आधुनिक औद्योगिक डेयरी सिस्टम में नैतिक चिंता बढ़ जाती है। कई बडी डेयरियों में बछड़े को जन्म के कुछ दिन बाद अलग कर दिया जाता है। उसकी हिस्सेदारी सीमित या कभी-कभी कम कर दी जाती है। गाय लगातार गर्भाधान के चक्र में रखी जाती है। यह व्यवस्था कई लोगों को अनैतिक लगती है। यही कारण है कि कई लोग दूध-उद्योग को मांसाहार जैसा शोषण बताते हैं।
एक सवाल यह कि क्या दूध को मांसाहार की श्रेणी में रखा जा सकता है? कुछ लोग उसे भी मांसाहार से जोडते हैं। कई लोग दूध को मांसाहार मानते हुए दूध से बने सभी उत्पादों यथा दही, पनीर व घी आदि का सेवन नहीं करते। यह दो तरह से देखा जाता है। एक धार्मिक-परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार हिंदू, जैन, बौद्ध परंपराओं में दूध को सतोगुणी, शाकाहारी माना गया है। आयुर्वेद में दूध को ओज-वर्धक बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों में दुग्ध-उत्पादों को अहिंसक माना गया है, जब बछड़े को उसका हिस्सा मिलता है।
आधुनिक नैतिक-वीगन दृष्टिकोण में दूध को मांसाहार नहीं, लेकिन पशु-शोषण का हिस्सा अवष्य कहा जाता है। उनका तर्क है कि यदि पशु का दूध मनुष्य ले रहा है, तो वह किसी स्तर पर स्वार्थपूर्ण हस्तक्षेप है। उपयोगकर्ता किस दृष्टिकोण को स्वीकार करता है, यह उसकी संवेदनशीलता और तर्कशक्ति पर निर्भर करता है।
कुल मिला कर हम इस निर्णय पर पहुंच सकते हैं कि प्रकृति ने दूध बछड़े के लिए उत्पन्न किया है। यदि बछड़े को पूरा दूध मिले और अतिरिक्त ही मनुष्य ले, तो यह शोषण नहीं बनता। औद्योगिक डेयरियों में यह संतुलन अक्सर बिगड़ जाता है, यहीं से नैतिक प्रश्न उठते हैं। औद्योगिक पशु-उत्पीड़न के संदर्भ में इसमें आपत्ति की गुंजाइश है। यदि कोई व्यक्ति दूध पीना चाहता है और साथ ही नैतिकता भी बनाए रखना चाहता है, तो यह उपाय अपनाए जा सकते हैं- स्थानीय, देसी, छोटे डेयरी किसानों से दूध लिया जाए, जहां बछड़ा प्राथमिकता पाता है। देशी नस्ल की गायों का दूध, जहां उत्पादन स्वाभाविक रूप से सीमित और प्राकृतिक होता है।
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