तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

गुरुवार, दिसंबर 25, 2014

मोदी के विकास को पटरी से नहीं उतार दें ये भाजपा नेता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विकास के जिस वादे के साथ आंधी की तरह देश भर में छा गए, उसे देश की अब तक की राजनीति में आशावाद का अनूठा उदाहरण माना जा सकता है। और उससे भी बड़ी बात ये कि उनका सबका साथ सबका विकास नारा इतना लोकप्रिय हुआ है कि तटस्थ मुस्लिमों को भी मोदी भाने लगे हैं। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के कुछ बयानवीर मोदी के विकास को पटरी से उतारने को उतारु हैं। हालत ये है कि खुद मोदी को संसद में अपनी मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के रामजादे बनाम हरामजादे वाले बयान पर खेद तक व्यक्त करके विपक्ष से अपील करनी पड़ी कि साध्वी के माफी मांग लेने के बाद मामला समाप्त मान लिया जाना चाहिए। मोदी जैसे प्रखर नेता के लिए ऐसी अपील करते हुए कितना कष्टप्रद रहा होगा, जब उन्हें यह दलील देनी पड़ी होगी कि साध्वी पहली बार मंत्री बनी हैं और उनकी पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह अकेला एक उदाहरण नहीं कि जिसमें मोदी को खुद के विकास के नारे से जागी आशा में खलल पड़ता दिखाई दिया होगा।
इसमें कोई दोराय नहीं कि भाजपा या यूं कहना ज्यादा उचित होगा कि देश में मोदी का राज लाने में हिंदूवादी संगठन आरएसएस की अहम भूमिका रही है, मगर आम जनता की ओर से जिस प्रकार झोलियां भर कर वोट डाले गए, उसमें मोदी के प्रति विकास की आशा भरी निगाहें टिकी हुई हैं। आम जन लगता है कि मोदी निश्चित ही देश की कायापलट कर देंगे। मगर दूसरी ओर कट्टर हिंदूवादी नेता इसे हिंदुत्व को स्थापित करने का स्वर्णिम मौका मान कर ऐसी ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो मोदी के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। एक ओर मोदी दुनिया भर में घूम कर अपनी छवि को मांजने में लगे हुए हैं तो दूसरी उन्हीं के साथी उनकी टांगे खींच कर सांप्रदायिकता के दलदल में घसीटने से बाज नहीं आ रहे।
देश के ताजा हालात पर जानीमानी पत्रकार तवलीन सिंह की एक टिप्पणी ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि खुद मोदी के ही साथी उनकी जमीन को खोखला कर रहे हैं। आपको बता दे कि यह तवलीन सिंह वही हैं, जिन्होंने लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी के पक्ष में लगभग एकपक्षीय पत्रकारिता की थी, लेकिन अब वे भी मानती हैं कि मोदी सरकार ने जब से सत्ता संभाली है, एक भूमिगत कट्टरपंथी हिन्दुत्व की लहर चल पड़ी है। ज्ञातव्य है कि उनकी यह टिप्पणी साध्वी निरंजन ज्योति के रामजादे बनाम हरामजादे वाले बयान पर आई है। लेकिन अफसोस कि इससे कोई सबक लेने के बजाय यह भूमिगत हिन्दू एजेण्डा अब गीता के बहाने और भी खतरनाक साम्प्रदायिक लहर पैदा करने जा रहा है।
मोदी सरकार की विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने जैसे ही हिन्दू धर्म ग्रन्थ गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने की मांग की, देश धर्मनिरपेक्ष तबका यह सोचने को मजबूर हो गया है कि आखिर भाजपा राजनीति की कौन सी दिशा तय करने की कोशिश कर रही है। इससे भी खतरनाक बयान हरियाणा के मुख्यमन्त्री मनोहरलाल खट्टर का आया है, जिन्होंने यह मांग की है कि गीता को संविधान से ऊपर माना जाना चाहिए। इसका साफ मतलब है कि खट्टर भारतीय संविधान की जगह गीता को भारत का संविधान बनाना चाहते हैं।
असल में ऐस प्रतीते होता है कि मोदी के प्रधानमन्त्री बनते ही संघ परिवार का हिन्दुत्व ऐसी कुलांचे मार रहा है, मानो इससे बेहतर मौका अपना एजेंडा लागू करने को नहीं मिलने वाला है। एक अर्थ में यह बात सही भी है। पिछली बार जब भाजपा को अन्य दलों के साथ सरकार बनाने का मौका मिला था तो उसे धारा 370, कॉमन सिविल कोड व राम मंदिर के अपने मौलिक एजेंडे को साइड में रखना पड़ा था, मगर अब जबकि भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई है, संघनिष्ठों को लगने लगा है कि यदि अब भी वे अपने एजेंडे को लागू न करवा पाए तो फिर जाने ऐसा मौका मिलेगा या नहीं। उन्हें ये खयाल ही नहीं कि मोदी ने हिंदूवादी एजेंडे को गौण कर विकास का नारा देने पर ही उन्हें सफलता हाथ लगी है। ऐसे में यह खतरा उत्पन्न होता नजर आ रहा है कि कहीं संघ खेमे के कुछ नेता कहीं मोदी के विकास को पटरी न उतार दें। आज जब देश महंगाई, भ्रष्टाचार से मुक्ति पा कर विकास के नए आयाम छूने के सपने देख रहा है, इस प्रकार के हिंदूवादी वादी मुद्दे उसकी आशाओं पर पानी न फेर दें, इसकी आशंका उत्पन्न होने लगी है। देखना ये है कि मोदी किस प्रकार संतुलन बना कर देश को विकास की दिशा में ले जाने में कामयाब हो पाते हैं।

