मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निर्देश पर हाल ही राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव सी. के. मैथ्यू ने अब सभी विभागों को नकारात्मक खबरों का नियमित रूप से खंडन जारी करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए सभी विभागों में विभागाध्यक्ष अथवा वरिष्ठतम उप शासन सचिव को नोडल अधिकारी बनाया जा रहा है। सरकार का मानना है कि राज्य सरकार की रीति-नीति और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के संबंध में नकारात्मक समाचार छपने से जनता में सरकार के बारे में गलत संदेश जाता है। साथ ही लोगों में भ्रम की स्थिति भी बनती है।
निश्चित रूप से यह जायज है कि यदि कोई समाचार गलत छपा है तो संबंधित पक्ष को उसका खंडन करना चाहिए अथवा अपना पक्ष रखना चाहिए। इससे कम से कम आम जनता दोनों पक्षों के तथ्य जानकार निर्णय तो कर सकेगी कि क्या सही है और क्या गलत। सरकार ने भले ही इसे अपनी छवि को सुधारने की गरज से लागू किया हो, मगर है यह स्वागत योग्य कदम। मगर अहम सवाल ये है कि सरकार को यदि अपने खिलाफ छप रही गलत या नकारात्मक खबरों से परेशानी है तो इस बात की चिंता क्यों नहीं कि आम जनता की समस्याओं से जुड़ी खबरों पर भी कार्यवाही उतनी ही मुस्तैदी से की जानी चाहिए। उसकी नजर इस बात पर तो है कि नकारात्मक खबर का खंडन करना है, मगर इस पर नहीं कि आखिर वह क्यों छपी है और उसका समाधान भी किया जाना चाहिए। सरकार ने नकारात्मक खबरों से निपटने के लिए जो कदम उठाया है, उसकी उसने कितनी पुख्ता व्यवस्था की है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुख्य सचिव मैथ्यू ने जो परिपत्र जारी किया है, उसके तहत सभी विभागों को नकारात्मक समाचार के बारे में वस्तुस्थिति (खंडन) सीधे ही सूचना एवं जन संपर्क विभाग की वेबसाइट पर अपलोड करने होंगे। खबरों की जानकारी रोजाना सुबह 11 बजे तक सीएमओ, मुख्य सचिव अथवा डीपीआर की ओर से मोबाइल, एसएमएस अथवा टेलीफोन से संबंधित अतिरिक्त मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, विभागाध्यक्ष को दी जाएगी। दोपहर 12 बजे तक संबंधित विभागों को खबरों की कटिंग फैक्स अथवा ई-मेल से भेजी जाएंगी। संबंधित विभाग को शाम 4 बजे तक उस खबर से संबंधित वस्तुस्थिति और तथ्यात्मक टिप्पणी से ऑनलाइन न्यूज मॉनिटरिंग सिस्टम पर अपलोड करनी होगी। है न तगड़ी व्यवस्था। मगर अफसोस कि मुख्य सचिव को इस बात का ख्याल नहीं आया कि जो भी समाचार सरकार या सरकारी विभाग के खिलाफ छपते हैं, वे कोई हवाई तो होते नहीं हैं। यदि वाकई वे हवाई हैं तो उनका खंडन जायज है। मगर अमूमन समाचार वास्तविक समस्याओं से संबंधित होते हैं। वे छापे ही इस कारण जाते हैं कि सरकार का ध्यान उस ओर जाए, मगर उन पर कार्यवाही में सरकार कितनी गंभीरता दिखाती है, सब जानते हैं। बेहतर होता कि मैथ्यू साहब यह आदेश भी साथ ही जारी करते कि जनता की समस्याओं से संबंधित समाचार पर तुरंत कार्यवाही की जानी चाहिए और उससे उच्चाधिकारी को अवगत भी कराना चाहिए।
आपको ख्याल होगा कि एक जमाना था, जब किसी समाचार पत्र में कोई छोटी सी खबर भी छपती थी तो तुरंत कार्यवाही होती थी, मगर आज अखबार वाले पूरा पेज का पेज भी छाप देते हैं, मगर प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। यह आम रवैया सा बन गया कि किसी भी खबर पर अधिकारी वर्ग की यही प्रतिक्रिया होती है कि खबरें तो यूं ही छपती ही रहती हैं। और यही वजह है कि समाचारों का अवलोकन करने के लिए सूचना केन्द्र से कटिंग का पुलिंदा जिला कलेक्टर के पास नियमित रूप से जाता है, मगर वह या तो खुलता ही नहीं और खुलता भी तो उस पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती। कई