तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, मई 12, 2017

हटने की अफवाह के बावजूद वसुंधरा का ही दबदबा

तेजवानी गिरधर
नरेन्द्र मोदी भले ही वह कदीमी शख्स हैं, जिसकी लहर पर सवार हो कर भाजपा केन्द्र में सत्तारूढ़ हुई, राजस्थान में भी लोकसभा की सभी पच्चीस सीटों पर उनकी ही बदोलत भाजपा ने कब्जा किया, मगर राज्य में अब भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ही तूती बोलती है। और इसका सबसे बड़ा सबूत है कि ओम प्रकाश माथुर, जो कि मोदी के बेहद करीबी हैं, जिनकी रणनीति गुजरात, हरियाणा व उत्तरप्रदेश में कामयाब रही, उनकी हालत ये है कि राज्य में कोई भी भाजपा नेता व कार्यकर्ता उनके पास फटकने से भी एक बारगी कतराता है। वजह सिर्फ इतनी कि कहीं वसुंधरा मेडम नाराज न हो जाएं। नाराजगी की वजह ये कि वसुंधरा के रहते राज्य में मुख्यमंत्री पद का कोई भी नेता बर्दाश्त नहीं। हालांकि अपवाद स्वरूप पिछले दिनों शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव की ओर से माथुर का स्वागत समारोह गिनाया जा सकता है, मगर उसमें भी किस तरह से बड़े नेता किनारा कर गए, ये सब को पता है। यादव भी इसलिए खुल कर सामने आए क्योंकि वे वाया श्रीकिशन सोनगरा माथुर लॉबी में माने जाते हैं। जानकारी के अनुसार पार्टी के चंद लोगों ने बाकायदा सूची बना कर ऊपर भेजी गई कि कौन-कौन स्वागत करने पहुंचे थे। इसका सीधा सा अर्थ है कि उनके नाम रेखांकित किए गए होंगे।
जो कुछ भी हो, मगर जो व्यक्ति भाजपा का कद्दावर नेता हो, उससे अगर उसी की पार्टी की सरकार के रहते राज्य में कार्यकर्ता दूरी रखने को मजबूर हों तो वह चौंकाता है। खुद माथुर जब राजस्थान आते हैं तो उन्हें लगता होगा कि ये कौन सी दुनिया में आ गए। जिस पार्टी के वे कद्दावर नेता हैं, उसी के कार्यकर्ता मुंह फेर रहे हैं। पिछले दिनों उनके पुष्कर आगमन पर यही स्थिति हुई। हालांकि कहने भर को जरूर यह बात कही गई कि उनके आने की कोई सूचना नहीं थी, मगर सच ये है कि सब को पता था कि वे आने वाले हैं। अजमेर नगर निगम के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत जरूर अपने साथी हितेश वर्मा के साथ आए, मगर इसलिए नहीं कि वे अभी भाजपा में हैं ही नहीं।
राज्य में यह स्थिति पहली बार नहीं आई है। इससे पहले राजस्थान के एक ही सिंह कहलाने वाले भैरोंसिंह शेखावत भी जब उपराष्ट्रपति पद से निवृत्त हो कर राजस्थान लौटे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनकी पूरी जाजम समेट कर ताक पर रख दी थी। उनकी भी हालत ये हो गई थी कि वे राज्य में जहां कहीं भी जाते तो अपने स्वागत के लिए कार्यकर्ताओं को तरस जाते थे। लंबी और कठोर साधना के बाद हासिल मुकाम का यकायक खो जाना जीतेजी मरने के समान है। राजस्थान में आने के बाद काफी दिन तक तो शेखावत सार्वजनिक रूप से नजर ही नहीं आए। और आए तो वसुंधरा के डर से भाजपा के कार्यकर्ता उनसे दूर दूर ही रहते थे। स्थिति ये हो गई कि शेखावत अपनी ही सरकार को घेरने लग गए। इसी के साथ उनका राजनीतिक अवसान हो गया। इतना ही नहीं नरपत सिंह राजवी को भी केवल इसी कारण वसुंधरा राजे की टेड़ी नजर का शिकार होना पड़ा कि वे शेखावत के दामाद थे। इससे समझा जा सकता है कि वसुंधरा राजे किस शैली की राजनीतिज्ञ हैं। अपने इर्द गिर्द वे किसी को पनपने नहीं देतीं।
पिछले कुछ दिनों से भले ही इस प्रकार की अफवाह फैल रही है कि वसुंधरा को हटा कर माथुर को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, मगर फिलवक्त तो यही लगता है कि भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं में वसुंधरा का ही दबदबा है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, मई 07, 2017