सोमवार, दिसंबर 08, 2014

पायलट की जंबो कार्यकारिणी से भी संतुष्ट नहीं हुए कांग्रेसी

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने सभी को खुश करने के लिए जंबो कार्यकारिणी बनाई, बावजूद इसके प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ता इससे संतुष्ट नहीं हैं। कार्यकारिणी की घोषणा के तुरंत बाद विरोध के स्वर उठने लगे हैं। जहां जातिगत उपेक्षा के आरोप लग रहे हैं, वहीं काम करने वालों को जगह नहीं दिए जाने पर नाराजगी जाहिर की जा रही है। श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में चल रही पाटी भले ही महिलाओं को राजनीति में आगे लाने की पैरवी करती हो, मगर उनको भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाने का अफसोस है।
कुछ अति उत्साही कार्यकर्ता अपने विरोध को मुखर करने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक व वाट्स ऐप का उपयोग कर रहे हैं। देखिए एक बानगी-
कांग्रेस ने अपने सच्चे और सक्रिय कार्यकर्ता की अनदेखी कर सोशल मीडिया पर कांग्रेस से जुड़े तमाम युवाओं के जबे को ठेस पहुंचाई है। सोशल मीडिया पर पिछले पांच वर्ष से भी ज्यादा समय से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को प्रदेश में नई पहचान देने वाले और प्रदेश के युवाओं की टीम बनाने वाले लोकेश शर्मा को हाशिये पर रखना अपनी ही पार्टी के लिए काम कर रही पूरी टीम के साथ अन्याय किया गया है। जब प्रदेश में कांग्रेस की सोशल मीडिया पर कोई पहचान नहीं थी, तब लोकेश भैया ने इस काम को एक मुहिम के रूप में शुरू किया और धीरे-धीरे हम जैसे अनेक युवा उनके काम से प्रभावित होकर होकर उनसे जुड़ते चले गए। सरकार की योजनाएं हो, जनकल्याणकारी कार्य हो, कोई भी उपलब्धि हो या विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब देना हो, इस सबकी शानदार शुरुआत करके एक आंदोलन सोशल मीडिया पर उनके नेतृत्व में उनकी पूरी टीम चला रही है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों के कैम्पेन में पार्टी का पक्ष रखने में कोई कमी नहीं छोड़ी और उसके बाद भी लगातार उसी ऊर्जा के साथ हरेक सदस्य को जोश से लबरेज होकर काम करने को प्रेरित करते रहे। आज प्रदेश स्तर के उसी नेतृत्व की अनदेखी होते देख कर किसी भी सदस्य को समझ नहीं आ रहा कि पार्टी को क्या चाहिए, क्या काम करने वाले लोगों को मौके नहीं देने से पार्टी को सफलता हाथ लगेगी, क्या प्रदेश में मौजूद मजबूत टीम को दरकिनार कर राजस्थान कांग्रेस नए जुडऩे वाले लोगों को कोई सन्देश देने में सफल रहेगी?
वैसे बताया जाता है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लॉबी के हैं।
इसी प्रकार अखिल भारतीय रैगर महासभा (प्रगतिशील) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पी.एम. जलुथरिया ने रैगर समाज की उपेक्षा का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक भी पद पर रैगर समाज को जगह नहीं दी गई है। महासभा ने कांग्रेस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित कर कहा है कि समाज की प्रदेश में 35 लाख जनसंख्या है और करीब 25 लाख वोटर, लेकिन कांग्रेस को समाज के वोटरों को बंधुआ मान रखा है। पहले लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों में रैगरों को टिकट नहीं दिए, अब संगठन में भी उपेक्षा की गई हैैैै।
राजस्थान राज्य विमुक्त, घुमंतू, अर्द्ध घुमंतु कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष, गोपाल केसावत, जो कि कांगे्रस नेता ने भी कहा है कि परंपरागत वोट बैंक घुमंतू समाज की उपेक्षा की गई है। उनका सवाल है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घुमंतू बोर्ड का गठन किया व पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान ने संगठन में प्रकोष्ठ बनाया, मगर सचिन पायलट इस परंपरा को तोड़ रहे हैं।
कार्यकारिणी के प्रति महिलाओं में असंतोष देखा जा रहा है। इसकी वजह ये कि प्रदेश उपाध्यक्ष की 15 और महासचिव की 26 की सूची में केवल एक-एक महिला को शामिल किया गया है। सचिव की 43 नामों की सूची में 8 नाम हैं, मगर 14 कार्यकारिणी सदस्यों में केवल 2 को जगह मिल पाई है। इसी प्रकार स्थाई और विशेष आमंत्रित सदस्यों में 5 पदाधिकारी महिलाएं हैं। अर्थात कुल 131 की लंबी सूची में केवल 17 महिलाएं हैं।
यहां उल्लेखनीय है कि तनिक असंतोष की खबरों के बाद स्वयं पायलट ने यह कहा कि वे जरूरत होने पर कुछ और पात्र नेताओं को स्थान दिया जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, नवंबर 18, 2014