बार तो अधिकारी किसी सरकारी खबर पर अपनी प्रतिक्रिया मांगने पर भी नहीं देते। मोबाइल फोन स्विच ऑफ कर देते हैं या फिर नो कमेंट कह कर फोन रख देते हैं। इसी कारण एक पक्षीय समाचार छप जाता है। हकीकत तो यह है कि पत्रकार दूसरे पक्ष को भी पूरा तवज्जो देते हैं। उन्हें इसी की शिक्षा दी गई है कि एकपक्षीय समाचार न छापे जाएं। फिर भी दोष अखबार वालों को दिया जाता है कि सरकार के खिलाफ खबरें छापते हैं। मैथ्यू साहब को इस पर भी गौर करना चाहिए कि अखबार वाले तो चला कर सरकार का पक्ष जानना चाहते हैं, आपके अधिकारी ही तवज्जो नहीं देते। अगर वे ऐसा करते तो इस प्रकार के आदेश ही जारी नहीं करने पड़ते कि खबर छपने के बाद उसका खंडन किया जाए। नकारात्मक खबर के साथ ही सरकार का भी पक्ष छप जाता। मगर चूंकि सरकार ने इस पर कभी गौर नहीं किया, इस कारण नौबत यहां तक आ गई है कि उसे खंडन करने की व्यवस्था कायम करनी पड़ रही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com
तीसरी आंख
शुक्रवार, मार्च 16, 2012
मैथ्यू साहब, केवल खबरों का खंडन ही होगा, कार्यवाही कौन करेगा?
शनिवार, मार्च 10, 2012
छह दिन हफ्ता क्यों नहीं कर दिया जाए?
होली की छुट्टी के बाद सरकारी दफ्तर खुले और जिला कलेक्टर श्रीमती मंजू राजपाल ने आकस्मिक निरीक्षण किया तो पाया कि एडीएम व एसीएम समेत 67 कर्मचारी नदारद हैं। यह तो उस दफ्तर की हालत है, जहां स्वयं जिला कलेक्टर व अन्य बड़े प्रशासनिक अधिकारी बैठते हैं। उसके बावजूद कर्मचारी अपनी ड्यूटी के प्रति लापरवाह हैं। लापरवाही की पराकाष्ठा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्य सचिव ने हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिग में कार्मिकों के ऑफिस में समय पर पहुंचना सुनिश्चित करने के निर्देश देते हुए आकस्मिक निरीक्षण शुरू करने का अभियान शुरू करने को कहा था। उसकी भी कर्मचारियों को कोई चिंता नहीं थी। जिला कलेक्टर इस बात से भली भांति वाकिफ थीं, इस कारण सर्वप्रथम कलेक्टर परिसर के दफ्तरों पर ही कार्यवाही को अंजाम दिया और पाया कि राजपत्रित अधिकारीअतिरिक्त कलेक्टर मोहम्मद हनीफ, सहायक कलेक्टर भगवत सिंह राठौड़, प्रोटोकाल अधिकारी सुनीता डागा, लेखाधिकारी लालचंद मूंदड़ा व सहायक विधि परामर्शी हरीश कुमार शर्मा सहित 67 कर्मचारी सीट पर नहीं हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अन्य सरकारी दफ्तरों का क्या हाल होगा।
असल में तीन साल से ज्यादा बीतने के बाद भी राज्य कर्मचारी पांच दिन के हफ्ते के साथ ड्यूटी समय बढ़ाए जाने के आदी नहीं हुए हैं। अधिसंख्य कर्मचारी पुराने ढर्रे पर ही दफ्तर आते हैं और शाम को भी जल्द ही बस्ता बांध लेते हैं। इससे आम लोगों को परेशानी होती है। यह परेशानी इस कारण भी बढ़ जाती है कि कई कर्मचारी छुट्टी के इन दो दिनों के साथ अन्य किसी सरकारी छुट्टी को मिला कर आगे-पीछे एक-दो दिन की छुट्टी ले लेते हैं और नतीजा ये रहता है कि उनके पास जिस सीट का चार्ज होता है, उसका काम ठप हो जाता है। अन्य कर्मचारी यह कह कर जनता को टरका देते हंै कि इस सीट का कर्मचारी जब आए तो उससे मिल लेना। यानि कि काम की रफ्तार काफी प्रभावित होती है।
कलेक्ट्रेट को छोड़ कर अधिकतर विभागों में पुराना ढर्रा चल रहा है। कलेक्ट्रेट में जरूर कुछ समय की पाबंदी नजर आती है, क्योंकि वहां पर राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों व मीडिया की नजर रहती है। आम जनता के मानस में भी आज तक सुबह दस से पांच बजे का समय ही अंकित है और वह दफ्तरों में इसी दौरान पहुंचती है। कोई इक्का-दुक्का ही होता है, जो कि सुबह साढ़े नौ बजे या शाम पांच के बाद छह बजे के दरम्यान पहुंचता है। यानि कि काम के जो घंटे बढ़ाए गए, उसका तो कोई मतलब ही नहीं निकला। बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों को यह समझ में आ गया कि छह दिन का हफ्ता ही ठीक था। इस बात को जानते हुए उच्च स्तर पर कवायद शुरू तो हुई और कर्मचारी नेताओं से भी चर्चा की गई, मगर यह सब अंदर ही अंदर चलता रहा। चर्चा कब अंजाम तक पहुंचेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।
