तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

गुरुवार, अप्रैल 20, 2017

कानून के शिकंजे में जकड़ा भाजपा का शीर्ष पुरुष

जैसा कि मीडिया में आशंका जाहिर की जा रही है कि लाल कृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी को राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर करने की खातिर ही सोची समझी साजिश के तहत बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमा चलाया जा रहा है, अगर ये सच है तो राजनीति वाकई निकृष्ठ चीज है। भले ही सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से यह स्थापित हो रहा हो कि कानून सब के लिए समान है, मगर भाजपा के शीर्ष पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के लिए यह जीते जी मर जाने के समान है। जिस राम मंदिर आंदोलन के वे सूत्रधार रहे, उसने देश की दशा व दिशा बदली, उसी की परिणति में भाजपा दो सीटों से बढ़ कर आज सत्ता पर काबिज है, मगर उसी की परिणति में वे खुद उम्र के इस पड़ाव पर भी कानून के शिकंजे में जकड़े हुए हैं। कैसी विडंबना है कि जिस राम के नाम पर कुछ नेता आज सत्ता का सुख भोग रहे हैं, और आगे और भी ज्यादा ताकतवर होना चाहते हैं, उन्हीं राम की खातिर आडवाणी के हाथों हुआ कथित कृत्य उनको सलाखों के करीब ले आया है। यह तब और ज्यादा दर्दनाक हो जाता है कि जब पार्टी की खातिर किए गए बलिदान की एवज में ईनाम का मौका आया तो उन्हें उससे वंचित रखने के लिए अपने ही लोग नए सिरे से शिकंजे में कसना चाहते हैं। उस पर तुर्रा ये कि औपचारिकता निभाते हुए पार्टी आपके साथ खड़ी है।
बाबरी मस्जिद के विध्वंस की साजिश में अगर वे शामिल थे, यह कोर्ट में साबित हो जाता है तो उन्हें सजा होनी ही है, होनी ही चाहिए, मगर क्या यह सच नहीं है कि उसी विध्वंस ने हिंदुओं को लामबंद किया, ऊर्जा भरी और उसी सांप्रदायिक धु्रवीकरण की बदौलत भाजपा आज पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है। कोर्ट को यह तो दिख जाएगा कि साजिश करने वाले कौन थे, मगर उसे यह कदापि नजर नहीं आएगा कि उसी साजिश के परिणामस्वरूप  पार्टी के कुछ और नेता सत्तारूढ़ हो कर इठला रहे हैं। बकौल आडवाणी,  राम मंदिर आंदोलन से वे गौरवान्वित हैं, मगर उसी आंदोलन की वजह से बने मार्ग पर चल कर सुशोभित तो कुछ और रहे हैं।
यह भी एक संयोग या भाजपा के लिए सुयोग है कि मुकदमे में रोज सुनवाई होगी और जब तक फैसला आने वाला होगा तब तक प्रतिदिन राम मंदिर का नाम सुर्खियों में रहेगा, जिसका लाभ स्वाभाविक रूप से भाजपा उठाएगी ही। अगर आरोपित बरी हो गए तो ठीक, नहीं तो इसे हिंदुओं के लिए शहादत के रूप में भुनाया जाएगा। यानि कि भुगतेंगे शहादत देने वाले और भोगेंगे कंगूरे।
इस कष्ट की पीड़ा कितनी गहरी होगी, ये तो आडवाणी ही जानते होंगे कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वे न केवल हाशिये पर धकेल दिए गए, अपितु अनुशासन के नाम पर उनका मुंह भी सिल गया है। वे अपना ब्लॉग तक लिखना छोड़ चुके हैं। संगठन के हित को लेकर कभी कुछ टिप्पणी भी की और मौजूदा नेतृत्व को रास नहीं आया तो उन्होंने न बोलने का फैसला कर लिया। यहां तक कि भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी या कार्यसमिति तक में उन्होंने चुप्पी साधे रखी है।
देश के सर्वोच्च पद के मुहाने पर खड़े शख्स को यदि सामने सलाखें नजर आ जाएं तो उसकी मन:स्थिति की व्याख्या करना नितांत असंभव है। मरने के बाद पीछे क्या होता है, किसी ने नहीं देखा, मगर जीते जी अपनी दुर्गति देखने वाले को शायद मृत्यु से भी हजारों गुणा भयंकर पीड़ा होती होगी। तभी कुछ लोग कहते हैं कि स्वर्ग और नर्क कहीं ऊपर नहीं, यहीं धरती पर है, यहीं पर है।
तेजवानी गिरधर
सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय से जहां हमारी न्यायिक व्यवस्था पर गर्वानुभूति होती है, उसी व्यवस्था पर शर्म भी आनी चाहिए कि 25 साल तक  मुकदमा चलने के बाद भी उसका फैसला नहीं आया। अभी दो साल और इंतजार करना होगा। इस बीच साजिश रचने के 21 आरोपियों में से 8 तो इस दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। धन्य है।
और उधर उमा भारती को देखिए, उन्हें तो कोई मलाल ही नहीं। कहती हैं-कोई साजिश नहीं हुई, साजिश तो अंधेरे में होती है, वहां तो जो हुआ, खुल्लम-खुल्ला हुआ...। अयोध्या में राम मंदिर के लिए फांसी चढऩे को भी तैयार हूं। कोई माई का लाल मंदिर बनने से रोक नहीं सकता।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, अप्रैल 19, 2017

