तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, दिसंबर 23, 2012

मोदी को डर व लालच में दिया मुसलमानों ने वोट


गुजरात विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को रिझाने का प्रहसन करने के बावजूद एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिए पर सभी राजनीति जानकार चक्कर में पड़ गए। और मजे की बात ये रही कि मोदी को मुस्लिम बहुल सीटों पर वोट भी भरपूर मिले। इससे विश्लेषकों की माथापच्ची और बढ़ गई। वे यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर इसकी वजह क्या है। इस बीच खुद भाजपा के ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने यह कह कर सभी को चौंका दिया है कि गुजरात में मुसलमानों ने भी नरेंद्र मोदी को वोट दिया, क्योंकि इसके पीछे उनका डर व लालच था। डर इस बात का कि वे मोदी के खिलाफ जाकर उनकी आंखों की किरकिरी नहीं बनना चाहते थे और लालच था विकास का।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने मोदी को ही वोट दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि मोदी की ही सरकार बननी है तो फिर काहे को उनसे दुश्मनी मोल ली जाए। उनकी इस बात में काफ दम नजर आता है। इसके पीछे एक तर्क भी समझ में आता है। वो यह कि मोदी के राज में गिनती के कट्टरपंथी मुसलमानों को उन्होंने कुचल दिया, इस कारण टकराव मोल लेने वाला कोई रहा ही नहीं। रहा सवाल शांतिप्रिय व व्यापार करने वाले अधिकतर मुसलमान का तो उसे तो अमन की जिंदगी चाहिए, फिर भले ही सरकार मोदी ही क्यों न हो। वह यह भी जानता है कि मोदी रहे तो कट्टरपंथी कभी उठ ही नहीं पाएगा, ऐसे में टकराव कौन मोल लेगा। यही सोच कर उन्होंने मोदी को वोट दिया। कदाचित वे यह समझते थे कि अगर कांग्रेस आई तो एक बार फिर तुष्टिकरण के चलते कट्टरपंथी ताकतवर होगा कि उनकी शांतिप्रिय जिंदगी के लिए परेशानी का सबब ही बनेगा। ऐसे में बेहतर यही है कि मोद को वोट दे दिया जाए, ताकि मोदी खुश भी हो जाएं ओर तंग नहीं करें।
मुसलमानों के दमन का आरोप झेल रहे मोदी के लिए यह राहत की बात रही कि एक भी मुसलमान को टिकट नहीं देने के बाद भी मुसलमानों ने उनका समर्थन किया। शायद इसी वजह से उन्होंने अपनी जीत के बाद आयोजित सबसे पहली सभा में इशारों ही इशारों में मुसलमानों से उन्हें हुई किसी भी प्रकार की तकलीफ के लिए माफी मांग ली।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, दिसंबर 20, 2012