राजस्थान में जीत के लिए भाजपा अपनाएगी कई हथकंडे

तेजवानी गिरधर
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर पर सवार भाजपा राजस्थान में किसी भी सूरत में सत्ता पर फिर काबिज होने के लिए कई हथकंडे अपनाएगी। आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति क्या होगी, यह भले ही अभी तक गोपनीय है, मगर भाजपा की ओर से साफ तौर पर इशारे आ रहे हैं कि वह तकरीबन डेढ़ साल पहले ही कमर कसना शुरू कर चुकी है।
असल में भाजपा को यह ख्याल में है कि मोदी लहर के बावजूद इस बार राजस्थान में एंटी एस्टेब्लिशमेंट फैक्टर भी काम करेगा। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश व पंजाब इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। विशेष रूप से राजस्थान के बारे में यह धारणा सी बन गई है कि यहां की जनता हर पांच साल बाद सत्ता की पलटी कर देती है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल उनके पिछले कार्यकाल की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर रहा है, इस कारण आम धारणा है कि मतदाता उनके चमकदार चेहरे के आकर्षण में नहीं आएगा। ऐसे में वह अभी से जीत की कुंडली बनाने में जुट गई है। इसी सिलसिले में वसुंधरा को हटा कर केन्द्र में ले जाने और अकेले मोदी के नाम पर चुनाव लडऩे के मानस का खुलासा पिछले दिनों मीडिया में हो रहा था। हालांकि वसुंधरा की ओर यही दावा किया जा रहा है कि अगला चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, मगर पार्टी कार्यकर्ता अभी असमंजस में हैं।
बहरहाल, जीत के प्रति भाजपा हाईकमान इतनी शिद्दत लिए हुए हैं कि पिछले दिनों मीडिया में यह खबर तक आ गई कि राजस्थान में भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट को अपने खेमे में शामिल करना चाहती है। बताया गया कि उन्हें बाकायदा ऑफर भी दी जा चुकी है कि उन्हें केन्द्रीय मंत्री बना दिया जाएगा। यद्यपि सचिन की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। भाजपा के इस हथकंडे से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक तो वह अपनी सेना के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है, तभी तो विरोधी के सेना नायक पर ही हाथ मारने की सोच रही है, दूसरा ये कि इसके लिए वह तोड़-फोड़ की पराकाष्टा भी पार करने को आतुर है। भाजपा जानती है कि पिछले विधानसभा चुनाव में रसातल में पहुंच चुकी कांग्रेस को सजीव करने के लिए सचिन ने एडी से चोटी का जोर लगा रखा है। भाजपा सोचती है कि अगर उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ऐन वक्त पर टक्कर में आ खड़े होने का डर दिखाया जाए तो कदाचित वे डिग भी जाएं। इससे यह तो स्पष्ट है कि भाजपा को अब सत्ता प्राप्ति के लिए दिग्गज कांग्रेसियों को अपनाने से भी कोई परहेज नहीं है। ज्ञातव्य है कि चुनाव से कुछ समय पूर्व ही उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा भाजपा में शामिल हो गई थीं। उसके सकारात्मक परिणाम भी आए।    भाजपा ऐसा ही प्रयोग राजस्थान में करना चाहती है। सचिन पर दाव भले ही दूर की कौड़ी लगता तो, मगर इससे इतना तो तय मान कर चलना चाहिए कि भाजपा निचले स्तर पर असंतुष्ट कांग्रेसी नेताओं को बड़े पैमाने पर तोडऩे का प्रयास करेगी।
भाजपा एक नया प्रयोग और करने जा रही है। वो यह कि हाशिये पर जा चुके पुराने नेताओं को भी जोत रही है। उसे डर है कि कहीं उपेक्षा का शिकार ऐसे नेताओं की निष्क्रियता नकारात्मक असर न डाले। जैसे ही यह फंडा सामने आया विस्तारक बनाए गए पुराने नेताओं में जोश आ गया कि  पार्टी अब उनकी कद्र कर रही है। उन्हें यह भ्रम भी हुआ कि यदि उन्होंने ठीक से काम किया तो टिकट की लॉटरी लग सकती है। और कुछ नहीं तो टिकट वितरण में तो उनकी भूमिका रहेगी ही। भ्रम होना ही था, उन्हें संघ के प्रचारक तरह विस्तारक की संज्ञा जो दे दी गई। भाजपा को अनुमान नहीं था कि ऐसा करके उसने अनजाने ही उनमें फिर से लालसा पैदा कर दी है। नतीजतन हाल ही जब जयपुर में विस्तारकों का दो दिवसीय अधिवेशन हुआ तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को कहना पड़ गया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। विस्तारक का काम केवल अपने आवंटित विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्रों पर जाकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना है। इसके अतिरिक्त विस्तारक टिकट अथवा किसी पद की लालसा न रखें। जाहिर तौर पर इससे विस्तारक हतोत्साहित हुए होंगे, मगर समझा जाता है कि पार्टी जरूर विचार करेगी कि उन्हें कैसी लॉलीपॉप थमाई जाए।
भाजपा की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव ये भी आया है कि जहां पहले यह कहा जा रहा था कि सत्तर साल से अधिक उम्र के नेताओं को टिकट नहीं दिया जाएगा, उसे बढ़ा कर अब पचहत्तर साल कर दिया गया है।  कदाचित सर्वे में यह तथ्य आया हो कि अगर सत्तर साल के नेताओं को संन्यास दे दिया गया तो बड़े पैमाने पर जीतने वाले प्रत्याशियों का अभाव हो जाएगा।
कुल मिला कर भाजपा ने अगले विधानसभा चुनाव की रणभेरी से बहुत पहले ही अपनी सेना को सुसज्जित करना शुरू कर दिया है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