ज्ञातव्य है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार के जाते-जाते कर्मचारियों के वोट हासिल करने के लिए पांच दिन का हफ्ता कर गई थीं। चंद दिन बाद ही आम लोगों को अहसास हो गया कि यह निर्णय काफी तकलीफदेह है। लोगों को उम्मीद थी कि कांगे्रस सरकार इस फैसले को बदलेगी। उच्च स्तर पर बैठे अफसरों का भी यह अनुभव था कि पांच दिन का हफ्ता भले ही कर्मचारियों के लिए कुछ सुखद प्रतीत होता हो, मगर आम जनता के लिए यह असुविधाजन व कष्टकारक ही है। हालांकि अधिकारी वर्ग छह दिन का हफ्ता करने पर सहमत है, लेकिन इसे लागू करने पर कर्मचारियों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। वस्तुत: यह फैसला न तो आम जन की राय ले कर किया गया और न ही इस तरह की मांग कर्मचारी कर रहे थे। बिना किसी मांग के निर्णय को लागू करने से ही स्पष्ट था कि यह एक राजनीतिक फैसला था, जिसका फायदा तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती थीं। उन्हें इल्म था कि कर्मचारियों की नाराजगी की वजह से ही पिछली गहलोत सरकार बेहतरीन काम करने के बावजूद धराशायी हो गई थी, इस कारण कर्मचारियों को खुश करके भारी मतों से जीता जा सकता है। हालांकि दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया।
असल बात तो ये है कि जब वसुंधरा ने यह फैसला किया, तब खुद कर्मचारी वर्ग भी अचंभित था, क्योंकि उसकी मांग तो थी नहीं। वह समझ ही नहीं पाया कि यह फैसला अच्छा है या बुरा। हालांकि अधिकतर कर्मचारी सैद्धांतिक रूप से इस फैसले से कोई खास प्रसन्न नहीं हुए, मगर कोई भी कर्मचारी संगठन इसका विरोध नहीं कर पाया। रहा सवाल राजनीतिक दलों का तो भाजपाई इस कारण नहीं बोले क्योंकि उनकी ही सरकार थी और कांग्रेसी इसलिए नहीं बोले कि चलते रस्ते कर्मचारियों को नाराज क्यों किया जाए।
ऐसा नहीं कि लोग परेशान नहीं हैं, बेहद परेशान हैं, मगर बोल कोई नहीं रहा। कर्मचारी संगठनों के तो बोलने का सवाल ही नहीं उठता। राजनीतिक संगठन ऐसे पचड़ों में पड़ते नहीं हैं और सामाजिक व स्वयंसेवी संगठनों को क्या पड़ी है कि इस मामले में अपनी शक्ति जाया करें। ऐसे में जनता की आवाज दबी हुई पड़ी है। देखना ये है कि कांग्रेस सरकार आम लोगों के हित में फैसले को पलट पाती है या नहीं।
-tejwanig@gmail.com
असल में तीन साल से ज्यादा बीतने के बाद भी राज्य कर्मचारी पांच दिन के हफ्ते के साथ ड्यूटी समय बढ़ाए जाने के आदी नहीं हुए हैं। अधिसंख्य कर्मचारी पुराने ढर्रे पर ही दफ्तर आते हैं और शाम को भी जल्द ही बस्ता बांध लेते हैं। इससे आम लोगों को परेशानी होती है। यह परेशानी इस कारण भी बढ़ जाती है कि कई कर्मचारी छुट्टी के इन दो दिनों के साथ अन्य किसी सरकारी छुट्टी को मिला कर आगे-पीछे एक-दो दिन की छुट्टी ले लेते हैं और नतीजा ये रहता है कि उनके पास जिस सीट का चार्ज होता है, उसका काम ठप हो जाता है। अन्य कर्मचारी यह कह कर जनता को टरका देते हंै कि इस सीट का कर्मचारी जब आए तो उससे मिल लेना। यानि कि काम की रफ्तार काफी प्रभावित होती है।