बसपा फिर कर रही है राजस्थान में चुनाव की तैयारी

हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव के बाद राजस्थान के सभी बसपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने से बसपा को बड़ा भारी झटका लगा था, मगर अपने वोट बैंक के दम पर बसपा ने फिर से चुनाव मैदान में आने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती को उम्मीद है कि पदोन्नति में आरक्षण के लिए सतत प्रयत्नशील रहने के कारण बसपा के वोट बैंक में और इजाफा होगा, जिसे वे किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहेंगी।
असल में बसपा ने अपना जनाधार तो बसपा के संस्थापक कांशीराम के जमाने में ही बना लिया था और कांगे्रेस से नाराज अनुसूचित जाति अनेक मतदाता बसपा के साथ जुड़ गए थे। स्वयं कांशीराम ने भी भरपूर कोशिश की, मगर अच्छे व प्रभावशाली प्रत्याशी नहीं मिल पाने के कारण उन्हें कुछ खास सफलता हासिल नहीं हो पाई। इसके बाद भी बसपा सक्रिय बनी रही और उसे पिछले चुनाव में छह विधायक चुने जाने पर उल्लेखनीय सफलता हासिल हुई। मगर मायावती के उत्तरप्रदेश में व्यस्त होने के कारण वे राजस्थान में ध्यान नहीं दे पाईं। नतीजतन पार्टी के सभी छहों विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए और पार्टी को एक बड़ा झटका लग गया। असल में बसपा का मतदाता आज भी मौजूद है, मगर पार्टी को कोई दमदार राज्यस्तरीय चेहरा नहीं मिल पाने के कारण संगठनात्मक ढ़ांचा बन नहीं पा रहा। समझा जाता है कि उत्तरप्रदेश में सत्ता गंवाने के बाद मायावती ने राजस्थान पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। इस बार उन्हें कोई दमदार चेहरा यहां मिल पाता है या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा, मगर इतना जरूर तय है कि पार्टी पूरे जोश-खरोश से एक बार फिर चुनाव मैदान में जरूर उतरेगी। लक्ष्य यही है कि किसी भी प्रकार दस-बीस सीटें हासिल कर ली जाएं, ताकि बाद में सरकार के गठन के वक्त नेगासिएशन किया जा सके।
हालांकि अभी राजस्थान में बसपा की कोई गतिविधियां नहीं हैं, मगर उसका जनाधार तो है ही। वस्तुत: बसपा अपनी वोट बैंक की फसल को ठीक से काट नहीं पा रही है। बसपा का राजस्थान में कितना जनाधार है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनाव में बसपा ने 199 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, जिनमें से 53 सीटें ऐसी थीं, जिनमें बसपा ने 10 हजार से अधिक वोट हासिल किए थे। छह पर तो बाकायदा जीत दर्ज की और बाकी 47 सीटों पर परिणामों में काफी उलट-फेर कर दिया।
बेशक बसपा राजस्थान में अभी तीसरा विकल्प नहीं बन पाई है, मगर उसका ग्राफ धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। आपको ख्याल होगा कि बसपा ने राजस्थान में 1998 में खाता खोला था। तब पार्टी के 110 में से 2 प्रत्याशी बानसूर से जगत सिंह दायमा और नगर से मोहम्मद माहिर आजाद जीते थे। इसके बाद 2003 में 124 प्रत्याशी मैदान में उतरे थे, उनमें से बांदीकुई से मुरारीलाल मीणा और करौली से सुरेश मीणा विधानसभा पहुंचे। इसी प्राकर 2008 में 199 प्रत्याशियों में से 6 ने जीत दर्ज कर जता दिया कि बसपा धीरे-धीरे ही सही, तीसरे विकल्प की ओर बढ़ रही है। हालांकि उसके सभी विधायक कांग्रेस में चले गए, मगर इससे उसके वोट बैंक पर कोई असर पड़ा होगा, ऐसा समझा जाता है। प्रसंगवश बता दें कि 2008 में नवलगढ़ से राजकुमार शर्मा, उदयपुरवाटी से राजेन्द्र सिंह गुढ़ा, बाडी से गिर्राज सिंह मलिंगा, सपोटरा से रमेश, दौसा से मुरारीलाल मीणा और गंगापुर से रामकेश ने जीत दर्ज की थी। इसके अतिरिक्त दस सीटों सादुलपुर, तिजारा, भरतपुर, नदबई, वैर, बयाना, करौली, महवा, खींवसर और सिवाना पर कड़ा संघर्ष करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया था। वोटों के लिहाज से देखें तो पार्टी को सादुलपुर व करौली में चालीस हजार से ज्यादा वोट मिले। इसी प्रकार नदबई, खींवसर, हनुमानगढ़ व लूणी में तीस हजार से ज्यादा वोट मिले। तिजारा, भरतपुर, वैर, बयाना, महवा, सिवाना, करनपुर, रतनगढ़, सूरजगढ़, मंडावा, अलवर ग्रामीण, धौलपुर, मकराना, पीपलदा सूरतगढ़, संगरिया व हिंडौन में बीस हजार से ज्यादा वोट हासिल किए। कुल मिला आंकड़े यह साफ जाहिर करते हैं कि यहां बसपा का उल्लेखनीय जनाधार तो है, बस उसे ठीक मैनेज कर सीटों में तब्दील करने के लिए रणनीति बनाई जाए। जानकारी के अनुसार इस बार खुद मायावती इस ओर ध्यान दे रही हैं। उनकी रणनीति क्या होगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
-तेजवानी गिरधर