तिवाड़ी ने दिखाई परनामी को हैसियत

वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी का यह कहना कि जब वे विधायक थे, तब परनामी राजनीति में कुछ नहीं थे, वे उस समय सिर्फ अगरबत्ती बेचते थे, इसके गहरे मायने हैं। प्रदेश अध्यक्ष के बारे में इतनी बेबाक टिप्पणी करने का अर्थ है कि तिवाड़ी आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं। इतना ही नहीं, इससे ये संकेत भी मिलते हैं कि पार्टी के भीतर कुछ न कुछ पक रहा है, वरना प्रचंड बहुमत के साथ सरकार चलाने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ खुल कर आने का दुस्साहस नहींं करते।
ज्ञातव्य है कि पार्टी लाइन से हट कर चल रहे जयपुर की सांगानेर सीट के वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी को राष्ट्रीय अनुशासन समिति की ओर से अनुशासनहीनता का नोटिस जारी किया गया है। समिति के अध्यक्ष गणेशीलाल ने यह कार्यवाही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी की शिकायत पर की है और दस दिन में जवाब मांगा है।
नोटिस की प्रतिक्रिया में तिवाड़ी और मुखर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी जिस दीनदयाल वाहिनी के गठन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व को मेरी अनुशासनहीनता की शिकायतें कर रहे हैं, उसका गठन 29 साल पहले सीकर में उस समय हो गया था, जब मैं विधायक था और परनामी राजनीति में कुछ नहीं थे। वे उस समय सिर्फ अगरबत्ती बेचते थे। उन्होंने कहा कि वे न तो डरेंगे और न ही झुकेेंगे। भ्रष्ट सरकार के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे। अपनी ही पार्टी की सरकार को भ्रष्ट करार देना कोई मामूली बात नहीं है। हालांकि एक समय में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने तत्कालीन वसुंधरा सरकार के खिलाफ मुहिम का आगाज किया था, मगर तब वसुंधरा बहुत मजबूत थीं। मजबूत भी इतनी कि हाईकमान से भी टक्कर ले रही थीं। मगर अब हालात पहले जैसे नहीं हैं। अब केन्द्र में भाजपा की सरकार है और हाईकमान बहुत मजबूत। ऐसे में तिवाड़ी का मजबूती के साथ ये कहना कि कुछ दिनों पहले मुझे दिल्ली में एक नेता ने कहा था कि आप राजस्थान में मौजूदा नेतृत्व को स्वीकार कर लो, सब ठीक हो जाएगा, लेकिन मैं नहीं माना, इसलिए अब नोटिस का डर दिखाया जा रहा है। मैं ऐसे नोटिस से डरने वाला नहीं हूं, गहरे अर्थ रखता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

तिवाड़ी को दो साल से क्यों झेलते रहे?

