तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, अक्टूबर 11, 2013

राजस्थान में भाजपा की जीत नहीं अब सुनिश्चित

कोई छह माह पहले तक कायम यह धारणा अब कमजोर होने लगी है कि इस बार राजस्थान की सत्ता पर भाजपा काबिज होने ही जा रही है। बेशक पूरे चार साल तक राज्य से बाहर रही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने सुराज संकल्प यात्रा निकाल कर पार्टी को सक्रिय किया है, मगर इसी बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कई जनकल्याणकारी योजनाओं की झड़ी लगा कर माहौल बदल दिया है। अब मुकाबला कांटे का माना जा रहा है, जो कि पहले पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में माना जा रहा था।
असल में आज से छह माह पहले तक जनता को ऐसा लग रहा था कि भाजपा बढ़त की स्थिति में हैं और आगामी सरकार भाजपा की ही बनेगी। भाजपाइयों को भी पूरा यकीन था कि अब वे सत्ता का काबिज होने ही जा रहे हैं। वस्तुत: इसकी एक वजह ये भी थी कि भ्रष्टाचार और महंगाई के कारण देशभर में यह माहौल बना कि कांग्रेस तो गई रसातल में। उसका प्रतिबिंब राजस्थान में भी दिखाई देने लगा। भाजपाई भी अति उत्साहित थे कि अब तो हम आ ही रहे हैं। रहा सवाल राज्य सरकार के कामकाज का तो वह था तो अच्छा, मगर उसका प्रोजेक्शन कमजोर था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी उम्मीद थी कि उन्होंने पिछले चार साल में जो जनहितकारी काम किए हैं, उसकी वजह से जनता उनके साथ रहेगी, मगर सर्वे से यह सामने आया कि आम जन तक कांग्रेस सरकार के कामकाज का प्रचार ठीक से नहीं हुआ है। इस पर खुद गहलोत ने कांग्रेस संदेश यात्रा निकालने का जिम्मा उठाया। इसी दौरान विभिन्न योजनाओं के कारण स्वाभाविक रूप से विभिन्न वर्गों को मिल रहे आर्थिक लाभ से माहौल बदला है। हालांकि इससे चिढ़ कर वसुंधरा ने यह आरोप लगाना शुरू किया कि सरकार खजाना लुटा रही है, मगर उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि यह खजाना आखिरकार गरीब जनता के लिए ही तो उपयोग में आ रहा है। कुछ मिला कर अब माहौल साफ होने लगा है कि कांग्रेस सरकार से जनता उतनी नाखुश नहीं है, जितना की प्रचार किया गया था। अब तो मीडिया के सर्वे भी कहने लगे हैं कि राजस्थान में कांग्रेस व भाजपा टक्कर में हैं।
पिछले कुछ माह में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ओर से की गई मशक्कत के बाद बदले माहौल से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अब जा कर उम्मीद जागी है कि इस बार राजस्थान में फिर से कांग्रेस की सरकार बनाई जा सकती है, इसी कारण उन्होंने यहां पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है। इसी सिलसिले में उनके निर्देशन में बनी चुनाव अभियान समिति और घोषणा पत्र समिति को पूरी तरह से संतुलित बनाया गया। डेमेज कंट्रोल में कुछ कामयाबी भी हासिल हुई है, इसका एक संकेत देखिए कि जेल में बंद पूर्व जलदाय मंत्री महिपाल मदेरणा की पुत्री दिव्या मदेरणा तक का सुर बदल गया है, जो कि अब तक सरकार को लगातार घेरती रही थीं।