सोमवार, दिसंबर 17, 2012

यानि कि हेडली मामले से सबक नहीं लिया


ब्रह्मा मंदिर
अजमेर में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह की जियारत के नाम पर बिना वीजा के पाकिस्तानियों के आने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही दो पाकिस्तानी नागरिकों का पुष्कर आ कर लौट जाना और उसके बाद उनके आने का खुलासा होना यह साबित करता है कि अजमेर की पुलिस व खुफिया एजेंसियों ने मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड डेविड कॉलमेन हेडली के पुष्कर की रेकी करके चले जाने वाली सनसनीखेज घटना से कोई सबक नहीं लिया है। इस ताजा घटना से पुलिस तंत्र की नाकामी साफ साबित हो रही है। अब जिस होटल में वे पाक नागरिक ठहरे थे, उसके प्रबंधन व पुलिस एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।
ज्ञातव्य है कि 10 दिसम्बर को मुम्बई पहुंचे करांची निवासी इम्तियाज हुसैन और लाहौर निवासी जमशेख बशीर भाटी के पास 7 दिन का वैध वीजा था। इसके तहत वे मुम्बई, आगरा और अजमेर घूम सकते थे, लेकिन ये लोग भारतीय नियमों को धत्ता बताते हुए पुष्कर के अनन्ता होटल में आकर वापस चले गये। गौरतलब है कि विश्व का एक मात्र ब्रह्मा मंदिर और इजरायलियों का धर्म स्थल बेद खबाद आतंकियों के निशाने पर हैं। इसके बावजूद सुरक्षा को लेकर ना तो पुलिस गंभीर है न ही गुप्तचर एजेंसियां।
यहां उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी बिना वीजा के अजमेर व पुष्कर में पाक नागरिकों के आने की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। कितने अफसोस की बात है कि एक ओर बम विस्फोट के बाद दरगाह को और अधिक संवेदनशील माना जा रहा है और सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने के दावे किए जाते हैं, दूसरी ओर पाकिस्तानी नागरिक बिना वीजा के बड़ी आसानी से यहां चले आते हैं। दावे चाहे जो किए जाएं, मगर न तो हमने दरगाह बम विस्फोट से सबक लिया है और न ही मुंबई ब्लास्ट के मास्टर माइंड व देश में आतंकी हमले करने का षड्यंत्र रचने के आरोप में अमेरिका में गिरफ्तार डेविड कॉलमेन हेडली के सीआईडी की आंख में सुरमा डालने से कुछ सीखा है। हेडली मामले में तो पुलिस तंत्र की बड़ी किरकिरी हुई थी।
बेद खबाद
बिना वीजा-पासपोर्ट के अजमेर आने वालों का सिलसिला काफी लंबा है। अब तक अनेक पाकिस्तानी व बांग्लादेशी पकड़े जा चुके हैं, मगर इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकाला जा सका है। पकड़े गए घुसपैठिये तो रिकार्ड पर हैं, पर जो नहीं पकड़े जा सके हैं, उनका तो अनुमान ही लगाना कठिन है। ज्यादा चौंकाने वाली बात तो ये है कि अपराधी किस्म के या मकसद विशेष के लिए अजमेर आने वाले तो चलो शातिर हैं, मगर केवल जियारत के मकसद से भी यहां बड़ी आसानी से पहुंच रहे हैं। स्पष्ट है कि न तो सीमा पर पूरी चौकसी बरती जा रही है और न ही अजमेर जैसे संवेदनशील स्थान के बारे में पुलिस गंभीर है। रहा सवाल सरकार का तो वह भी सख्त नजर नहीं आती है। जरूर इस प्रकार बिना वीजा-पासपोर्ट के पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वालों पर अंकुश लगाने के लिए प्रावधान लचीले हैं, तभी तो घुसपैठियों में कोई खौफ नहीं है।
बहरहाल, इस प्रकार लगातार बढ़ती जा रही धुसपैठ की घटनाओं से अंदेशा यही है कि अजमेर में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। कोई आतंकी भी इस प्रकार बिना पासपोर्ट व वीजा के अजमेर या पुष्कर पहुंच जाएगा और वह कोई हरकत कर गायब हो जाएगा और पुलिस हाथ ही मलती रह जाएगी।
-तेजवानी गिरधर