पार्टी लाइन से हट कर चल रहे जयपुर की सांगानेर सीट के वरिष्ठ भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी को आखिर राष्ट्रीय अनुशासन समिति की ओर से अनुशासनहीनता का नोटिस जारी कर दिया। समिति के अध्यक्ष गणेशीलाल ने यह कार्यवाही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी की शिकायत पर की है और दस दिन में जवाब मांगा है।
नोटिस में गौर करने लायक बात ये है कि उसमें साफ तौर कहा गया है कि वे पिछले दो साल से लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों एवं पार्टी के विरुद्ध बयानबाजी करने में संलग्न हैं। पार्टी द्वारा आयोजित बैठकों में वे उपस्थित नहीं हो रहे और विपक्षी दलों के साथ मिलकर मंच साझा कर रहे हैं। इसके साथ ही नोटिस में यह भी बताया गया है कि वे समानांतर राजनीतिक दल का गठन करने के प्रयास में जुटे हैं।
सवाल ये उठता है कि दो साल तक पार्टी उनको क्यों झेलती रही? दो साल का वक्त बहुत होता है। इस दरम्यान अनेक बार उनकी गतिविधियों व बयानों से पार्टी की किरकिरी हो चुकी है। यदि भाजपा की सरकार सीमित बहुमत वाली होती तो भी समझ में आ सकता था कि पार्टी उनको खोने का खतरा मोल नहीं लेना चाहती, मगर भाजपा तो प्रचंड बहुमत के साथ सरकार चला रही है। केन्द्र में भी भाजपा सरकार है। ऐसे इक्का दुक्का नेता अगर पार्टी छोड़ कर चले जाएं या निकाल दिए जाएं तो बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। ऐसे में पार्टी को उनके बारे निर्णय करने में इतना वक्त क्यों लगा, यह चौंकाता तो है?
ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी हाईकमान काफी सोच विचार के बाद इस पार या उस पार वाली स्थिति में आया है। अभी चुनाव दूर हैं। अगर पार्टी को उनको खोना पड़ता है तो उनकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त वक्त है। अगर अब भी कार्यवाही नहीं की जाती है तो इससे अन्य असंतुष्टों के हौसले बुलंद हो सकते हैं।
बहरहाल, अब देखने वाली बात ये है कि घनश्याम तिवाड़ी क्या जवाब देते हैं और क्या पार्टी की अनुशासन समिति उनके जवाब से संतुष्ट होती है या नहीं। अगर उनको पार्टी से निकालने की नौबत आती है तो निश्चित रूप से राज्य में भाजपा के समीकरण में कुछ बदलाव आएगा। इसके अतिरिक्त यह भी साफ हो जाएगा कि कौन उनके साथ है और पार्टी के साथ। बाकी एक बात जरूर है कि आज जब कि पार्टी अच्छी स्थिति में है, उसके बाद भी तिवाड़ी ने जो दुस्साहस दिखाया है तो वह गौर करने लायक है।
ज्ञातव्य है कि भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी अपने बेटे अखिलेश तिवाड़ी के नेतृत्व में नई पार्टी दीनदयाल वाहिनी का गठन करने में जुटे हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, मई 02, 2017

भाजपा विस्तारक कर पाएंगे संघ प्रचारकों की तरह सेवा?

भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक नया प्रयोग शुरू किया है, जिसके तहत पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए पार्टी के विस्तारकों को जिम्मेदारी दी जा रही है। परिकल्पना ये है कि जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में प्रचारक अपना घर छोड़ कर नि:स्वार्थ भावना से काम करते हैं, ठीक वैसे ही पार्टी के पुराने नेता बिना किसी राजनीतिक लाभ की कामना किए हुए पार्टी को जमीन पर मजबूत करें। कहने और बताने में लगता तो यह अच्छा है, मगर यह एक आदर्श स्थिति है, धरातल पर यह प्रयोग कामयाब होगा, इसको लेकर पार्टी के भीतर ही संशय है।
ज्ञातव्य है कि हाल ही जयपुर के केशव विद्यापीठ में भाजपा के प्रदेश भर के विस्तारकोंं का दो दिवसीय शिविर हुआ। इसमें मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने उपदेश दिया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। विस्तारक का काम केवल अपने आवंटित विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्रों पर जाकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना है। इसके अतिरिक्त विस्तारक टिकट अथवा किसी पद की लालसा न रखें। इतना ही नहीं पहले चरण में लगातार छह माह तक आवंटित क्षेत्र में ही रहना पड़ेगा। कोई विस्तारक अपने गृह जिले में नहीं रहेगा। वसुंधरा ने जोर देकर यह इसलिए कहा कि वे जानती हैं कि जो भी व्यक्ति सक्रिय राजनीति में है या रह चुका है, वह बिना स्वार्थ के काम नहीं करेगा। करेगा तभी, जब उसकी एवज में उसे कुछ न कुछ मिले। बहरहाल, इसी के साथ विस्तारक बनाए गए पुराने नेताओं के सपनों पर पानी फिर गया। जब वे विस्तारक बनाए गए तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वे हाशिये पर नहीं हैं, बल्कि पार्टी उनकी कद्र कर रही है, मगर यदि बिना किसी लालच के काम करना है तो वह तो वे अपने कार्यकर्ता काल में कर चुके हैं, तो ऐसा विस्तारक का तमगा लगाने से क्या फायदा, अब तो राजनीतिक ईनाम की उम्मीद है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि भाजपा ही एक मात्र राजनीतिक संगठन है, जिसके बारे में ऐसी धारणा है कि उसका कार्यकर्ता घर की रोटी खा कर और अपनी जेब का पेट्रोल भाग-दौड़ करता है। विशेष रूप से संघनिष्ट कार्यकर्ता तो वाकई तन, मन और यथासंभव धन से सेवा कार्य करता है। यह कुछ हद तक सही है, मगर उसमें अब परिवर्तन आने लगा है। वो जमाना गया, जबकि पार्टी थी ही विपक्ष में। सत्ता व सत्ता का सुख एक सपना ही था। तब न तो पार्टी के पास इतना धन था कि वह कार्यकर्ताओं पर खर्च करे, और न ही पार्टी के नेता ऐसी स्थिति में थे। वह संघर्ष का दौर था। लेकिन अब जबकि पार्टी नेता सत्ता का स्वाद चख चुके हैं, कार्यकर्ता भी लाभ की उम्मीद करता ही है। ऐसे में सत्ता का तनिक सुख भोग चुके पुराने नेताओं से फोकट में घिसने की आशा करना बेमानी ही है।
बात अगर संघ के प्रचारकों की करें तो वे वाकई घर का परित्याग कर समर्पित भाव से जुटे रहते थे। मगर अब वह आदर्श स्थिति नहीं रही। हालांकि अब भी कुछ प्रचारक परंपरागत तरीके के ही हैं, मगर अनेक ऐसे भी हैं, जो पार्टी नेताओं की मिजाजपुर्सी पसंद करने लगे हैं। और उसकी एक मात्र वजह ये है कि भाजपा की असली ताकत संघ में ही मानी जाती है। अगर उसे रिमोर्ट कंट्रोल की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संघ की सिफारिश पर टिकटों का बंटवारा होता है। संघ प्रचारक व पदाधिकारी भी जानते हैं कि वे तो नींव की ईंट बने हुए हैं, मगर उनकी कृपा से सत्ता पर काबिज नेता सुख भोग रहे हैं। ऐसे में वे भी अतिरिक्त सम्मान की उम्मीद करते हैं।
पार्टी में यह सोच बनी है कि जिस प्रकार संघ के प्रचारक आदर्श जीवन जीते हैं, ठीक वैसे ही पार्टी के पुराने नेता भी नि:स्वार्थ जीवन जीएं।  मगर धरातल का सच ये है कि जिस नेता ने एक बार सत्ता का सुख भोग लिया या किसी साथी को सत्ता सुख भोगते हुए देख लिया, उसमें नि:स्वार्थ भाव पैदा होना कठिन है। मुख्यमंत्री वसुंधरा भले ही कितना भी जोर दें, मगर ऐसे विस्तारक तैयार करना बेहद कठिन है। वसुंधरा ने यह कह कर और पानी फेर दिया कि विस्तारक स्वयं को विधानसभा चुनाव का टिकट बांटने वाला नेता न समझें। अगर ऐसा है तो टिकट का दावेदार भला उसे क्यों गांठेगे? अगर उनकी रिपोर्ट पर किसी को टिकट नहीं मिलेगा तो विधायक बनने बनने वाला उसका अहसान भी क्यों मानेगा?
ऐसा नहीं है कि वसुंधरा अथवा पार्टी के बड़े नेता इस स्थिति से अनभिज्ञ हैं। वे भलीभांति जानते हैं कि यह टास्क कठिन है। ऐसे में संभव है कि विस्तारकों को कोई न कोई लॉलीपॉप पर विचार किया जाए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, अप्रैल 30, 2017

भाजपा बड़े पैमाने पर काटेगी मौजूदा विधायकों के टिकट?

