये में काम रही मुख्यमंत्री वसुंधरा का चेहरा भी चमक खोने लगा है। उनके खाते में एक भी बड़ी उपलब्धि नहीं है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा के 163 विधायकों मेें से करीब एक सौ विधायकों का परफोरमेंस खराब है, जिसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा। कानून-व्यवस्था तो बिगड़ी ही है, मगर जनता पर ज्यादा असर महंगाई का है। मोदी के सत्ता में आने पर जनता को जो उम्मीद थी, वह तो पूरी हुई नहीं, बल्कि उसके विपरीत महंगाई और बढ़ रही है। पेट्रोल के दाम अस्सी रुपए प्रति लीटर तक पहुंचने के बाद तो आम जन की कमर ही टूट गई है। ऐसा माना जा रहा है कि इन सब केलिए जनता केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार मान रही है।
ऐसा प्रतीत होता है कि जिस प्रकार पिछली बार केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे द्वारा बनाए गए माहौल के चलते राज्य में कांग्रेस की सरकार गई, ठीक वैसे ही मोदी की नीतियां राज्य में भाजपा के लिए मुश्किल पैदा करने वाली हैं। पहले भाजपा के पास राज्य में वसुंधरा का चेहरा था, मगर अब वह कामयाब होता नहीं दिखाई दे रहा है। अब केवल मोदी ब्रांड पर ही भाजपा की आस टिकी है, वह भी पहले की तुलना काफी फीका हो गया है। जो कुछ भी हो, इतना तो तय है कि पहले की तरह इस बार मोदी लहर की कोई उम्मीद नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, सितंबर 16, 2017

मोदी के साम, दाम, दंड, भेद को जस्टीफाई किया जा रहा है

एक समय में पार्टी विथ द डिफ्रेंस का तमगा लगाने वाली भाजपा जब से अपनी रीति-नीति बदल कर सत्ता में आई है, उसके कार्यकर्ताओं को लग तो ये रहा है कि अब वे उस पार्टी के नहीं रहे हैं, जिसकी वे दुहाई दिया करते थे। वे सब समझ रहे हैं कि जिन बातों को लेकर वे कांग्रेस की आलोचना करते नहीं थकते थे, आज वही बातें खुद की पार्टी में हो रही हैं, मगर उन्हें लगता है कि सत्ता में बने रहने का यही फंडा है। यहां तक कि कांग्रेस मुक्त  भारत का नारा देने वाले अपनी ही पार्टी को कांग्रेस युक्त होता देख रहे हैं तो उन्हें उसमें कुछ भी गलत नजर नहीं आता। स्वभाविक रूप से अब जबकि भाजपा निशाने पर है तो उसके कार्यकर्ताओं को लगता है कि बचाव का एक मात्र तरीका यही है कि मौजूदा रीति-नीति को जस्टीफाई किया जाए। ढ़ीठ हो लिया जाए।
एक बानगी देखिए:-
जब तक भाजपा वाजपेयी जी जैसों की विचारधारा पर चलती रही, वो राम के बताये मार्ग पर चलती रही। मर्यादा, नैतिकता, शुचिता इनके लिए कड़े मापदंड तय किये गये थे, परन्तु आज तक कभी भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। मात्र एक लाख रुपये लेने पर भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्षमण को हटाने में तनिक भी विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। ताबूत घोटाले के आरोप पर जार्ज फर्नांडिस का इस्तीफा, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। कर्नाटक में येदियुरप्पा पर भ्रष्ट्राचार के आरोप लगते ही येदियुरप्पा को भाजपा ने निष्कासित करने में कोई विलंब नहीं किया, परन्तु चुनावों में नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात...। आखिरकार मोदी के कार्यकाल वाली भाजपा ने अपनी नीति बदल दी और अब साम, दाम, दंड, भेद वाली नीति अपना कर सत्ता पर काबिज है। काबिज ही नहीं है, तोड़-फोड़ कर लगातार विस्तार करती जा रही है।
जो भाजपा भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसती थी,  उसी के कार्यकर्ता अब नई भाजपा को यह कह कर जस्टीफाई कर रहे हैं कि हमारी रंगों में पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसे भ्रष्टाचार के वायरस डाल दिये हैं कि हम स्वयं भ्रष्ट हो गये हैं। हमें जहां मौका मिलता है, हम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने से नहीं चूकते हैं। पुलिस का चालान हो, या सरकारी विभागों में काम हो, हम कुछ ले देकर अपने काम को निपटाने में ही यकीन रखते हैं।
भाजपा के नए अवतार पर एक कार्यकर्ता ने लिखा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नक्शे कदम पर चलने वाली भाजपा को मोदी कर्मयोगी कृष्ण के राह पर ले आये हैं। कृष्ण अधर्मी को मारने में किसी भी प्रकार की गलती नहीं करते हैं। छल हो तो छल से, कपट हो तो कपट से, अनीति हो तो अनीति से। अधर्मी को नष्ट करना ही उनका ध्येय होता है। इसलिए वो अर्जुन को सिर्फ मछली की आंखों को ही देखने को कहते हैं।
भाजपा कार्यकर्ता की मानसिकता में आए परिवर्तन की बानगी देखिए:-
येदियुरप्पा को फिर से भाजपा में शामिल किया गया, नतीजा लोकसभा चुनावों में सामने है। पीडीपी से गठबंधन करके कम से कम काश्मीर के अंदरूनी हालात से रूबरू तो हो रहे हैं..। कुल मिलाकर सार यह है कि, अभी देश दुश्मनों से घिरा हुआ है, नाना प्रकार के षडयंत्र रचे जा रहे हैं। अभी भी हम नैतिकता को अपने कंधे पर ढ़ोकर नहीं चल सकते हैं। नैतिकता को रखिये ताक पर, और यदि इस देश के बचाना चाहते हैं तो सत्ता अपने पास ही रखना होगा। वो चाहे किसी भी प्रकार से हो। साम दाम दंड भेद, किसी भी प्रकार से.... । बिना सत्ता के आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए भाजपा के कार्यकर्ताओं को चाहिए कि कर्ण के अंत करते समय के विलापों पर ध्यान न दें (येदियुरप्पा, पीडीपी, ललित मोदी), सिर्फ ये देखें कि.......अभिमन्यु की हत्या के समय उनकी नैतिकता कहां चली गई थी?
कुल मिला कर भाजपा कार्यकर्ताओं में एक नई सोच जन्म ले रही है, कि सत्ता में रहना है तो उसके लिए कुछ भी करना जायज है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी इत्यादि को लेकर आसमान सिर पर उठाने वाले भाजपा कार्यकर्ता इन समस्याओं के पहले से ज्यादा हो जाने पर भी आंख मूंदने को मजबूर हैं, क्योंकि सत्ता पर सवार हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, सितंबर 10, 2017

क्या केवल बाबा राम रहीम ही जिम्मेदार है?

अपनी ही शिष्या साध्वी के साथ बलात्कार करने के मामले में दोषी ठहराये जाने के बाद हुई हिंसा, आगजनी, तोडफ़ोड़ को लेकर कोर्ट तो सख्त है ही, पूरा मीडिया भी बाबा राम रहीम की जम कर मजम्मत कर रहा है। यह स्वाभाविक भी है। धर्म व आस्था की आड़ में यौन शोषण कोई निराधम प्राणी ही कर सकता है, जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है। इस घटना के कारण एक ओर जहां इसी किस्म के बाबाओं को लानत दी जा रही है, वहीं देश की राजनीति, धर्म और हमारी सामाजिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सबसे पहले बात राजनीति की। इस घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि आस्था के नाम पर हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यह बात ठीक है कि प्रधानमंत्री को ऐसा ही वक्तव्य देना चाहिए, मगर आस्था के नाम पर राजनीति के सहारे पनपने वाले व बाद में राजनीतिज्ञों को ही सहारा देने वाले ऐसे मठ व डेरे क्यों बर्दाश्त किए जा रहे हैं? क्या ये सही नहीं है कि वोटों की खातिर ऐसे बाबाओं को पनपाने में राजनीतिज्ञों का ही हाथ है? बाबा राम रहीम के मामले में तो जानते बूझते हुए भी राजनीतिक संरक्षण दिया जाता रहा। यह हरियाणा सरकार की की नरमी का ही नतीजा रहा कि राम रहीम के समर्थकों को सिरसा, पंचकूला और अन्य शहरों में एकत्रित होने से रोकने के लिए उपयुक्त कदम नहीं उठा सकी। इसके दुष्परिणाम सबके सामने हैं। यदि हम बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों को दोषी ठहराते हैं तो बाबाओं के मंचों पर जा कर उनकी ब्रांडिंग करने वाले राजनीतिज्ञों को निर्दोष कैसे मान सकते हैं? सच तो ये है कि बाबाओं का सहारा लेने और उन्हें संरक्षण देने के मामले में भाजपा ही सबसे आगे नजर आती है। डेरा समर्थकों की राजनीति में इतना अहमियत उनके वोट के कारण है, जो हार जीत तय कराती है। सिरसा के अलावा हरियाणा के कई जिलों में डेरा का प्रभाव है, जिसका फायदा 2014 के चुनाव में बीजेपी को कई सीटों पर मिला और जीत हासिल हुई। जीत हासिल होने के बाद गुरमीत रामरहीम को धन्यवाद अदा करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ बीजेपी के उम्मीदवार सिरसा गए थे। जब सत्ताधारी पार्टी के विधायक और मंत्री किसी संत के आगे माथा टेकता है तो अधिकारियों को क्या सन्देश जाएगा?
वहीं मीडिया जो, आज चिल्ला चिल्ला कर बाबाओं का पोस्टमार्टम कर रहा है, क्या उनका ऐसे बाबाओं को स्थापित करने में मीडिया की भूमिका नहीं है? सोशल मीडिया पर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की जम कर आलोचना हो रही है। एक बानगी देखिए:-
आज हर न्यूज़ चैनल पर दिखाया जा रहा है- बाबा की अय्याशी का अड्डा, गुफा का रहस्य, दत्तक पुत्री का सच इत्यादि। ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो, जिन्हें दिखा कर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि इतने खोजी मीडिया चैनल अब तक कहां थे? न तो बाबा नया है न ही गुफा रातों-रात बन गई है, फिर ये कैसी पत्रकारिता? जो अब तक सो रही थी, अब बाबा के जेल जाते ही मुखरित होने लगी। इन अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझकर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए।
सोशल मीडिया, जो कि पूरी तरह से स्वच्छंद है, उस पर तो बाबाओं के चक्कर में पडऩे वाली महिलाओं पर भी तंज कसे जा रहे हैं-
बाबा राम रहीम को गालियां दे लो या आशाराम को। उन मूर्ख महिलाओं को भी कुछ बोलो, जो अपने सास, ससुर, घर-परिवार की सेवा को छोड़ कर बाबाओं के चरण दबाती हैं। उन महिलाओं का क्या जो, पति परेमश्वर को छोड़ कर बाबाओं को पूजती हैं, माता-पिता समान सास-ससुर का प्रताडि़त करती हैं? सच तो ये है कि इन बाबाओं की सेवा में लगी महिलाएं अगर दस प्रतिशत भी अपने परिवार की सेवा में मन लगा लें तो उनका जीवन धन्य हो जाए।
बाबाओं के प्रति अंध भक्ति रखने वालों की मूर्खता की भी खूब मजम्मत हो रही है। देखिए- अंधभक्त श्रद्धा से सुनते हैं, वे सोचते नहीं हैं। बाबा जी दौलत के ढ़ेर पर बैठ कर बोलते हैं कि मोह-माया छोड़ दो, लेकिन उत्तराधिकारी अपने बेटे को ही बनायेंगे। भक्तों को लगता है कि उनके सारे मसले बाबा जी हल करते हैं, लेकिन जब बाबा जी मसलों में फंसते हैं, तब बाबा जी बड़े वकीलों की मदद लेते हैं, अंधभक्त बाबा जी के लिये दुखी होते हैं, लेकिन सोचते नहीं हैं। भक्त बीमार होते हैं, डॉक्टर से दवा लेते हैं, मगर बाबाओं के आगे भी सिर झुकाते हैं, जब ठीक हो जाते हैं तो कहते हैं, बाबा जी ने बचा लिया, जबकि बाबा जी बीमार होते हैं तो बड़े डॉक्टरों से महंगे अस्पतालों में इलाज करवाते हैं। अंधभक्त अपने बाबा को भगवान समझते हैं, उनके चमत्कारों की सौ-सौ कहानियां सुनाते हैं, लेकिन जब बाबा किसी अपराध में जेल जाते हैं, तब वे कोई चमत्कार नहीं दिखाते।
एक के बाद एक बाबा के जेल जाने के बाद कुल जमा बात ये सामने आती है कि वे बाबा भले ही सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, मगर हमारी अंध श्रद्धा और राजनीतिक व्यवस्था भी उतनी ही दोषी है। इस पर गंभीर चिंतन की जरूरत है।

-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, अगस्त 10, 2017

कोई टपोरी ही श्रीकृष्ण को दुनिया का सबसे बड़ा डॉन बता सकता है

आगामी 15 अगस्त को महायोगी, सर्वगुणसंपन्न भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्ठमी है। उसे मनाने के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं। उसी सिलसिले में  कुछ सिरफिरे एक पोस्ट सोशल मीडिया पर कट-पेस्ट कर रहे हैं।
आइये, पहले वह पोस्ट देख लें:-
15-08-2017 तारीख को  दुनिया के सबसे
बड़े डॉन का बर्थडे है!