गुरुवार, दिसंबर 13, 2012

पकड़े रहो नए जिले बनने का झुनझुना

राजस्थान में नए जिले बनाने को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लग रहा है कि इसके लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट देने के लिए तीन माह का और समय मांग लिया है। यानि कि फिलहाल सब्र करना होगा और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले बजट सत्र तक आशा को मन में संजो कर रखना होगा।
इस मुद्दे पर एचबीसी न्यूज चैनल के डीडवाना संवाददाता हनु तंवर निशब्द ने फेसबुक पर लिखा है कि राज्य सरकार नए जिलों की घोषणा के लिए श्री जीएस संधू की अध्यक्षता में बनाई गई विशेष समिति ने जिलों की घोषणा से सम्बंधित रिपोर्ट के लिए तीन माह का समय और मांगा है । अभी तक इस समिति के पास 31 दिसंबर तक का समय था जिसमें समिति को नए जिलों के प्रस्ताव सरकार को देने थे । गत बजट में राज्य सरकार ने नए जिले बनाने के लिए एक समिति गठन करने की घोषणा की थी बजट में इस समिति को सितम्बर में रिपोर्ट देनी थी लेकिन इस अवधि को बढाकर बाद में दिसंबर कर दिया गया लेकिन दिसंबर में भी समिति अपनी रिपोर्ट नहीं दे पायेगी । एक तरफ जहाँ राज्य सरकार ने नए जिलों की मांग कर रहे कस्बो को और आम नागरिकों को इस घोषणा के बाद बड़े बड़े आयोजन करके शक्ति प्रदर्शनों के लिए मजबूर कर दिया वहीँ अब सरकार इन घोषणाओं को रोक कर जनता की भावनाओं के साथ कुठारघात कर रही है । मिडिया के जरिये बार बार सरकार जनता को भ्रमित भी करने की कोशिश कर रही है । जिले बनाने की क़तार में खड़े शहरों की आम जनता सरकार के चार वर्ष पूर्ण करने के समारोह को बड़ी आशा की नज़रों से देख रहे थे लेकिन 13 तारिख निकलते ही इन शहरों की जनता की भावनाओ के साथ एक बार और कुठारघात हुआ और जिलों की घोषणा नहीं हुई । लेकिन लोगों को आशा अभी भी है की चुनाव से पूर्व आने वाले बजट में सरकार इन जिलों की घोषणा अवश्य करेगी । लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह अवश्य ही जनता की भावनाओ के साथ खिलवाड़ होगा और इसमे कोई अतिस्योक्ति नहीं होगी की जनता इसका हिसाब चुनावों में अवश्य चुकाएगी।
निशब्द की इस टिप्पणी पर प्रतिटिप्पणी करते हुए केकड़ी के पत्रकार पीयूष राठी ये विचार जाहिर किए हैं:- चाहे ये शहर जिले बने न बने मगर जनता को तो क्षेत्रीय राजनेताओ और सरकार ने एक झुनझुना पकड़ा ही दिया है और इस झुनझुने को पत्रकारों द्वारा भी बड़े जोश फरोश के साथ हिलाया जा रहा है...और जैसे एक मदारी अपना खेल दिखाने से पूर्व झुनझुना हिला कर लोगो का आकर्षण प्राप्त करता है ठीक वैसे ही हालात इन शहरों में निवास कर रही जनता के है...जिला बने न बने मगर ये अपनी डफली बजा कर एक मांग जर्रूर कर लेंगे की भाई इस बार तो तकनीकी खामिया रह गयी एक बार और जीता दो तो जिला बनने से इस क्षेत्र को कोई नहीं रोक सकता...मगर ये पब्लिक है सब जानती है....
एक समाचार पत्र के सर्वे के अनुसार राजस्थान में मौजूदा क्षेत्रीय विधायकों से उनकी क्षेत्रीय जनता काफी नाखुश है....अब देखो आखिर क्या होता है जिलों का....या फिर ये जिल्जिला ही रह जाता है....
कुल मिला कर यह माना जा सकता है कि सरकार कभी अपना स्टैंड साफ नहीं करती और लोगों को झुनझुना पकड़ा देती है। ब्यावर को जिला बनाने की मांग को ही लीजिए। यह मांग पिछले बीस साल से हो रही है। कांग्रेस व भाजपा, दोनों के ही नेताओं स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत व अशोक गहलोत ने आश्वासन दे कर वोट हासिल किए और बाद में चुप्पी साध ली। ब्यावर अभी जिला बना नहीं और उससे पहले ही केकड़ी के विधायक व सरकारी मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा ने अगला चुनाव जीतने के लिए केकड़ी को जिला बनवाने का वादा कर दिया। अब देखना ये है कि क्या आगामी बजट सत्र में इस पर कुछ होता है या नहीं।
-तेजवानी गिरधर