हालांकि मोटे तौर पर यही माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी के नाम में अब भी चमत्कार है और मोदी लहर अभी नहीं थमी है, बावजूद इसके स्वयं भाजपा का मानना है कि एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर भी अपना काम करता है, जिसका ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश व पंजाब हैं। उत्तर प्रदेश में चूंकि भाजपा को बंपर बहुमत मिला, इस कारण उसे मोदी लहर की संज्ञा मिल गई, मगर सच्चाई ये थी कि मायावती व अखिलेश की सरकारों के प्रति जो असंतोष था, वहीं मोदी लहर में शामिल हो गया। उधर पंजाब में मोदी लहर नाकायाब हो गई, क्योंकि वहां एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर पूरा काम कर गया। ऐसे में पार्टी केवल इसी मुगालते में नहीं रहना चाहती कि चुनाव जीतने के लिए केवल मोदी का नाम ही काफी है।
सूत्रों के अनुसार भाजपा के अंदरखाने यह सोच बन रही है कि अगले साल होने जा रहे राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी मोदी फोबिया के साथ एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर काम करेगा। इसके अतिरिक्त विशेष रूप से राजस्थान के संदर्भ में यह तथ्य भी ध्यान में रखा जा रहा है कि यहां की जनता हर साल पांच साल बाद सत्ता बदल देती है। हालांकि मौजूदा मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे चूंकि क्षेत्रीय क्षत्रप हैं और उनका भी अपना जादू है, मगर समझा जाता है कि वह भी अब फीका पड रहा है। हालांकि भाजपा का एक बड़ा खेमा यही मानता है कि वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल संतोषजनक रहा है, मगर फिर भी यह आम धारणा बन गई है कि उनका मौजूदा कार्यकाल पिछले कार्यकाल की तुलना में अलोकप्रिय रहा है। इसकी एक वजह ये रही है कि इस बार भाजपा के पास ऐतिहासिक बहुमत था, इस कारण सभी विधायकों को संतुष्ट नहीं किया जा सका, जिसकी छाया आम जनता में भी नजर आती है। ऐसे में भाजपा के लिए चिंता का विषय है कि राजस्थान में सत्ता विरोधी पहलु से निपटने के लिए क्या किया जाए?
सूत्रों के अनुसार भाजपा हाईकमान की सोच है कि एंटी एस्टेब्ल्शिमेंट फैक्टर तभी कमजोर किया जा सकता है, जबकि बड़े पैमाने पर पुराने चेहरों के टिकट काटे जाएं। चेहरा बदलने से कुछ हद तक पार्टी के प्रति असंतोष को कम किया जा सकता है। पार्टी के भीतर भी मौजूदा विधायक के विरोधी खेमे का असर तभी कम किया जा सकता है, जबकि चेहरा ही नया ला दिया जाए। पार्टी का मानना है कि विशेष रूप से दो या तीन बार लगातार जीते हुए विधायकों के टिकट काटना जरूरी है। हालांकि ऐसा करना आसान काम नहीं है, और उसकी कोई ठोस वजह भी नहीं बनती, मगर फार्मूला यही रखने का विचार है। बस इतना ख्याल जरूर रखा जा सकता है कि सीट विशेष पर यदि किसी विधायक का खुद का समीकरण बहुत मजबूत है तो उसे फिर मौका दिया जा सकता है।
भाजपा हाईकमान ने ऐसे पुराने चेहरों को भी हाशिये पर रखना चाहती है, जो कि पूर्व में विधायक, सांसद या प्रभावशाली रहे हैं। इसके लिए संघ प्रचारकों की तर्ज पर पार्टी में भी विस्तारकों की टीम तैयार की गई है। पिछले दिनों ऐसे विस्तारकों को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने साफ तौर पर कहा कि न तो वे टिकट मिलने की आशा रखें और न ही इस गलतफहमी में रहें कि उनके रिपोर्ट कार्ड पर टिकट दिए जाएंगे। उनका काम केवल पार्टी का जनाधार बढ़ाना है। इसका मतलब साफ है कि पार्टी इस बार बिलकुल नए चेहरों पर दाव खेलना चाहती है।
सूत्रों का मानना है कि अगर चेहरे बदलने के फार्मूले पर ही चुनाव लड़ा गया तो तकरीबन साठ से सत्तर फीसदी टिकट काटे जाएंगे, जिनमें मौजूदा विधायक और पिछली बार चुनाव हारे प्रत्याशी शामिल होंगे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