वसुंधरा का तख्ता पलट टला, मगर खतरा बरकरार

हालांकि लंबे इंतजार व जद्दोजहद के बाद राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने मंत्रीमंडल का विस्तार तो कर पाईं और इसके साथ ही उनके तख्तापटल की आशंकाएं टल गईं, मगर राजनीतिक हलकों में अब भी यही राय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री बने नहीं रहने देंगे। पिं्रट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर हालांकि बहुत कुछ खुल कर सामने नहीं आ पाया, मगर इन दिनों सर्वाधिक सक्रिय सोशल मीडिया पर तो साफ तौर पर ये खबरें चल रही थीं कि जल्द ही पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर राज्य के मुख्यमंत्री बना दिए जाएंगे।
असल में जिस प्रकार राज्य मंत्रीमंडल के विस्तार में बाधाएं आईं, जिसकी वजह से भाजपा को उपचुनाव में झटका भी झेलना पड़ा, उसी से लग गया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व वसुंधरा राजे के बीच सब कुछ ठीकठाक नहीं है। मंत्रीमंडल विस्तार के लिए वसुंधरा राजे को कई बार दिल्ली जाना पड़ा, मगर तकरीबन दस माह बाद जा कर उन्हें सफलता हासिल हो पाई। हालांकि मंत्रीमंडल को संतुलित किया गया है, मगर अब भी माना जाता है कि संघ लॉबी के घनश्याम तिवाड़ी व नरपत सिंह राजवी सरीखे कुछ प्रमुख नेता समायोजित नहीं हो पाए हैं, इस कारण मनमुटाव की फांस बरकरार है। यह तब और अधिक दुखदायी हो गई, जब पिछले दिनों वसुंधरा ने यह कह दिया कि इतना प्रचंड बहुमत किसी एक व्यक्ति का कमाल नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की मेहनत व जनता का आशीर्वाद है। इसको लेकर खूब खबरबाजी हुई। बताया जाता है कि इसको लेकर मोदी की नाराजगी और बढ़ गई है। वसुंधरा के इस बयान को सीधे तौर पर मोदी पर निशाना करने के रूप में देखा गया। जाहिर तौर पर वसुंधरा विरोधी लॉबी ने इसका फायदा उठाने की कोशिश की होगी। ऐसे में माना यही जा रहा है कि वसुंधरा राजे सुरक्षित तो कत्तई नहीं है। आम धारणा यही बनती जा रही है कि मोदी को जैसे ही मौका मिलेगा, वे वसुंधरा को निपटा देंगे। कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा वे दो-तीन माह में कर लेंगे, जबकि कुछ का मानना है कि स्थानीय निकाय चुनाव में उनको परफोरमेंस दिखाने के लिए कम से कम एक साल और मौका दिया जाएगा। बताया जाता है कि ओम प्रकाश माथुर को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के बाद वसुंधरा को कुछ राहत मिली है। वैसे भी ये माना जा रहा था कि माथुर को भले ही ऊपर से थोपने की कोशिश की जाए, मगर विधायकों की आमराय उनके पक्ष में बनाना कठिन होगा। माना जाता है कि वे एक अच्छे रणनीतिकार व संगठनकर्ता तो हैं, प्रशासनिक तौर पर उतने कुशल नहीं, जितना एक मुख्यमंत्री को होना चाहिए। इसी वजह से बीच में गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया का भी नाम सामने आया था।
कुल मिला कर माना यही जा रहा है कि वसुंधरा विरोधी लॉबी अभी तक सक्रिय है और वह घात लगा कर बैठी है कि कब उन्हें कमजोर साबित किया जाए। हाईकमान की भी उन पर पैनी नजर है। ऐसे में वसुंधरा को बहुत सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, नवंबर 13, 2014