क्या ऐसा आडवाणी को राष्ट्रपति पद से दूर रखने के लिए हुआ?

तेजवानी गिरधर
बाबरी विध्वंस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के बुधवार को आए अहम फैसले को राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले आगामी चुनाव के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया तो इस सवालों से अटा पड़ा है कि क्या ऐसा पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को इस पद की दौड़ से अलग करने के लिए किया गया है? उल्लेखनीय है कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत 12 नेताओं पर आपराधिक साजिश का मुकदमा चलाने के आदेश हुए हैं और दूसरी ओर आडवाणी राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार माना जाते है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट व सीबीआई पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, ऐसे में मूल रूप से इस तरह का सवाल बेमानी है, मगर पिछले सालों में सीबीआई की भूमिका को लेकर जिस तरह से प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं, इस कारण लोगों को इस तरह की संभावना पर सहसा यकीन भी हो जाता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने तो बाकायदा अपने बयान में ऐसा कह ही दिया, जिसकी प्रतिक्रिया में भाजपा के रविशंकर प्रसाद की ओर से इतना भर जवाब आया कि वे खुद व खुद के परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर ध्यान दें। एक बात और। वो यह कि इस फैसले से यह संदेश भी तो गया ही है कि सरकार सीबीआई व सुप्रीम कोर्ट के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती, भले ही भाजपा के दिग्गजों का मसला हो।
ज्ञातव्य है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी सरीखों को जिस तरह से मार्गदर्शक मंडल के नाम पर हाशिये पर रख छोड़ा गया है, पार्टी के अधिसंख्य लोगों के लिए यह तकलीफ है कि जिन नेताओं ने पार्टी को अपने खून पसीने से सींचा है, उनकी यह दुर्गति ठीक नहीं है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस तरह एक तानाशाह की तरह मजबूत बने हुए हैं, उनको पार्टी में कोई चुनौति देने वाला नहीं है, मगर फिर भी आडवाणी व जोशी जैसे नेताओं के कुछ न कुछ गड़बड करने का अंदेशा बना ही रहता है। इस कारण पार्टी के भीतर इस प्रकार की राय बनाई जाने लगी कि आडवाणी को राष्ट्रपति बना कर उपकृत कर दिया जाए। इससे वह काला दाग भी धुल जाएगा कि पार्टी में वरिष्ठों को बेकार समझ कर अलग-थलग कर दिया जाता है। मगर साथ यह भी ख्याल रहा कि अगर आडवाणी सर्वोच्च पद पर बैठा दिए गए तो कहीं वे सरकार के कामकाज में दिक्कतें न पैदा करते रहें। चाहे कुंठा की वजह से ही, मगर आडवाणी का इस प्रकार का स्वभाव सामने आता रहा है। कदाचित प्रधानमंत्री मोदी की भी यही सोच हो, इस कारण उन्हें उलझा दिया है, ताकि उन्हें राष्ट्रपति बनाने का जो दबाव बन रहा है, उसकी हवा निकल जाए। इसी सिलसिले में पिछले दिनों जिस तरह से संघ प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की मांग उठी है, उसे भी इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है, ताकि आडवाणी के नाम से ध्यान हटे। ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों मुस्लिम युवा आतंकवाद विरोधी समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष शकील सैफी ने अजमेर में सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हाजिरी दे कर यह दुआ मांगी कि भागवत को राष्ट्रपति बनाया जाए। अगर मुस्लिम ही हिंदुओं के शीर्षस्थ नेता को राष्ट्रपति बनाने की मंशा जाहिर करें तो वह वाकई चौंकाने वाला था। जियारत की प्रस्तुति से ही लग रहा था कि यह सब प्रायोजित है।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से सब भौंचक्क हैं। हर कोई अपने हिसाब से आकलन कर रहा है। कुछ का कहना है कि ऐसा उन नेताओं को शिकंजे में रखने के लिए किया गया है, जिनकी राम मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका है और इसी वजह पार्टी में उनकी अलग ही अहमियत रहती है। मोदी कभी नहीं चाहते कि बुरे वक्त में पार्टी को खड़ा करने वाले अपने बलिदान के नाम पर उन पर किसी प्रकार कर दबाव बनाए रखें। बतौर बानगी इन्हीं में से एक उमा भारती का बयान देखिए वे तो कह  रही हैं कि बाबरी विध्वंस के लिए साजिश का तो सवाल ही नहीं उठता, जो कुछ हुआ खुल्लमखुल्ला हुआ। उन्हें तो गर्व है कि वे मन, वचन व कर्म से राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी हुई रही हैं। है न बिंदास तेवर।
-तेजवानी गिरधर
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रविवार, अप्रैल 16, 2017