मंगलवार, अप्रैल 25, 2017

आडवाणी के फंसने से है सिंधियों को मोदी पर गुस्सा

हालांकि पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी सिंधी हैं, मगर वे अकेले सिंधी समाज के नेता नहीं हैं, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पृष्ठभूमि के होने की वजह से हिंदुत्व में ज्यादा यकीन रखते हैं। असल में वे सिंधी समाज से कहीं ऊपर उठ कर हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। बावजूद इसके सिंधी समाज उन्हें अपना नेता मानता है। इतना मानता है कि एक बार जब उन्होंने कह दिया कि सिंधी पुरुषार्थी हैं और उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं है तो उसके बाद सिंधी समाज ने कभी इस मांग पर जोर नहीं दिया। आज जब वे बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की अपील पर फिर से आपराधिक साजिश के आरोपी बन गए हैं तो सिंधी समाज में गुस्सा है। गुस्सा इस वजह से है कि भाजपा में हाशिये पर धकेल दिए जाने के बाद पहली बार राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार बने तो ताजा मामला आड़े आता दिखाई दे रहा है।
यूं तो पिछले कुछ माह से सिंधियों के कुछ संगठन सोशल मीडिया पर आडवाणी को राष्ट्रपति बनाए जाने की मुहिम छेड़े हुए हैं ही, मगर ताजा हालात में वह मुहिम गुस्से में तब्दील होने लगी है। चूंकि सोशल मीडिया बेलगाम है, इस कारण यूं तो कई प्रकार की आपत्तिजनक टिप्पणियां पसरी पड़ी हैं, मगर उनका निचोड़ इन चंद लाइनों में पेश है:-
आडवाणी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए देशभर में राम रथ यात्रा की और उसका परिणाम ये है कि जिस पार्टी की संसद में केवल दो ही सीटें थीं, वह तीन सौ तक पहुंच गई। जब प्रधानमंत्री बनने की बारी आई तो कट्टर हिंदुत्व का चेहरा आड़े आ गया और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए। गोधरा कांड में जब वाजपेयी ने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की नसीहत दी तो आडवाणी ने उनको बचाया। मगर आज वही मोदी अहसान फरामोश हो कर आडवाणी के राष्ट्रपति बनने में आड़े आ रहे हैं। उनके इशारे पर ही सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर बाबरी मामले की फिर से सुनवाई के आदेश जारी करवा दिए। कैसी विडंबना है कि जिस शख्स ने पार्टी को खड़ा किया, आज वही अपनी पार्टी के शासन में अपराधी कर श्रेणी में खड़ा है, जबकि यूपीए के शासन काल में ऐसा नहीं हुआ।
सिंधी समाज आडवाणी को अपना आइकन मानता है। उनकी ही वजह से आज बहुसंख्यक सिंधी भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है, मगर भाजपा ने सिंधियों का इस्तेमाल केवल सत्ता हासिल करने के लिए किया है। सिंधी समाज को चाहिए कि वह मोदी व भाजपा को सबक सिखाए, ताकि उनकी अक्ल ठिकाने आए।
हालांकि सिंधी समाज का कोई सशक्त राष्ट्रीय संगठन नहीं है और अगर हैं तो भी वे कहीं न कहीं संघ या भाजपा विधारधारा के ही नजदीक हैं। ऐसे में कोई भी मोदी के विपरीत जा कर सांगठनिक रूप से आडवाणी के लिए दबाव नहीं बना पाएगा, मगर इस प्रकार की मुहिम आम सिंधियों की भावना को तो प्रदर्शित करती ही है। यह बाद दीगर है कि ऐसी मुहिम के कामयाब होने की संभावना कम ही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000