उधर वसुंधरा राजे ने टिकट दावेदारों के बलबूते सुराज यात्रा में शक्ति प्रदर्शन तो कर लिया, मगर अब ये ही टिकट दावेदार उनके लिए सिरदर्द साबित होने वाले हैं और वे उनकी जीत की गणित को भी गड़बड़ा सकते हैं। टिकट दावेदारों ने वसुंधरा में चाहे भीड़ जुटाना हो या अखबारों में लाखों रुपए के विज्ञापन देने की बात हो, सारी ताकत लगा और उसके बदले अब वे भी टिकट की उम्मीद तो रखते ही हैं, यह अलग बात है कि वसुंधरा ने यह स्पष्ट कर दिया कि योग्य उम्मीदवारों को टिकट मिलेगा मगर हर दावेदार अपने योग्य मानते हुए अपनी टिकट पक्की मान रहा है। हर सीट पर दावेदारों की लंबी लिस्ट है। भाजपा में पहली बार टिकट को लेकर दिखा माहौल भाजपा के लिए खतरे का संकेत दे रहा है। यदि भाजपा ने 2009 की तरह टिकट बंटवारे में पैराशूट उम्मीदवारों को उतारा तो जीत की उम्मीद पर पानी फिर सकता है।
जहां तक सुराज संकल्प यात्रा के दौरान कांग्रेस सरकार पर हमले का सवाल है, भले ही वसुंधरा ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अब तक का सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री बताया हो, मगर धरातल पर वे इसे साबित करने में नाकाम रही हैं। उनके अधिसंख्य आरोप नुक्ताचीनी टाइप और रूटीन के हैं। कम से कम इतने तो दमदार नहीं कि सरकार की चूलें हिल जाएं। यानि उनका आम जन पर कोई गहरा असर नहीं है। उनके आरोपों की धार तो तेज रही, मगर उसकी मार उतनी नजर नहीं आई। जुमले उनके तगड़े थे, मगर वे केवल भाषणों में ही सुहावने नजर आए, धरातल पर उसकी गंभीरता कम रही। खुद भाजपाई भी मानने लगे हैं कि इस बार वसुंधरा की यात्रा पहले जैसी कामयाब नहीं रही है। कारण स्पष्ट है। वे खुद अपनी पार्टी में दोफाड़ का कारण बनी रहीं। चार साल तक राज्य से गायब रह कर चुनावी साल में यकायक सक्रिय होने के कांग्रेस के आरोप का आज तक कोई सटीक जवाब नहीं दे पाई हैं।
अगर मोदी फैक्टर की बात करें तो वह अपना असर जरूर दिखाएगा, मगर धरातल की सच्चाई वैसी नहीं जैसी दिखाई देती है। आपको याद होगा कि हाल में कुछ बड़े मीडिया हाउसेस ने सर्वे कराया। सर्वे के मुताबिक कांग्रेस और भाजपा को मिलने वाली (लोकसभा) सीटों में सिर्फ 15 से 20 सीट का फासला है। भाजपा को महज 20 ज़्यादा। ये उन लोगों के मुंह पर तमाचा है, जो पूरे देश में मोदी की लहर बहने का दावा करते हैं। तमाम सर्वे बता रहे हैं कि देश की दो बड़ी पार्टियां (कांग्रेस और बीजेपी) 150 सीट भी नहीं ला पाएंगी। साथ ही गैर कांग्रेसी-गैर भाजपाई कुनबा 200 के आंकड़े को भी बमुश्किल छू पायेगा। यानी कुल 543 सीटों में से भाजपा 150 (लगभग एक चौथाई) का आंकडा भी ना छू पाए तो ये किस लहर और किस लोकप्रियता के दावे की बात हो रही है?
सीएनएन, आईबीएन सीएनडीएस के लोकसभा चुनाव के लिए किए सर्वे के मुताबिक राजस्थान में कांग्रेस के तीन प्रतिशत वोट घटने वाले है, जबकि 2009 के चुनाव में कांग्रेस को 47 प्रतिशत वोट मिले थे। इस तरह आगामी चुनाव में कांग्रेस को 44 प्रतिशत वोट मिल पाएंगे। वहीं भाजपा का सात प्रतिशत मतों का इजाफा होने से 37 प्रतिशत से बढ़कर कांग्रेस के बराबर रहेगी। इससे यह संकेत मिलते है कि मौटे तौर पर विधानसभा चुनाव में भाजपा व कांग्रेस में कड़ी टक्कर होने वाली है। इसमें साइलेंट फैक्टर ये है कि इस प्रकार के सर्वे आमतौर पर शहरी होते हैं, जहां भाजपा का प्रभाव अधिक है, जबकि गांवों में आज भी कांग्रेस की पकड़ ज्यादा है।
ऐसे में अगर ये कहा जाए कि भाजपा की जीत सुनिश्चित नहीं तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालांकि इन सबके बावजूद चुनाव परिणाम इस मुख्य फैक्टर पर निर्भर करेंगे कि दोनों दलों में से कौन ज्यादा सही उम्मीदवारों को टिकट बांटता है।
-तेजवानी गिरधर, 7742067000
tejwanig@gmail.com