सचिन पायटल पर हाथ मारना चाहती है भाजपा?

तेजवानी गिरधर
जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक हलकों में अफवाहों का बाजार गर्म हो रहा है। बाजारवाद के दौर में मीडिया भी ऐसे बाजार का हिस्सा बनता दिख रहा है। प्रदेश के एक बड़े दैनिक समाचार पत्र में देश की राजधानी से लीड खबर आई कि राजस्थान में भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट को अपने खेमे में शामिल करना चाहती है। बताया गया कि उन्हें बाकायदा ऑफर भी दी जा चुकी है कि उन्हें केन्द्रीय मंत्री बना दिया जाएगा। हालांकि अभी तक सचिन ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। बताया गया है कि भाजपा की कांग्रेस के ऐसे ही कुछ और चेहरों यथा मिलिंद देवड़ा व नारायण राणे पर भी भाजपा की नजर है। है न विस्फोटक खबर या यूं कहिये ब्लास्टिंग अफवाह।
खबर में दम भरने के लिए बाकायदा तर्क भी दिया गया है। वो यह कि पिछले विधानसभा चुनाव में रसातल में पहुंच चुकी कांग्रेस को सजीव करने के लिए सचिन ने एडी से चोटी का जोर लगा रखा है। यह सच भी है। वाकई सचिन की मेहनत के बाद आज स्थिति ये है कि इस धारणा को बल मिलने लगा है कि अगली सरकार कांग्रेस की ही होगी। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक लगातार गहलोत-गहलोत की रट लगाए हुए हैं। अर्थात रोटी तो पकाएं सचिन व खाएं गहलोत। भाजपा सचिन व गहलोत के बीच की कथित नाइत्तफाकी का लाभ लेना चाहती है। वह सचिन के दिमाग में बैठाना चाहती है कि कांग्रेस के लिए दिन रात एक करने के बाद भी ऐन वक्त पर कांग्रेस गहलोत को मुख्यमंत्री बना सकती है। ऐसे में बेहतर ये है कि भाजपा में चले आओ।
राजस्थान वासियों के लिए यह खबर हजम करने के लायक नहीं है, मगर भाजपा ने उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में जो प्रयोग किया, उससे लगता है कि वह सत्ता की खातिर किसी भी हद तक जा सकती है। वैसे भी उसे अब कांग्रेसियों से कोई परहेज नहीं है। भाजपा व मोदी को पानी पी पी कर कोसने वालों से भी नहीं। ज्ञातव्य है कि चुनाव से कुछ समय पूर्व ही उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा भाजपा में शामिल हो गई थीं। उसके सकारात्मक परिणाम भी आए। उन्हें बाकायदा ईनाम भी दिया गया। संभव है भाजपा ऐसा ही प्रयोग राजस्थान में दोहराना चाहती हो। वह जानती है कि सचिन इस वक्त राजस्थान में कांग्रेस के यूथ आइकन हैं। ऊर्जा से लबरेज हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता पर काबिज भी हो सकती है। अगर वह उन्हें तोडऩे में कामयाब हो गई तो राजस्थान में कांग्रेस की कमर टूट जाएगी। वे गुर्जर समाज के दिग्गज नेता भी हैं। उनके जरिए परंपरागत कांग्रेसी गुर्जर वोटों में भी सेंध मारी जा सकती है। हालांकि इस बात की संभावना कम ही है कि सचिन भाजपा का ऑफर स्वीकार करें, मगर इस खबर से यह संकेत तो मिलता ही है कि भाजपा राजस्थान में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस में तोडफ़ोड़ के मूड में है।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, अप्रैल 15, 2017