क्या प्रो. जाट को मंत्री बनने के लिए पाला बदलना पड़ा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच के जगजाहिर संबंधों की ही वजह रही कि राजनीतिक विश्लेषक यह मान कर चल रहे थे कि अजमेर के सांसद प्रो. सांवरलाल जाट को केन्द्रीय मंत्रीमंडल में स्थान नहीं मिल पाएगा और यह उनके साथ सबसे बड़ा धोखा होगा। राज्य में किसी केबीनेट मंत्री को लोकसभा चुनाव लड़ाया जाए तो इसका मतलब यही माना जाना चाहिए कि अगर वह जीता और पार्टी की सरकार बनी तो केन्द्रीय मंत्रीमंडल में उसका स्थान पक्का होगा, मगर प्रो. जाट के साथ ऐसा होता नजर नहीं आ रहा था। बेशक उनकी पैरवी मुख्यमंत्री वसुंधरा कर रही थीं, मगर चूंकि मोदी व उनके बीच ट्यूनिंग को ठीक माना जा रहा, इस कारण कम से कम राजनीति के जानकार तो यही मान कर चल रहे थे कि प्रो. जाट शायद ही मंत्री बन पाएं। कदाचित इसका अहसास खुद प्रो. जाट को भी रहा होगा। उनके लिए अफसोसनाक बात ये भी थी जो नसीराबाद सीट उन्होंने छोड़ी उसके लिए उनके पुत्र को पार्टी ने टिकट नहीं दिया। ऐसे में अगर उन्हें मंत्री नहीं बनाया जाता तो समझा जा सकता है कि जाती तौर पर उनके साथ क्या बीतती। सो बताते हैं कि उन्होंने अकेले वसुंधरा के भरोसे रहना उचित नहीं समझा। मोदी के करीबी भाजपा नेता ओम प्रकाश माथुर के लगातार संपर्क में रहे। यह बात राजनीति के जानकारों की जानकारी में भी थी। मगर इसका जिक्र मीडिया में कहीं नहीं आया। जैसे ही प्रो. जाट को मंत्री बनाया गया तो पत्रकारों ने खुलासा किया कि वे माथुर के संपर्क में भी थे।
बात अगर राजनीतिक समीकरणों की करें तो यह सब को पता है कि माथुर व वसुंधरा के बीच कैसे संबंध हैं। एक बारगी तो यह अफवाह तक फैल गई थी कि वसुंधरा को हटा कर माथुर को मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है। अब समझा सकता है कि प्रो. जाट ने वसुंधरा के खासमखास होने के बाद भी माथुर से करीबी क्यों बढ़ाई। संभव है उन्हें लग रहा हो कि अकेले वसुंधरा उन्हें मंत्री नहीं बनवा पाएंगी। ऐसे में केवल वसुंधरा के भरोसे रह कर भला अपना राजनीतिक कैरियर काहे को खराब करते। जो भी हो माथुर से नजदीकी और मंत्री बनने में माथुर का हाथ होने की कानाफूसी का कुछ लोग ये भी अर्थ लगा रहे हैं कि प्रो. जाट ने ऐन वक्त पर पाला बदल लिया। कुछ लोग इसका ये भी अर्थ लगा रहे हैं कि वसुंधरा ने यह जानते हुए कि अकेले उनके दम पर वे मंत्री नहीं बन पाएंगे, खुद ही जाट से कहा होगा कि वे दूसरे चैनल पर भी काम करें। हालांकि अभी ये पक्का नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने पाला बदल लिया है, मगर यदि उनको मंत्री बनवाने में माथुर का हाथ रहा है, तो समझा जा सकता है कि अब मोदी व वसुंधरा में से कौन उनके लिए अहम रहेगा। वैसे भी केन्द्र में काम करना है तो मोदी के प्रति स्वामी भक्ति उन्हें दिखानी ही होगी।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, अक्टूबर 25, 2014

