तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शनिवार, अगस्त 16, 2014

नटवर का सोनिया की निजी जानकारी सार्वजनिक करना कितना उचित?

खांटी कांग्रेसी नेता रहे नटवर सिंह ने अपनी किताब के जरिए जिस प्रकार सोनिया-राहुल की निजी जानकारियां सार्वजनिक की हैं, उससे यकायक यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या राजनीति में इस प्रकार विमुख होने के बाद किसी की निजी जिंदगी का खुलासा किया जाना उचित है, जिससे आपके अंतरंग संबंध रहे हों? क्या इसे सामान्य नैतिकता की सीमा लांघने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए? जिस परिवार के रहमो-करम पर आप इतनी ऊंचाइयां छू पाए, उससे अलग होने के बाद सारी मर्यादाएं ताक पर रख देनी चाहिए?
हो सकता है कि नटवर सिंह को लग रहा हो कि उन्होंने कोई बड़ा मीर मार लिया है, मगर इससे राजनीतिक लोगों का चरित्र किस हद तक गिर सकता है, उसका तो अनुमान होता ही है। ऐसा करके वे भले ही कांग्रेस विरोधियों की नजर में चढ़ गए हों, और उसका ईनाम भी पा जाएं, मगर आमजन की नजर में वे उच्च राजनीतिक नेता होते हुए भी निम्न स्तरीय हरकत करने वाले माने जाएंगे। असल में नटवर सिंह ने कोई नई खोज नहीं की है, जिसके लिए खुद की पीठ थपथपाएं। यदि उन्हें सोनिया के बारे में इतनी अंतरंग जानकारी है तो वह इसीलिए ना कि वे उनके करीब थे, वरना उन्हें कैसे पता लगा कि राहुल ने सोनिया के प्रधानमंत्री बनने पर उनकी हत्या किए जाने की आशंका के चलते प्रधानमंत्री पद न ग्रहण करने की जिद की थी। स्वाभाविक रूप से घनिष्ठ संबंधों के चलते इस विषय पर सोनिया व राहुल ने उनके चर्चा की थी। उन्हें ये अनुमान थोड़े ही रहा होगा कि भविष्य में यदि संबंध खराब होंगे तो नटवर सिंह इस तरह से पीठ में छुरा घोंपने को आतुर हो जाएंगे। अंतरंग संबंधों का एक और उदाहरण भी हमारे सामने है। फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के बारे में सब को पता है कि उनका परिवार नेहरू परिवार के कितना करीब था। वे स्वयं भी राजीव गांधी के करीबी रहे। बाकायदा कांग्रेस के टिकट पर सांसद भी बने। मगर जब संबंध टूटे तो उसके बाद शायद ही उन्होंने निजी जिंदगी का बहुत खुलासा किया हो। जाहिर सी बात है कि वे राजनीतिक शख्स नहीं हैं, इस कारण उनका दिमाग इस ओर नहीं चला। इससे यह स्थापित होता है कि राजनीति इतनी गंदी चीज हो चली है, जिसमें किसी पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। नटवर सिंह के खुलासे से सोनिया-राहुल और कांग्रेस को क्या परेशानी आएगी, ये तो पता नहीं मगर फिलवक्त लोगों को चटकारे लेने का मौका तो मिल ही गया है।
सिक्के का दूसरा पहलु ये भी है कि जब भी कोई ऊंचाइयों पर पहुंचता है, और खास कर जब उसका जीवन सार्वजनिक रूप में महत्व रखता है तो उसकी हर बात में लोगों की रुचि होती ही है। नैतिक रूप से भले ही ये ठीक नहीं लगता, मगर ऊंचे लोगों की निजी बातें अमूमन जगजाहिर हो ही जाती है। और स्वाभाविक रूप से उसे उनके निजी लोग की जगजाहिर किया करते हैं।
असल में नटवर सिंह ने जानबूझ कर यह सब कुछ किया है। उनका मकसद है कि किसी भी रूप में कांग्रेस से निकाल जाने के बाद उसका बदला लिया जाए। राजनीति के जानकार इसे इस रूप में लेते हैं कि छाती पर शहीदी तमगा और विचार के तौर पर त्याग का मुकुट लगा कर ही सोनिया गांधी ने कांग्रेस को खड़ा किया, सत्ता तक पहुंचाया लेकिन नटवर सिंह ने जिस तरह राजीव गांधी की हत्या के साथ श्रीलंका को लेकर राजीव गांधी की फेल डिप्लोमेसी और सोनिया गांधी के त्याग के पीछे बेटे राहुल गांधी को मां की मौत का खौफ के होने की बात कही है, उसने गांधी परिवार के उस प्रभाव को भी खत्म नहीं तो कम तो किया ही है। अब तक इसी प्रभाव के आसरे कांग्रेस खड़ी रही है। नटवर ने कांग्रेस की उस राजीनिति में भी सेंध लगा दी है, जो बीते दस बरस से तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं की तुलना में सोनिया गांधी को अलग खड़ा करती रही।
ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या नटवर के खुलासे के बाद सोनिया का आभा मंडल टूट जाएगा? क्या फिर उस पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा? यदि टूटा तो लौटेगा कैसे? क्या सोनिया के किताब लिखने से वह वापस जुड़ पाएगा? सवाल ये भी कि क्या सोनिया की राजनीतिक साख यहां खत्म होती है और अब कांग्रेस को तुरुप का पत्ता प्रियंका गांधी को चलने का वक्त आ गया है। या फिर राहुल गांधी को अब कहीं ज्यादा परिपक्व तरीके से सामने आकर उस राजनीतिक लकीर को आगे बढ़ाना होगा, जहां उनके कहने पर सोनिया गांधी पीएम नहीं बनी और राहुल के खौफ को अपनी आत्मा की आवाज के आसरे सोनिया गांधी ने त्याग की परिभाषा गढ़ी।
-तेजवानी गिरधर

तो सेलिब्रिटी को सांसद बनाते ही क्यों हैं?