क्या वसुंधरा का मुख्यमंत्री पद से हटना टल जाएगा?

तेजवानी गिरधर
राजनीति में प्रति पल बदलते समीकरणों के बीच धौलपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को शानदार जीत दिलवाने के बाद क्या श्रीमती वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री पद से हटने की अफवाहों पर विराम लगेगा?ï यह सवाल बदले बदले हालात के कारण राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषया बना हुआ है।
असल में इस चुनाव से पूर्व पिछले दिनों मीडिया में यह खबर आम हो गई थी कि श्रीमती वसुंधरा को मुख्यमंत्री पद से हटा कर केन्द्र में विदेश मंत्री बनाया जाएगा। उनके स्थान पर वरिष्ठ भाजपा नेता ओम माथुर को मुख्यमंत्री सौंपे जाने की चर्चा थी। हालांकि इसकी पुष्टि न होनी थी और न ही हुई, मगर जिस प्रकार मीडिया में बार बार यह खबर उछल रही थी, यह आम धारणा सी बन गई थी कि जल्द ही वसुंधरा को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा रहा है। हाल ही में ओम माथुर के राजस्थान प्रवास के दौरान जिस प्रकार उनके समर्थकों ने उनका स्वागत किया, उससे भी इस धारणा को बल मिला। माथुर ने भी खंडन नहीं किया और यही कहा कि पार्टी जो भी जिम्मेदारी देगी, वे उसका बखूबी निर्वहन करेंगे।
अब जबकि वसुंधरा ने धौलपुर में पार्टी को शानदार जीत दिलवाई दी है तो यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अब भी उनकी सीट को खतरा है? यहां यह कहने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती कि उन्होंने इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था। अपनी पूरी ताकत इसमें झौंक दी थी। हालांकि विधानसभा में उनके पास जितना बंपर बहुमत हासिल है, इस चुनाव में जीत कर एक सीट और हासिल करना उनके लिए कत्तई जरूरी नहीं था, फिर भी उन्होंने जीतने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। वे चाहती थीं कि इस जीत से यह साबित हो जाए कि उनका दबदबा अब भी कायम है, लोग भले ही चर्चा कर रहे हों कि भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। वसुंधरा समर्थक भाजपाइयों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केलिए अब वसुंधरा को हटाना आसान नहीं होगा। उनकी बात में दम भी है, कि जब तीन साल बाद भी वसुंधरा का जादू कायम है तो उन्हें हटाने का क्या औचित्य है। जहां तक स्वयं वसुंधरा का सवाल है तो वे कभी नहीं चाहेंगी कि उन्हें राजस्थान से जाना पड़े। इसके लिए वे एडी चोटी का जोर लगा देंगी। बहुत अधिक दबाव आने पर ही समझिये कि वे केन्द्र में जाने को तैयार होंगी।
दूसरी ओर वसुंधरा के हटने का इंतजार कर रहे भाजपाई मानते हैं कि मात्र एक सीट पर जीतने का तो कोई मसला ही नहीं है। असल मोदी की दूरगामी योजना है और वे आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वसुंधरा को हटाना चाहते हैं। जैसी कि चर्चा है कि अगले चुनाव में जनता भाजपा को पलटी खिला देगी, वे इस संभावना को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहते हैं। उनकी मंशा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल उनके नाम पर ही लड़ा जाए, जिससे जीतने के बाद अपनी पसंद से मुख्यमंत्री बना सकें।
बहरहाल, बहुत जल्द ही साफ हो जाएगा कि क्या राजस्थान में सत्ता  का हस्तांतरण वसुंधरा से माथुर या और किसी और को होगा। इसकी वजह  ये है कि इस प्रकार के परिवर्तन के लिए यही उपयुक्त समय है। पार्टी में ऊर्जा भरने व नई जाजम बिछाने के लिए कम से कम एक-डेढ़ साल तो चाहिए ही। यदि अभी परिवर्तन नहीं हुआ तो बाद में होना मुश्किल हो जाएगा। देखते हैं क्या होता है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, मार्च 28, 2017