शनिवार, दिसंबर 08, 2012

यूपीए की नहीं असल जीत तो मायावती की हुई


बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती ने एफडीआई के मामले में राज्यसभा में सरकार के पक्ष में मतदान करके एक तीर से कई शिकार कर लिए। हालांकि इस मामले में भाजपा की करारी हार हुई और कांग्रेस की तिकड़मी जीत, मगर मायावती ने जो जीत हासिल की है, उसके गहरे राजनीतिक मायने हैं।
बेशक मायावती पर भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने दोहरी भूमिका का जो सवाल उठाया, उसका सीधा सपाट जवाब मायावती के पास नहीं है, मगर पलट कर उन्होंने जो कटाक्ष किए, उससे भाजपा की बोलती बंद हो गई। उनका साफ मतलब था कि वे कब क्या करेंगी, कुछ नहीं कहा जा सकता और अपनी पार्टी के हित के लिये वे जो कुछ उचित समझेंगी, करेंगी। ऐसा नहीं कि मायावती ने ऐसा पहली बार किया है, इससे पहले भी इसी तरह की चालें चल चुकी हैं। ये वही मायावती हैं, जिन्होंने सत्ता की खातिर कथित सांप्रदायिक पार्टी भाजपा से हाथ मिला कर उत्तरप्रदेश में समझौते की सरकार ढ़ाई साल चलाई, पूरा मजा लिया और जैसे ही भाजपा का नंबर आया, समझौता तोड़ दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि मायावतीवाद यही है कि साम, दाम, दंड, भेद के जरिए येन केन प्रकारेण दलित को सत्ता में लाया जाए। उसमें फिर कोई भी आदर्श आड़े नहीं आता। असल में यह उन सैकड़ों वर्षों का प्रतिकार है, जिनमें सवर्ण वर्ग ने दलितों का सारे आदर्श और मानवता ताक पर रख कर दमन किया। इसी प्रतिकार की जद में उन्होंने अपने धुर विरोधी मुलायम सिंह को भी नहीं छोड़ा। उन्होंने कांग्रेस को जो समर्थन दिया, उसके पीछे एक कारण ये भी है कि वे दूसरे पलड़े में बैठ कर मुलायम का वजन कम करना चाहती हैं। ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता से माया को बेदखल करने वाले मुलायम लगातार कोशिश कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव जल्दी हो जाएं। विधानसभा चुनावों में जो अप्रत्याशित बहुमत एसपी को मिला था वह लोकसभा में भी मिले। ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर वह दिल्ली में ताकत बढ़ाना चाहते हैं ताकि दिल्ली पर राज करने का सपना पूरा कर सकें। इसके लिए उन्होंने तैयारी भी कर ली है। मगर मायावती चाहती हैं कि केन्द्र सरकार स्थिर बनी रहे और कुछ समय और निकाले, ताकि विधानसभा चुनावों के समय जो माहौल एसपी के पक्ष में बना था, वह धीरे-धीरे कम हो जाए। जो फायदा एसपी को अभी मिल सकता है वह 2014 में नहीं मिलेगा। इसके अतिरिक्त वे मुलायम की बार्गेनिंग पावर को भी कम करना चाहती हैं और सरकार को स्पष्ट समर्थन देकर यह संदेश दे दिया है कि सरकार का आंकड़ा पूरा है और समय से पहले चुनाव की कोई संभावना नहीं है। यह भी साफ हो चुका है कि मुलायम केंद्र का साथ छोड़ दें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। माया का समर्थन उसके लिए काफी होगा।
कुल मिला कर मायावती की कार्यशैली की चाहे जितनी आलोचना की जाए, मगर राजनीतिक हथकंडों में उनका कोई सानी नहीं है। यूं कुछ इसी प्रकार की फितरत मुलायम भी रखते हैं। जब मीडिया ने उनसे पूछा कि आप संसद में एफडीआई का विरोध करते हैं ओर उसे लागू करने के लिए अपरोक्ष रूप से कांग्रेस को संबल प्रदान करते हैं, इस पर वे बोले कि ये तो राजनीति है, हम कोई साधु-संन्यासी थोड़े ही हैं। यानि कि भले ही भाजपा लोकतंत्र और मर्यादा की लाख दुहाई दे, मगर जातिवाद के जरिए राजनीति पर हावी मायावती व मुलायम वही करेंगे, जो कि उन्हें करना है।
 -तेजवानी गिरधर