कोई ऐसा गुनाह नहीं, जो उन्होंने नहीं किया हो.....
जेल में जन्म.....
मां-बाप की हेराफेरी...
बचपन से लड़कियों का चक्कर.....
नाग देवता को भी मार दिया......
कंकर मार कर लड़कियों को छेडऩा....
16108 लफड़ा........
दो-दो बीवियां......
अपने मामू का मर्डर......
मथुरा से तड़ीपार.......
फिर भी भाई कभी पकड़े नहीं गए...
इसलिए तो उसे मैं भगवान् मानता हूं

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं
जय श्रीकृष्ण

आप देखिए, भगवान श्रीकृष्ण की जय भी कर रहे हैं, उनके जन्म की शुभकामनाएं भी दे रहे हैं, यानि कि उनके प्रति श्रद्धा भी है, फिर भी कैसी उपमाएं दी हैं? निश्चित ही यह काम किसी टपोरी का है। उसे श्रीकृष्ण की लीलाओं में सांसारिक कृत्य नजर आ रहे हैं। अर्थात जैसा वह है, या होना चाहता है, वैसा ही श्रीकृष्ण को देख रहा है। जैसे हम मानव ईश्वर की कल्पना महामानव के रूप में करते हैं, ठीक वैसे ही टपोरी उसे महाटपोरी मान रहा है। नैतिकता का पतन देखिए कि वह ऐसा कह कर अपने कृकृत्यों को जायज करार दे रहा है। ...कि उसने किया या अब करे तो क्या हुआ, श्रीकृष्ण भी तो ऐसा करते थे। ऐसा भ्रष्ट बुद्धि की वजह से ही हो सकता है। मगर अफसोस जिस महान संस्कृति ही हम दुहाई देते हैं, हमारे जिन महापुरुषों की बदोलत भारत को विश्व गुरू मानते हैं, उसी संस्कृति में ऐसे लोग भी हैं, जो कुसंस्कृत होने का प्रमाण दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी श्रीकृष्ण के प्रति अश्रद्धा होगी, वे भी श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे वैसे ही नतमस्तक होते होंगे, जैसे आम श्रद्धालु, मगर उन्हें अपने ही भगवान की मजाक बनाने में तनिक भी शर्म नहीं आती। चलो, उनकी श्रद्धा न सही, मगर वे इतने बेखौफ हैं कि उन्हें अन्य की श्रद्धा का भी डर नहीं। ऐसा अन्य धर्मों में नहीं। चाहे मुसलमान हों या ईसाई, बौद्ध हों या जैन, किसी को भी अपने भगवान या ईष्ट के प्रति ऐसी घटिया टिप्पणी करते नहीं देखा होगा। अव्वल तो कोई ऐसा करता ही नहीं, खुदानखास्ता गलती से कर भी दे तो समझो उसकी खैर नहीं। मगर हिंदू धर्म को मानने वालों में ऐसे भ्रष्टबुद्धि लोग मौजूद हैं, जो कि न केवल बेहद शर्मनाक है, अपितु असहनीय है। केवल भगवान श्रीकृष्ण ही क्यों, जिनकी मति मारी हुई है, वे भगवान राम, माता सीता, हनुमान जैसे देवी देवताओं तक पर चुटकले बनाते हैं। राजनीतिक कारणों से महात्मा गांधी पर भी अभद्र टिप्पणियां करने से लोग बाज नहीं आते। और तो और गणेश चतुर्थी, नवरात्र आदि के जुलूस या कावड़ यात्रा के दौरान मद्यपान व अन्य मादक पदार्थों का सेवन किए हुए लोग मिल जाएंगे। आस्था व नैतिकता का यह हृास बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। फिर भी यदि हम फिर विश्व गुरू बनने का ख्वाब देखते हैं तो यह कोरी कल्पना ही है।
ऐसा नहीं कि टपोरियों की पोस्ट को लेकर सज्जन चिंतित नहीं, वे खूब अपील करते हैं कि जन्माष्टमी आ रही है, सभी से विनम्र निवेदन है कि भगवान श्रीकृष्ण के बारे में उलटे-सीधे मेसेज पोस्ट न करें और कोई भी गलत पोस्ट करके धर्म का अपमान न करे, मगर उनकी सुनता कौन है?
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, अगस्त 02, 2017

साधु-संत भी लोकेषणा से मुक्त नहीं

इसमें कोई शक नहीं कि साधु-संत हमारे लिए सम्माननीय हैं। वे समाज का मार्गदर्शन करते हैं और आमजन में धर्म के प्रति आस्था कायम रखे हुए हैं और उसी वजह से इस अर्थ प्रधान व मतलबी दुनिया में संस्कार व नैतिक जीवन मूल्य मौजूद हैं, मगर वे भी वैसी ही लोकेषणा रखते हैं, जैसी कि हम लोग रखते हैं। इसका नजारा हाल ही जयपुर में देखने को मिला, जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आगमन पर साधु-संतों का सम्मेलन किया गया।
इस मौके पर अमित शाह व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित अन्य नेताओं ने उनसे आशीर्वाद लिया। न केवल मीडिया ने ऐसे क्षणों को कैमरे में कैद कर यह दिखाया कि देखो किस प्रकार सत्ताधीश साधुओं के आगे नतमस्तक होते हैं, अपितु कुछ संतों ने भी अमित शाह व वसुंधरा को आशीर्वाद देते हुए खींचे गए फोटो सोशल मीडिया पर जारी किए। मीडिया की तो चलो ड्यूटी है कि वह समाज में जो कुछ चल रहा है, उसकी रिपोर्ट करे, मगर यदि संत भी ऐसे फोटोज का प्रचार-प्रसार करते हैं, तो इसका अर्थ ये है कि वे भी हमारी तरह लोकेषणा से मुक्त नहीं हैं। लोकेषणा भी ऐसी कि देखो कैसे सत्ता के शिखर पर बैठे नेता हमारे आगे शीश नवा रहे हैं। यानि कि जितना बड़ा नेता आशीर्वाद ले रहा है, उतना ही संत का स्टेटस बढ़ जाता है, कद बढ़ जाता है। अर्थात बड़े नेता को आशीर्वाद देना भी ब्रॉन्डिंग  के काम आता है। इसका अनुमान इस प्रकार लगाया जा सकता है कि भविष्य में वे ही फोटोज आप संतों के ड्राइंग रूप में टंगे मिलेंगे। उनके शिष्य भी ऐसे फोटोज का प्रचार-प्रसार करते हैं कि देखो, अमुक बड़ा नेता हमारे गुरू के आगे झुक रहा है।
इसके विपरीत जैसी कि हमारी संस्कृति है, वह यह दर्शाती है कि हमारे साधु-संत सभी प्रकार की एषणाओं से मुक्त हैं। वे इसी कारण हमारे लिए सम्मानीय हैं कि हम सभी तरह की एषणाओं से घिरे हुए हैं, जबकि हमारे आदर्श विरक्त हैं। उनके लिए छोटा-बड़ा एक समान है। सभी पर एक जैसी कृपा बरसाते हैं।
रहा सवाल राजनीतिज्ञों का तो वे इस कारण शीश झुकाते हैं क्यों कि या तो वाकई उनकी संतों के प्रति श्रद्धा है या फिर जनता को संदेश दे रहे होते हैं कि आप भी संतों का सम्मान करें। जबकि साइलेंट एजेंडा ये होता है जिस भी संत के आगे वे झुकें, उसके फॉलोअर्स में उनकी लोकप्रियता बढ़े। इसी कारण नेता लोग हर संत के आगमन पर भरी सभा में जा कर आशीर्वाद लेते हैं। यानि वोटों की खातिर यह प्रहसन किया जाता है। सच तो ये है कि कई बार संतों के ही शिष्य नेताओं से संपर्क कर उनसे आग्रह करते हैं कि उनके गुरू की सभा में आ कर आशीर्वाद लें। ऐसे शिष्यों में विशेष रूप से वे होते हैं, जो कि किसी न किसी राजनीतिक दल अथवा नेता के अनुयायी होते हैं और  ये जताते हैं कि देखो अमुक संत और नेता तक उनकी पहुंच है।
लब्बोलुआब नेताओं की लोकेषणा तो समझ में आती है, मगर साधु-संत भी इससे मुक्त नहीं तो इसका ये अर्थ है कि वे भी संसार में रस ले रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि नेता ने सफेद कपड़े पहन रखे हैं और साधु ने गेरुआ।  और चूंकि गेरुआ रंग हमारी श्रद्धा का प्रतीक है, इस कारण हम हर उस जगह झुक जाते हैं, जहां गेरुआ रंग होता है। मन में श्रद्धा हो न हो, हम भी इस वजह से झुक जाते हैं, क्योंकि हमारे इर्द-गिर्द अन्य झुक रहे होते हैं।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, जुलाई 29, 2017

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन : नई बोतल में पुरानी शराब

राज्य सरकार आमजन की समस्याओं के समाधान के लिए आगामी 15 अगस्त से मुख्यमंत्री हेल्पलाइन लॉन्च करने जा रही है। यह निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है, क्योंकि इसके लिए जो प्रक्रिया बनाई गई है, वह परिणाममूलक नजर आती है, मगर हमारा जो प्रशासनिक ढ़ांचा है, वह इसे कामयाब होने देगा, इसमें तनिक संदेह है। संदेह की वजह भी है। राज्य की जनता का पिछला अनुभव अच्छा नहीं रहा है।
आपको ज्ञात होगा कि पिछली सरकार के दौरान लोक सेवा गारंटी कानून लागू कर हर शिकायत का निपटारा करने के लिए चालीस दिन की अवधि तय की गई थी। बेशक वह भी जनता को राहत देने वाला एक अच्छा कदम था, मगर उसका हश्र क्या हुआ, सबको पता है। आरंभ में जरूर इस पर काम हुआ और वह गति पकड़ता, इससे पहले ही सत्ता परिवर्तन हो गया। प्रशासनिक ढ़ांचे ने राहत की सांस ली। हालांकि कानून आज भी लागू है, मगर न तो उसके तहत समाधान तलाशा जा रहा है और न ही प्रशासन को उसकी चिंता है। कुछ इसी तरह का सूचना का अधिकार कानून बना, मगर सूचना देने में अधिकारी कितनी आनाकानी या कोताही बररते हैं, यह सर्वविदित है। अव्वल तो वे अर्जी में ही कोई न कोई तकनीकी गलती बताते हुए सूचना देने से इंकार कर देते हैं। अगर कोई पीछे ही पड़ जाए तो सूचना देने से बचने के उपाय के बतौर शब्दों की बारीकी में उलझा देते हैं। सच बात तो ये है कि आम आदमी थोड़ी बहुत बाधा आने पर आगे रुचि ही नहीं लेता। अगर कोई पीछे पड़ता है तो कई बाधाओं को पार करने के बाद ही संबंधित अधिकारी पर जुर्माना करवा पाता है।
खैर, अब बात करते हैं मौजूदा सरकार की ओर से शुरू किए गए मुख्यमंत्री संपर्क पोर्टल की। इसमें भी समस्याओं के ऑन लाइन समाधान की व्यवस्था है, मगर कितनों का समाधान मिलता है, यह किसी से छिपा नहीं है। असल में जो व्यवस्था बनाई गई है, वह तो पूरी तरह से दुरुस्त है, मगर उस पर अमल का जो तरीका है, वह पूरी तरह से बाबूगिरी स्टाइल का है। उसमें कहीं न कहीं टालमटोल नजर आती है। शिकायतकर्ता को जवाब तो आता है, मगर उसमें समाधान कहीं नजर आता। वस्तुत: हमारे सरकारी अमले में कागजी खानापूर्ति की आदत पड़ गई है, समाधान हो या न हो, उसकी कोई फिक्र नहीं।
अब अगर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन लॉन्च की जा रही है तो यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि मुख्यमंत्री संपर्क पोर्टल कारगर नहीं हो पाया। बेशक मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की व्यवस्था भी बड़ी चाक-चौबंद नजर आती है, मगर असल में ये है पुरानी व्यवस्था का ही नया तकनीकी रूप।  जैसे नई बोतल में पुरानी शराब। पहले पोर्टल पर शिकायत ऑन लाइन, दर्ज होती रही है, और अब भी वह ऑन लाइन ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब अनपढ़ शिकायतकर्ता भी मोबाइल फोन पर अपनी आवाज में अपनी परेशानी दर्ज करवा सकता है। रहा सवाल शिकायत के निपटाने का तो पहले भी संबंधित विभाग के पास शिकायत जाती थी, अब भी जाएगी। रहा सवाल समस्या समाधान की समय सीमा का तो वह लोक सेवा गारंटी कानून के तहत भी थी और मुख्यमंत्री संपर्क पोर्टल में भी। मगर हुआ क्या?
असल में हमारे यहां गणेश जी की बड़ी महिमा है, इस कारण हर योजना का श्रीगणेश बहुत बढिय़ा, गाजे-बाजे के साथ किए जाने की परंपरा रही है। योजनाएं बनाते वक्त भी उसकी हर बारीकी को ध्यान में रखा जाता है, मगर बाद में वही ढर्ऱे पर चल पड़ती है। एक छोटे से उदाहरण से आप हमारी मानसिकता को समझ सकते हैं। आपने देखा होगा कि जब भी कहीं सार्वजनिक मूत्रालय बनाया जाता है तो बाकायदा में चिकनी टाइलें लगाई जाती हैं, पॉट भी लगाया जाता है, निकासी की भी पुख्ता व्यवस्था की जाती है, यहां तक कि पानी की टंकी का भी इंतजाम होता है, मगर चंद दिन बाद ही उसकी हालत ऐसी हो जाती है कि वहां जाने पर घिन्न सी आती है। टंकी में पानी नहीं भरा जाता, टाइलें टूट जाती हैं, पॉट साबूत बचता है तो उसका पाइप गायब होता है। कहीं कहीं तो निकासी ही ठप होती है। यानि कि बनाते समय जरूर सारी जरूरतों का ध्यान रखा जाता है, मगर बाद में मॉनिटरिंग पर कोई ध्यान नहीं देता। कुछ ऐसा ही है सरकारी योजनाओं का हाल।
आपने देखा होगा कि दैनिक भास्कर में भी भास्कर हस्तक्षेप कॉलम में स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल ने भी मुख्यमंत्री हैल्पलाइन को यद्यपि   नई आजादी की संज्ञा दी है, मगर साथ ही यह भी आशंका जता दी है कि दफ्तरी पैंतरों के शातिर, नौकरशाह उम्मीदों से भरी नई व्यवस्था को भी अपने पंजों का शिकार बना डालें। दफ्तरों से फाइल की फाइल गायब कर डालना, किसी अर्जी पर एक बार में सारी आपत्तियां डालना, स्पष्ट कानूनों में भी भ्रम के पेंच डालकर मार्गदर्शन मांगने के नाम पर आवेदनों को अटका देना, कानूनों की नकारात्मक व्याख्या निकालना, ये सब वे फंदे हैं, जिनमें उलझकर बड़े से बड़े लोक कल्याणकारी कानून जमीन सूंघ चुके हैं।
कुल मिला कर योजना निश्चित रूप से सराहनीय है, मगर यदि सरकार की यह मंशा है कि इससे वाकई आमजन को राहत मिले तो उसे इसे परिणाममूलक बनाने के लिए दंडात्मक बनाना होगा, वरना हमारा प्रशासनिक तंत्र कितना चतुर है, उसकी व्याख्या करने की जरूरत नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, जुलाई 28, 2017