कलेक्ट्रेट को छोड़ कर अधिकतर विभागों में पुराना ढर्रा चल रहा है। कलेक्ट्रेट में जरूर कुछ समय की पाबंदी नजर आती है, क्योंकि वहां पर राजनीतिज्ञों, सामाजिक संगठनों व मीडिया की नजर रहती है। आम जनता के मानस में भी आज तक सुबह दस से पांच बजे का समय ही अंकित है और वह दफ्तरों में इसी दौरान पहुंचती है। कोई इक्का-दुक्का ही होता है, जो कि सुबह साढ़े नौ बजे या शाम पांच के बाद छह बजे के दरम्यान पहुंचता है। यानि कि काम के जो घंटे बढ़ाए गए, उसका तो कोई मतलब ही नहीं निकला। बहुत जल्द ही उच्च अधिकारियों को यह समझ में आ गया कि छह दिन का हफ्ता ही ठीक था। इस बात को जानते हुए उच्च स्तर पर कवायद शुरू तो हुई और कर्मचारी नेताओं से भी चर्चा की गई, मगर यह सब अंदर ही अंदर चलता रहा। चर्चा कब अंजाम तक पहुंचेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।
ज्ञातव्य है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार के जाते-जाते कर्मचारियों के वोट हासिल करने के लिए पांच दिन का हफ्ता कर गई थीं। चंद दिन बाद ही आम लोगों को अहसास हो गया कि यह निर्णय काफी तकलीफदेह है। लोगों को उम्मीद थी कि कांगे्रस सरकार इस फैसले को बदलेगी। उच्च स्तर पर बैठे अफसरों का भी यह अनुभव था कि पांच दिन का हफ्ता भले ही कर्मचारियों के लिए कुछ सुखद प्रतीत होता हो, मगर आम जनता के लिए यह असुविधाजन व कष्टकारक ही है। हालांकि अधिकारी वर्ग छह दिन का हफ्ता करने पर सहमत है, लेकिन इसे लागू करने पर कर्मचारियों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। वस्तुत: यह फैसला न तो आम जन की राय ले कर किया गया और न ही इस तरह की मांग कर्मचारी कर रहे थे। बिना किसी मांग के निर्णय को लागू करने से ही स्पष्ट था कि यह एक राजनीतिक फैसला था, जिसका फायदा तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उठाना चाहती थीं। उन्हें इल्म था कि कर्मचारियों की नाराजगी की वजह से ही पिछली गहलोत सरकार बेहतरीन काम करने के बावजूद धराशायी हो गई थी, इस कारण कर्मचारियों को खुश करके भारी मतों से जीता जा सकता है। हालांकि दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया।
असल बात तो ये है कि जब वसुंधरा ने यह फैसला किया, तब खुद कर्मचारी वर्ग भी अचंभित था, क्योंकि उसकी मांग तो थी नहीं। वह समझ ही नहीं पाया कि यह फैसला अच्छा है या बुरा। हालांकि अधिकतर कर्मचारी सैद्धांतिक रूप से इस फैसले से कोई खास प्रसन्न नहीं हुए, मगर कोई भी कर्मचारी संगठन इसका विरोध नहीं कर पाया। रहा सवाल राजनीतिक दलों का तो भाजपाई इस कारण नहीं बोले क्योंकि उनकी ही सरकार थी और कांग्रेसी इसलिए नहीं बोले कि चलते रस्ते कर्मचारियों को नाराज क्यों किया जाए।
ऐसा नहीं कि लोग परेशान नहीं हैं, बेहद परेशान हैं, मगर बोल कोई नहीं रहा। कर्मचारी संगठनों के तो बोलने का सवाल ही नहीं उठता। राजनीतिक संगठन ऐसे पचड़ों में पड़ते नहीं हैं और सामाजिक व स्वयंसेवी संगठनों को क्या पड़ी है कि इस मामले में अपनी शक्ति जाया करें। ऐसे में जनता की आवाज दबी हुई पड़ी है। देखना ये है कि कांग्रेस सरकार आम लोगों के हित में फैसले को पलट पाती है या नहीं।
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शुक्रवार, मार्च 02, 2012
...यानि अब ट्रेफिक पुलिस की जेब ज्यादा गरम होगी

तकरीबन बाईस पुराने सेंट्रल मोटर वीइकल एक्ट में संशोधन के प्रस्तावित बिल को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद एक ओर जहां यह उम्मीद की जा रही है कि इससे भारी अर्थ दंड से डर कर चालक ट्रेफिक नियमों की पालना के प्रति सजग होंगे, वहीं इस बात की भी आशंका है कि इससे ट्रेफिक पुलिस में पहले से व्याप्त भ्रष्टाचार और बढ़ जाएगा। दरअसल सरकार का सोच यह है कि जुर्माना कम होने के कारण चालक सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। वे ले दे कर छूटने कोशिश में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब दो करोड़ लोगों ने पिछले साल ट्रैफिक