रविवार, दिसंबर 02, 2012

सुषमा ने कब कहा कि मोदी पीएम इन वेटिंग हैं?

इन दिनों जैसे ही किसी नेता के मुंह से कुछ निकलता है, मीडिया तुरंत उसका पोस्ट मार्टम करने लग जाता है। सच कहें तो मुंह से निकलता नहीं, बल्कि जबरन मुंह में ठूंस दिया जाता है। मीडिया सवाल ही ऐसे करता है कि नेता को जवाब देना पड़ जाता है। फिर उसकी हां या ना के अपने हिसाब से मायने निकाल लिए जाते हैं।
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को ही लीजिए। उन्होंने अपनी ओर से कहीं नहीं कहा कि मोदी पीएम इन वेंटिंग हैं, अथवा पार्टी की ओर दावेदारी कर रहे हैं। उनसे पूछा गया था कि क्या मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं, इस पर उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा कि मोदी हर दृष्टि से प्रधानमंत्री पद के लायक हैं। इसका अर्थ ये कत्तई नहीं होता कि वे भाजपा की ओर से पेश किए जा रहे हैं अथवा वे दावेदारी कर रहे हैं। मगर अर्थ ये ही निकाला गया कि वे मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने के पक्ष में हैं। न केवल अर्थ निकाला गया अपितु उस पर बड़ी बड़ी स्टोरीज तक चलाई जाने लगी।
कल्पना की कीजिए कि अगर वे कहतीं कि मोदी दावेदार नहीं हो सकते तो उसके कितने खतरनाक मायने होते। सीधी से बात है कि वे ये तो किसी भी सूरत में नहीं कह सकती थीं कि वे दावेदार नहीं हो सकते। उन्हें तो कहना ही था कि हां, दावेदार हो सकते हैं, जो कि एक सच भी है। इसी सच को जैसे ही उन्होंने स्वीकारोक्ति दी, मीडिया ने तो भाजपा की ओर से मोदी को प्रधानमंत्री ही बना दिया।
मीडिया का अगर यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा आएगा कि नेता लोग मीडिया के सामने आना ही बंद कर देंगे कि वे कुछ का कुछ अर्थ निकाल लेते हैं। इसके अतिरिक्त वे मीडिया की इस आदत का फायदा भी उठा सकते है और जो बात उन्हें राजनीति के बाजार फैंकनी होगी, उसका हल्का का इशारा कर देंगे।
-तेजवानी गिरधर