सत्ता की खातिर भ्रष्टाचार को छोड़ सांप्रदायिकता से नाता जोड़ा

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि राजनीति अब सिद्धांत विहीन होती जा रही है। सत्ता की खातिर कुछ भी किया जा सकता है। कैसी विडंबना है कि सांप्रदायिकता के नाम पर जिन को पानी पी-पी कर कोसा और सत्ता भी हासिल की, उन्हीं से हाथ मिला लिया। हालांकि उन्होंने लालू से नाता तोड़ कर ये संदेश देने की कोशिश की है कि वे भ्रष्टाचार के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते, मगर सांप्रदायिकता के जिस मुद्दे को लेकर भाजपा से पुराना नाता तोड़ा, आज उसी से गलबहियां कर रहे हैं, तो यह भी तो संदेश जा रहा है कि सत्ता की खातिर आप जमीर व जनभावना को भी ताक पर रख सकते हैं। केवल इतना ही क्यों, जब आपने भाजपा का साथ छोड़ कर लालू का हाथ पकड़ा था, तब भी चारा घोटाले में उन्हें सजा सुनाई जा चुकी थी, मगर चूंकि आपको जीत का जातीय समीकरण समझ आ गया था, इस कारण उस वक्त भ्रष्टाचार के साथ समझौता करने में जरा भी देर नहीं की। यानि की आपका मकसद केवल सत्ता हासिल करना है, जब जो अनुकूल लगे, उसके साथ। न आपको सांप्रदायिकता से परहेज है और न ही भ्रष्टाचार से।
और सबसे बड़ा सवाल ये कि जिस जनता का वोट आपने सांप्रदायिकता के खिलाफ बोल कर हासिल किया, उसके प्रति भी आपकी कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं। इन सबसे अफसोसनाक पहलु ये है कि जो नरेन्द्र मोदी लोकतंत्र का भारी समर्थन पा चुके हैं, वे लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनस्र्थापना करने की बजाय लोकतांत्रिक अनैतिकता को खुले आम बढ़ावा दे रहे हैं।
यह ठीक है कि तेजस्वी यादव पर कानूनी शिकंजा कसने के बाद उनके पास लालू यादव के साथ रहना मुश्किल हो रहा था, ऐसे में इस्तीफा  दे कर उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अच्छा संदेश दिया, मगर उनकी अंतरआत्मा की आवाज व नैतिकता तभी स्थापित हो सकती थी, जबकि  वे विपक्ष में बैठने को राजी हो जाते। यदि आपने सत्ता और केवल सत्ता को ही ख्याल में रखा है, तो भ्रष्टाचार और सिद्धांत परिवर्तन में क्या अंतर है? एक आर्थिक भ्रष्टाचार है तो दूसरा नैतिक भ्रष्टाचार। यदि आप अपना जमीर बेच रहे हैं तो आप भी भ्रष्टाचारी हैं।
हां, इतना जरूर है कि उन्होंने अपने आपको एक चतुर राजनीतिज्ञ साबित कर दिया है। वो ऐसे कि यदि अचानक इस्तीफा दे कर सत्ता के गणित को नहीं बदलते तो खुद उनकी ही पार्टी में सेंध पडऩे वाली थी। तेजस्वी यादव के समर्थक जेडीयू विधायक उनके खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। जेडीयू में ऐसे विधायकों की संख्या करीब डेढ़ दर्जन बतायी जा रही है। इनमें से ज्यादातर यादव और मुस्लिम विधायक हैं। इसके अतिरिक्त उनके खुद के विधायक भी तेजस्वी के साथ जाने को तैयार थे। यानि कि तेजस्वी को हटाने की हिम्मत तो उनकी थी ही नहीं। जैसे ही वे उन्हें हटाते तेजस्वी सहानुभूति का फायदा उठाते और सारा गणित उलटा पड़ जाता।
खैर, अब जबकि नीतीश की कथित सुशासन बाबू की छवि और लालू के जातीय गणित की संयुक्त ढ़ाल तोड़ कर भाजपा ने बिहार में सेंध लगा दी है, वहां नई कुश्ती शुरू होगी। फिलहाल भले ही नीतीश ने कुर्सी बचा ली हो, मगर अगले चुनाव में उनको अपना खुद का जनाधार कायम रखना मुश्किल होगा। और अगर भाजपा कोई बहुत बड़ा ख्वाब देख रही है तो फिलहाल तो ये हवाई किला ही होगा, क्योंकि उसके पास मोदी लहर के अलावा कोई और बड़ा वजूद नहीं है, जो कि अगले चुनाव तक कितनी बाकी रहती है, कुछ नहीं कहा जा सकता।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, जुलाई 19, 2017

पार्टी में बगावत के सुर उठे, तब जा कर झुकी सरकार

कुख्यात आनंदपाल के एनकाउंटर मामले में एक ओर जहां भाजपा का राजपूत वोट बैंक खिसकने का खतरा उत्पन्न हो गया था, वहीं पार्टी में भी बगावत के हालात पैदा हो गए थे, तब जा कर सरकार को मामले की सीबीआई जांच के लिए घुटने टेकने पड़े।
असल में राजपूत आंदोलन जिस मुकाम पर आ कर खड़ा हो गया था, वहां पार्टी के राजपूत विधायकों व मंत्रियों की स्थिति अजीबोगरीब हो गई थी। जिस जाति के नाम पर वे राजनीति कर सत्ता का सुख भोग रहे हैं, अगर वही जनाधार ही खिसकने की नौबत आ गई तो उनके लिए पार्टी में बने रहना कठिन हो गया। वे हालात पर गहरी नजर रखे हुए थे। कैसी भी स्थिति आ सकती थी। इसी बीच वरिष्ठ भाजपा नेता व विधायक नरपत सिंह राजवी मुखर हो गए। ज्ञातव्य है कि वे पूर्व उपराष्ट्रपति व पूर्व मुख्यमंत्री स्व. भैरोंसिंह शेखावत के जंवाई हैं और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से उनके राजनीतिक रिश्ते किसी से छिपे हुए नहीं हैं। उन्होंने प्रदेश नेतृत्व को दरकिनार करके सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को पत्र लिख कर आनंदपाल मामले में राजपूतों पर पुलिस द्वारा की जा रही मनमानीपूर्ण कार्रवाई में दखल देने की मांग कर दी। उन्होंने कहा कि राजस्थान में राजपूत समाज के साथ पुलिस द्वारा अत्यंत निंदनीय बर्ताव किया जा रहा है। राजपूत समाज में असमंजस और आक्रोश की स्थिति उत्पन्न हो गई है। यह समाज अब तक के सभी चुनावों में 90 प्रतिशत तक पार्टी के साथ खड़ा रहा है, लेकिन दुख की बात है कि उसी भाजपा की सरकार में यही राजपूत समाज अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहा है। इस पत्र के मायने साफ समझे जा सकते हैं। अगर सरकार सीबीआई जांच के लिए राजी नहीं होती तो अन्य विधायक भी मुखरित हो सकते थे।
शायद ही ऐसी भद पिटी किसी गृहमंत्री की
आनंदपाल मामले में गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया की जितनी भद पिटी, उतनी शायद ही किसी की पिटी हो। पहले जब आनंदपाल राजनीतिक संरक्षण की वजह से पकड़ से बाहर था तो उनसे जवाब देते नहीं बनता था और एनकाउंटर के बाद पुलिस कार्यवाही को सही बताते हुए सीबीआई जांच की मांग किसी भी सूरत में नहीं मानने पर अड़े तो मुख्यमंत्री के कहने पर उसी बैठक में सरकार की ओर से बैठना पड़ा, जिसमें सीबीआई जांच  का समझौता करना पड़ा। इससे बड़ी कोई विडंबना हो नहीं सकती। होना तो यह चाहिए कि इतनी किरकिरी के बाद उन्हें पद त्याग देना चाहिए। उनकी जिद के कारण ही आंदोलन इतना लंबा खिंचा, जिसमें हिंसा और जन-धन की हानि हुई। प्रदेश के कुछ हिस्सों में तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। एनकाउंटर को सही ठहराने के लिए पुलिस के तीन आला अधिकारियों को प्रेस वार्ता करनी पड़ी। खुद भी यही बोले कि अपनी पुलिस का मनोबल नहीं  गिरने दे सकता। चाहो हाईकोर्ट से जांच के आदेश करवा दो। और फिर यकायक यू टर्न ले लिया। सवाल ये उठता है कि अगर मांग माननी ही थी तो क्यों आनंदपाल के शव की दुर्गति करवाई? क्यों प्रदेश को हिंसक आंदोलन के मुंह में धकेला?
क्या पुलिस ने खो दिया है विश्वास?
क्या अब समय आ गया है कि पुलिसकर्मियों को अपने हथियार मालखाने में जमा करा देने चाहिए, क्योंकि अब पुलिस को दिए गए हथियारों के इस्तेमाल पर जनता को भरोसा नहीं रहा है। देशभर के न्यायालय, राजनेता, सामाजिक संगठना व मीडिया अब पुलिस के हथियारों के प्रयोग पर इतना गहरा संदेह करने लग गए हैं कि पुलिसकर्मी चाहे जितनी गोलियां खा कर घायल हो जाये, तब भी पुलिस के कामकाज पर भरोसा नहीं है। बहुत सोचनीय है कि सोसायटी पुलिस की बजाय खूंखार अपराधी के साथ खड़ी हो जाती है। वस्तुत: कुख्यात अपराधियों के साथ हुए तथाकथित एनकाउंटर की घटनाओं में सुप्रीम कोर्ट व सीबीआई की दखलंदाजी के बाद एनकाउंटर की थ्योरी गलत साबित होने लगी है व कई पुलिसकर्मी जेलों में बंद हुए हैं। क्या ऐसी स्थिति में पुलिस को जनता का विश्वास फिर से हासिल करने के बाद ही हथियारों का इस्तेमाल करना चाहिए? एक तरह से पुलिस की सच्चाई व अस्मिता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। इस पर यदि समय रहते गंभीर चिंतन कर रास्ता नहीं निकाला गया तो समाज को बहुत बुरे अंजाम देखने होंगे।
तेजवानी गिरधर
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वोट बैंक खोने के डर से मानी सीबीआई जांच की मांग

आखिरकार राज्य की वसुंधरा राजे सरकार ने राजपूतों की मांग मान ही ली। अब सरकार एनकाउंटर में मारे गए आनंदपाल के मामले की सीबीआई जांच कराने को तैयार हो गई है। अन्य सभी मांगों पर भी सहमति दे दी है। सवाल उठता है कि अगर ये मांगें माननी ही थीं, तो काहे तो आनंदपाल के पार्थिव शरीर की दुर्गति होने दी गई? काहे को इतना लंबा आंदोलन होने दिया गया? काहे को सांवराद में मुठभेड़ और हिंसा की नौबत पैदा होने दी गई? काहे को गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया के उस बयान की किरकिरी करवाई, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि हम तो सीबीआई की जांच नहीं करवाएंगे, चाहें तो इसके लिए हाईकोर्ट से आदेश करवा दें?
साफ दिखाई दे रहा है कि इस मामले से निपटने में वसुंधरा राजे के सलाहकार आरंभ से ही गलत दिशा में चल रहे थे। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि पूरा राजपूत समाज इस प्रकार एकजुट हो जाएगा। वे तो यही मान कर चल रहे थे कि राजपूत नेताओं के बीच किसी न किसी तरह से दोफाड़ कर दी जाएगी और आंदोलन टांय टांय फिस्स हो जाएगा। राजपूत नेताओं में मतभेद के प्रयास भी हुए, मगर आम राजपूत इतना उग्र हो गया था कि किसी भी नेता की हिम्मत नहीं हुई कि वह मुख्य धारा से हट सके। सरकार यह सोच कर चल रही थी कि आंदोलन को लंबा करवा कर उसे विफल करवा दिया जाएगा, मगर वह रणनीति भी कामयाब नहीं हो पाई। यह ठीक है कि सांवराद में हुई हिंसा के बाद लागू कफ्र्यू के बीच आनंदपाल के शव का अंतिम संस्कार करवाने में सरकार सफल हो गई, मगर वह भी उलटा पड़ गया। सरकार को यह लगा कि अंतिम संस्कार के बाद आंदोलन की हवा निकल जाएगी, मगर वह अनुमान भी गलत निकला। राजपूतों को यह कहने का मौका मिल गया कि सरकार ने अंत्येष्टि के लिए दमन का सहारा लिया। सोशल मीडिया पर आम राजपूत का गुस्सा फूटने लगा। हालत ये हो गई राजपूत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के जयपुर दौरे के दौरान बड़ा जमावड़ा करने को आमादा हो गए। सरकार जानती थी कि लाख कोशिशों के बाद भी वह राजपूतों को जयपुर में एकत्रित न होने देने में कामयाब नहीं हो पाएगी।  और अगर रोकने के लिए पुलिस का सख्त रवैया अख्तियार किया जाता तो राजपूत अपनी अस्मिता को लेकर और उग्र हो जाता। इसका परिणाम ये होता कि भाजपा का यह परंपरागत वोट बैंक पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो जाता। आखिरकार सरकार को अपना स्टैंड बदल कर यू टर्न लेना पड़ा। इसमें गौर करने वाली बात ये है कि आरंभ से वसुंधरा राजे ने चुप्पी साध रखी थी। काफी दिन तक तो गृहमंत्री कटारिया भी मुखर नहीं हुए। और जब सामने आए तो ऐसे कि मानो उनसे मजबूत राजनेता कोई है ही नहीं। वे साफ तौर पर बोले कि वे अपनी पुलिस का मनोबल नहीं गिरा सकते। सीबीआई जांच की मांग किसी भी सूरत में नहीं मानी जाएगी। राजपूत चाहें तो इसके लिए हाईकोर्ट चले जाएं। उन्होंने ऐसा अहसास कराया, मानो उनके पास राजपूतों को कंट्रोल करने की कोई युक्ति हाथ आ गई है। मगर दो दिन बाद ही उनकी किरकिरी हो गई। उनकी फजीहत तो आनंदपाल के लंबे समय तक न पकड़े जाने के कारण भी होती रही और अब उसकी मृत्यु के बाद भी  घुटने टेकने को मजबूर हुए हैं।
आनदंपाल की गिरफ्तारी न हो पाने से लेकर आंदोलन से निपटने तक में पुलिस की नाकामी तो अपनी जगह है ही, सरकार इसके राजनीतिक पहलु को सुलझाने में भी विफल हो गई। कुल मिला कर अब यह साफ हो गया है कि सरकार ने अपना वोट बैंक खत्म हो जाने के डर से सीबीआई की जांच की मांग मानी है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, जून 28, 2017