नियमों को तोड़ा और जुर्माना भी चुकाया। अफसरों का कहना है कि जुर्माना राशि कम है। लोग नियम तोडऩे से नहीं डरते। ऐसे में सवाल यह है कि क्या वाकई में जुर्माना बढऩे के बाद लोग सुधर जाएंगे या हालात जस के तस बने रहेंगे। अक्सर यह देखने में आता है कि जिन नियमों के उल्लंघन में जुर्माने की राशि 100, 200 या 500 रुपये से ज्यादा है, उनमें जुर्माना भरने के बजाय मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें की जाती हैं। यद्यपि आमतौर पर ये कोशिशें उल्लंघन करने वालों की तरफ से ही ज्यादा होती हैं, लेकिन कई ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकते। ऐसे में जब जुर्माना बढ़ जाएगा, तो मामला मौके पर ही निपटा लेने की कोशिशें भी बढ़ जाएंगी। यह सही है कि ट्रेफिक पुलिस को यातायात सप्ताह के दौरान अपेक्षित लक्ष्य हासिल करने होते हैं, मगर लक्ष्य की पूर्ति के अतिरिक्त आम तौर पर घूसखोरी ही चलन में है। इसकी वजह ये है कि जहां नियम का उल्लंघन करने वाला नियमानुसार चुकाए जाने वाली राशि से कम दे कर छूट जाता है, इस कारण वह संतुष्ट रहता है, वहीं ट्रेफिक कर्मचारी को जेब गरम होने के कारण संतुष्ट होना ही है। यानि मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी? चूना तो सरकार को ही लगता है। जब जुर्माना राशि बढ़ जाएगी तो स्वाभाविक रूप से घूसखोरी बढ़ जाएगी। यद्यपि इस आशंका भरी सोच को नकारात्मक माना जा सकता है, मगर जब तक घूसखोरी पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जाएगा, जुर्माना बढ़ाए जाने मात्र से हालत सुधरने वाले नहीं हैं। सौ बात की एक बात। जुर्माना बढ़ाने का सीधा सा मतलब है कि चालक सुधर नहीं रहा है। सुधर नहीं रहा है, इसका मतलब ये नहीं कि वह गंवार है, अपितु वह अधिक चतुर है। चालक इसके प्रति इतने जागरूक नहीं है कि सारे नियम उनके हित की खातिर ही बने हैं, बल्कि वह इसके प्रति अधिक जागरूक है कि ट्रेफिक पुलिस से कैसे बचा जाए। चालक जानता है कि अमुक-अमुक जगह पर ट्रेफिक पुलिस वाला नहीं होगा, उन-उन जगहों पर वह हेलमेट उतार देता है, सीट बैल्ट खोल देता है। एक महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि केवल नियम कड़े करने और दंड बढ़ाने से तब तक सकारत्मक परिणाम नहीं आएंगे, जब तक कि ट्रेफिक पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे। हकीकत यही है कि संसाधनों की कमी के कारण ही नियमों का उल्लंघन होता है और दुर्घटनाएं होती हैं। रहा सवाल दुर्घटना में किसी की मृत्यु होने पर मुआवजा राशि चार गुना बढ़ाकर एक लाख रुपए करने की तो इसकी वजह से चालक दुर्घटना कारित कर किसी को मारेगा नहीं, ऐसा नहीं है, बल्कि महंगाई बढ़ जाने के कारण मौजूदा मुआवजा राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, इस कारण उसमें वृद्धि की गई है। लब्बोलुआब, दंड बढ़ाए जाने से कुछ तो फर्क की उम्मीद की जा सकती है, मगर इससे चालक जागरूक हो जाएगा, इसकी संभावना कुछ कम ही है। उलटे भ्रष्टाचार बढ़ जाएगा। इस सिलसिले में ओशो रजनीश की ओर से दिए गए उदाहरण को लीजिए- हमारे देश के एक मंत्री इंग्लैंड के दौरे पर गए। कड़ाके की ठंड थी। वे रात को करीब एक बजे किसी कार्यक्रम से होटल को लौट रहे थे। अचानक ड्राइवर ने कार रोक दी। मंत्री जी ने देखा कि चौराहे पर लाल बत्ती हो जाने के कारण कार रुकी है। उन्होंने जब यह देखा कि चौराहा पूरी तरह से सुनसान है तो ड्राइवर से बोले कि जब कोई वाहन व राहगीर नहीं है और उससे भी बढ़ कर ट्रेफिक पुलिस भी नहीं है तो कार रोकने का क्या मतलब है? इस पर ड्राइवर ने चौराहे पर एक ओर खड़ी ठंड में ठिठुर रही एक बुढिय़ा की ओर इशारा किया कि जो हरी लाइट होने का इंतजार कर रही थी तो मंत्री जी को समझ में आ गया कि हम भारतीय भले ही देशभक्ति की ऊंची ऊंची ढीगें हाकें, मगर राष्ट्रीयता और नियमों का पालन करने के मामले में अंग्रेज हमसे कई गुना बेहतर हैं। अफसोस कि अंग्रेज हमें अंग्रेजी तो सिखा गए, मगर एटीकेट्स और मैनर्स अपने साथ ले गए।
