तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, मार्च 30, 2026

श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंख क्यों?

आपने देखा होगा कि भगवान श्रीकृष्ण के सभी चित्रों में सिर पर मोर पंख होता है। क्या कभी ख्याल आया कि ऐसा क्यों? वस्तुतः श्रीकृष्ण के सिर पर लगा मोर पंख केवल सजावट नहीं है, इसके पीछे गहरा धार्मिक, प्रतीकात्मक, दार्शनिक और प्राकृतिक अर्थ निहित है। परंपरा, पुराण, लोककथा और मनोविज्ञान, चारों स्तर पर इसके सुंदर अर्थ मिलते हैं। एक कथा के अनुसार एक दिन गोपियां श्रीकृष्ण के लिए फूल चुन रही थीं, ताकि वे उनके लिए सुंदर मुकुट बना सकें। श्रीकृष्ण यह देखकर मुस्कुरा उठे और बोले, “मेरे लिए इतने सुंदर फूल क्यों?” गोपियां बोलीं, “क्योंकि आप हमें प्रिय हैं।” कृष्ण ने उत्तर दिया, “जो भी बिना अहंकार के प्रेम देता है, मैं वही पहनता हूं।” तभी पास खड़ा मोर अपना सुंदर पंख गिरा देता है। श्रीकृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर लगा लिया। इसी क्षण से मोरपंख उनका प्रिय अलंकार बन गया। कथा है कि मथुरा-वृंदावन में मानसून आने पर मोर प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे। श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी बजानी शुरू की। बांसुरी की ध्वनि से मोर इतना मोहित हुए कि नाचते-नाचते उन्होंने अपना सुंदर पंख कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। कृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर रख कर कहा, “यह मेरे मित्र का प्रेम है।” इसलिए उन्हें ‘मोर मुकुटधारी’ कहा जाता है।

ज्ञातव्य है कि पुराणों में मोर पंख को शुभ माना गया है। मोर पंख में तीन आंखों जैसे चिह्न होते हैं, जो कि ज्ञान, कर्म और भक्ति के प्रतीक हैं। मोर पंख सात रंगों से बना है, जो सात चक्रों और सात भावों का प्रतीक है। इसलिए इसे धारण करना धर्म, सौंदर्य और संतुलन का चिन्ह माना जाता है। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि श्रीकृष्ण अपने सिर पर वनमालाएं, वनफूल, तथा मोरपंख का अलंकार धारण करते थे। यह उनके साधारण, सहज, प्रकृति के निकट और सबके मित्र होने का संकेत है।

एक अन्य कथा कहती है कि जब कंस ने कृष्ण की पहचान करने के लिए दूत भेजे, तब नंदगांव के लोगों ने कृष्ण के सिर पर मोरपंख लगाया, ताकि वे साधारण ग्वालबाल की तरह लगें। यही ‘वेशभूषा’ बाद में उनकी अलंकार-परंपरा बन गई। मोरपंख का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मोर पंख जितना सुंदर है, उतना ही हल्का, इसके पीछे यह शिक्षा दी जाती है कि सुंदरता का अहंकार नहीं होना चाहिए। भारतीय परंपरा में मोर पंख को नजर दोष हटाने वाला, सकारात्मक ऊर्जा देने वाला और दिव्य कंपन पैदा करने वाला माना गया है। यही वजह है कि इसे लोग घर के मंदिर में रखते हैं। मोर पंख में सकारात्मक ऊर्जा की वजह से ही तांत्रिक व ओझा झाडफूंक के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसी प्रकार जैन संतों की “पिच्छी” (या पिच्छिका) एक अत्यंत पवित्र और अहिंसक उपकरण है। यह मोर के गिरे हुए पंखों से बनाई जाती है, केवल स्वाभाविक रूप से झड़े हुए पंख, न कि किसी मोर को नुकसान पहुंचा कर। दिगम्बर और श्वेताम्बर परंपराओं में इसके आकार-विन्यास में कुछ अंतर हो सकते हैं, पर सामग्री मोरपंख ही होती है। जैन मुनि इसे अहिंसा के लिए प्रयोग करते हैं, जैसे बैठने से पहले छोटे जीवों को हटाने हेतु ताकि अनजाने में हिंसा न हो।

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