बुधवार, नवंबर 28, 2012

केजरीवाल पर हेगड़े की आशंका में दम है


सामाजिक आंदोलन के गर्भ से राजनेता के रूप में पैदा हुए अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को बने जुम्मा जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए हैं कि उसकी सफलता पर आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं। यूं तो जब वे टीम अन्ना से अलग हट कर राजनीति में आने की घोषणा कर रहे थे, तब भी अनेक समझदार लोगों ने यही कहा था कि राजनीतिक पार्टियों व नेताओं को गालियां देना आसान काम है, मगर खुद अपनी राजनीतिक पार्टी चलना बेहद मुश्किल। अब जब कि पार्टी बना ही ली है तो सबसे पहले टीम अन्ना के सदस्य कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने ही प्रतिक्रिया दी है कि उसकी सफलता संदिग्ध है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक 546 सदस्यों को चुनने के लिए एक बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है। यह कार्य इतना आसान नहीं है। आज के समय में किसी भी राजनीतिक पार्टी को चलाने के लिए काफी चीजों की जरूरत पड़ रही है।
हेगड़े की इस बात में दम है कि आम आदमी पार्टी के विचार तो बड़े ही खूबसूरत हैं, मगर सवाल ये है कि क्या वे सफल हो पाएंगे? यह ठीक वैसे ही है, जैसे एक फिल्मी गाने में कहा गया है किताबों में छपते हैं चाहत के किस्से, हकीकत की दुनिया में चाहत नहीं है। केजरीवाल की बातें बेशक लुभावनी और रुचिकर हैं, मगर देश के ताजा हालात में उन्हें अमल में लाना नितांत असंभव है। यानि कि केजरवाल की हालत ऐसी होगी कि चले तो बहुत, मगर पहुंचे कहीं नहीं। उनकी सफलता का दरवाजा वहीं से शुरू होगा, जहां से व्यावहारिक राजनीति के फंडे अमल में लाना शुरू करेंगे।
अव्वल तो केजरीवाल उसी सिस्टम में दाखिल हो गए हैं, जिसमें नेताओं पर जरा भी यकीन नहीं रहा है। ऐसे में अगर वे सोचते हैं कि भाजपा की तरह वे भी पार्टी विथ द डिफ्रेंस का तमगा हासिल कर लेंगे तो ये उनकी कल्पना मात्र ही रहने वाली है। यह एक कड़वा सच है कि जब तक भाजपा विपक्ष में रही, सत्ता को गालियां देती रही, तब तक ही उसका पार्टी विथ द डिफ्रेंस का दावा कायम रहा, जैसे ही उसने सत्ता का स्वाद चखा, उसमें वे भी वे अपरिहार्य बुराइयां आ गईं, जो कांग्रेस में थीं। आज हालत ये है कि हिंदूवाद को छोड़ कर हर मामले में भाजपा को कांग्रेस जैसा ही मानते हैं। किसी पार्टी की इससे ज्यादा दुर्गति क्या होगी कि जिसे बड़ी शान से अनुशासित पार्टी माना जाता था, उसी में सबसे ज्यादा अनुशासनहीनता आ गई है। आपको ख्याल होगा कि भाजपा सदैव कांग्रेस के परिवारवाद का विरोध करते हुए अपने यहां आतंरिक लोकतंत्र की दुहाई देती रहती थी, मगर उसी की वजह से आज उसकी क्या हालत है। कुछ राज्यों में तो क्षेत्रीय क्षत्रप तक उभर आए हैं, जो कि आए दिन पार्टी हाईकमान को मुंह चिढ़ाते रहते हैं। राम जेठमलानी जैसे तो यह चैलेंज तब दे देते हैं उन्हें पार्टी से निकालने का किसी में दम नहीं। इस सिलसिले में एक लेखक की वह उक्ति याद आती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दुनिया में लोकतंत्र की चाहे जितनी महिमा हो, मगर परिवार तो मुखियाओं से ही चलते हैं। पार्टियां भी एक किस्म के परिवार हैं। जैसे कि कांग्रेस। उसमें भी लाख उठापटक होती है, मगर सोनिया जैसा कोई एक तो है, जो कि अल्टीमेट है। कांग्रेस ही क्यों, एकजुटता के मामले में व्यक्तिवादी पार्टियां यथा राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, अन्नाद्रमुक, द्रमुक, शिवसेना आदि आदि भाजपा से कहीं बेहतर है। ऐसे में केजरीवाल का वह आम आदमी वाला कोरा आंतरिक लोकतंत्र कितना सफल होगा, समझा जा सकता है।
