आप देखिए न कि हम यदि भगवान को प्रसाद चढ़ाने का संकल्प लेते हैं या प्रसाद चढ़ाते हैं तो तब भी सवाये का ख्याल रखते हैं। अब तो पचीस पैसे अर्थात चवन्नी चलन से बाहर हो गई, मगर किसी जमाने में सवा रुपया या सवाल ग्यारह रुपए चढ़ाए जाते थे। जब चवन्नी बंद हो गई तो भी राउंड फिगर से एक रुपया ज्यादा का चलन आया। ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन। लेकिन चूंकि कई बार एक रुपए का सिक्का जेब में नहीं होता है, इस कारण गिफ्ट वाले ऐसे लिफाफे आ गए हैं, जिनमें एक रुपया पहले से चिपका हुआ होता है। मकसद सिर्फ ये है यदि हम उसमें सौ रुपये या दो सौ रुपए डालें तो एक रुपया स्वतरू जुड़ जाए। यह भी सवाये का ही रूप है। अर्थात हम पूर्णांक से एक अंक ज्यादा को प्राथमिकता देते हैं।
वस्तुतरू सनातन धर्म में सवा (एक और एक चौथाई) का महत्व है और इसी क्रम में सवा, ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन को शुभ माना जाता है। अर्थात् सबसे छोटी प्राकृत संख्या जो शुभ मानी जाती है, वह 11 ही है। इसी से जुड़े तथ्य रोचक हैं। जैसे अपोलो 11, चन्द्रमा पर भेजा गया पहला मानवयुक्त अन्तरिक्ष यान था। बहुत से खेलों में 11 खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं, जैसे क्रिकेट, फुटबॉल आदि।
शायद आपकी जानकारी में हो कि ज्योतिषी कोई भी काम करते वक्त सवाये की सलाह देते हैं। जैसे नौ, दस, ग्यारह बजे, या जो भी, वे कहते हैं कि पूर्णांक की बजाय कुछ ज्यादा मिनट होने पर ही काम की शुरुआत करनी चाहिए। वे पौने से बचने की राय देते हैं, अर्थात पौ नौ, पौने दस या पौने ग्यारह बजे काम शुरू करने से बचने की कहते हैं, क्योंकि वह पूर्ण से कम है, इस कारण उस वक्त शुरू किए गए काम के पूर्ण होने में संशय हो सकता है।
कुल मिला कर यह स्थापित तथ्य है कि हमारे जीवन में सवाये का बड़ा महत्व है। लेकिन तथ्य स्थापित होने के पीछे क्या कारण है, इसके बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। जहां तक मेरी समझ है, इसके पीछे कहीं न कहीं अध्यात्म है। दर्शन को गहराई जानने वाले कहते हैं कि पूर्ण और शून्य में कोई अंतर नहीं। दोनों एक ही सिक्के के पहलु हैं। जैसे ही पूर्णता आती है, उसी के साथ शून्य आ कर खड़ा हो जाता है। कदाचित इसीलिए पूर्णांक की बजाय उसमें सवाया जोड़ा जाता है।
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