जनता के बीच से चुने गए सांसदों का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है
इन दिनों क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर और सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रेखा के संसद में लगातार अनुपस्थित रहने को लेकर खासी गरमागरम बहस हो रही है। आप याद कीजिए कि जून 2012 में जब सचिन तेंदुलकर ने सांसद की शपथ ली थी तो उन्होंने कहा था, मैं संसद में खेल से जुड़े मुद्दे उठाना चाहता हूं। जाहिर है ऐसा आज तक तो हुआ नहीं कि सचिन तेंदुललर कोई मुद्दा उठाये या रेखा ने कभी कुछ कहा भी हो। ऐसे में कोई सांसद कहता है कि ऐसे सेलिब्रिटी सदस्यों को हटा देना चाहिए तो कोई कहता है कि सांसदों की न्यूनतम उपस्थिति अनिवार्य की जानी चाहिए। बहस का एक बिंदु ये भी है कि आखिर ऐसी सेलिर्बिटी को संसद में भेजा ही क्यों जाता है, जिनके पास संसद में उपस्थित होने का समय और देश के ज्वलंत विषयों पर अपनी राय रखने की रुचि ही नहीं है।
असल में संविधान में विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों को राज्यसभा में मनोनीत करने की व्यवस्था की ही इस कारण गई कि वे गैर राजनीतिक होने के कारण चुनाव लड़ कर संसद में नहीं आ सकतीं, मगर सोसायटी के अन्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए, ताकि उनकी भी भागीदारी हो। मगर अमूमन पाया ये गया है कि ऐसी सेलिब्रिटी न तो संसद आना जरूरी समझती हैं और न ही देश के जरूरी विषयों पर अपनी कोई राय रखती हैं। उन्होंने इसे केवल स्टेटस सिंबल बना रखा है और उससे होने वाले लाभ उठाती रहती हैं। ऐसे में यह सवाल उचित ही है कि ऐसी हस्तियों को संसद में रखने से क्या फायदा, जिनकी संसद में कोई रुचि ही नहीं है। माना कि राष्ट्रपति ने सरकार की राय पर ऐसी हस्तियों को सम्मान देने की खातिर उनका मनोनयन किया है, मगर उन्हें भी तो संसद का सम्मान करना चाहिए।
सिक्के का एक पहुल ये भी हस्तियों की लोकप्रियता ही इतनी है कि उन्हें एक अदद सांसद बनने की जरूरत नहीं है। उनका क्रेज ही इतना अधिक है कि खुद सांसद व मंत्री भी उनकी एक झलक पाना चाहते हैं। याद कीजिये तो 2012 में संसद के भीतर रेखा और सचिन तेंदुलकर को लेकर संसद का कुछ ऐसा ही हाल था। कैमरे की चमक। सितारों की चकाचौंध। हर नजर रेखा और सचिन की तरफ। एकबारगी तो ऐसा लगा कि संसद की चमक भी इनके सामने फीकी है। भला ऐसी हस्तियों को सांसद बनने की जरूरत ही क्या है? और अगर बन जाती हैं तो फिर संसद में अनुपस्थित न हो कर काहे को अपनी फजीहत करवाती हैं?
बहरहाल, चूंकि सांसदों की संसद में सक्रियता का मुद्दा इस बहाने उठ ही गया है तो बातें और भी उठने लगी हैं। वो ये कि जो सांसद सीधे जनता अथवा विधायकों के माध्मम चुन कर आते हैं, उनमें से भी कई कमोबेश ऐसा ही हाल है। सैकड़ों सांसद ऐसे हैं, जिन्हें जनता ने चुना है, लेकिन वे न तो कोई सवाल पूछते हैं, न चर्चा में शामिल होते है। आडवाणी और करिया मुंडा समेत समेत बीजेपी के दर्जनभर से ज्यादा सांसद ऐसे हैं, जिनकी हाजिरी सौ फीसदी रही, लेकिन न तो चर्चा में हिस्सा लिया, न ही कोई सवाल खड़ा किया। पिछली लोकसभा में कांग्रेस के जाने-पहचाने चेहरे अजय माकन ने पांच साल के दौरान न कोई सवाल पूछा, न ही किसी चर्चा में शामिल हुये।  इसी कड़ी में हालांकि सोनिया व राहुल गांधी का नाम भी लिया जाता है, मगर उन पर इसलिए अंगुली नहीं उठाई जा सकती क्योंकि वे ही तो कांग्रेस के रुख की नीति बनाते हैं। वे न भी बोले तो अन्य कांग्रेसी सांसदों का बोलना पर्याप्त है।
हाल ही यूपी की कानून व्यवस्था को लेकर यूपी के सीएम की सांसद पत्नी डिंपल यादव संसद में बोल रही थी, लेकिन 15 लोकसभा में डिंपल यादव ने कुछ कहा ही नहीं। यही हाल कांग्रेस के सी पी जोशी और वीरभ्रद्र सिंह का भी रहा। हाजिरी 95 फीसदी, लेकिन कभी संसद में नहीं बोले।  औसत निकालेंगे तो हर सत्र में सौ से ज्यादा सांसद ऐसे होंगे, जो संसद में आते हैं और चले जाते हैं। ताजा आंकड़ों को देखें तो मौजूदा लोकसभा में अभी तक 72 सांसदों की कोई भागेदारी ही नहीं है। 101 सांसदों ने किसी चर्चा में हिस्सा ही नहीं लिया है। 198 सांसदों ने कोई सवाल नहीं उठाया है।
खैर, जो सवाल सबसे बड़ा उभरता है वो यह है कि जब चुने हुए जिम्मेदार सांसदों का ही ये हाल है तो केवल सचिन या रेखा से ही कोई उम्मीद क्यों की जाये? जब उनकी अदा ही हर दिन चलने वाले संसद के खर्च से ज्यादा कमाई हर दिन कर लेती हो, तो फिर संसद की साख पर सचिन की अदा तो भारी होगी ही। चलो, रेखा और सचिन तो फिर भी मनोनीत हैं, मगर सीधे जनता के वोटों से जीतने वाले फिल्मी सांसदों का भी यही हाल है। बालीवुड के सिने कलाकार धर्मेन्द्र बीकानेर से जीत कर गए, मगर पूरे कार्यकाल के दौरान कुछ नहीं बोले। बोलने की छोडिय़े, वे तो पूरे पांच साल बीकानेर ही नहीं गए।
कुल मिला कर निष्कर्ष यही है कि चाहे सीधे जनता के जरिए लोकसभा चुनाव जीते या फिर विधायकों के जरिए या मनोनयन के आधार पर राज्य सभा में पहुंचे सांसदों पर कुछ तो नियम लागू होने ही चाहिए। जब स्कूल में छात्रों की निर्धारित उपस्थिति जरूरी है तो जनता के प्रति जिम्मेदार सांसदों के लिए क्यों जरूरी नहीं होनी चाहिए। इतना ही नहीं, हर सत्र या साल के बाद सांसदों की परफोरमेंस का रिकार्ड रख कर उन्हें निर्देशित किया जाना चाहिए कि वे जिस मकसद से संसद में हैं, उसका दायित्व निभाएं।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, अगस्त 01, 2014

क्या मोदी की लहर अब धीमी हो चली है?