चलो, भाजपा में तो फिर भी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी मौजूद हैं, पार्टी कहीं न कहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे सशक्त संगठन की डोर से बंधा है, मगर केजरीवाल और उनके साथियों को एक सूत्र में बांधने वाला न तो कोई तंत्र है और न ही उनमें राजनीति का जरा भी शऊर है। उनकी अधिकांश बातें हवाई हैं, जो कि धरातल पर आ कर फुस्स हो जाने वाली हैं।
वे लाख दोहराएं कि उनकी पार्टी आम आदमी की है, नेताओं की नहीं, मगर सच ये है कि संगठन और वह भी राजनीति का होने के बाद वह सब कुछ होने वाला है, जो कि राजनीति में होता है। नेतागिरी में आगे बढऩे की खातिर वैसी ही प्रतिस्पद्र्धा होने वाली है, जैसी कि और पार्टियों में होती है।  राजनीति की बात छोडिय़े, सामाजिक और यहां तक कि धार्मिक संगठनों तक में पावर गेम होता है। दरअसल मनुष्य, या यो कहें कि जीव मात्र में ज्यादा से ज्यादा शक्ति अर्जित करने का स्वभाव इनबिल्ट है। क्या इसका संकेत उसी दिन नहीं मिल गया था, जब पार्टी की घोषणा होते ही कुछ लोगों ने इस कारण विरोध दर्ज करवाया था कि वे शुरू से आंदोलन के साथ जुड़े रहे, मगर अब चुनिंदा लोगों को ही पार्टी में शामिल किया जा रहा है। इसका सीधा सा अर्थ है कि जो भी पार्टी में ज्यादा भागीदारी निभाएगा, वही अधिक अधिकार जमाना चाहेगा। इस सिलसिले में भाजपा की हालत पर नजर डाली जा सकती है। वहां यह संघर्ष अमतौर पर रहता है कि संघ पृष्ठभूमि वाला नेता अपने आपको देशी घी और बिना नेकर पहने नेता डालडा घी माना जाता है। ऐसे में क्या यह बात आसानी से हलक में उतर सकती है कि जो प्रशांत भूषण पार्टी को एक करोड़ रुपए का चंदा देंगे, वे पार्टी का डोमिनेट नहीं करेंगे?
सवाल इतने ही नहीं हैं, और भी हैं। वर्तमान भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था से तंग जनता जिस जोश के साथ अन्ना आंदोलन से जुड़ी थी, क्या उसी उत्साह के साथ आम आदमी पार्टी से जुड़ेगी? और वह भी तब जब कि वे अन्ना को पिता तुल्य बताते हुए भी अपना अलग चूल्हा जला चुके हैं? शंका ये है कि जो अपने पिता का सगा नहीं हुआ, वह अपने साथियों व आम आदमी का क्या होगा? राजनीति को पानी पी-पी कर गालियां देने वाले केजरीवाल क्या राजनीति की काली कोठरी के काजल से खुद को बचा पाएंगे? क्या वे उसी किस्म के सारे हथकंडे नहीं अपनाएंगे, जो कि राजनीतिक पार्टियां अपनाती रही हैं? क्या उनके पास जमीन तक राजनीति की बारीकियां समझने वाले लोगों की फौज है? क्या उन्हें इस बात का भान नहीं है कि लोकतंत्र में सफल होने के लिए भीड़ से ज्यादा जरूरत वोट की होती है? ये वोट उस देश की जनता से लेना है, जो कि धर्म, भाषा, जातिवाद और क्षेत्रवाद में उलझा हुआ है। क्या केजरीवाल को जरा भी पता है कि आज जो तबका देश की खातिर बहस को उतारु है और कथित रूप से बुद्धिजीवी कहलाता है, उससे कहीं अधिक अनपढ़ लोगों का मतदान प्रतिशत रहता है? ऐसे ही अनेकानेक सवाल हैं, जो ये शंका उत्पन्न करते हैं आम आदमी पार्टी का भविष्य अंधकारमय प्रतीत होता है। हां, अगर केजरीवाल सोचते हैं वे चले हैं एक राह पर, सफलता मिले मिले, चाहे जब मिले, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता तो ठीक है, चलते रहें।
-तेजवानी गिरधर