सोशल मीडिया ने तो बना दिया ओम प्रकाश माथुर को मुख्यमंत्री

एक ओर जहां राज्य मंत्रीमंडल के विस्तार की कवायद चल रही है, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया ने भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर को मुख्यमंत्री बना दिया है और अब बस औपचारिक घोषणा का इंतजार है।
हालांकि ये बात सही है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच ट्यूनिंग नहीं बैठने और असंतुष्ठ लॉबी के सक्रिय होने के कारण यह लग रहा है कि वसुंधरा राजे अब मुख्यमंत्री पद पर ज्यादा दिन नहीं रह पाएंगी। गोपनीय स्तर पर मुख्यमंत्री को हटाए जाने की कवायद भी चल रही है, जिसे मोदी का संरक्षण हासिल बताया जाता है। इस सनसनीखेज साजिश का खुलासा अपुन पहले ही कर चुके हैं। तब तक यही माना जा रहा था कि मोदी के खासमखास ओम प्रकाश माथुर की ताजपोशी होगी, मगर जैसे ही महाराष्ट्र के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया यह कयास लगाया जाना लगा कि शायद उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का विचार त्याग दिया गया है, इसी कारण फिर नई जिम्मेदारी दे दी गई है। इसमें कुछ लोगों का तर्क ये है कि एक तो उन्हें प्रशासनिक तंत्र को हैंडल करने का अनुभव नहीं है, दूसरा विधायकों के बीच वे आसानी से स्वीकार्य नहीं हैं। ऐसे में अगर वसुंधरा को हटाया भी गया तो गुलाब चंद कटारिया का नंबर आ सकता है।
जहां तक सोशल मीडिया पर माथुर की खबर चलने का सवाल है, उसका मजमून कुछ इस प्रकार है:-
ब्रेकिंग न्यूज- ओमप्रकाश माथुर होंगे राजस्थान के नये मुख्यमंत्री
जल्द ही राजस्थान को तानाशाही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया से मुक्ति मिलने की सम्भावना है। सूत्र बताते हैं कि वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी, अपने विधायकों पर तानाशाही रवैया रखने, 10 महीने में कुछ भी काम न हो पाना तथा केंद्र की वित्तीय सुविधाओं का उपयोग न कर पाने के कारण केन्द्रीय नेतृत्व ने उनको बदलने का फैसला कर लिया है। ऐसे में ओमप्रकाश माथुर का नाम प्रबल दावेदारों में सबसे ऊपर है।
जाहिर तौर पर राजस्थान की राजनीति से गायब हो चुके ओम प्रकाश माथुर चर्चा में आए तो उनके व्यक्तित्व की भी चर्चा होने लगी है। इस बारे में सोशल मीडिया पर अजमेर के वरिष्ठ पत्रकार एस पी मित्तल की एक टिप्पणी भी चल रही है। वो इस प्रकार है:-
ओम प्रकाश माथुर ने अपनी लाइन बड़ी की
सब जानते हैं कि भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री ओम प्रकाश माथुर और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे में छत्तीस का आंकड़ा है। राजनीतिक विवाद के चलते ही माथुर ने राजस्थान की राजनीति को छोड़ दिया। यदि माथुर वसुंधरा राजे के साथ विवादों में ही उलझते रहते तो शायद आज  इतने बड़ मुकाम पर नहीं पहुंचते। माथुर ने वसुंधरा राजे की लाइन को छोटा करने के बजाए स्वयं की लाइन को बड़ा करने की रणनीति अपनाई। माथुर ने पहले गुजरात में और फिर महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया। यही वजह रही कि इस बार माथुर को देश में सबसे बड़े उत्तर प्रदेश राज्य का प्रभारी बनाया गया है। आज माथुर जिस मुकाम पर खड़े हैं, वह राजस्थान की राजनीति से बहुत बड़ा है। माथुर की कामयाबी से राजस्थान के भाजपा नेताओं को सबक लेना चाहिए।
खैर, जो कुछ भी हो यह कहना कत्तई गलत नहीं होगा इस बार प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाली वसुंधरा उम्मीद के विपरीत कमजोर साबित हुई हैं। उनके मोदी से संबंध न होने की बात को इस कारण भी बल मिला क्योंकि यह चर्चा जबरदस्त रही कि पिछले दिनों एक सभा में उन्होंने यहां तक कह दिया कि किसी एक व्यक्ति के दम पर चुनाव नहीं जीता जाता, जीत में सभी का सहयोग होता है। जाहिर है उनका ये बयान सुन कर मोदी की जुबान का स्वाद खराब हुआ ही होगा। ऐसे में अगर वे उन्हें निशाने पर लेते हैं, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
-तेजवानी गिरधर