तकरीबन सत्तर दिन पहले हुए जिस चुनाव में उतराखंड की पांचों सीटें मोदी लहर में बह गई थीं, विधान सभा उप चुनाव के नतीजों के साथ ही अब वह लहर थमती नजर आ रही है। जहां खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने धारचूला से जीत हासिल की, वहीं अन्य दोनों सीटों, डोइवाला और सोमेश्वर को कांग्रेस ने बीजेपी से छीन लिया। डोइवाला से पूर्व कैबिनेट मंत्री हीरासिंह बिष्ट ने जीत हासिल की, वहीं सोमेश्वर से ऐन चुनाव से पहले बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुई रेखा आर्य ने विजय पताका फहरायी। इस चुनाव परिणाम ने राजनीतिक हलकों में इस बहस को जन्म दिया है कि आखिर उस लहर का क्या हुआ, जिस पर सवार आकलनकर्ताओं को ये लग रहा था कि अब मोदी पांच साल नहीं बीस साल से ज्यादा के लिए आ गए हैं।
बेशक एक राज्य के विधानसभा चुनाव के परिणाम के आधार पर मोदी सरकार की लोकप्रियता को आंकना गलत है, मगर इतना जरूर लगता है कि मोदी के प्रति जो अत्यधिक आकर्षण दिखाई दे रहा था, वह तो कम हुआ ही है। और उसकी अपनी वजह है।
सबसे बड़ा सवाल महंगाई का है। मोदी ने चुनाव प्रचार ही इस प्रकार किया था कि जैसे ही वे सत्ता पर काबिज होंगे, महंगाई छूमंतर कर देंगे। मानो वे कोई जादूगर हों। कांग्रेस से तंग लोगों ने उन पर यकीन कर लिया। हालांकि यह बात सही है कि जिस माली हालत का भाजपा जिक्र कर रही थी, उसमें सुधार लाने में वक्त लगना था, मगर चूंकि वादे इस तरीके से किए गए थे कि उसके सत्ता में आते ही सारे समाधान हो जाएंगे, इस कारण जनता की अपेक्षाएं बढ़ गईं। दैनिक जरूरत के आलू-प्याज की कीमतें घटने की बजाय बढ़ गईं, तो त्राहि त्राहि मच गई। दोष भले ही मानसून का या काला बाजारियों का था, मगर चूंकि ये बहाना कांग्रेस भी बनाती थी, इस कारण जनता को ये बहाना मंजूर नहीं। खुद वित्त मंत्री जेटली कहते हैं कि निकट भविष्य में महंगाई घटने की कोई उम्मीद नहीं है। हद तो तब हो गई, जब खुद मोदी ने ही कड़वी दवा पीने को तैयार रहने को कह दिया। इसी प्रकार बहुत हुई महंगाई की मार, अब की बार मोदी सरकार के नारे पर झूमने वाले जमीन पर आ गिरे, जब रेल भाड़ा बजट से पहले ही बढ़ा दिया गया। जब ये कहा गया कि ये तो कांग्रेस के कार्यकाल में ही बढऩा प्रस्तावित था, उसे केवल लागू किया गया है, तो लोगों ने सवाल उठाया कि अब तो आपकी सरकार है, आप भी नहीं बढ़ाते। लोगों को तकलीफ इस वजह से हुई कि जिन सुविधाओं का सपना दिखा कर किराया बढ़ाया गया, वे देने से पहले ही किराया बढ़ा दिया गया। इस मुद्दे पर अब भाजपाई ये कह कर बगलें झांकने लगते हैं कि कांग्रेस के कर्मों को दुरुस्त करने में आखिर समय तो लगेगा।
जिन लोगों ने आंख मूंद कर मोदी को झोली भर वोट दिए, उन्हें तब और झटका लगा, जब मोदी सरकार के दोहरे पैमाने सामने आए। जब मोदी ने अपने पहले ही भाषण में राजनीति में अपराधीकरण बर्दाश्त न करने की बात कही, तो लोगों को बढ़ा सुखद लगा, मगर आरोप झेल रहे अपने खासमखास अमित शाह को भाजपा का अध्यक्ष बना दिया, तो सवाल उठने ही थे। इसी प्रकार दुराचार के आरोपी निहालचंद को मंत्री पद से नहीं हटाने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
जिस काले धन को वापस लाने के वादे के साथ मोदी सरकार में आए, उस पर जब लोगों ने उनकी ही पार्टी के लोगों के बयान सुने तो वे सकते में आ गए। भाजपा सांसद रिशिकांत दुबे ने कहा कि काला धन इस जन्म में वापस लाना मुश्किल है। गौ हत्या का विरोध कर हिंदुओं का समर्थन लेने वाली भाजपा ने जब गौ-मांस पर टैक्स घटा दिया तो भी सवाल उठे कि वह तो गौ हत्या की बड़ी विरोधी थी। भाजपा के उस दोहरे मापदंड की भी आलोचना हो रही है, जिसमें कांग्रेस राज में वह एफडीआई का विरोध करती रही, मगर अब खुद एफडीआई को ला रही है।
लोगों को याद है वह दिन जब सुषमा स्वराज ने कहा था कि मनमोहन सरकार हाथ पर हाथ रख कर बैठी है, होना तो यह चाहिए कि हमारे एक जवान के बदले में दस पाकिस्तानियों के सिर काट कर लाएं। अब जब आए दिन सीमा पर जवान मर रहे हैं तो भाजपाई ये कह कर चुप हो जाते हैं कि हमारे सैनिक भी तो मार रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक जब पाकिस्तान में भारत के सबसे बड़े दुश्मन हाफिज सईद से मिल कर आए तो सरकार ने यह कह कर पल्लू झाड़ लिया कि उसकी जानकारी में नहीं है। इस पर कांग्रेसी ये कह कर हल्ला मचा रहे हैं कि अगर कांग्रेस राज में ऐसा होता तो भाजपा आसमान सिर पर उठा लेती। आपको याद होगा कि आम आदमी पार्टी के नेता वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने जब कश्मीर में जनमत संग्रह का समर्थन किया तो एक हिंदूवादी ने उनको पीट दिया था, जबकि वेद प्रताप वैदिक ने यही बात कही तो उस पर सरकार और भाजपाई चुप हैं।
मोदी सरकार पर इसलिए भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि कश्मीर में धारा 370 हटाने, राम मंदिर बनाने और कॉमन सिविल कोड पर सरकार चुप है, जबकि भाजपा का असल तीन सूत्री कार्यक्रम यही था, जिसकी बिना पर ही उसका वोटों का जनाधार बना हुआ है।
हाल ही गृह मंत्री राजनाथ सिंह के इस बयान की भी खिल्ली उड़ाई जा रही है कि सीमा पर गलती से भी घुसपैठ हो जाती है। कहा जा रहा है कि देश नहीं झुकने दूंगा वाले चीनी घुसपेठियो को वापस क्यों जाने दे रहे हैं।
कुल मिला कर अब मोदी सरकार की हर हरकत पर मीडिया व कांग्रेस सहित जनता की पैनी नजर है और उसकी समीक्षा हुए बिना नहीं रहती।
-तेजवानी गिरधर