हीरो कैसे बन गया आनंदपाल?

यह कहना आसान है, सही भी है कि जो आनंदपाल खुले आम दो बार पुलिस की हिरासत से भागा, जिस पर हत्या, लूट, अवैध हथियार रखने, शराब व हथियार तस्करी, संगठित माफिया के रूप में अवैध खनन जैसे सिद्ध आरोप थे, उसे महिमामंडित कैसे किया जा सकता है? परिवारजन की पीड़ा और एनकाउंटर की सीबीआई जांच सहज प्रतिक्रिया हो सकती है, उसे अन्यथा लिया भी नहीं जाना चाहिए, लेकिन अगर पूरा समाज के उसके साथ खड़ा हो गया है तो इसे गंभीरता से लेना और समझना होगा।
यह सर्वविदित है कि आनंदपाल पिछले ढ़ाई साल से सुर्खियों में रहा।  पुलिस के कब्जे से फरार होने के कारण और फिर उसे गिरफ्तार न कर पाने की पुलिस की नाकामयाबी के कारण भी। निश्चित रूप से उसके नहीं पकड़े जाने को लेकर राजस्थान पुलिस के साथ सरकार की खिल्ली भी उड़ रही थी। मगर जैसे ही वह एनकाउंटर में मारा गया तो पुलिस के गले में आ गई। सवाल सिर्फ ये है कि क्या उसका एनकाउंटर फर्जी था? और इसीलिए सीबीआई की जांच की मांग की जा रही है। मगर उससे भी बड़ा सवाल ये कि आखिर क्यों एक पूरा समाज यकायक लामबंद हो गया है? इसका सीधा सा अर्थ ये है कि वह मात्र खूंखार अपराधी ही नहीं था, बल्कि उसके राजनीतिक कनैक्शन भी थे। मीडिया में इस किस्म की चर्चा भी रही उसे भगाने व उसके गिरफ्तार न हो पाने की एक मात्र वजह उसकी चालाकी नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण भी था। और अगर राजनीतिक संरक्षण था तो यह भी बात माननी होगी कि जिन राजनीतिज्ञों ने उसे संरक्षण दिया हुआ था, वे जरूर उससे कोई न कोई लाभ उठा रहे थे। वह आर्थिक भी हो सकता है और समाज विशेष के वोटों की शक्ल में भी हो सकता है। वरना कोई राजनीतिज्ञ किसी को क्यों संरक्षण दे रहा था? एक ओर पुलिस पर आनंदपाल को गिरफ्तार करने का दबाव था तो दूसरी ओर उसके कथित कनैक्शन वाले राजनीतिज्ञों को डर था कि अगर वह गिरफ्तार हुआ तो कहीं उनके कनैक्शन न उजागर हो जाएं। ऐसे में आखिरी रास्ता एनकाउंटर ही था। एनकाउंटर के साथ ही बहुत से राजनीतिक राज राज की रह जाते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है ये तो सीबीआई जांच में ही उजागर हो पाएगा। एनकाउंटर वास्तविक था, या फिर फर्जी, ये तो साफ होगा ही, कदाचित ये भी सामने आए कि आनंदपाल के किस प्रभावशाली व राजनीतिक व्यक्ति से ताल्लुकात रहे।
दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल ने इस बात को कुछ इन शब्दों में पिरो कर संकेत देने की कोशिश की है:- जातिवाद के शेर को पाल कर बड़ा करने वाले राजनीतिज्ञ शायद यह नहीं जानते कि शेर जब आदमखोर हो जाता है तो वह अपने पालने वाले को भी नहीं बख्शता।
डॉ. अग्रवाल ने एक बात और लिखी है कि अपराध को जब घोषित रूप से सही ठहराया जाने लगे, समझ लेना चाहिये उस समाज की नींवें हिल चुकी हैं। अपना ये मानना है कि नींवें अभी नहीं हिल रहीं, पहले से हिली हुई थीं, बस दिख नहीं रही थीं। कहने भर को हमारा लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, मगर उसकी बुनियाद जातिवाद पर ही टिकी हुई है। क्या ये सच नहीं है कि आज की राजनीति पूरी तरह से बाहुबल और धनबल से ही संचालित है और वोटों का धु्रवीकरण जाति व धर्म के आधार पर होता है? ऐसे में अगर कोई खूंखार अपराधी पैदा होता है, तो उसकी जननी यही राजनीति है। इसे स्वीकार करना ही होगा।
रहा सवाल राज्य सरकार का तो भले ही उसकी नजर में एनकाउंटर आखिरी चारा था या पूरी तरह से उचित था, मगर मामले की सीबीआई जांच से कतराना दाल में काला होने का संकेत देता है। अगर सरकार व पुलिस सही है तो उसे सीबीआई जांच करवाने में कोई परहेज नहीं होना चाहिए। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, जून 22, 2017

तिवाड़ी ने खोला वसुंधरा के खिलाफ मोर्चा

अगर यह सही है कि प्रदेशभर के लाखों मोबाइल फोनों पर जो वॉइस मैसेज आ रहा है, वह वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी का ही है तो, यह अब साफ है कि पार्टी लाइन से हट कर चल रहे तिवाड़ी ने काफी जद्दोजहद के बाद अपनी ही पार्टी की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के खिलाफ आर-पार की जंग छेड़ दी है। इस वॉइस मैसेज में तिवाड़ी बता रहे हैं कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जिस बंगले में निवास कर रही हैं, उसकी कीमत दो हजार करोड़ रुपए हैं और उन्होंने इस पर आजन्म कब्जा करने की कानूनी जुगत बैठा ली है। अर्थात अगर वे दुबारा मुख्यमंत्री नहीं भी बनती हैं तो भी उस पर काबिज रहेंगी, वह उनकी निजी संपत्ति होगी। तिवाड़ी का कहना है कि यह संपत्ति जनता की है और वे जतना के हित के साथ खिलवाड़ कत्तई बर्दाश्त नहीं करेंगे और इस सिलसिले में आगामी 25 जून को आंदोलन आरंभ करेंगे। उन्होंने इस आंदोलन में सहयोग की अपील की है।
ज्ञातव्य है कि इससे पूर्व काफी लंबे समय से तिवाड़ी सरकार, विशेष रूप से मुख्यमंत्री राजे के खिलाफ बोलते रहे हैं। इस पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी ने राष्ट्रीय अनुशासन समिति को शिकायत की थी, जिस पर समिति के अध्यक्ष गणेशीलाल ने तिवाड़ी को नोटिस दे कर दस दिन में जवाब मांगा। नोटिस में साफ तौर कहा गया है कि वे पिछले दो साल से लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों एवं पार्टी के विरुद्ध बयानबाजी करने में संलग्न हैं। पार्टी द्वारा आयोजित बैठकों में वे उपस्थित नहीं हो रहे और विपक्षी दलों के साथ मिलकर मंच साझा कर रहे हैं। इसके साथ ही नोटिस में यह भी बताया गया है कि वे समानांतर राजनीतिक दल का गठन करने के प्रयास में जुटे हैं। नोटिस की भाषा से ही स्पष्ट था पार्टी का रुख अब उनके प्रति क्या रहने वाला है। तिवाड़ी भी ये जानते थे और उन्होंने बहुत सोच समझ कर अपनी मुहिम को जारी रखा। नोटिस पर प्रतिक्रियास्वरूप तिवाड़ी ने जो पलटवार किया, उसी से ही लग गया था कि वे आरपार की लड़ाई के मूड में हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी जिस दीनदयाल वाहिनी के गठन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व को मेरी अनुशासनहीनता की शिकायतें कर रहे हैं, उसका गठन 29 साल पहले सीकर में उस समय हो गया था, जब मैं विधायक था और परनामी राजनीति में कुछ नहीं थे। वे उस समय सिर्फ अगरबत्ती बेचते थे। उन्होंने कहा कि वे न तो डरेंगे और न ही झुकेंगे। भ्रष्ट सरकार के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे। अपनी ही पार्टी की सरकार को भ्रष्ट करार देना कोई मामूली बात नहीं है।
हालांकि इस बीच वसुंधरा के प्रति वफादारी दिखाने वाले कुछ नेताओं ने तिवाड़ी पर आरोपों की झड़ी लगा दी, मगर इससे वे और अधिक मुखर हो गए।
अब जबकि वे खुल कर आंदोलन करने पर उतारु हो ही गए हैं तो लगता नहीं कि बीच का रास्ता निकलेगा। अगर उनको पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है तो जाहिर तौर पर प्रदेश भाजपा की राजनीति के समीकरणों में बदलाव आएगा। इसके अतिरिक्त यह भी साफ हो जाएगा कि कौन उनके साथ है और कौन पार्टी के साथ। बाकी एक बात जरूर है कि आज जब कि पार्टी अच्छी स्थिति में है, उसके बाद भी तिवाड़ी ने जो दुस्साहस दिखाया है तो वह गौर करने लायक है।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, जून 15, 2017

मोदी का गृहराज्य गुजरात अब उतना आसान नहीं

हालांकि देश की राजनीति में इन दिनों मोदी ब्रांड धड़ल्ले से चल रहा है, ऐसे में यही माना जाना चाहिए कि उनका खुद का गृह राज्य गुजरात तो  सबसे सुरक्षित है, मगर धरातल का सच ये है कि भाजपा के लिए वहां हो रहे आगामी विधानसभा चुनाव बहुत आसान नहीं है। बेशक जब तक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब तक उन्होंने वहां अपनी जबरदस्त पकड़ बना रखी थी, मगर प्रधानमंत्री बनने के बाद वहां स्थानीय नेतृत्व सशक्त नहीं होने के कारण भाजपा का धरातल कमजोर हुआ है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा को अपने सशक्त किले में ही मुख्यमंत्री को बदलना पड़ गया। हालांकि वहां अब भी भाजपा जीतने की स्थिति में है, मगर अंतर्कलह संकट का कारण बनी हुई है। गुजरात की राजनीति में थोड़ी बहुत समझ रखने वाले जानते हैं कि मोदी के पीएम बनने के बाद से ही राज्य में अमित शाह, आनंदीबेन पटेल और पुरुषोत्तम रूपाला की गुटबाजी बढ़ी है।
गुजरात में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती आदिवासी नेताओं की उपेक्षा व भिलीस्तान हैं। गुजरात के अधिसंख्य राजनीतिक विशेषज्ञों के ताजा आलेखों पर नजर डालें तो वहां भाजपा के लिए पाटीदारों और दलितों के बाद आदिवासी समुदाय मुसीबत का बड़ा सबब बन सकता। आदिवासी इलाकों में भिलीस्तान आंदोलन खड़ा किया जा रहा है, जिसमें कुछ राजनीतिक दल एवं धार्मिक ताकतें आदिवासी समुदाय को हवा दे रही हैं। अब जबकि चुनाव का समय सामने है यही आदिवासी समाज जीत को निर्णायक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। हर बार चुनाव के समय आदिवासी समुदाय को बहला-फुसलाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की तथाकथित राजनीति इस बार असरकारक नहीं होगी। क्योंकि गुजरात का आदिवासी समाज बार-बार ठगे जाने के लिए तैयार नहीं है। इस प्रांत की लगभग 23 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह गुजरात के आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन-यापन करने को विवश हैं। यूं भले ही गुजरात समृद्ध राज्य है, मगर आदिवासी अब भी समाज की मुख्य धारा से कटे नजर आते हैं। इसका फायदा उठाकर मध्यप्रदेश से सटे नक्सली उन्हें अपने से जोड़ लेते हैं। महंगाई के चलते आज आदिवासी दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी नहीं खरीद पा रहे हैं। वे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। अगर भिलीस्तान आंदोलन को नहीं रोका गया तो गुजरात का आदिवासी समाज खण्ड-खण्ड हो जाएगा। इसके लिए तथाकथित हिन्दू विरोधी लोग भी सक्रिय हैं। इन आदिवासी क्षेत्रों में जबरन धर्मान्तरण की घटनाएं भी गंभीर चिंता का विषय है। यही ताकतें आदिवासियों को हिन्दू मानने से भी नकार रही है और इसके लिए तरह-तरह के षडयंत्र किये जा रहे हैं।
ऐसे में आदिवासियों का रुख मुख्यमंत्री विजय रूपाणी व भाजपा अध्यक्ष जीतू वाघानी के लिए तो चुनौती है ही, मोदी के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है। मोदी हालात से अच्छी तरह से वाकिफ हैं, इस कारण वे एक दर्जन बार गुजरात की यात्रा कर चुके हैं। मोदी ने आदिवासी कॉर्निवल में आदिवासी उत्थान और उन्नयन की चर्चाएं की, मगर धरातल तक राहत पहुंचने में वक्त लग सकता है। ऐसे में तेजी से बढ़ता आदिवासी समुदाय को विखण्डित करने का हिंसक दौर आगामी विधानसभा चुनावों का मुख्य मुद्दा बन सकता है और एक समाज और संस्कृति को बचाने की मुहिम इन विधानसभा चुनावों की जीत का आधार बन सकती है।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, जून 14, 2017