सत्ता परिवर्तन को हवा देने के लिए माथुर भी जिम्मेदार

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम प्रकाश माथुर लाख मना करें कि राजस्थान में चल रही सत्ता परिवर्तन की बातें सिर्फ राजनीति से प्रेरित हैं और इन बातों को में कोई दम नहीं है, मगर साफ दिख रहा है कि कुछ न कुछ तो गड़बड़ है। और सबसे बड़ी बात ये कि ऐसी गड़बड़ होने के जो कारक हैं, उसके जिम्मेदार वे खुद हैं। न वे समर्थकों को अपने स्वागत में आयोजित समारोह इत्यादि की इजाजत दें और न ही ऐसा माहौल बने। वे चाहें तो समर्थकों को स्वागत करने से इंकार कर सकते हैं। अव्वल तो समर्थकों को पता कैसे लगता है कि वे कब, कितने बजे, कहां से गुजरेंगे।
असल में जब से उत्तर प्रदेश में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला है और मोदी और ताकतवर हुए हैं, तभी से यह माहौल बना हुआ है। रोजाना इस आशय की खबरें छप रही हैं। जब वे जानते हैं कि उनके स्वागत की खबरों से ही यह संदेश जा रहा है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन हो रहा है, तो काहे को स्वागत करवा रहे हैं। आखिरकार वे पार्टी के जिम्मेदार नेता हैं, उन्हें पार्टी के बीच हो रही गुटबाजी को रोकना चाहिए, न कि बढऩे देना चाहिए। स्पष्ट है कि उनकी रुचि इसी बात में है कि स्वागत के बहाने शक्ति प्रदर्शन होता रहे। साथ ही यह भी संदेश जाए कि वे भी मुख्यमंत्री पद की लाइन में हैं। अगर यह मान भी लिया जाए कि भाजपा हाईकमान राज्य में सत्ता परिवर्तन करने के मूड में नहीं है तो भी जिस प्रकार उनका उत्साह से स्वागत हो रहा है, वह इस बात का संकेत है कि भाजपा का एक धड़ा वसुंधरा की जगह उनको देखना चाहता है। और अगर दबाव ज्यादा बना व भाजपा के कर्ताधर्ता नरेन्द्र मोदी जो जच गई कि वसुंधरा को हटाना है तो सत्ता परिवर्तन में देर भी नहीं लगेगी।
एक बात और। भाजपा नेता सत्ता परिवर्तन की संभावना से नकारते हुए कहते हैं कि यह सब मीडिया की ओर से पैदा की गई खबरें हैं। यानि कि पार्टी के भीतर हो रही हलचल को स्वीकार करने की बजाय उसका दोषी मीडिया को बनाया जा रहा है। सवाल ये उठता है कि क्या मीडिया को कोई सपना है कि आपकी पार्टी मेें कुछ चल रहा है। मीडिया उसी खबर को उजागर करता है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं न कहीं वजूद में होती है। कोरी हवा में कोई भी खबर नहीं बनाई जाती।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, मार्च 23, 2017

आगे चल कर मोदी के लिए समस्या बन सकते हैं योगी?