राजस्थान की शेरनी वसुंधरा बेबस क्यों?

सुराज संकल्प यात्रा के जरिए लोगों के विश्वास कायम करने वाली श्रीमती वसुंधरा राजे ने मोदी लहर के सहारे राजस्थान में प्रचंड बहुमत तो हासिल कर लिया, मगर सत्ता संभालने के आठ माह बाद भी पूर्ण मंत्रीमंडल का गठन न कर पाने को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। यह पहला मौका है कि वसुंधरा इतनी ताकतवर होने के बाद भी कमजोर दिखाई दे रही हैं, वरना विपक्ष में रहते हुए तो उन्होंने हाईकमान को इतना नचाया था कि उन्हें भी मुलायम, ममता, मायावती, जयललिता की तरह खुद के दम पर राजनीति करने वाली क्षत्रप के गिना जाने लगा था।
आपको याद होगा कि पिछली बार जब उनके नेतृत्व में भाजपा हार गई थी तो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम माथुर के साथ उन्हें भी नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देने को कहा गया था, प्रदेश अध्यक्ष माथुर ने तो तुरंत हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया, मगर वसुंधरा अड़ गईं। विधायकों पर उनकी इतनी जबदस्त पकड़ थी कि उनके दम पर वे हाईकमान से भिड़ गईं। काफी दिन तक नाटक होता रहा और बमुश्किल उन्होंने पद छोड़ा। छोड़ा भी ऐसा कि उनके बाद किसी और को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनने दिया। आखिरकार हाईकमान को झुकना पड़ा और देखा की वे बहुत ताकतवर हैं और संगठन बौना तथा उनकी उपेक्षा करके चुनाव नहीं जीता जा सकता तो फिर नेता प्रतिपक्ष बनने का आग्रह किया। एकबारगी तो उन्होंने इंकार कर दिया, मगर पर्याप्त अधिकार देने और उनके मामले में हस्तक्षेप न करने के आश्वासन पर ही मानीं। चुनाव नजदीक आते देख जब लगा कि उनके मुकाबले को कोई भी नेता नहीं है जो भाजपा की वैतरणी पार लगा सके, तो प्रदेश अध्यक्ष का जिम्मा भी उन्हें ही सौंपा गया। वे पार्टी के भरोसे पर पूरी तरह से खरी उतरीं भी। न केवल विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत दिलवाया, अपितु लोकसभा चुनाव में भी पच्चीसों सीटें जितवा कर दीं। यानि कि वे पहले के मुकाबले और अधिक ताकतवर हो गई हैं। मगर अब जब मंत्रीमंडल का विस्तार करने की जरूरत है तो ऊपर से हरी झंडी नहीं मिल पा रही। सत्ता संभालते ही उन्होंने न्यूनमत जरूरी 12 मंत्रियों का मंत्रीमंडल बनाया, मगर बाद में उसका विस्तार नहीं कर पाई हैं। यानि कि इन 12 मंत्रियों के सहारे ही सरकार के सारे मंत्रालयों का कामकाज किया जा रहा है, जबकि कुल 30 मंत्री बनाए जा सकते हैं। हालत ये है कि नसीराबाद के विधायक प्रो. सांवरलाल जाट के अजमेर का सांसद बनने के बाद भी उन्हें मुक्त नहीं कर पा रही हैं, जबकि वे विधायक पद से इस्तीफा दे चुके हैं। अभी वे बिना विधायकी के मंत्री हैं। इसको लेकर कांग्रेस ने हंगामा मचा रखा है कि सांसद रहते नियमानुसार उन्हें मंत्री नहीं माना जा सकता, मगर विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने कांग्रेस की आपत्ति को नजरअंदाज कर रखा है।
बहरहाल, मुद्दा ये है कि मंत्रीमंडल के विस्तार की सख्त जरूरत है, विवाद से बचने के लिए और सरकार को ठीक से काम करने के लिए भी, मगर विस्तार नहीं हो पा रहा। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तो इस मुद्दे को लेकर हमला भी बोला है कि भारी बहुमत के बावजूद आठ माह से केबिनेट तक नहीं बना पा रही हैं। इतिहास में ऐसा पहली बार देखा जा रहा है। इसको लेकर लोगों में इस सरकार के प्रति निराशा उत्पन्न हो रही है। मगर वसुंधरा मंत्रीमंडल का विस्तार नहीं कर पा रहीं तो शंका होती ही है कि आखिर बात क्या है? विस्तार लगातार टलता जा रहा है। समझा जाता है कि यह स्थिति केन्द्र से तालमेल के अभाव में उत्पन्न हुई है। उनकी पसंद के सांसद, विशेष रूप से अपने सांसद बेटे को मंत्री को मंत्री नहीं बनवा पायी हैं। पच्चीस सांसदों पर एक ही मंत्री निहाल चंद मेघवाल बनाए गए हैं, मगर वे भी उनकी पसंद के नहीं हैं। माना जाता है कि केन्द्रीय मंत्रीमंडल के विस्तार की गुत्थी के साथ राजस्थान मंत्रीमंडल का विस्तार अटका हुआ है। यूं कहा तो ये जा रहा है कि लिस्ट फाइनल है, मगर उसे स्वीकृति नहीं मिल पा रही। पहले राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष रहते उसे अटकाया और अब नए अध्यक्ष अमित शाह पेच फंसाए हुए हैं। समझा जा सकता है कि अमित शाह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ की कठपुतली हैं और नरेन्द्र मोदी जब चाहेंगे, जैसा चाहेंगे, उसी के अनुरूप मंत्रीमंडल का विस्तार होगा। खैर, राजस्थान की शेरनी वसुंधरा की मोदी के सामने जो हालत है, उसे देखते तो यही लगता है कि दोनों के बीच ट्यूनिंग कुछ गड़बड़ है। वैसे उम्मीद यही है कि अगस्त माह में मंत्रीमंडल का विस्तार होगा। केन्द्र का भी और राज्य का भी। तभी पता लगेगा कि वसुंधरा में कितना दमखम है और उनकी पसंद कितनी चल पाई है। वैसे संभावना यही है कि उन्हें स्थानीय संघ लॉबी से मिल कर ही चलना होगा।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, जुलाई 31, 2014