-tejwanig@gmail.com
मंगलवार, फ़रवरी 28, 2012
मीडिया में छाने को ले रहे हैं आयोग से पंगा

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के दौरान चुनाव आयोग को नाराज करने के एक के बाद एक मामले सामने आने से दो ही बातें समझ में आती हैं, या तो कांग्रेस के नेता वाकई आचार संहिता को नहीं जानते और मासूम हैं अथवा संयोग से गलती कर रहे हैं और या फिर जानबूझ कर ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं, ताकि आयोग नाराज हो और कांग्रेस मीडिया में चर्चा में बनी रहे। संभव है कि कानून मंत्री सलमान खुर्शीद, गृह राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल व बेनीप्रसाद शर्मा के पास बयान देने का ठोस तार्किक आधार हो अथवा अपने बयान को अलग संदर्भ में कह कर बचने की कोशिश करें, मगर उनका जो रवैया दिखाई दे रहा था, वह साफ तौर पर आयोग को चिढ़ाने जैसा ही था। वे आयोग पर ऐसे गुर्रा रहे थे मानो उन्हें उसका कोई डर ही नहीं है। असल बात तो यह नजर आती है कि उन्होंने इतनी अधिक सीमा लांघी कि आयोग को नोटिस देना ही पड़ा। उनके बयानों से यह कहीं से भी नहीं दिखाई देता कि उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं था कि उनके बयान पर आयोग ऐतराज जाहिर करते हुए नोटिस दे देगा। कम से कम ऐसा तो कत्तई नहीं लगा कि उनसे गलती हो गई अथवा जुबान फिसल गई थी, ठोक बजा कर जो बयान दे रहे थे। बयान आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे थे या नहीं, इस में नहीं पड़ें, तब भी होना जाना क्या है? फांसी तो होनी नहीं है। हद से हद यही कहना है कि उनका मकसद आचार संहिता का उल्लंघन करना नहीं था, वे आयोग का सम्मान करते हैं अथवा आयोग के सामने पेश हो कर खेद प्रकट कर देने से मामला रफा-दफा हो जाएगा। वैसे भी इस प्रकार की विवादास्पद बयानबाजी का मतलब चुनाव पूरे होने तक है। उसके बाद पूछता कौन है कि आपने ऐसा कैसे कह दिया? असल में ऐसा प्रतीत होता कि कांग्रेस की यह सोची समझी चाल है। वह चुनाव की सरगरमी के दौरान मीडिया को अपनी ओर आकर्षित करने की फिराक में है, ताकि वहीं छायी रहे। वह असल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाना चाहती है साथ ही अपने मकसद में कामयाब भी होना चाहती है। मुस्लिम आरक्षण का ही मामला लीजिए। माना कि इस पर बाद में माफीनामे अथवा खेद प्रकट करने की स्थिति आती है, मगर जिस मकसद से बयान दिया वह तो मुसलमानों को कम्युनिकेट हो ही गया। आयोग लाख माफी मंगवा ले, मगर उसे डीकम्युनिकेट कैसे करवा पाएगा। तब तक तो वोट ही पड़ चुके होंगे। मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस के आला मंत्रियों ने चुनाव आयोग पर वार पर वार करने की योजना चल ही रही थी कि कांग्रेस युवराज राहुल गांधी ने कानपुर में जानबूझ कर रोड शो किया और पूरे 24 घंटे तक वे मीडिया की सुर्खियां बने रहे। इतना ही नहीं, राहुल का सपा का घोषणा पत्र फाडऩे वाला नाटक भी साफ तौर पर मीडिया में सुर्खी पाने के लिए था। इससे मीडिया ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दल भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। जाहिर तौर पर इससे भाजपा को बड़ी तकलीफ हुई होगी। मीडिया में छाये रहने के गुर तो भाजपाइयों को ही आते हैं। इस मामले में उनका कोई सानी नहीं। मगर पहली बार कांग्रेस के इस प्रकार मीडिया पर बने रहने से भाजपाई सकते में हैं। इसी बीच आयोग को कमजोर करने का मुद्दा उभर आया। आयोग ने जब इस प्रकार की किसी भी कोशिश का नाकाम करने की बात कही तो सरकार की ओर से कहा गया कि ऐसा कोई विचार ही नहीं था। ऐसे में भाजपा के दिग्गज अरुण जेटली ने मोर्चा संभाला और कांग्रेस को सीरियल अपराधी करार दे दिया, मगर मीडिया ने उसे कोई खास तवज्जो नहीं दी। पूरा प्रकरण मीडिया मैनेजमेंट से जुड़ा हुआ नजर आया।
