पुराणों एवं शास्त्रों में पक्षियों से बात करने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। जब रावण सीता का हरण कर रहा था, तब गरुड़वंशी पक्षी जटायु ने रावण से लड़ते हुए राम को सीता का संदेश दिया। राम ने जटायु से बात भी की। उन्होंने कहा कि हे पक्षिराज, आपने पिता का धर्म निभाया। यह संवाद मानव और पक्षी के बीच हुआ माना गया। गरुड़ (विष्णु का वाहन) पक्षियों के राजा हैं। वे देवताओं, ऋषियों और स्वयं भगवत्कथाओं में संवाद करते हैं। गरुड़ पुराण में गरुड़ और विष्णु के बीच लम्बा संवाद है। इसी प्रकार शुकदेव (शुक = तोता) महर्षि व्यास के पुत्र थे। कहा जाता है कि वे तोते के रूप में ज्ञान सुनते थे और अर्थ समझते थे। भागवत पुराण में शुकदेव-व्यास संवाद आता है।
कहा जाता है कि राजा भोज ने एक चिड़िया से बात की थी, जो भविष्यवाणी करती थी। श्राद्ध के समय कौवे को पितर की ओर से संदेशवाहक मानते है। पुराणों में कौवे को भी यमदूत कहा गया है। सवाल उठता है कि पक्षियों से संवाद क्या वास्तविक था या प्रतीकात्मक? वस्तुतः पक्षी से बात करना मनुष्य के उच्च चेतना स्तर को दर्शाता है। साधक जब एकाग्रता, योग या अध्यात्मिक स्थिति में पहुंचता है, तब प्रकृति की भाषा समझ सकता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार संभवतः ऋषि-मुनि पक्षियों की ध्वनि, दिशा, उड़ान के संकेतों और व्यवहार से अनुमान लगाते थे, जिसे बाद में “संवाद” के रूप में वर्णित किया गया। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मनुष्य प्रकृति से जुड़कर अपने मन की बात को पक्षियों के व्यवहार में उत्तर के रूप में महसूस करता है।
कुल मिला कर पुराणों में पक्षियों से बात करने का तात्पर्य प्रकृति से गहरे सामंजस्य, अंतर्ज्ञान और उच्च आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता है। यह शाब्दिक कम, और संकेतात्मक एवं योगिक अधिक है। अर्थात
पक्षी बात तो करते हैं, पर मनुष्य उसे सीधे भाषा की तरह सुन-समझ नहीं सकता। उनकी ध्वनियां (चहकना, सुर, पुकार, चेतावनी आदि) एक प्रकार की संचार प्रणाली होती हैं, पर वह मानव भाषा जैसी संरचना वाली नहीं होती। पक्षी अपनी आवाजों से कई तरह की बातें व्यक्त करते हैं। जैसे मधुर चहक से साथी को आकर्षित करना, क्षेत्र घोषित करना, बिल्ली, बाज आदि की ओर से तेज चेतावनी स्वर कर खतरे की सूचना देना। आपने देखा होगा कि जब किसी कौए की मृत्यु होती है तो आस पास के सभी कौए एकत्र हो कर आसमान में विचरण करते हुए चेतावनी के स्वर निकालते हैं। अन्य पक्षी भी इस तरह के चेतावनी सूचक स्वर निकालते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या पक्षी की आवाज क्या मनुष्य समझ सकता है? इसका उत्तर यह है कि सुर और लय को सुन कर उसके भाव का अनुमान लगा सकता है, सटीक मतलब नहीं, मनुष्य पूर्ण अर्थ नहीं समझ पाता।
वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि कुछ पक्षी जैसे तोता, मैना मानव ध्वनि की नकल तो कर सकते हैं, पर यह समझ आधारित नहीं, प्रशिक्षण आधारित नकल होती है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के अध्ययनों में पाया गया कि कुछ पक्षी अलग-अलग शिकारी के लिए अलग चेतावनी स्वर देते हैं, पर मनुष्य इसे सीधे नहीं समझ सकता, सिर्फ शोध द्वारा पता चलता है। आपको जानकारी होगी कि तोता मानव भाषा बोल सकता है, पर बोलते वक्त अर्थ समझे बिना। लब्बोलुआब मनुष्य पक्षियों की भाषा नहीं सीख सकता, क्योंकि वह लय, आवृत्ति और ध्वनि पैटर्न का सिस्टम है, शब्दों का नहीं। पक्षी आपस में बातें करते हैं मगर अपनी खुद की पक्षी भाषा में।
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