राहुल ने ठीक ही मना किया था सोनिया को पीएम बनने से

भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी सही कह रहे हैं या पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह, कुछ पता नहीं लग रहा। स्वामी का कहना है कि राष्ट्रपति ने सोनिया को प्रधानमंत्री बनाने में कानूनी अड़चन की बात कही थी और अगर वे बन भी जातीं तो मामला कोर्ट में ले जाया जा सकता था। इस कारण सोनिया को कदम पीछे खींचने पड़े। मगर नटवर सिंह ने अगले महीने आने वाली अपनी किताब वन लाइफ इज नॉट एनफ में जो कुछ अहम खुलासे किए हैं, उसमें कहा गया है कि 2004 में सोनिया गांधी के पीएम नहीं बनने की सबसे बड़ी वजह राहुल गांधी थे। राहुल गांधी को डर था अगर उनकी मां सोनिया, दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी की तरह पीएम बनीं, तो उनकी भी हत्या कर दी जाएगी। यही वजह थी कि राहुल गांधी ने बेटा होने की दुहाई देते हुए सोनिया को पीएम नहीं बनने दिया। राहुल गांधी ने अपनी मां सोनिया गांधी को सोचने के लिए 24 घंटे का समय दिया था। हालांकि राहुल बेटे के तौर पर अपना निर्णय पहले ही सुना चुके थे। आखिरकार सोनिया गांधी को भी राहुल की यह अपील माननी पड़ी। इन खुलासों का जिक्र उन्होंने न्यूज चैनल हेडलाइंस टुडे को दिए इंटरव्यू में किया है।
संभव है स्वामी की बात सही हो, मगर आज तक उसका ठीक से खुलासा कानूनी नजरिये के पहलुओं से नहीं हो पाया है। ये आज भी बहस का विषय है। मगर नटवर सिंह की बात में दम नजर आता है। ये वही नटवर सिंह हैं जो कभी गांधी-नेहरू परिवार के बेहद करीबी थे और अब कांग्रेस से निष्कासित। कांग्रेस से अलग हुए नेता का ये कहना कुछ गले उतरता है। चाहते तो वे भी स्वामी की तरह का तर्क दे सकते थे क्योंकि सोनिया व राहुल से उनकी अब नाइत्तफाकी है। खुद नटवर सिंह का दावा है कि वह किसी पुरानी कटुता की वजह से किताब नहीं लिख रहे हैं, बल्कि उनकी किताब तथ्यों पर आधारित है।
नटवर सिंह की बातों को अगर उस वक्त के हालात की रोशनी से देखें तो यकीन होता है कि वे शायद सही ही कह रहे हैं। उस वक्त सत्ता से वंचित हो रही भाजपा के नेताओं को बड़ा मलाल था कि विदेश में जन्मी एक महिला उन पर कैसे राज कर सकती है। एक तो वे महिला हैं, दूसरा विदेशी। उस वक्त पूरे देश में ऐसा माहौल बनाया गया था कि लोगों को सोनिया के प्रधानमंत्री बनने पर ऐतराज हो। उनके जज्बात जगाए गए कि तुम एक विदेशी महिला के राज को कैसे स्वीकार कर सकते हो। इसमें बाकायदा देशभक्ति का पुट भी डाला गया था। यहां तक कि भारतीय पुरुषों की मर्दानगी तब को चुनौती तक देकर दबाव बनाया जा रहा था कि सोनिया किसी भी सूरत प्रधानमंत्री नहीं बननी चाहिए। चंद शब्दों में कहा जाए तो सोनिया के प्रति नफरत का माहौल बनाने की भरपूर कोशिश की गई थी। माहौल बना भी था। ऐसे माहौल में मर्दानगी की चुनौती झेला हुआ कोई भी सिरफिरा सोनिया को मारने की साजिश रच सकता था। किसी भी भारतीय के प्रधानमंत्री होने पर उसकी सुरक्षा को लेकर जितनी सतर्कता नहीं चाहिए, उससे कहीं गुना अधिक एक विदेशी महिला के प्रधानमंत्री होने पर बरतने की नौबत आ सकती थी। यहां तक देशभर में हिंसा तक भड़कने का खतरा था। गृहयुद्ध भी हो सकता था। कदाचित उस आशंका की भयावहता का सोनिया और राहुल को आभास रहा होगा। राहुल के अपनी दादी व पिता की हत्या और सोनिया के अपनी सास व पति की हत्या देखने की वजह से ये ख्याल स्वाभाविक ही है। भले ही सोनिया प्रधानमंत्री बन जातीं, मगर यदि केवल उनके विदेशी होने के मुद्दे को लेकर देश में बवाल होता तो वह उनके लिए बेहद शर्मनाक होता। वह इतिहास का काला अध्याय बन जाता। यदि इस अर्थ में सोनिया का त्याग देखा जाए तो उसमें कुछ गलत भी नहीं है कि उनके त्याग से देश हिंसा से बच गया। हालांकि सोनिया के भविष्य में आने वाले उस मन्तव्य का इंतजार करना चाहिए, जो उन्होंने नटवर के बयान के बाद आया है कि वे एक किताब लिखेंगी, जिसमें सब कुछ सामने आ जाएगा।
संभव है कि तब सोनिया व राहुल ने सोचा होगा कि चाहे किसी को प्रधानमंत्री बना दिया जाए, सरकार की कमान तो उनके ही हाथों में रहने वाली है और उनके प्रधानमंत्री बनने न बनने से कोई फर्क नहीं पडऩे वाला था, सो पद त्यागने का विचार आया होगा। यहां कहने की जरूरत नहीं है कि यह मुद्दा कई बार उठा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो कठपुतली मात्र हैं  और सरकार सोनिया के इशारे पर ही चलती है। सत्ता के दो केन्द्र थे, उसमें ज्यादा ताकतवर सोनिया का था। ज्ञातव्य है कि कभी मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहने वाले संजय बारू ने अपनी किताब द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर, द मेकिंग ऐंड अनमेंकिंग ऑफ मनमोहन सिंह में खुलासा किया था सोनिया ही असल में सरकार चला रही थीं। नटवर सिंह भी ये कह रहे हैं कि सोनिया गांधी की पहुंच सरकारी फाइलों तक थी।
बहरहाल, चाहे बेटे की जिद के कारण या हिंसा के डर से सोनिया ने प्रधानमंत्री बनने का विचार त्यागा हो, मगर इस सिलसिले में एक बात कहने की इच्छा होती है कि भले ही भाजपा इत्यादि दलों को सोनिया के प्रधानमंत्री न बनने पर सुकून मिला हो, मगर यह भी हकीकत है कि पूरे दस साल सोनिया ने ही सरकार चलाई, चाहे अप्रत्यक्ष रूप से। नटवर सिंह ने तो इससे भी एक कदम आगे कह दिया कि जब वे पार्टी में थे तो सोनिया गांधी का कांग्रेस पर पूरा नियंत्रण था। सोनिया गांधी ने कभी इंटेलेक्चुअल होने का दावा नहीं किया, लेकिन उनके शब्द ही पार्टी के लिए कानून थे। नटवर सिंह ने कहा कि कई मायनों में कांग्रेस पर सोनिया का नियंत्रण इंदिरा गांधी से भी ज्यादा था और वह इंदिरा से भी ज्यादा ताकतवर नजर आती थीं।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, जुलाई 25, 2014