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रविवार, फ़रवरी 26, 2012
केजरीवाल ने की बुझते शोलों को हवा देने की कोशिश

टीम अन्ना के बुझते आंदोलन को हवा देने की खातिर अन्ना हजारे के खासमखास सिपहसालार अथवा यूं कहें कि अन्ना को कथित रूप से चाबी भरने वाले अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर गरमागरम बयान दे दिया है। यूपी विधानसभा चुनावों में स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को चुनने के लिए चलाए जा रहे जन जागृति अभियान के सिलसिले में केजरीवाल ने कहा कि संसद में हत्यारे और बलात्कारी बैठे हैं। लालू, मुलायम और राजा जैसे लोग संसद में बैठ कर देश का कानून बना रहे हैं। धन इकठ्ठा कर रहे हैं। इन लोगों से संसद को निजात दिलाने की जरूरत है। उन्होंने यहां तक कहा कि लुटेरे और बलात्कारी सहित सभी प्रकार के बुरे तत्व संसद पर कब्जा जमाए हुए हैं। पहली बार क्रीज से बाहर आ कर उन्होंने कहा कि भाजपा भी भ्रष्टाचार करने वालों में शामिल है। उसने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए कुछ भी नहीं किया।
असल में केजरीवाल को लग रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश को खड़ा व एकजुट करने के तुरंत बाद भी यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी टीम अप्रासंगिक सी हो गई है। वहां जातिवाद व संप्रदायवाद पूरी तरह से हावी हैं। हर पार्टी ने इसी आधार पर प्रत्याशियों का चयन किया है और जनता का रुख भी जातिवाद पर केन्द्रित हो गया है। ऐसे में चुनाव के बाद आंदोलन को फिर से जिंदा करने में काफी जोर आएगा। इसी कारण चुनावी सरगरमी के बीच आखिरी दौर में जानबूझ कर ऐसा बयान दिया है, ताकि राजनेताओं को मिर्ची लगे और वे प्रतिक्रिया में कुछ बोलें व फिर बहस की शुरुआत हो जाए। उनका पैंतरा काम भी आया। उनका गरमागरम बयान आते ही राजनीति भी गरम हुई। कांग्रेस ने केजरीवाल के इस बयान पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस प्रवक्ता संजय निरूपम ने कहा कि हम मानते हैं कि संसद में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग हैं। इसका मतलब ये नहीं कि कोई भी संसद की गरिमा के खिलाफ जा कर बोले। यह संसद के विशेषाधिकार का हनन है। सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा है कि उनका यह बयान अमर्यादित है। टीम अन्ना लगातार संसद के मर्यादा को चोट पहुंचा रही है। मुलायम सिंह का नाम इस संदर्भ में घसीटना बेतुका है। पार्टी इस संदर्भ में चर्चा के बाद कार्रवाई तय की करेगी। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता ह्रदय नारायण दीक्षित ने कहा है कि केजरीवाल को इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए था। संसद एक गरिमामयी स्थान है। सांसदों को जनता चुनकर भेजती है। ऐसे में उनको इस तरह की बात कहने का कोई अधिकार नहीं है। संसद की विशेषाधिकार समिति इस बात का संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगी।
निरूपम के इस बयान से जाहिर तौर पर एक बार फिर यह बहस शुरू होगी कि टीम अन्ना संसद की गरिमा पर हमला कर रही है या फिर सांसदों पर। देखना ये होगा कि केजरीवाल की ओर से शांत से हो गए आंदोलन में डाले गए कंकड़ से कितने दिन तक तरंगें उठती हैं।
ममता शर्मा के बयान पर इतना बवाल क्यों?