बडे पैमाने पर तोडफ़ोड़ उलटी भी पड़ सकती है भाजपा को

विधानसभा चुनावों को लेकर इन दिनों भाजपा की जो तोडफ़ोड़ की नीति है, उसी के तहत इस बार राजस्थान में भी बड़े पैमाने पर कांग्रेस में सेंध मारने की योजना है। उस पर प्रारंभिक काम भी शुरू हो गया है, जिसके चुनाव से छह माह पहले तेजी पकडऩे की संभावना है। मगर जैसा कि यहां का राजनीतिक माहौल है, यह नीति भाजपा को उलटी भी पड़ सकती है।
वस्तुत: यह बात भाजपा हाईकमान अच्छी तरह से जानता है कि भले ही मोदी के नाम का असर अपना काम करेगा, मगर राजस्थान में भाजपा का परफोरमेंस कुछ खास अच्छा न होने और एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर की वजह से मौजूदा सीटों से ग्राफ गिर कर सौ के अंदर भी ठहर सकता है। जनता भाजपा को बिलकुल पलटी खिला देगी ऐसा भी नहीं दिखता, मगर हाईकमान चाहता है कि जीत किसी भी स्थिति में सुनिश्चित होनी ही चाहिए। भले ही हाईप क्रिएट करने के लिए लक्ष्य 180 का बनाया गया है, मगर अंदरखाने पता है कि स्पष्ट बहुमत के लिए भी पूरी मेहनत करनी होगी। इसी के तहत इस बार एक बड़ा प्रयोग ये किया जाना है कि काफी बड़ी तादात में मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाएंगे। एंटी इन्कंबेंसी से निपटने के लिए इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है। दूसरा ये कि भाजपा हाईकमान का कांग्रेस में बड़े पैमाने पर तोडफ़ोड़ का मानस है। इस पर काम शुरू भी हो गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को न्यौता दिए जाने की अफवाह भी इसी कड़ी का हिस्सा है। जानकारी के अनुसार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की नजर दूसरी और तीसरी पंक्ति के कांग्रेस नेताओं पर भी है। सुविज्ञ सूत्रों के अनुसार एक पूर्व विधायक व जिला प्रभारी से तो शाह की मीटिंग भी हो चुकी है। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति के अन्य नेताओं व टिकट के दावेदारों की भी पूरी निगरानी की जा रही है। ऐन चुनाव के वक्त उनमें से सशक्त दावेदारों को टिकट का लालच भी दिया जाएगा। अनुमान है कि चुनाव से छह माह पहले काफी अफरातफरी फैलाई जा सकती है। समझा जाता है कि कांग्रेस के भीतर भी इसका आभास है। वे दावेदार, जो कि खुद को टिकट मिलने की संभावना कुछ कम समझ रहे हैं, वे या तो भाजपा से न्यौते के इंतजार में रहेंगे या अभी से भाजपा के मीडिएटरों से तार जोड़े हुए हैं।
कुल जमा बात ये है कि भाजपा की यह नीति उलटी भी पड़ सकती है। वे मौजूदा विधायक, जिनका कि टिकट कटेगा, वे बगावत या भीतरघात कर सकते हैं। दूसरा ये कि कांग्रेस से तोड़ कर लाए गए नेताओं को भाजपा का कार्यकर्ता कितना स्वीकार करेगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। असल में अन्य राज्यों की तुलना में राजस्थान का राजनीतिक सिनोरियो अलग किस्म का हैं। यहां दलबदल हुए तो हैं, मगर आम तौर पर दलबदल चलन में नहीं है। कांग्रेस व भाजपा के बीच ऐसी गहरी सीमा रेखा है कि दलबदल को अच्छा नहीं माना जाता। कार्यकर्ता परंपरागत तौर पर या भावनात्मक रूप से अपनी-अपनी पार्टी से जुड़े हुए हैं। एक मात्र यही वजह है कि यहां तीसरी ताकत खड़ी नहीं हो पाई और भाजपा व कांग्रेस ही वजूद में हैं। मौजूदा विधायक का टिकट कटने पर कदाचित कार्यकर्ता उतना रिएक्ट न करे और भाजपा के ही नए नेता का साथ दे दें, मगर कांग्रेस से लाए नेता को टिकट देने पर वह निष्ठा से काम करेगा ही, इसको लेकर संदेह है। भावनात्मक रूप से वह उसका साथ देने से कतरा सकता है। शायद यह स्थिति भाजपा के बड़े नेताओं से छिपी हुई नहीं है, मगर चुनाव जीतने की जिद में ज्यादा उठापटक की गई तो हो सकता है कि भाजपा खता भी खा जाए।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, जून 07, 2017

मोदी के तीन साल : आम आदमी को तो कुछ नहीं मिला

पिछली 26 मई को नरेन्द्र मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर मोदी फैस्ट के जरिए उल्लेखनीय सफलताओं का दावा किया जा रहा है। कदाचित आंकड़ों की भाषा में वह सच हो, मगर धरातल की सच्चाई ये है कि आम आदमी की जिंदगी में राहत के तनिक भी लक्षण नजर नहीं आ रहे।
अकेले न खाऊंगा, न खाने दूंगा के जुमले की बात करें तो भले ही प्रत्यक्षत: कोई बड़ा घोटाला उजागर नहीं हुआ हो, मगर समीक्षकों का मानना है कि घोटाले तो हुए हैं, मगर बाहर नहीं आने दिए गए। नोटबंदी की ही बात करें तो वह अपने आप में एक घोटाला है। पूरा देश जानता है कि उसमें किस कदर लूट मची। न केवल बैंक वालों ने कमीशन खा कर नोट बदले, अपितु दलालों की भी पौ बारह हो गई। इस तथ्य को कोई भी नहीं नकार सकता। केंद्रीय सूचना आयोग के आयुक्त श्रीधर आचार्यलु ने नोटबंदी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सूचना को रोके रखने से अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों में शंकाएं पैदा हों रही हैं। ज्ञातव्य है कि प्रधानमंत्री कार्यालय, रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय नोटबंदी के पीछे के कारणों संबंधी जानकारी मांगने वाली सभी आरटीआई याचिकाओं को हाल में खारिज कर चुके हैं। सीधी सट्ट बात है कि आप कोई जानकारी बाहर ही नहीं आने देंगे तो पता ही कैसे चलेगा कि घोटाला हुआ है या नहीं।
नोटबंदी जैसे देश को बर्बाद कर देने वाले कदम को भी सरकार ने ऐसे प्रस्तुत किया मानो उससे देश का बहुत भला हुआ हो। जहां लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा बिछाए गए विकास के दावों के मायाजाल में फंसा हुआ है, वहीं जमीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। न तो महंगाई कम हुई है, न रोजगार बढ़ा है और ना ही आम आदमी की स्थिति में कोई सुधार आया है। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है और किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं।
जहां तक न खाने देने का सवाल है, हर कोई जानता है कि स्थिति जस की तस है। प्रशासनिक तंत्र अब भी भ्रष्टाचार में उसी तरह आकंठ डूबा हुआ है, जैसा पहले था। किसी भी महकमे पर नजर डाल लें, कहीं भी सुविधा शुल्क की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया है। हर कोई जानता है कि हर जगह रिश्वतखोरी वैसी की वैसी है, जैसे पहले थी। इस तथ्य को साबित करने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि यह स्वयंसिद्ध है। न तो रिश्वतखोरों के मन में कोई डर उत्पन्न हुआ है और न ही आम आदमी को किसी प्रकार की राहत मिली है।
दूसरी उल्लेखनीय बात ये है कि पाकिस्तान के साथ तो संबंध पहले से ज्यादा बिगड़े हैं। कश्मीर की हालत भी सुधरने की बजाय दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। केवल झूठी वाहवाही और बड़ी-बड़ी डींगे हांकने का माहौल है। जो मोदी विपक्ष में रहते पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की बात करते थे, वही आज चुप बैठे हैं। सबक सिखाना तो दूर पाकिस्तान का हौसला और बढ़ गया है। अफसोस कि आत्ममुग्ध सरकार सर्जिकल स्ट्राइक का ढिंढोरा पीट रही है। कश्मीर के संबंध में सरकार की नीति का नतीजा यह हुआ है कि लड़के सड़कों पर निकल कर पत्थर फेंक रहे हैं। कश्मीर के लोगों से संवाद स्थापित करने में सरकार की विफलता के कारण, घाटी में हालात खराब होते जा रहे हैं।
मोदी के कार्यकाल की तीसरी उल्लेखनीय बात ये है कि भले ही वे आज भी एक आइकन के तौर पर देखे जाते हैं, मगर इस दौर में सत्ता का प्रधानमंत्री के हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ है। मोदी के सामने वरिष्ठ से वरिष्ठ मंत्री की भी कुछ कहने तक की हिम्मत नहीं होती और ऐसा लगता है कि कैबिनेट की बजाए इस देश पर केवल एक व्यक्ति शासन कर रहा है।
चुनाव प्रचार के दौरान जो सबसे बड़ा वादा मोदी ने किया था, वह पूरी तरह से झूठा साबित हुआ। विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रुपए जमा करने का भाजपा का वायदा, सरकार के साथ-साथ जनता भी भूल चली है।
सामाजिक समरसता की स्थिति ये है कि पवित्र गाय को राजनीति की बिसात का मोहरा बना दिया गया है। गाय के नाम पर कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है। सरकार जिस तरह से गोरक्षा के मामले में आक्रामक रुख अपना रही है, उसके चलते, गोरक्षक गुंडों की हिम्मत बढ़ गई है और वे खुलेआम मवेशियों के व्यापारियों और अन्य के साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं।
कुल मिला कर देश को मोदी के नाम पर भले ही ऐसा चुंबकीय व्यक्ति मिला हुआ है, जो भाजपा को बढ़त दिलाए हुए है, मगर धरातल पर आम आदमी को कुछ भी नहीं मिला है। सार्वजनिक रूप से भले ही भाजपाई इस तथ्य को स्वीकार न करें, मगर कानाफूसी में वे भी स्वीकार करते हैं कि जिस परिवर्तन के नाम पर भाजपा सत्ता में आई, वैसा कोई परिवर्तन कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
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शनिवार, जून 03, 2017

जोशी के आरसीए अध्यक्ष बनने के बड़े राजनीतिक मायने

बेशक क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में भी राजनीति का बड़ा दखल होता है, मगर उससे राजनीति की दिशा तय होती हो, ऐसा नहीं है। हां, इतना जरूर है कि क्रिकेट की राजनीति इशारा जरूर करती है कि राजनीति का तापमान कैसा है? आरसीए के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
इसमें कोई दोराय नहीं कि प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सी पी जोशी राजनीति के बड़े चतुर खिलाड़ी हैं, मगर उन्हें आरसीए अध्यक्ष बनने की जो कामयाबी हाथ लगी, उसमें कहीं न कहीं भाजपा के अंदरूनी अंतरविरोध ने अपनी भूमिका अदा की। पिछले दिनों जब इस चुनाव के लिए वोटिंग हो चुकी तो इशारे यही थे कि सी पी जोशी का पलड़ा भारी है, मगर समीक्षकों की नजर इस बात पर थी कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा की रुचि कैसी है? माना यही जा रहा था कि चूंकि भाजपा यह नहीं चाहती कि राजस्थान क्रिकेट की राजनीति पर आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी हावी रहें, इस कारण मोदी के पुत्र रुचि मोदी को सत्तारूढ़ दल का साथ मिला होने पर संदेह था। फिर भी चूंकि सारा गेम भाजपा के अंदरखाने चल रहा था, इस कारण समीक्षक यह जानते हुए भी कि जोशी ही जीतेंगे, उनके जीतने पर सवालिया निशान छोड़ रहे थे।
चुनावी गणित कैसा था, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि समीक्षक यह भाषा बोल रहे थे- जो रुझान मिल रहे हैं, उनके अनुसार जीत कांग्रेस के दिग्गज नेता सीपी जोशी की होगी, लेकिन यह तभी संभव है, जब उनके प्रतिद्वंद्वी और आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी के बेटे रुचिर को सरकार का सहयोग नहीं मिला होगा। राजस्थान में ललित मोदी किसके करीबी हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। यदि केन्द्रीय भाजपा की रुचि रुचिर में नहीं थी, इसका सीधा सा अर्थ है कि वह ललित मोदी के बहाने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मजबूत होते नहीं देखना चाहती। इसी कारण इस चुनाव से जुड़ा सरकारी तंत्र असंमस में था। उसने रुचिर का पूरा साथ नहीं दिया और जोशी जीत गए।
यह तो हुई भाजपा की बात। अब अगर इस परिणाम के कांग्रेस में असर पर नजर डालें तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि केन्द्र व राज्य में भाजपा की सत्ता होने के बाद भी अगर एक पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आरसीए का अध्यक्ष बनता है तो इसका प्रभाव कांग्रेस कार्यकर्ता के मनोबल पर भी पड़ता है। वह दिखाई भी दे रहा है। यह भी तय है कि इससे पूर्वोत्तर के दस राज्यों में कांग्रेस का प्रभार संभालने के कारण राजस्थान की राजनीति से कुछ कटे हुए जोशी फिर ताकतवर हुए हैं। वे इस बहाने राजस्थान में अपनी जड़ों को फिर से सींचेंगे। स्वाभाविक रूप से इसका असर कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति पर भी पड़ेगा। निश्चित रूप से कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे की भी इस चुनाव पर नजर रही होगी। उन्हें अब कांग्रेस हाईकमान के निर्देशों के अनुरूप नए सिरे से माथापच्ची करनी होगी। हालांकि जोशी इस जीत के आधार पर कोई बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में नहीं होंगे, मगर इतना जरूर है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए उनके पक्के समर्थकों का उम्मीदें कुछ बढ़ जाएंगी। और अगर राजस्थान से ध्यान हटा कर गुजरात की जिम्मेदारी निभा रहे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थकों का भी साथ मिला तो वे नया समीकरण बनाने की कोशिश करेंगे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, मई 22, 2017