इतना क्या जरूरी था वैदिक का हाफिज सईद से मिलना?

इन दिनों वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक के हाफिज सईद से मिलने का मुद्दा गरमाया हुआ है। चूंकि वे बाबा रामदेव से सीधे जुड़े हुए हैं और बाबा रामदेव तथा उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान भी मोदी व भाजपा को जितवाने के प्रयास किए, इस कारण भाजपा खेमे की सिट्टी पिट्टी गुम है। वे इसे पत्रकारिता का मुद्दा बता कर पल्लू झाड़ रहे हैं। उनके गुण-अवगुण को पत्रकार जगत पर छोड़े दे रहे हैं। जाहिर है वे उन्हें बचाना चाहते हैं। यहां तक कि बड़े-बड़े पत्रकार भी पत्रकारिता की खेमेबाजी के कारण उनकी तरफदारी कर रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बना कर आसमान सिर पर उठा रखा है कि वैदिक ने चूंकि देश के सबसे बड़े दुश्मन से मुलाकात की है, इस कारण उनके खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए।
सवाल ये उठता है कि आखिर माजरा क्या है? जैसा कि कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि बेशक वैदिक का सईद से मिलना कानूनी अपराध नहीं हो सकता है, विशेष रूप से पत्रकार होने के नाते, क्योंकि पत्रकारिता का कर्म ही ऐसा है कि पत्रकार को कई लोगों से मिलना होता है, मगर क्या वे केवल पत्रकार हैं? क्या उससे पहले भारत देश के नागरिक नहीं? क्या उनका पत्रकारिता का धर्म राष्ट्र भक्ति व देश के वफादारी से कहीं अधिक हो गया? और अफसोस तो तब होता है जबकि आप इस मुलाकात पर इठला रहे हैं कि आपने कोई बड़ा तीर मार लिया है। मुलाकात पर हंगामा होते ही उन्होंने इसे अपनी बड़ी उपलब्धि करार दिया। यहां तक कहा कि कोई कांग्रेसी नेता होता तो उसका पायजामा गीला हो जाता। उनका जो दंभ सामने आया, उससे तो यही लगता है कि भले ही वे किसी मिशन के तहत सईद से नहीं मिले, मगर उससे मिलने पर क्या बवाल होना है, इससे अच्छी तरह से वाकिफ थे। वे ये भी जानते थे कि वे यह कह आसानी से बच जाएंगे कि वे तो पत्रकार हैं, इस कारण कई नेताओं से मिलते रहते हैं।
जो तथ्य हैं उससे साफ है वे मिले ही भले एक पत्रकार के नाते, मगर उन्होंने वहां पत्रकारिता जैसा कोई काम नहीं किया। बात रही उनके पत्रकार होने के नाते वरिष्ठ पत्रकारों के उनकी तरफदारी की तो वजह स्पष्ट है, अनेक उनके शिष्य रहे  हैं या फिर किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं, इस कारण व्यक्तिगत द्वेष से बचाना चाहते हैं। एक वर्ग इस मुद्दे को पत्रकारिता की स्वतंत्रता की वजह से चुप है।
तस्वीर का एक रुख ये भी है कि भले ही वैदिक को एक पत्रकार के रूप में देखा जा रहा हो, चूंकि उनका अधिकतर जीवन पत्रकारिता में ही बीता है, मगर सच ये भी है कि हाल ही के लोकसभा चुनाव में वे खुल कर भाजपा के पक्ष में लिखने लग गए थे। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने में उनकी भी भूमिका रही, जिसे वे स्वयं स्वीकार करते हैं। यहां तक कहते हैं कि मोदी का नाम उन्होंने ही प्रस्तावित किया था। ऐसे में क्या ये सवाल नहीं उठता कि पत्रकार कब से किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष के लिए काम करने लगे। उन्होंने भले ही भाजपा की सदस्यता नहीं ली, जिसका तर्क दे कर भाजपा उनसे पल्लू झाड़ रही है, मगर उनके सारे कृत्य तो भाजपा के ही पक्ष में थे। मोदी के लिए प्रचार करने वाले योग गुरू बाबा रामदेव के साथ उनकी कितनी घनिष्ठता है, ये किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में अगर उन पर भाजपाई होने का आरोप लग रहा है तो उसमें गलत क्या है?
वास्तव में वैदिक को पहली बार में ही हाफिज से मिलने के लिए साफ  मना करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने राष्ट्र धर्म नहीं निभाया। और सबसे बड़ा सवाल ये कि वे ऐसी कौन सी पत्रकारिता करने का आतुर थे कि राष्ट्रधर्म निभाना ही भूल गए? सबसे बड़ा सवाल ये कि वैदिक को सईद से मिलने की इतनी जरूरत क्या आ पड़ी थी? बहरहाल अब मामला तूल पकड़ चुका है। उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हो गया है। अब कोर्ट ही तय करेगा कि उनका कृत्य उचित था या अनुचित।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, जुलाई 03, 2014

