ज्योतिष पर मुंह बनाने वाले मूढ़मति लोगों को सूर्य सिद्धांत को पढ़ लेना चाहिए, जिसमें न केवल पृथ्वी बल्कि सौरमंडल के ग्रहों का नियमन करने वाली गतियों, उनके प्रभाव आदि का विस्तार वैज्ञानिक आधार पेश किया गया है। लोग जिस न्यूटन का नाम लेते नहीं थकते, उसे भास्कराचार्य ने पहले ही सिद्ध कर दिया था। एक बार आप आर्यभट्ट, वराहमिहिर द्वारा बनाई गई वेधशालाओं के दर्शन ही कर लें, तो ज्योतिष गणना की सटीकता और भारतीय विज्ञान के मुरीद हो जाएंगे। आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने ज्योतिष का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किए। भास्कराचार्य ने न्यूटन से बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था, जिसे उन्होंने अपने ग्रंथ सिद्धांतशिरोमणि में प्रस्तुत किया है। आकृष्ट शक्ति च महीतया, स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या,
अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, जिससे वह अपने आस-पास की वस्तुओं को आकर्षित करती है।
आज से करीब दो हजार साल पहले वराहमिहिर ने 27 नक्षत्रों और 7 ग्रहों तथा ध्रुव-तारे को वेधने के लिए एक बड़े जलाशय में स्तंभ का निर्माण करवाया था, इसकी चर्चा भागवतपुराण में है, स्तंभ में सात ग्रहों के लिए सात मंजिलें और 27 नक्षत्रों के लिए 27 रोशनदान काले पत्थरों से निर्मित करवाए थे, इसके चारों तरफ 27 वेधशालाएं मंदिरों के रूप में बनी थीं।
अतः ज्योतिष की सार्थकता और सटीकता पर आंखें बंद करके विरोध करना अज्ञानी या अर्द्धज्ञानी का काम है। इसके पहले आपको वेदों, पुराणों, ज्योतिष शास्त्र का समझें। खास बात, जो लोग ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते, उनको अधिकार भी नहीं की पंचांग की गणना के आधार पर निर्धारित किए जाने वाले होली, दीपावली, बश्चों के नाम, शादियों के मुहूर्त आदि को मानें।
आइये, अब दूसरा पक्ष जानते हैं। रीयल एस्टेट के जानकार रमेश टेहलानी ने एक पोस्ट में अपना मन्तव्य जाहिर किया है कि किसी समय में ज्योतिष सलाह कार्य करने के बहुत बाद में अनुभव किया कि ज्योतिष का असर उन्हीं पर होता है, जो इस पर विश्वास करते हैं। ज्योतिष न मानने वालो पर ग्रहों का कोई असर नहीं पड़ता। वे बताते हैं कि जब वे 17 साल के थे, तो ज्योतिष में गहरी रुचि हो गई थी। उन्होंने कई किताबें पढ़ीं और अनुभवी ज्योतिषियों से मिले। जब वे 18 की उम्र के थे, उस समय उनकी आय का स्त्रोत ज्योतिष सलाह कार्य था। इसी आय से उन्होंने एमबीए किया और फिर बैंक में नौकरी लगी।
उनकी बात को अनुभवसिद्ध मान लिया जाए तो भी सवाल उठता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जो ज्योतिष को नहीं मानते, उन पर ग्रहों का असर नहीं पडता? प्रकृति निरपेक्ष है। ग्रह निरपेक्ष होते हैं। वे उन्हें मानने या न मानने वालों पर समान रूप से असर डालते होंगे। जैसे सूर्य सभी पर समान रूप से तपिश डालता है, भला ऐसे कैसे हो सकता है कि उसे न मानने वाला उस तपिश से बच सकता है? बावजूद इसके अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा है कि ज्योतिष न मानने वालों पर ग्रह असर नहीं डालते तो जरूर कोई मर्म होगा। एक उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करते हैं। जैसे कई लोग अमुक दिन पर दाढी-बाल नहीं कटवाते, और ऐसे भी हैं, जो हर दिन दाढी-बाल कटवाते हैं, उन पर अमुक ग्रहों का असर क्यों नहीं पडता? हमारे यहां अधिसंख्य सैनिक प्रतिदिन दाढी बनाते हैं, उन पर ग्रह कुपित क्यों नहीं होते? एक बात और। ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि हस्तरेखाओं में भले ही कुछ भी लिखा हो, प्रबल कर्म से उनको बदला जा सकता है। इसके अनेक उदाहरण भी मौजूद हैं।
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