आपने कोडी देखी होगी। यूं तो उसकी कोई कीमत नहीं मानी जाती, मगर है वह बेषकीमती। आइये, जानते हैं कि वह अनूठी और बेषकीमती कैसे है। आज भले ही मुद्रा के रूप में सिक्के चलन में है, मगर पुराने समय में उसका उपयोग सिक्के के रूप में प्रयोग होता था। विवाह, पूजा, तांत्रिक साधनाओं, खेल-कूद, जैसे चौपड़ आदि में भी उसका उपयोग होता रहा है। कुछ पारंपरिक खेलों में कोड़ियां फेंककर अंक निकाले जाते थे। कोड़ी कई खेल जैसे चौसर और चंग पो में इस्तेमाल होती है। वैसे आम बोलचाल में उसकी कीमत अत्यंत सस्ती मानी जाती है, जिसका मूल्य नगण्य है। तभी तो किसी के लिए यह कहा जाता है कि यह तो कोड़ी भर भी कीमत नहीं रखता। या यह तो दो कोडी का आदमी है। कोड़ी को लेकर आपने बहुत सी कहावतें सुनी होंगी, जैसे दो कोड़ी की औकात ना होना, कल के हजार से आज की कौड़ी अच्छी, पैसा न कोड़ी-बाजार जाए दौड़ी, कोड़ी-कोड़ी पर जान देना, दूर की कौड़ी, कोड़ी के भाव बिकना।
वस्तुतः कोडी एक तरह का छोटा सा समुद्री शंख है, जो छोटा, चिकना, गोलाई लिए हुए होता है। कोड़ी समुद्र से निकले एक जीव का आवरण है, जिसे वह मर जाने के बाद छोड़ देता है। कोड़ी कई रंगों में मिलती है जैसे सफेद, पीली और हरी। समुद्र से निकलने के कारण इसे लक्ष्मी का रूप भी माना जाता है। इसलिए कुछ लोग इसे लक्ष्मी कोडी भी कहते हैं। इसका इस्तेमाल पुराने जमाने में धन और सामान के अदल-बदल में पैसे के रूप में भी किया जाता था। लक्ष्मी के पूजन में कोड़ी रखी जाती है। तांत्रिक भी इस इस्तेमाल बहुधा जादू-टोने में किया करते हैं। वषीकरण, अर्थात किसी को बस में करने के लिए कोड़ी ब्रह्मास्त्र का काम करती है। एक टोटका है कि कोई पैसा न लौटाए तो 3 कोड़ी उसके घर के सामने फेंक देते हैं या जमीन में दबा देते हैं। इसके अतिरिक्त सजावट और भगवान की आंख बनाने में भी कोड़ी का इस्तेमाल किया जाता है।
पुराने जमाने में एक नई और साफ-सुथरी कोड़ी तीन फूटी कोड़ी के बराबर मानी जाती थी। दस कोड़ी देने पर एक दमड़ी (तांबे का सिक्का) मिलती थी। दो दमड़ी देने पर एक धेला मिलता था। एक धेले के बदले में डेढ पाई मिलती थी। तीन पाई का एक पैसा और चार पैसे के बराबर एक आना होता था। सोलह आने के बराबर 64 पैसे होते थे। उसकी कीमत एक रुपया होती थी। आज भले ही एक रुपए की कोई कीमत नहीं रही, मगर कोड़ी आज भी अनमोल है। दिलचस्प बात है कि अजमेर में आज भी दरगाह इलाके में इसका उपयोग किया जाता है।
कोड़ी, जिसे आम बोलचाल में हम अक्सर तुच्छ मानकर “दो कोड़ी का” कहकर किसी की अवहेलना कर देते हैं, वास्तव में अपनी प्रकृति, इतिहास और उपयोग में बेहद अनूठी और बेशकीमती रही है। आपने कोड़ी अवश्य देखी होगीकृछोटी, चिकनी, गोलाई लिए हुए समुद्र की लहरों से निकली यह सुंदर सी वस्तु कभी मुद्रा, कभी पूजन सामग्री, कभी तांत्रिक साधना और कभी खेल-कूद का अभिन्न हिस्सा रही है। आज भले ही सिक्कों और नोटों ने मुद्रा का स्थान ले लिया हो, लेकिन पुराने समय में कोड़ी का आर्थिक और सामाजिक महत्व आश्चर्यजनक रूप से बड़ा था।
दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अजमेर के दरगाह क्षेत्र में आज भी कोड़ी का उपयोग देखने को मिल जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि कोड़ी केवल एक समुद्री वस्तु नहीं, बल्कि भारत की परंपरा, अर्थव्यवस्था, आस्था और लोकजीवन का जीवित प्रतीक है। जो वस्तु कभी मुद्रा, श्रद्धा, शक्ति और खेलकृचारों रूपों में उपयोगी रही, वह वास्तव में “बेशकीमती” ही कही जा सकती है, चाहे हम उसे दो कोड़ी की ही क्यों न कहें।
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