साईं बाबा विवाद पर छिड़ी है वैचारिक जंग

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद की ओर से साईं बाबा को भगवान न मानने के बयान के बाद देशभर में जबरदस्त बहस छिड़ गई है। टीवी चैनलों पर लगातार कई पैनल डिस्कशन हो रहे हैं। सांई बाबा के भक्त लामबंद हो कर शंकराचार्य का विरोध कर रहे हैं तो शंकराचार्य ने भी विभिन्न संतों की बैठक बुला कर अपने बयान पर बल देने का प्रयास किया है। केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती के बयान के बाद तो इस विवाद ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है। भाजपा से जुड़े राजनेता व संत यह कहने से नहीं चूक रहे कि शंकराचार्य कांग्रेस के नजदीकी हैं और उनका भाजपा में सत्ता में आने के बाद ऐसा बयान साजिश का इशारा करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा हिंदू समाज इस मुद्दे पर दो फाड़ सा हो गया है। कुछ हिंदू वादी साईं बाबा तो मुस्लिम करार देने पर आमादा हैं तो साईं भक्त उन्हें भगवान मानने पर अडिग हैं।
इस मुद्दे पर सोशल मीडिया भी मुखर हो गया है। वाट्स एप पर दोनों की पक्षों की ओर से अपने तर्क दिए जा रहे हैं। आइये, जरा देखें कि उनकी बात में कितना-कितना दम है:-
शंकराचार्य के एक समर्थक की पोस्ट इस प्रकार है- 
कटु सत्य--क्या आप जानते हैं?
1-साईं का असली नाम चांद मियां था।
2-साईं ने कभी अपने जीवन में 2 गांव से बाहर कदम नहीं रखा।
3-साईं सत्चरित में 10 बार से अधिक अल्लाह मालिक शब्द आया है, परन्तु एक बार भी ओम् नहीं आया।
4-साईं के समय में उसके आसपास के राज्यों में भयंकर अकाल पड़ा, परन्तु साईं बाबा ने गरीबों की मदद करना जरूरी नहीं समझा।
5-साईं का जन्म 1834 में हुआ, पर उन्होंने आजादी की लड़ाई, जिसे धर्म युद्ध की संज्ञा दी जाती है, में भारतीयों की मदद करना जरूरी नहीं समझा। पता नहीं क्यों, अगर वे राम-कृष्ण के अवतार थे, तो उन्हें मदद करनी चाहिए थी क्योंकि कृष्ण का हीकहना है कि धर्म युद्ध में सभी को भाग लेना पड़ता है। स्वयं कृष्ण ने महाभारत में पांडवों का मार्ग दर्शन किया और वक्त आने पर शस्त्र भी उठाया। भगवान राम ने भी यही किया, पर पता नहीं साईं कहां थे।
6-साईं भोजन से पहले फातिहा पढ़ते थे, परन्तु कभी गीता और रामायण नहीं पढ़ी, न ही कोई वेद। वाह कमाल के भगवान थे।
7-साईं अपने भक्तों को प्रसाद के रूप में बिरयानी यानि मांस मिश्रित चावल देते थे। खास कर ब्राह्मण भक्तों को। ये तो संभव ही नहीं की कोई भगवान का रूप ऐसा करे।
8-साईं जात के यवनी यानि मुसलमान थे और मस्जिद में रहते थे, लेकिन आज कल उन्हें ब्राह्मण दिखाने का प्रयास चल रहा है। सवाल ये है कि क्या ब्राह्मण मस्जिदों में रहते हैं?
नोट-ये सारी बातें स्वयं साईं सत्चारित में देखें। यहां पर एक भी बात मनगढ़ंत नहीं है। ये हमारी एक कोशिश है अन्धे हिन्दुओं को जगाने की। लेकिन हो सकता है इसका असर नहीं पड़े क्योंकि भैंस के आगे बीन बजाने का कोई लाभ नहीं होता।