कांग्रेस की सुनिश्चित जीत पर संशय के बादल

प्रदेश में भाजपा शासन के तीन नकारा सालों और प्रदेश कांगे्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की कड़ी मेहनत की वजह से जो आम धारणा सी बन गई थी कि इस बार सरकार कांग्रेस की बनेगी, उस पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं। अगर कांग्रेस बहुमत में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा, अकेले इस सवाल ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि क्या कांग्रेस एकजुट हो कर चुनाव लड़ भी पाएगी?
चूंकि मृतप्राय: कांग्रेस को फिर से जिंदा करने में सचिन की अहम भूमिका है और प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाना है, इस कारण यह आमराय मानी जाती थी कि बहुमत मिलने पर वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे, मगर इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थकों ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि गहलोत भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे तो असंमजस पैदा होना ही था। हालांकि दोनों नेताओं ने कभी इस प्रकार का दावा नहीं किया कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं, वे तो यही कहते रहे हैं कि फैसला हाईकमान को करना है कि मुख्यमंत्री कौन होगा, या किसी को मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट किया भी जाएगा या नहीं, यह भी हाईकमान ही तय करेगा, मगर दूसरी श्रेणी के नेता और कार्यकर्ताओं की खींचतान के चलते यह संदेश जाने लगा है कि कांग्रेस एकजुट नहीं है।
वस्तुत: पिछले कुछ वर्षों का अनुभव ये रहा है कि राज्य की जनता ने बारी-बारी से दोनों दलों को सत्ता सौंपी है, इस कारण यह राय बन गई कि इस बार कांग्रेस सत्ता में आ सकती है। यह राय इसलिए और मजबूत हो गई,  क्यों कि इस बार वसुंधरा सरकार का अब तक कार्यकाल जनता के लिए सुखद नहीं रहा है। जिस उम्मीद में भाजपा को बंपर समर्थन दिया, उसके अनुरूप अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं। यहां तक कि वसुंधरा के इस कार्यकाल में पिछले कार्यकाल की तुलना में राजनीतिक व प्रशासनिक निर्णयों में मजबूती कम दिखाई दी। यह बात भाजपा के लोग भी जानते हैं, इस कारण वे भी लगभग ये मान बैठे हैं कि जनता इस बार पलटी खिला देगी। इस धारणा की वजह से कांग्रेसी भी मान बैठे हैं कि अब उनकी ही सरकार आने वाली है।  पायलट ने भी कांग्रेस में जान फूंकी है। भाजपा हाईकमान को भी यह आशंका है कि इस बार कांग्रेस बाजी न मार जाए। समझा जा सकता है जिस पार्टी की केन्द्र में बहुमत वाली सरकार हो और राज्य में भी तगड़े बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज हो, वह अगर सचिन पायलट को भाजपा में आने का लालच देती है तो इसका अर्थ ये है कि उसे अपने बूते चुनाव जीतने का भरोसा नहीं है।
तस्वीर का दूसरा रुख ये है कि कांग्रेस में एकजुटता की कमी के चलते वह धारणा धुंधली होती दिखाई दे रही है कि कांग्रेस सत्ता में लौटेगी। कांग्रेस  के राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडे व पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत तक यह बयान  दे चुके हैं कि कांग्रेस कार्यकर्ता यह मान कर न बैठ जाएं कि अगली सरकार कांग्रेस की होगी।
बात अगर कांग्रेस कार्यकर्ता की मन:स्थिति की करें तो वह इस बात को लेकर असमंजस में है कि अगर सरकार बनी तो मुख्यमंत्री कौन होगा? ऐसा असमंजस निचले स्तर पर नहीं, बल्कि से ऊपर से आया है। पूर्व प्रभारी कामथ कहते रहे कि अगला चुनाव सचिन के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा तो नए प्रभारी पांडे कहते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में कोई प्रोजेक्ट नहीं होगा और चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इस प्रकार के डिप्लामेटिक बयानों का राज क्या है, ये तो हाईकमान ही जाने, मगर समझा जा सकता है कि इसका असर कार्यकर्ता पर क्या पड़ता होगा? हालांकि कांग्रेस में एकजुटता की कमी तो नजर आ रही है, मगर कार्यकर्ता हताश हुआ है, ऐसा नहीं है।  यदि उसके मन में यह बात बैठ गई कि एकजुट हो कर मेहनत नहीं की तो सत्ता का सपना सपना ही रह जाएगा तो संभव है, वह एकजुट हो जाए। लेकिन फिलहाल इस प्रकार की खुसरफुसर शुरू हो गई है कि कांग्रेस का सत्ता में लौटना आसान नहीं है। विशेष रूप से इस वजह से कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जिस रणनीति के तहत अपना जाल फैलाने वाले हैं, उसे देखते हुए यह लगता है कि संघर्ष जबदस्त होने वाला है।

-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, मई 12, 2017

हटने की अफवाह के बावजूद वसुंधरा का ही दबदबा

तेजवानी गिरधर
नरेन्द्र मोदी भले ही वह कदीमी शख्स हैं, जिसकी लहर पर सवार हो कर भाजपा केन्द्र में सत्तारूढ़ हुई, राजस्थान में भी लोकसभा की सभी पच्चीस सीटों पर उनकी ही बदोलत भाजपा ने कब्जा किया, मगर राज्य में अब भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ही तूती बोलती है। और इसका सबसे बड़ा सबूत है कि ओम प्रकाश माथुर, जो कि मोदी के बेहद करीबी हैं, जिनकी रणनीति गुजरात, हरियाणा व उत्तरप्रदेश में कामयाब रही, उनकी हालत ये है कि राज्य में कोई भी भाजपा नेता व कार्यकर्ता उनके पास फटकने से भी एक बारगी कतराता है। वजह सिर्फ इतनी कि कहीं वसुंधरा मेडम नाराज न हो जाएं। नाराजगी की वजह ये कि वसुंधरा के रहते राज्य में मुख्यमंत्री पद का कोई भी नेता बर्दाश्त नहीं। हालांकि अपवाद स्वरूप पिछले दिनों शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव की ओर से माथुर का स्वागत समारोह गिनाया जा सकता है, मगर उसमें भी किस तरह से बड़े नेता किनारा कर गए, ये सब को पता है। यादव भी इसलिए खुल कर सामने आए क्योंकि वे वाया श्रीकिशन सोनगरा माथुर लॉबी में माने जाते हैं। जानकारी के अनुसार पार्टी के चंद लोगों ने बाकायदा सूची बना कर ऊपर भेजी गई कि कौन-कौन स्वागत करने पहुंचे थे। इसका सीधा सा अर्थ है कि उनके नाम रेखांकित किए गए होंगे।
जो कुछ भी हो, मगर जो व्यक्ति भाजपा का कद्दावर नेता हो, उससे अगर उसी की पार्टी की सरकार के रहते राज्य में कार्यकर्ता दूरी रखने को मजबूर हों तो वह चौंकाता है। खुद माथुर जब राजस्थान आते हैं तो उन्हें लगता होगा कि ये कौन सी दुनिया में आ गए। जिस पार्टी के वे कद्दावर नेता हैं, उसी के कार्यकर्ता मुंह फेर रहे हैं। पिछले दिनों उनके पुष्कर आगमन पर यही स्थिति हुई। हालांकि कहने भर को जरूर यह बात कही गई कि उनके आने की कोई सूचना नहीं थी, मगर सच ये है कि सब को पता था कि वे आने वाले हैं। अजमेर नगर निगम के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत जरूर अपने साथी हितेश वर्मा के साथ आए, मगर इसलिए नहीं कि वे अभी भाजपा में हैं ही नहीं।
राज्य में यह स्थिति पहली बार नहीं आई है। इससे पहले राजस्थान के एक ही सिंह कहलाने वाले भैरोंसिंह शेखावत भी जब उपराष्ट्रपति पद से निवृत्त हो कर राजस्थान लौटे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनकी पूरी जाजम समेट कर ताक पर रख दी थी। उनकी भी हालत ये हो गई थी कि वे राज्य में जहां कहीं भी जाते तो अपने स्वागत के लिए कार्यकर्ताओं को तरस जाते थे। लंबी और कठोर साधना के बाद हासिल मुकाम का यकायक खो जाना जीतेजी मरने के समान है। राजस्थान में आने के बाद काफी दिन तक तो शेखावत सार्वजनिक रूप से नजर ही नहीं आए। और आए तो वसुंधरा के डर से भाजपा के कार्यकर्ता उनसे दूर दूर ही रहते थे। स्थिति ये हो गई कि शेखावत अपनी ही सरकार को घेरने लग गए। इसी के साथ उनका राजनीतिक अवसान हो गया। इतना ही नहीं नरपत सिंह राजवी को भी केवल इसी कारण वसुंधरा राजे की टेड़ी नजर का शिकार होना पड़ा कि वे शेखावत के दामाद थे। इससे समझा जा सकता है कि वसुंधरा राजे किस शैली की राजनीतिज्ञ हैं। अपने इर्द गिर्द वे किसी को पनपने नहीं देतीं।
पिछले कुछ दिनों से भले ही इस प्रकार की अफवाह फैल रही है कि वसुंधरा को हटा कर माथुर को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, मगर फिलवक्त तो यही लगता है कि भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं में वसुंधरा का ही दबदबा है।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, मई 07, 2017

राजस्थान में जीत के लिए भाजपा अपनाएगी कई हथकंडे

तेजवानी गिरधर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर पर सवार भाजपा राजस्थान में किसी भी सूरत में सत्ता पर फिर काबिज होने के लिए कई हथकंडे अपनाएगी। आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति क्या होगी, यह भले ही अभी तक गोपनीय है, मगर भाजपा की ओर से साफ तौर पर इशारे आ रहे हैं कि वह तकरीबन डेढ़ साल पहले ही कमर कसना शुरू कर चुकी है।
असल में भाजपा को यह ख्याल में है कि मोदी लहर के बावजूद इस बार राजस्थान में एंटी एस्टेब्लिशमेंट फैक्टर भी काम करेगा। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश व पंजाब इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। विशेष रूप से राजस्थान के बारे में यह धारणा सी बन गई है कि यहां की जनता हर पांच साल बाद सत्ता की पलटी कर देती है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल उनके पिछले कार्यकाल की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर रहा है, इस कारण आम धारणा है कि मतदाता उनके चमकदार चेहरे के आकर्षण में नहीं आएगा। ऐसे में वह अभी से जीत की कुंडली बनाने में जुट गई है। इसी सिलसिले में वसुंधरा को हटा कर केन्द्र में ले जाने और अकेले मोदी के नाम पर चुनाव लडऩे के मानस का खुलासा पिछले दिनों मीडिया में हो रहा था। हालांकि वसुंधरा की ओर यही दावा किया जा रहा है कि अगला चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, मगर पार्टी कार्यकर्ता अभी असमंजस में हैं।
बहरहाल, जीत के प्रति भाजपा हाईकमान इतनी शिद्दत लिए हुए हैं कि पिछले दिनों मीडिया में यह खबर तक आ गई कि राजस्थान में भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट को अपने खेमे में शामिल करना चाहती है। बताया गया कि उन्हें बाकायदा ऑफर भी दी जा चुकी है कि उन्हें केन्द्रीय मंत्री बना दिया जाएगा। यद्यपि सचिन की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। भाजपा के इस हथकंडे से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक तो वह अपनी सेना के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है, तभी तो विरोधी के सेना नायक पर ही हाथ मारने की सोच रही है, दूसरा ये कि इसके लिए वह तोड़-फोड़ की पराकाष्टा भी पार करने को आतुर है। भाजपा जानती है कि पिछले विधानसभा चुनाव में रसातल में पहुंच चुकी कांग्रेस को सजीव करने के लिए सचिन ने एडी से चोटी का जोर लगा रखा है। भाजपा सोचती है कि अगर उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ऐन वक्त पर टक्कर में आ खड़े होने का डर दिखाया जाए तो कदाचित वे डिग भी जाएं। इससे यह तो स्पष्ट है कि भाजपा को अब सत्ता प्राप्ति के लिए दिग्गज कांग्रेसियों को अपनाने से भी कोई परहेज नहीं है। ज्ञातव्य है कि चुनाव से कुछ समय पूर्व ही उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा भाजपा में शामिल हो गई थीं। उसके सकारात्मक परिणाम भी आए।    भाजपा ऐसा ही प्रयोग राजस्थान में करना चाहती है। सचिन पर दाव भले ही दूर की कौड़ी लगता तो, मगर इससे इतना तो तय मान कर चलना चाहिए कि भाजपा निचले स्तर पर असंतुष्ट कांग्रेसी नेताओं को बड़े पैमाने पर तोडऩे का प्रयास करेगी।
भाजपा एक नया प्रयोग और करने जा रही है। वो यह कि हाशिये पर जा चुके पुराने नेताओं को भी जोत रही है। उसे डर है कि कहीं उपेक्षा का शिकार ऐसे नेताओं की निष्क्रियता नकारात्मक असर न डाले। जैसे ही यह फंडा सामने आया विस्तारक बनाए गए पुराने नेताओं में जोश आ गया कि  पार्टी अब उनकी कद्र कर रही है। उन्हें यह भ्रम भी हुआ कि यदि उन्होंने ठीक से काम किया तो टिकट की लॉटरी लग सकती है। और कुछ नहीं तो टिकट वितरण में तो उनकी भूमिका रहेगी ही। भ्रम होना ही था, उन्हें संघ के प्रचारक तरह विस्तारक की संज्ञा जो दे दी गई। भाजपा को अनुमान नहीं था कि ऐसा करके उसने अनजाने ही उनमें फिर से लालसा पैदा कर दी है। नतीजतन हाल ही जब जयपुर में विस्तारकों का दो दिवसीय अधिवेशन हुआ तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को कहना पड़ गया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। विस्तारक का काम केवल अपने आवंटित विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्रों पर जाकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना है। इसके अतिरिक्त विस्तारक टिकट अथवा किसी पद की लालसा न रखें। जाहिर तौर पर इससे विस्तारक हतोत्साहित हुए होंगे, मगर समझा जाता है कि पार्टी जरूर विचार करेगी कि उन्हें कैसी लॉलीपॉप थमाई जाए।
भाजपा की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव ये भी आया है कि जहां पहले यह कहा जा रहा था कि सत्तर साल से अधिक उम्र के नेताओं को टिकट नहीं दिया जाएगा, उसे बढ़ा कर अब पचहत्तर साल कर दिया गया है।  कदाचित सर्वे में यह तथ्य आया हो कि अगर सत्तर साल के नेताओं को संन्यास दे दिया गया तो बड़े पैमाने पर जीतने वाले प्रत्याशियों का अभाव हो जाएगा।
कुल मिला कर भाजपा ने अगले विधानसभा चुनाव की रणभेरी से बहुत पहले ही अपनी सेना को सुसज्जित करना शुरू कर दिया है।
-तेजवानी गिरधर
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तिवाड़ी ने दिखाई परनामी को हैसियत

वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी का यह कहना कि जब वे विधायक थे, तब परनामी राजनीति में कुछ नहीं थे, वे उस समय सिर्फ अगरबत्ती बेचते थे, इसके गहरे मायने हैं। प्रदेश अध्यक्ष के बारे में इतनी बेबाक टिप्पणी करने का अर्थ है कि तिवाड़ी आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं। इतना ही नहीं, इससे ये संकेत भी मिलते हैं कि पार्टी के भीतर कुछ न कुछ पक रहा है, वरना प्रचंड बहुमत के साथ सरकार चलाने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ खुल कर आने का दुस्साहस नहींं करते।
ज्ञातव्य है कि पार्टी लाइन से हट कर चल रहे जयपुर की सांगानेर सीट के वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी को राष्ट्रीय अनुशासन समिति की ओर से अनुशासनहीनता का नोटिस जारी किया गया है। समिति के अध्यक्ष गणेशीलाल ने यह कार्यवाही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी की शिकायत पर की है और दस दिन में जवाब मांगा है।
नोटिस की प्रतिक्रिया में तिवाड़ी और मुखर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी जिस दीनदयाल वाहिनी के गठन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व को मेरी अनुशासनहीनता की शिकायतें कर रहे हैं, उसका गठन 29 साल पहले सीकर में उस समय हो गया था, जब मैं विधायक था और परनामी राजनीति में कुछ नहीं थे। वे उस समय सिर्फ अगरबत्ती बेचते थे। उन्होंने कहा कि वे न तो डरेंगे और न ही झुकेेंगे। भ्रष्ट सरकार के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे। अपनी ही पार्टी की सरकार को भ्रष्ट करार देना कोई मामूली बात नहीं है। हालांकि एक समय में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने तत्कालीन वसुंधरा सरकार के खिलाफ मुहिम का आगाज किया था, मगर तब वसुंधरा बहुत मजबूत थीं। मजबूत भी इतनी कि हाईकमान से भी टक्कर ले रही थीं। मगर अब हालात पहले जैसे नहीं हैं। अब केन्द्र में भाजपा की सरकार है और हाईकमान बहुत मजबूत। ऐसे में तिवाड़ी का मजबूती के साथ ये कहना कि कुछ दिनों पहले मुझे दिल्ली में एक नेता ने कहा था कि आप राजस्थान में मौजूदा नेतृत्व को स्वीकार कर लो, सब ठीक हो जाएगा, लेकिन मैं नहीं माना, इसलिए अब नोटिस का डर दिखाया जा रहा है। मैं ऐसे नोटिस से डरने वाला नहीं हूं, गहरे अर्थ रखता है।
-तेजवानी गिरधर
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तिवाड़ी को दो साल से क्यों झेलते रहे?

पार्टी लाइन से हट कर चल रहे जयपुर की सांगानेर सीट के वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी को आखिर राष्ट्रीय अनुशासन समिति की ओर से अनुशासनहीनता का नोटिस जारी कर दिया। समिति के अध्यक्ष गणेशीलाल ने यह कार्यवाही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी की शिकायत पर की है और दस दिन में जवाब मांगा है।
नोटिस में गौर करने लायक बात ये है कि उसमें साफ तौर कहा गया है कि वे पिछले दो साल से लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों एवं पार्टी के विरुद्ध बयानबाजी करने में संलग्न हैं। पार्टी द्वारा आयोजित बैठकों में वे उपस्थित नहीं हो रहे और विपक्षी दलों के साथ मिलकर मंच साझा कर रहे हैं। इसके साथ ही नोटिस में यह भी बताया गया है कि वे समानांतर राजनीतिक दल का गठन करने के प्रयास में जुटे हैं।
सवाल ये उठता है कि दो साल तक पार्टी उनको क्यों झेलती रही? दो साल का वक्त बहुत होता है। इस दरम्यान अनेक बार उनकी गतिविधियों व बयानों से पार्टी की किरकिरी हो चुकी है। यदि भाजपा की सरकार सीमित बहुमत वाली होती तो भी समझ में आ सकता था कि पार्टी उनको खोने का खतरा मोल नहीं लेना चाहती, मगर भाजपा तो प्रचंड बहुमत के साथ सरकार चला रही है। केन्द्र में भी भाजपा सरकार है। ऐसे इक्का दुक्का नेता अगर पार्टी छोड़ कर चले जाएं या निकाल दिए जाएं तो बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। ऐसे में पार्टी को उनके बारे निर्णय करने में इतना वक्त क्यों लगा, यह चौंकाता तो है?
ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी हाईकमान काफी सोच विचार के बाद इस पार या उस पार वाली स्थिति में आया है। अभी चुनाव दूर हैं। अगर पार्टी को उनको खोना पड़ता है तो उनकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त वक्त है। अगर अब भी कार्यवाही नहीं की जाती है तो इससे अन्य असंतुष्टों के हौसले बुलंद हो सकते हैं।
बहरहाल, अब देखने वाली बात ये है कि घनश्याम तिवाड़ी क्या जवाब देते हैं और क्या पार्टी की अनुशासन समिति उनके जवाब से संतुष्ट होती है या नहीं। अगर उनको पार्टी से निकालने की नौबत आती है तो निश्चित रूप से राज्य में भाजपा के समीकरण में कुछ बदलाव आएगा। इसके अतिरिक्त यह भी साफ हो जाएगा कि कौन उनके साथ है और पार्टी के साथ। बाकी एक बात जरूर है कि आज जब कि पार्टी अच्छी स्थिति में है, उसके बाद भी तिवाड़ी ने जो दुस्साहस दिखाया है तो वह गौर करने लायक है।
ज्ञातव्य है कि भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी अपने बेटे अखिलेश तिवाड़ी के नेतृत्व में नई पार्टी दीनदयाल वाहिनी का गठन करने में जुटे हैं।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, मई 02, 2017

भाजपा विस्तारक कर पाएंगे संघ प्रचारकों की तरह सेवा?

भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक नया प्रयोग शुरू किया है, जिसके तहत पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए पार्टी के विस्तारकों को जिम्मेदारी दी जा रही है। परिकल्पना ये है कि जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में प्रचारक अपना घर छोड़ कर नि:स्वार्थ भावना से काम करते हैं, ठीक वैसे ही पार्टी के पुराने नेता बिना किसी राजनीतिक लाभ की कामना किए हुए पार्टी को जमीन पर मजबूत करें। कहने और बताने में लगता तो यह अच्छा है, मगर यह एक आदर्श स्थिति है, धरातल पर यह प्रयोग कामयाब होगा, इसको लेकर पार्टी के भीतर ही संशय है।
ज्ञातव्य है कि हाल ही जयपुर के केशव विद्यापीठ में भाजपा के प्रदेश भर के विस्तारकोंं का दो दिवसीय शिविर हुआ। इसमें मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उपदेश दिया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। विस्तारक का काम केवल अपने आवंटित विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्रों पर जाकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना है। इसके अतिरिक्त विस्तारक टिकट अथवा किसी पद की लालसा न रखें। इतना ही नहीं पहले चरण में लगातार छह माह तक आवंटित क्षेत्र में ही रहना पड़ेगा। कोई विस्तारक अपने गृह जिले में नहीं रहेगा। वसुंधरा ने जोर देकर यह इसलिए कहा कि वे जानती हैं कि जो भी व्यक्ति सक्रिय राजनीति में है या रह चुका है, वह बिना स्वार्थ के काम नहीं करेगा। करेगा तभी, जब उसकी एवज में उसे कुछ न कुछ मिले। बहरहाल, इसी के साथ विस्तारक बनाए गए पुराने नेताओं के सपनों पर पानी फिर गया। जब वे विस्तारक बनाए गए तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वे हाशिये पर नहीं हैं, बल्कि पार्टी उनकी कद्र कर रही है, मगर यदि बिना किसी लालच के काम करना है तो वह तो वे अपने कार्यकर्ता काल में कर चुके हैं, तो ऐसा विस्तारक का तमगा लगाने से क्या फायदा, अब तो राजनीतिक ईनाम की उम्मीद है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि भाजपा ही एक मात्र राजनीतिक संगठन है, जिसके बारे में ऐसी धारणा है कि उसका कार्यकर्ता घर की रोटी खा कर और अपनी जेब का पेट्रोल भाग-दौड़ करता है। विशेष रूप से संघनिष्ट कार्यकर्ता तो वाकई तन, मन और यथासंभव धन से सेवा कार्य करता है। यह कुछ हद तक सही है, मगर उसमें अब परिवर्तन आने लगा है। वो जमाना गया, जबकि पार्टी थी ही विपक्ष में। सत्ता व सत्ता का सुख एक सपना ही था। तब न तो पार्टी के पास इतना धन था कि वह कार्यकर्ताओं पर खर्च करे, और न ही पार्टी के नेता ऐसी स्थिति में थे। वह संघर्ष का दौर था। लेकिन अब जबकि पार्टी नेता सत्ता का स्वाद चख चुके हैं, कार्यकर्ता भी लाभ की उम्मीद करता ही है। ऐसे में सत्ता का तनिक सुख भोग चुके पुराने नेताओं से फोकट में घिसने की आशा करना बेमानी ही है।
बात अगर संघ के प्रचारकों की करें तो वे वाकई घर का परित्याग कर समर्पित भाव से जुटे रहते थे। मगर अब वह आदर्श स्थिति नहीं रही। हालांकि अब भी कुछ प्रचारक परंपरागत तरीके के ही हैं, मगर अनेक ऐसे भी हैं, जो पार्टी नेताओं की मिजाजपुर्सी पसंद करने लगे हैं। और उसकी एक मात्र वजह ये है कि भाजपा की असली ताकत संघ में ही मानी जाती है। अगर उसे रिमोर्ट कंट्रोल की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संघ की सिफारिश पर टिकटों का बंटवारा होता है। संघ प्रचारक व पदाधिकारी भी जानते हैं कि वे तो नींव की ईंट बने हुए हैं, मगर उनकी कृपा से सत्ता पर काबिज नेता सुख भोग रहे हैं। ऐसे में वे भी अतिरिक्त सम्मान की उम्मीद करते हैं।
पार्टी में यह सोच बनी है कि जिस प्रकार संघ के प्रचारक आदर्श जीवन जीते हैं, ठीक वैसे ही पार्टी के पुराने नेता भी नि:स्वार्थ जीवन जीएं।  मगर धरातल का सच ये है कि जिस नेता ने एक बार सत्ता का सुख भोग लिया या किसी साथी को सत्ता सुख भोगते हुए देख लिया, उसमें नि:स्वार्थ भाव पैदा होना कठिन है। मुख्यमंत्री वसुंधरा भले ही कितना भी जोर दें, मगर ऐसे विस्तारक तैयार करना बेहद कठिन है। वसुंधरा ने यह कह कर और पानी फेर दिया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। अगर ऐसा है तो टिकट का दावेदार भला उसे क्यों गांठेगे? अगर उनकी रिपोर्ट पर किसी को टिकट नहीं मिलेगा तो विधायक बनने बनने वाला उसका अहसान भी क्यों मानेगा?
ऐसा नहीं है कि वसुंधरा अथवा पार्टी के बड़े नेता इस स्थिति से अनभिज्ञ हैं। वे भलीभांति जानते हैं कि यह टास्क कठिन है। ऐसे में संभव है कि विस्तारकों को कोई न कोई लॉलीपॉप पर विचार किया जाए।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, अप्रैल 30, 2017

भाजपा बड़े पैमाने पर काटेगी मौजूदा विधायकों के टिकट?