उत्तर प्रदेश में बंपर बहुमत के बाद जिस नाटकीय ढंग से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ काबिज हुए हैं, उसको लेकर इस आशंका का बीजारोपण हो गया है कि आगे चल कर योगी मोदी के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। यह सवाल इसलिए मौजूं हैं क्योंकि मोदी एक तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं, जो कि फिलहाल भाजपा के लिए मुफीद है, मगर मोदी स्टाइल का दूसरा फायर ब्रांड स्थापित होता है तो वह मोदी के लिए दिक्कत पैदा कर सकता है। हालांकि मोदी अपनी जिस तूफानी लहर पर सवार हो कर प्रधानमंत्री बने हैं और अब भी उनके नाम का जलवा कायम है, मगर योगी के मुख्यमंत्री बनते ही जिस प्रकार उन्हें युवा हिंदू सम्राट के नाम से विभूषित किया जा रहा है, जिस प्रकार कट्टर हिंदूवादी भावना हिलोरें ले रही है, वह इस आशंका को जन्म देती है कि अगर उन्होंने राम मंदिर के अतिरिक्त हिंदू हित पर कुछ अतिरिक्त करके दिखा दिया तो बहुसंख्यक हिंदू समाज में उनकी प्रतिष्ठा मोदी से भी कहीं अधिक न हो जाए।
बात अगर मुख्यमंत्री के चयन को लेकर हो रही कवायद की करें तो मीडिया में यह आमराय थी कि मोदी ने मनोज सिन्हा के नाम पर हरी झंडी दे दी थी। नाम तय होने के साथ ही जिस प्रकार उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत हो रहा था, वह इस बात की पुष्टि करता है। जानकारी के अनुसार इस बीच योगी यकायक सक्रिय हो गए। जीत कर आए भाजपा विधायकों का एक समूह भी दबाव बनाने लगा, जिसे टालना असंभव प्रतीत हो रहा था। संघ ने भी उन्हीं के पक्ष में वीटो जारी कर दिया। ऐसे में मोदी न चाह कर भी योगी के नाम पर सहमति देने को मजबूर हो गए। इस सिलसिले में योगी के शपथग्रहण समारोह में मोदी के चेहरे पर पसरे तनाव को नोटिस किया गया है। बताते हैं कि वे आम दिनों में जिस तरह लोगों से गर्मजोशी के साथ मिलते हैं, वह गर्मजोशी काफूर थी। उलटे होना तो यह चाहिए था कि वे और अधिक उत्साहित होते, क्योंकि उन्हीं की कथित सुनामी पर सवार हो कर भाजपा प्रचंड बहुमत से उत्तरप्रदेश पर काबिज हुई।
बताया जाता है कि मोदी खेमे की ओर से अध्यक्ष अमित शाह का तर्क था कि योगी आक्रामक शैली के कट्टर हिंदूवादी नेता हैं, जो कि मोदी के सबका साथ, सबका विकास के नारे के अनुकूल नहीं है। इस पर संघ की ओर से दलील आई कि छवि तो मोदी की भी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते कट्टर हिंदूवादी की थी, फिर भी दूरगामी सोच रख कर उनको प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया गया। ऐसे में योगी की छवि पर सवाल करना बेमानी है। समझा जाता है कि संघ ने सोची समझी रणनीति के तहत योगी को मुख्यमंत्री पद पर सुशोभित करवाया है। यह संघ के हिंदूवादी बनाम राष्ट्रवादी एजेंडे का हिस्सा है। राजनीतिक विचारकों का मानना है कि ऐसा इसलिए भी किया गया कि अगर मोदी संघ पर हावी होते हैं तो उनका विकल्प पहले से तैयार कर लिया जाए। इसके अतिरिक्त जिन नारों की बदोलत मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वे पूरे होने असंभव हैं, ऐसे में अगर आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी की चमक कम होने लगी तो कट्टर हिंदूवादी चेहरे के मालिक योगी को बहुसंख्यक हिंदुओं को लामबंद आगे ला कर दुबारा चुनाव जीता जा सकता है। कुल मिला कर ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी की योगी नामक संतति पिता से भी अधिक शौर्यवान निकली, जिसे कि कुछ लोग भस्मासुर तक की संज्ञा दे रहे हैं, जिस प्रकार भस्मासुर वरदान प्राप्त करने के बाद शिवजी को ही भस्म करने पर उतारु हो गया था।
योगी का मोदी के पहली पसंद न होने की बात से नाइत्तफाकी रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक हालांकि यहीं कहते हैं कि भाजपा, संघ व मोदी एक लाइन पर ही काम कर रहे हैं और कोई अंतरविरोध नहीं है, मगर वे भी यह बात तो स्वीकार करते ही हैं कि योगी का अभिषेक दीर्घकालिक एजेंडे के तहत दक्षिणपंथी राजनीति का एक बड़ा खिलाड़ी तैयार करना है, जो 2024 में मोदी का उपयुक्त उत्तराधिकारी बन सके। वस्तुत: मोदी ब्रांड के नाम पर फिलहाल भाजपा ने जो इमारत खड़ी की है, उसकी मजबूरी है कि सबका साथ, सबका विकास मंत्र ले कर ही कायम रह पाएगी। मोदी की भूमिका सिर्फ यहीं तक है। हिंदूवाद के अगले लक्ष्य हिंदू राष्ट के लिए योगी जैसा चेहरा ही काम आएगा। जिस प्रकार दो के अंक से दहाई के अंक तक भाजपा को लाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को भूमिका पूरी होने के बाद हाशिये पर रख दिया गया, ठीक वैसे ही मोदी की भूमिका समाप्त होने के बाद उन्हें भी हाशिये पर टांग दिया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। असल में संघ की नजर अपने दर्शन पर रहती है, व्यक्ति उसके लिए गौण होता है, वह साधन मात्र होता है।
तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, मार्च 21, 2017

क्या राजस्थान में भी मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा चुनाव?

उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में किसी का चेहरा सामने रखने की बजाय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर चुनाव लडऩे से मिली बंपर कामयाबी के बाद भाजपा में इस बात पर गंभीरता से विचार हो रहा बताया कि राजस्थान में भी आगामी विधानसभा चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा जाए।
यह लगभग सर्वविदित हो चुका है कि मोदी और राजस्थान की मौजूदा मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के बीच ट्यूनिंग ठीक नहीं है और इसी वजह से यह चर्चा कई बार सामने आई है कि मोदी उनके स्थान पर किसी और को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, बस उन्हें पलटने का मौका नहीं मिला या फिर साहस नहीं हुआ। इस सिलसिले वरिष्ठ भाजपा नेता व मोदी के विश्वासपात्र ओम प्रकाश माथुर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। सांसद भूपेन्द्र सिंह यादव भी लाइन में हैं। हाल ही उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम के बाद भी इस आशय की चर्चा शुरू हुई है। विचार इस बात पर हो रहा है कि ओम प्रकाश माथुर अथवा किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जाए अथवा नहीं। चुनावी रणनीति के रूप में अभी से यह तैयारी कर ली जाए कि आगामी चुनाव मोदी के नाम पर लड़ा जाए या नहीं। इस सिलसिले में वसुंधरा राजे का वह बयान भी जेहन में रखना होगा कि अगला चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, जो कि उन्होंने सरकार के तीन साल पूरे होने पर दिया था। ज्ञातव्य है कि इसका विरोध घनश्याम तिवाड़ी ने किया था। राजनीतिक पंडित वसुंधरा के बयान के निहतार्थ खोजने में लग गए थे।
बहरहाल, यह आम धारणा है कि चूंकि वसुंधरा राजे के चेहरे में वह आकर्षण नहीं रह गया है, जिसके दम पर पिछली बार कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। हालांकि इस पर भी विवाद था कि वह मोदी लहर थी या वसुंधरा का जलवा। भाजपा भी जानती है कि इस बार वसुंधरा के चेहरे पर चुनाव लडऩे पर अपेक्षित परिणाम आना संदिग्ध है, इस कारण मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा हुई, मगर समस्या ये रही कि उनसे बेहतर चेहरा पार्टी के पास है नहीं। इसी बीच उत्तर प्रदेश के चुनाव हो गए। इसके परिणामों ने पार्टी में यह आम राय कायम होने लगी है कि मोदी के नाम में अब भी जादू है, लिहाजा वसुंधरा राजे की जगह किसी और का चेहरा सामने लाने की बजाय मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ा जाए। इससे एक लाभ ये हो सकता है कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ वाले दावेदारों के बीच खींचतान समाप्त हो जाएगी और पार्टी एकजुट रहेगी। दूसरा ये भी ख्याल है कि जैसे पिछली बार जीत का श्रेय वसुंधरा राजे के लेेने पर तनिक विवाद हुआ था, वह नहीं होगा। उससे भी बड़ी बात ये कि जब मोदी के नाम पर जीत हासिल कर ली जाएगी तो मोदी को अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाने में आसानी रहेगी।
वैसे राजनीति के जानकारों का मानना है कि केवल मोदी के नाम पर चुनाव लडऩे से पहले पार्टी उत्तर प्रदेश व राजस्थान के राजनीतिक समीकरणों की तुलना जरूर करेगी। उसकी वजह ये है कि उत्तर प्रदेश में तो भाजपा को बीस साल की एंटी इन्कंबेंसी का लाभ मिला, जब कि राजस्थान में तो भाजपा का राज और यहां उसके खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी का फैक्टर काम करेगा। एक सोच ये भी है कि मोदी का नाम आने पर एंटी इन्कंबेंसी का फैक्टर गौण हो जाए।
बहरहाल, इतना तय है कि राजस्थान में पार्टी नई रणनीति के तहत ही चुनाव मैदान में उतरेगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
8094767000