जरा अब दूसरा पक्ष भी देख लीजिए-
न्यूज 24 पर साईं विवाद पर चल रही बहस में एंकर एवं अन्य धर्मों मुस्लिम, ईसाई, सिख के प्रतिनिधि उदारवाद के साक्षात अवतार दिखाई देने की कोशिश कर रहे थे एवं शंकराचार्य के बयान की निन्दा कर रहे थे तथा बेचारे हिन्दू प्रतिनिधि स्वामी का बचाव की मुद्रा में थे। सब सबका मालिक एक वाला राग गाये जा रहे थे। इसी दौरान स्वामी मार्तण्ड मणि ने बहुत ही बेहतरीन सवाल किया कि क्या आप सब अपने धर्म स्थानों मस्जिद, चर्च व गुरुद्वारे में साईं बाबा की पूजा की अनुमति देंगे? अब सबके चेहरे देखने लायक थे, सब इधर-उधर की बातें करने लगे। एंकर ने जोर देकर सवाल दोहराया तो टालमटोल करते-करते बताने लगे।
मुस्लिम धर्मगुरू-इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की इबादत की मनाही है, तो मस्जिद में साईं की इबादत का प्रश्न ही नहीं उठता। बुतपरस्ती की तो सख्त-मनाही है, वगैरह- वगैरह।
पादरी जी-चर्च प्रभु यीशू के शरीर का स्वरूप है, कमाल है पादरी साहब ने आज ये नई बात बतायी, उसमें किसी और की पूजा नहीं हो सकती।
सिख प्रतिनिधि-गुरुद्वारा गुरू का स्थान है। हम केवल गुरू की वाणी में ही विश्वास करते हैं। वह सभी धर्मों का आदर करती है, उसमें सभी भक्तों की वाणियां हैं...वगैरह-वगैरह। दोबारा पूछे जाने पर ज्ञानी जी ने भी माना कि गुरुद्वारे में साईं की पूजा की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अब कहां गई वह उदारता एवं सबका मालिक एक की भावना।
तो भाई जब तुम लोग साईं को अपने धर्म स्थान में जगह नहीं दे सकते, उसको अपने भगवान अर्थात अल्लाह, यीशु, गुरू आदि का अवतार नहीं मान सकते तो जब शंकराचार्य ने यही बात हिन्दुओं की ओर से कही तो आलोचना क्यों कर रहे हो।
ये सन्देश सीधा अंतर्मन से आया है। जो भी इसको 11 लोगों को भेजेगा, वह सनातन धर्म सेवा से मिले आनंद का भागी होगा।  और जो पढ़ कर भी डिलीट करेगा या नजर अंदाज करेगा, वह 5 दिन तक इसी टेंशन में रहेगा की बात तो सही लिखी थी, पर मैंने धर्म रक्षा का अवसर खो दिया।

इस विवाद पर राजनीति का रंग लिए यह पोस्ट भी देखिए-
मित्रों, आजकल साईं बाबा की आलोचना हर तरफ हो रही है, लेकिन कभी सोचा ये सब अब क्यों हो रहा है और इतने दिन बाद क्यों हो रहा है? आइये हम आपको बताते क्या हंै मामला.....
आपको पता होगा की शंकराचार्य जी की ओर से उठाये हुए सवाल के कारण आज ये विवाद पैदा हुआ है।
1-हाल ही में मोदी सरकार को बड़ी सफलता मिली है और ये जीत हिंदुस्तान के लिए बड़े गर्व का बात है और कांग्रेस के लिए ये शर्मनाक हार थी, इसी के कारण चलते कांग्रेस की बड़ी साजिश तैयार हुई। शंकराचार्य द्वारा जो अब बड़ा सिरदर्द बनाया हुआ है, बीजेपी व हिंदुस्तान के लिये, क्यों कि आने वाले कुछ ही दिन में महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, झारखण्ड और बिहार में विधानसभा इलैक्शन के लिये वोटिंग होगी।
साईं बाबा के नाम पर होगा हिन्दुओं का बंटवारा और इसके चलते हिंदुस्तान में हिन्दू एक दूसरे से लड़ते रहेंगे, इसका फायदा कांग्रेस और बाकी मुसलमान को मिलेगा क्योंकि वक्फ बोर्ड की नजर साईं बाबा के संपत्ति पर हे, इसे हम अनदेखी नहीं कर सकते। साईं को मुसलमान साबित करके सूफी-संत बता दिया जायेगा और हड़प लेंगे साईं मंदिर की करोड़ों की संपति।
शंकराचार्य जी को कांग्रेस हमेशा सपोर्ट करता है, इसका उदाहरण मीडिया का रिपोर्टर का थप्पड़ कांड है। मोदी जी के बारे में पूछने पर शंकराचार्य ने थप्पड़ मारा था।
साईं बाबा हिन्दू या मुसलमान थे, ये किसी को पता नहीं, न ही कहीं लिखा है। इसलिये हमें सोचना चाहिये । अगर हिन्दुओं का इतना ख्याल है शंकराचार्य जी को तो कहां थे, जब तिरुपति में भगवान बालाजी मंदिर के पास मुसलमानों की यूनिवर्सिटी बन रही थी?
कहां थे जब हैदराबाद के लक्ष्मी मंदिर में घंटा बजने पर बैन हुआ था?
कहां थे जब ओवेसी हिंदुओं पर जहर उगल रहा था?
हिन्दुओं को आपस में लड़ा कर हिन्दू वोट को अलग करना शंकराचार्य जी का लक्ष्य है, जो हमको समझना चाहिए।
सबसे बडी बात है कि मोदी जी को बदनाम करके भारत के विकास को रोकने का काम करेंगे, जो कल तक कुछ एनजीओ करते थे। आईबी की रिपोर्ट आने के बाद एनजीओ का असली चेहरा सामने आया था। हमारा साहित्य, संस्कृति, कला, चाल-चलन और भविष्य हम बनायेंगे या फिर उन लोगों पर छोड़ देंगे जो दूसरे देश से पैसा लेकर हम को ये गलत उपदेश देंगे। और न मानने पर वो कोर्ट पहुंच जाते हैं, फिर रोक लेते हैं बने हुए काम। यही सत्य है। अगर आप इससे सहमत हैं तो शेयर करना न भूलें और देश में स्थिर बनाये रखें। पहले हम भी थे शंकराचार्य जी का साथ, लेकिन अब देश के हित के लिये हिन्दुस्तान के साथ।