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा के बयान पर बवाल हो गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने थूक कर चाटना ही बेहतर समझा, लिहाजा तुरंत बयान वापस भी ले लिया। ज्ञातव्य है कि ममता ने यह कहा था कि युवतियां युवकों की टिप्पणियों से न डरें, बल्कि सकारात्मक रूप में लें। लड़कों द्वारा कहे जाने वाले सेक्सी शब्द को नकारात्मक सोच लेकर बुरा नहीं माने। इसका मतलब सुंदरता है, आकर्षण है और एक्साइटमेंट है।
भारतीय संस्कृति की दृष्टि से मोटे तौर पर निरपेक्ष रूप में उनका बयान निहायत ही आपत्तिजनक प्रतीत होता है और इस बयान की जरूरत भी नहीं थी दिखती, मगर सवाल ये उठता है आखिर उन्होंने गलत क्या कह दिया? सीधी सी बात है कि उन्होंने उन्हीं लड़कियों को यह सीख देने की कोशिश की होगी, जिन्हें सेक्सी शब्द बाण झेलना पड़ता है। वे वही लड़कियां हैं, जो कि जानते-बूझते हुए भी इस प्रकार के वस्त्र पहनती हैं, ताकि वे सुंदर व सेक्सी दिखाई दें। जो पारंपरिक परिधान पहनती हैं या जिनके सिर पर पल्लू ढ़का होता है, उन लड़कियों को वैसे भी कोई लड़का सेक्सी कहने की हिमाकत नहीं कर पाता। अमूमन उन्हीं लड़कियों को ऐसी टिप्पणी का सामना करना पड़ता है, जो कि शरीर के अंगों को उभारने वाले वस्त्र पहनती हैं। अव्वल तो उन लड़कियों को ऐसी टिप्पणी से ऐतराज होना ही नहीं चाहिए, क्योंकि वे जानबूझ कर ऐसे वस्त्र पहनती हैं। सच तो ये है कि लड़कों को ऐसी टिप्पणी के लिए प्रेरित करने के लिए वे ही जिम्मेदार हैं। गर संस्कारित लड़की अपनी सहेलियों की देखादेखी में ऐसे वस्त्र पहन लेती है तो उसे जरूर अटपटा लगता होगा। संभव है ऐसी लड़कियों को ही ममता ने सीख देने की कोशिश की होगी। यदि ममता के मुंह से निकले बयान को जुबान फिसलना मानें तो यह साफ दिखता है कि उन्होंने लड़कियों को बिंदास बनने की प्रेरणा देने की कोशिश की, जैसी कि वे खुद हैं। बस गलती ये हो गई कि उन्होंने बयान गलत तरीके से दे दिया।
रहा सवाल ममता के बयान का विरोध होने का तो वह स्वाभाविक ही है। जिस देश में नारी की पूजा की परंपरा हो, वहां ऐसे बयान से बवाल होना ही है। जैसे ही बवाल हुआ तो ममता को अपना बयान वापस भी लेना पड़ गया, क्योंकि वे एक ऐसे पद पर बैठी हैं, जिस पर रह कर ऐसा निम्नस्तरीय बयान कत्तई शोभाजनक नहीं माना जा सकता। वे इस पद पर नहीं होतीं तो कदाचित यह उनका निजी विचार मान लिया जाता।
खैर, इन सवालों के बीच एक सवाल ये भी उठता है कि जिन प्रबुद्ध महिलाओं, सामाजिक संगठनों व राजनीतिक संगठनों को ममता के बयान पर घोर आपत्ति है और उनका खून खौल उठा है, उन्हें सेक्सी कपड़े पहनने वाली लड़कियों को देख कर भी ऐतराज होता है या नहीं? जिन्हें ममता के इस बयान में लड़कियों को पाश्चात्य संस्कृति की ओर ले जाने का आभास होता है, उन्हें क्या सच में पाश्चात्य संस्कृति की ओर भाग रही लड़कियों पर भी तनिक अफसोस होता है। चारों ओर से शोर मचा कर उन्होंने भले ही ममता को बयान वापस लेने को मजबूर कर दिया हो, मगर क्या कभी अंगों को उभारने वाले वस्त्र पहनने वाली बहन-बेटियों को भी वे सादगी के वस्त्र पहनने को मजबूर कर पाएंगे। बयान तो बयान है, वापस हो गया, मगर क्या अंग प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनने वाली लड़कियों व पुरुषों के वस्त्र जींस व टी शर्ट पहनने वाली युवतियों को हम वापस भारतीय परिवेश में ला पाएंगे? अगर नहीं तो हम कोरी बयानबाजी ही करते रहेंगे, आरोप-प्रत्यारोप ही लगाते रहेंगे और हमारी लड़कियां पाश्चात्य संस्कृति की ओर सरपट दौड़ती चली जाएंगी।
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