शुक्रवार, अक्टूबर 24, 2014

राज्य मंत्रीमंडल का विस्तार हर हालत में 27 तक होगा

राज्य मंत्रीमंडल के लंबे समय से प्रतीक्षित विस्तार का आखिर समय आ ही गया। कई बार चर्चा हुई कि विस्तार अब होगा, अब होगा, मगर हर बार किसी न किसी वजह से वह टलता ही रहा, मगर अब स्थिति यहां तक आ गई है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को आगामी 27 अक्टूबर तक विस्तार करना ही होगा।
असल में यूं तो वसुंधरा राजे के पास आगामी 15 नवंबर तक का समय था। तब नसीराबाद से विधायक बनने के बाद इस्तीफा देकर सांसद बने प्रो. सांवरलाल जाट के बिना विधायक रहते मंत्री बने रहने को छह माह पूरे होने हैं। इस बात की कोई संभावना भी नहीं थी कि उन्हें फिर से विधानसभा का चुनाव लडय़ा जाए। अगर विधायक रखना ही था तो इस्तीफा ही क्यों दिलवाते। खैर, चूंकि 15 नवंबर तक जाट को इस्तीफा देना ही होगा और उनके इस्तीफा देते ही न्यूनमत 12 मंत्रियों की बाध्यता आ जाएगी, यानि कि तब तक उन्हें मंत्रीमंडल का विस्तार करना ही होगा। मगर इस बीच समस्या ये आ गई कि राज्य में कुछ स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए आचार संहिता 28 अक्टूबर को लागू हो जाएगी और तब वे मंत्रीमंडल का विस्तार नहीं कर पाएंगी, इस कारण अब यह लगभग पक्का ही है कि 27 अक्टूबर तक किसी भी सूरत में जाट का इस्तीफा और मंत्रीमंडल का विस्तार कर दिया जाएगा। इसमें भी एक पेच बताया जा रहा है। भाजपा हाईकमान की इच्छा है कि फिलहाल जाट के इस्तीफा देने के साथ सिर्फ एक-दो नए मंत्री बना दिए जाएं और पूरा विस्तार बाद में किया जाए, मगर जानकारी ये है कि वसुंधरा ठीक से विस्तार करना चाहती हैं। अब देखना ये है कि क्या हाईकमान वसुंधरा राजे को अपनी बात मानने में कामयाब हो जाता है या फिर वसुंधरा की इच्छा को पूरा किया जाता है।
कुल मिला कर मंत्रीमंडल विस्तार के लिए उलटी गिनती शुरू होने के साथ मंत्री बनने के इच्छुक विधायकों में हलचल तेज हो गई है। बनने में कौन कामयाब होगा, ये तो वक्त ही बताएगा।
-तेजवानी गिरधर