हालांकि मोटे तौर पर यही माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी के नाम में अब भी चमत्कार है और मोदी लहर अभी नहीं थमी है, बावजूद इसके स्वयं भाजपा का मानना है कि एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर भी अपना काम करता है, जिसका ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश व पंजाब हैं। उत्तर प्रदेश में चूंकि भाजपा को बंपर बहुमत मिला, इस कारण उसे मोदी लहर की संज्ञा मिल गई, मगर सच्चाई ये थी कि मायावती व अखिलेश की सरकारों के प्रति जो असंतोष था, वहीं मोदी लहर में शामिल हो गया। उधर पंजाब में मोदी लहर नाकायाब हो गई, क्योंकि वहां एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर पूरा काम कर गया। ऐसे में पार्टी केवल इसी मुगालते में नहीं रहना चाहती कि चुनाव जीतने के लिए केवल मोदी का नाम ही काफी है।
सूत्रों के अनुसार भाजपा के अंदरखाने यह सोच बन रही है कि अगले साल होने जा रहे राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी मोदी फोबिया के साथ एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर काम करेगा। इसके अतिरिक्त विशेष रूप से राजस्थान के संदर्भ में यह तथ्य भी ध्यान में रखा जा रहा है कि यहां की जनता हर साल पांच साल बाद सत्ता बदल देती है। हालांकि मौजूदा मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे चूंकि क्षेत्रीय क्षत्रप हैं और उनका भी अपना जादू है, मगर समझा जाता है कि वह भी अब फीका पड रहा है। हालांकि भाजपा का एक बड़ा खेमा यही मानता है कि वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल संतोषजनक रहा है, मगर फिर भी यह आम धारणा बन गई है कि उनका मौजूदा कार्यकाल पिछले कार्यकाल की तुलना में अलोकप्रिय रहा है। इसकी एक वजह ये रही है कि इस बार भाजपा के पास ऐतिहासिक बहुमत था, इस कारण सभी विधायकों को संतुष्ट नहीं किया जा सका, जिसकी छाया आम जनता में भी नजर आती है। ऐसे में भाजपा के लिए चिंता का विषय है कि राजस्थान में सत्ता विरोधी पहलु से निपटने के लिए क्या किया जाए?
सूत्रों के अनुसार भाजपा हाईकमान की सोच है कि एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर तभी कमजोर किया जा सकता है, जबकि बड़े पैमाने पर पुराने चेहरों के टिकट काटे जाएं। चेहरा बदलने से कुछ हद तक पार्टी के प्रति असंतोष को कम किया जा सकता है। पार्टी के भीतर भी मौजूदा विधायक के विरोधी खेमे का असर तभी कम किया जा सकता है, जबकि चेहरा ही नया ला दिया जाए। पार्टी का मानना है कि विशेष रूप से दो या तीन बार लगातार जीते हुए विधायकों के टिकट काटना जरूरी है। हालांकि ऐसा करना आसान काम नहीं है, और उसकी कोई ठोस वजह भी नहीं बनती, मगर फार्मूला यही रखने का विचार है। बस इतना ख्याल जरूर रखा जा सकता है कि सीट विशेष पर यदि किसी विधायक का खुद का समीकरण बहुत मजबूत है तो उसे फिर मौका दिया जा सकता है।
भाजपा हाईकमान ने ऐसे पुराने चेहरों को भी हाशिये पर रखना चाहती है, जो कि पूर्व में विधायक, सांसद या प्रभावशाली रहे हैं। इसके लिए संघ प्रचारकों की तर्ज पर पार्टी में भी विस्तारकों की टीम तैयार की गई है। पिछले दिनों ऐसे विस्तारकों को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने साफ तौर पर कहा कि न तो वे टिकट मिलने की आशा रखें और न ही इस गलतफहमी में रहें कि उनके रिपोर्ट कार्ड पर टिकट दिए जाएंगे। उनका काम केवल पार्टी का जनाधार बढ़ाना है। इसका मतलब साफ है कि पार्टी इस बार बिलकुल नए चेहरों पर दाव खेलना चाहती है।
सूत्रों का मानना है कि अगर चेहरे बदलने के फार्मूले पर ही चुनाव लड़ा गया तो तकरीबन साठ से सत्तर फीसदी टिकट काटे जाएंगे, जिनमें मौजूदा विधायक और पिछली बार चुनाव हारे प्रत्याशी शामिल होंगे।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, अप्रैल 25, 2017

आडवाणी के फंसने से है सिंधियों को मोदी पर गुस्सा

हालांकि पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी सिंधी हैं, मगर वे अकेले सिंधी समाज के नेता नहीं हैं, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पृष्ठभूमि के होने की वजह से हिंदुत्व में ज्यादा यकीन रखते हैं। असल में वे सिंधी समाज से कहीं ऊपर उठ कर हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। बावजूद इसके सिंधी समाज उन्हें अपना नेता मानता है। इतना मानता है कि एक बार जब उन्होंने कह दिया कि सिंधी पुरुषार्थी हैं और उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं है तो उसके बाद सिंधी समाज ने कभी इस मांग पर जोर नहीं दिया। आज जब वे बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की अपील पर फिर से आपराधिक साजिश के आरोपी बन गए हैं तो सिंधी समाज में गुस्सा है। गुस्सा इस वजह से है कि भाजपा में हाशिये पर धकेल दिए जाने के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार बने तो ताजा मामला आड़े आता दिखाई दे रहा है।
यूं तो पिछले कुछ माह से सिंधियों के कुछ संगठन सोशल मीडिया पर आडवाणी को राष्ट्रपति बनाए जाने की मुहिम छेड़े हुए हैं ही, मगर ताजा हालात में वह मुहिम गुस्से में तब्दील होने लगी है। चूंकि सोशल मीडिया बेलगाम है, इस कारण यूं तो कई प्रकार की आपत्तिजनक टिप्पणियां पसरी पड़ी हैं, मगर उनका निचोड़ इन चंद लाइनों में पेश है:-
आडवाणी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए देशभर में राम रथ यात्रा की और उसका परिणाम ये है कि जिस पार्टी की संसद में केवल दो ही सीटें थीं, वह तीन सौ तक पहुंच गई। जब प्रधानमंत्री बनने की बारी आई तो कट्टर हिंदुत्व का चेहरा आड़े आ गया और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए। गोधरा कांड में जब वाजपेयी ने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की नसीहत दी तो आडवाणी ने उनको बचाया। मगर आज वही मोदी अहसान फरामोश हो कर आडवाणी के राष्ट्रपति बनने में आड़े आ रहे हैं। उनके इशारे पर ही सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर बाबरी मामले की फिर से सुनवाई के आदेश जारी करवा दिए। कैसी विडंबना है कि जिस शख्स ने पार्टी को खड़ा किया, आज वही अपनी पार्टी के शासन में अपराधी कर श्रेणी में खड़ा है, जबकि यूपीए के शासन काल में ऐसा नहीं हुआ।
सिंधी समाज आडवाणी को अपना आइकन मानता है। उनकी ही वजह से आज बहुसंख्यक सिंधी भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है, मगर भाजपा ने सिंधियों का इस्तेमाल केवल सत्ता हासिल करने के लिए किया है। सिंधी समाज को चाहिए कि वह मोदी व भाजपा को सबक सिखाए, ताकि उनकी अक्ल ठिकाने आए।
हालांकि सिंधी समाज का कोई सशक्त राष्ट्रीय संगठन नहीं है और अगर हैं तो भी वे कहीं न कहीं संघ या भाजपा विधारधारा के ही नजदीक हैं। ऐसे में कोई भी मोदी के विपरीत जा कर सांगठनिक रूप से आडवाणी के लिए दबाव नहीं बना पाएगा, मगर इस प्रकार की मुहिम आम सिंधियों की भावना को तो प्रदर्शित करती ही है। यह बाद दीगर है कि ऐसी मुहिम के कामयाब होने की संभावना कम ही है।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, अप्रैल 24, 2017

मोदी के अश्वमेघ यज्ञ को कोई बाधा मंजूर नहीं?

-तेजवानी गिरधर-
देश के इतिहास में पहली बार जिस प्रकार भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को ब्रांड बना कर सत्ता पर कब्जा किया है, उस सफल प्रयोग ने भाजपा की मानसिकता बना दी है कि भले ही कॉमन सिविल कोड, राम मंदिर, कश्मीर में धारा 370 सहित कट्टर हिंदुत्व के अन्य एजेंडे समानांतर रूप से कायम रखे जाएं, मगर यदि इस देश की जनता व्यक्तिवाद में विश्वास रखती है तो बेहतर ये है कि मोदी ब्रांड को ही आगे रखा जाए। भाजपा को समझ में आ चुका है कि वह जिन मुद्दों को लेकर वर्षों से चल रही है, वे प्रभावी तो हैं, मगर ऐसे वैचारिक आंदोलन सत्ता हासिल करने के लिए नाकाफी हैं। सालों के मंथन व उतार-चढ़ाव देखने के बाद अलादीन के चिराग से निकले मोदी ब्रांड को वह तब तक भुनाना चाहती है, जब तक कि वे मंद पड़ता न दिखाई दे। ऐसे ही इरादों को मन में रख कर भुवनेश्वर में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह कहा कि अभी पार्टी अपने चरम पर नहीं पहुंची है और स्वर्णिम काल तब आएगा जब पूरे देश में पंचायत से लेकर हर प्रांत एवं संसद तक उसका शासन होगा।
तेजवानी गिरधर
ये इरादे यही इंगित करते हैं कि भाजपा उन राज्यों में भी अपनी दमदार उपस्थिति चाहती है, जहां वह सत्ता से दूर है। ओडिशा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी का आयोजन भी इसी बात को रेखांकित करता है।
असल में हाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा को जिस फार्मूले से सफलता मिली, उसके बाद उसने तय कर लिया है कि एक तो मोदी ब्रांड को ज्यादा से ज्यादा चमकाया जाए और दूसरा ये कि अगर जीत के लिए घोर विरोधी कांग्रेस के नेता भी पार्टी में शामिल करने पड़ें तो उससे परहेज न किया जाए। लब्बोलुआब, मोदी के अश्वमेघ यज्ञ में उसे कोई बाधा मंजूर नहीं। न पार्टी के भीतर की और न ही बाहर की। यहां तक कि उसे पार्टी के क्षेत्रीय क्षत्रप भी मंजूर नहीं। उन्हें भी ताश के पत्तों की तरह फैंट रही है। गोवा के क्षत्रप मनोहर पर्रिकर को केन्द्र में बुला कर रक्षा मंत्री बनाना और जरूरत पडऩे पर वापस गोवा का मुख्यमंत्री बनाना इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। बात राजस्थान की करें तो श्रीमती वसुंधरा राजे भी तो क्षेत्रीय क्षत्रप हैं। प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता का संचालन करने वाली पार्टी की चमकदार चेहरे वाली वसुंधरा राजे तक को यहां से हटा कर केन्द्र में ले जाने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। मोदी के नाम पर जीत की शिद्दत कितनी मजबूत है, उसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि एंटी इंकंबेंसी के चलते जरा सी चूक से कहीं सत्ता हाथ से न निकल जाए, वह राजस्थान में अगला विधानसभा चुनाव मोदी के नाम पर ही लडऩे का मानस बना चुकी है।
इतना ही नहीं, अगर देश की राजधानी से इस प्रकार की खबरें आती हैं कि उसने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट तक को भाजपा में शामिल होने पर केन्द्रीय मंत्री पद ऑफर किया है तो समझा जा सकता है कि सत्ता के लिए उसे घोर विरोधियों को भी अपने भीतर समा लेने से कोई गुरेज नहीं। सत्ता के विस्तार के लिए अश्वमेघ यज्ञ इसी का तो नाम है। ऐसा प्रयोग उसने उत्तर प्रदेश में भी किया था। वहां की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा को उनके कांग्रेस में तनिक असंतुष्ट दिखाई देते ही तुरंत हाथ मारा। कदाचित रीता बहुगुणा को भी हालात के मद्देनजर कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में जाना ज्यादा फायदे का सौदा लगा। कुछ इसी प्रकार सचिन को वह यह डर दिखा कर कि कहीं उनकी सारी मेहनत के बाद भी अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना दिया जाए, तो क्या करेंगे, बेहतर ये है कि भाजपा में चले आने का निमंत्रण दे रही है। जानकारी के अनुसार इसी कड़ी में महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा व नारायण राणे पर डोरे डाले जा रहे हैं।
बात अगर विपक्ष की करें तो वह मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित है। एक के बाद एक प्रमुख विपक्षी नेता भाजपा के खिलाफ एकजुट होने को वक्त की जरूरत बता रहे हैं। स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश में भी बिहार की तरह गठबंधन बनने के आसार बढ़ गए हैं। पहले मायावती ने ऐसे किसी गठबंधन की संभावना को रेखांकित किया और फिर अखिलेश यादव ने भी। वैसे इस प्रकार की एकजुटता देश के लोकतंत्र के लिए बेहतर है। क्षेत्रीय दलों की भीड़ के कारण केन्द्र व राज्यों में ब्लैकमेलिंग के अनेक उदाहरण सामने हैं। हालात अगर देश को द्विदलीय राजनीतिक व्यवस्था की ओर ले जाते हुए दिख रहे हैं, तो यह राजनीति के हित में है। राजनीतिक दलों की भारी भीड़ का कोई औचित्य नहीं। इसमें हर्ज नहीं कि समान विचारधारा वाले दल गोलबंद हो जाएं, लेकिन यह गोलबंदी विचारों के आधार पर होनी चाहिए।