रविवार, अगस्त 31, 2014

राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट

हालांकि राजस्थान में श्रीमती वसुंधरा राजे के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत से भाजपा ने कामयाबी हासिल कर सत्ता हासिल की है और ऐसे में इसकी अस्थिरता की कल्पना करना भी नासमझी कहलाएगी, मगर राजनीति हल्कों में इस किस्म की चर्चा आम है कि भाजपा हाईकमान राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं तलाश रहा है अथवा एक गुट विशेष वसुंधरा को अपदस्थ करने की फिराक में है।
बेशक ऐसी बात कपोल कल्पित ही लगती है, मगर जिस प्रकार आठ माह बीत जाने के बाद भी पूर्ण मंत्रीमंडल गठित नहीं हो पाया, उससे इसकी आशंका तो महसूस की ही जा रही है कि जरूर केन्द्र व राज्य में कहीं न कहीं कोई गतिरोध है। संभव है ऐसा मंत्री बनाने को लेकर पसंद-नापसंद को लेकर है। ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा हाईकमान विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी श्रीमती वसुंधरा को फ्रीहैंड देने के मूड में नहीं हैं। और इसी को लेकर खींचतान चल रही है। एक ओर जहां प्रचंड बहुमत से भाजपा को जिताने वाली वसुंधरा कम से कम राजस्थान में अपनी पसंद का ही मंत्रीमंडल बनाना चाहती हैं, वहीं केन्द्र में सत्तारूढ़ हो कर मजबूत हो चुकी भाजपा अपनी हिस्सेदारी, जिसे कि दखल कहना ज्यादा उपयुक्त होगा, रखना चाहती है। असल में वे दिन गए, जब केन्द्र में भाजपा विपक्ष में और कमजोर थी और वसुंधरा विधायकों के दम पर उस पर हावी थी, मगर अब हालात बदल गए हैं। केन्द्रीय नेता देश की सरकार चला रहे हैं। वे ज्यादा पावरफुल हो गए हैं। ऐसे में वे राजस्थान के मामले में टांड अड़ा रहे हैं। इसी अड़ाअड़ी के बीच ये चर्चा हो रही है कि मोदी राजस्थान में अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, जो उनके इशारे पर काम करे, वसुंधरा की तरह आंख में आंख मिला कर बात न करे। बताया जाता है कि मोदी की शह पर प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि माथुर मोदी के कितने करीबी हैं। इस सिलसिले में तकरीबन सत्तर विधायकों की एक गुप्त बैठक भी हुई और जोड़तोड़ की कवायद चल रही है। मसले का एक पहलु ये भी है कि मोदी पूरे देश में अपने हिसाब से ही जाजम बिछाना चाहते हैं। केन्द्रीय मंत्रियों पर शिकंजे और अपने ही शागिर्द अमित शाह को भाजपा अध्यक्ष बनवाने से यह साफ है कि वे इंदिरा गांधी वाली शैली में काम कर रहे हैं। आपको याद होगा कि इंदिरा गांधी के सामने जा कर बात करने के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री उनकी भृकुटी के अंदाज का पूरा ख्याल रखा करते थे।
खैर, मोदी की शह पर राज्य में अंडरग्राउंड चल रही हलचल कितनी कामयाब होगी, यह कहना मुश्किल है, मगर इससे कम से कम वसुंधरा जरूर अचंभित हैं। हालांकि वे इतनी चतुर राजनीतिज्ञ हैं कि एकाएक कोई बड़ा बदलाव नहीं होने देंगी, मगर इतना जरूर है कि पिछली बार की तरह वे शेरनी की शैली नहीं अपना पा रही हैं। दमदार नेतृत्व के बावजूद उनके ओज में आई कमी को साफ तौर पर देखा जा सकता है। असल में पहले जब सीमित विधायक थे, तब उनका उन पर एकछत्र राज था, मगर इस बार ढ़ेर सारे विधायकों को संभालना आसान नहीं रहा है। उसमें आरएसएस लॉबी के विधायक लामबंदी कर रहे हैं, जो कि वसुंधरा के लिए सिरदर्द है। जो कुछ भी हो, मगर आने वाले दिनों में कुछ ऐसा साफ झलकेगा कि केन्द्र वसुंधरा पर शिकंजा रखना चाहती है, ताकि वे एक क्षत्रप की तरह मनमानी न कर पाएं।
-तेजवानी गिरधर