गुरुवार, अगस्त 15, 2013

तिवाड़ी भी हुए वसुंधरा शरणम गच्छामी

घोषणा पत्र बनाने के लिए अजमेर में हुई संभागीय बैठक में भाषण देते तिवाडी
राजस्थान में भाजपाई बेड़े की खेवनहार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे के आगे प्रदेश के सारे दिग्गज भाजपा नेताओं के शरणम गच्छामी होने के बाद भी इकलौते वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी अलग सुर अलाप रहे थे। एक ओर तो वसुंधरा राजे सुराज संकल्प यात्रा में व्यस्त थीं, दूसरी ओर उन्होंने अपनी ओर से देव दर्शन यात्रा का नाटक शुरू कर दिया। बाबा रामदेव का सहयोग मिलने पर तो यह संदेश गया कि संभव है वे अपनी अलग पार्टी बना लेंगे। मगर जैसे ही बाबा रामदेव खुल कर नरेन्द्र मोदी और भाजपा की पैरवी करने लगे तो उन्हें भारी झटका  लगा। उनकी अक्ल ठिकाने आ गई कि इस वक्त भाजपा के विपरीत चलना अपने पैरों को कुल्हाड़ी मारने के समान होगा। सो वे भी पलटी खा गए। 
हाल ही वे भाजपा घोषणा पत्र के लिए सुझाव की संभागीय बैठक में भाग लेने अजमेर आए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रदेश और देश में परिवर्तन अवश्यम्भावी होगा और भा.ज.पा. सुराज देने के लिये कृत संकल्प है। 
अपुन ने तो पहले ही इस कॉलम में लिख दिया कि तिवाड़ी भी अन्य दिग्गजों की तरह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे की शरण में आ जाएंगे। वरिष्ठ नेता रामदास अग्रवाल व अन्य वरिष्ठ नेताओं की समझाइश के बाद वसुंधरा व तिवाड़ी के बीच कायम दूरियां कम हुईं। बर्फ पिघलने के संकेत पिछले दिनों जयपुर में भाजपा के धरने पर उनकी मौजूदगी से भी मिल गए थे। अब तो वे घोषणा पत्र बनवाने में भी जुट गए हैं। 
ज्ञातव्य है कि वे वसुंधरा को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किए जाने के वे शुरू से ही खिलाफ थे। तिवाड़ी की खुली असहमति तब भी उभर कर आई, जब दिल्ली में सुलह वाले दिन ही वे तुरंत वहां से निजी काम के लिए चले गए। इसके बाद वसुंधरा के राजस्थान आगमन पर स्वागत करने भी नहीं गए। श्रीमती वसुंधरा के पद भार संभालने वाले दिन सहित कटारिया के नेता प्रतिपक्ष चुने जाने पर मौजूद तो रहे, मगर कटे-कटे से। कटारिया के स्वागत समारोह में उन्हें बार-बार मंच पर बुलाया गया लेकिन वे अपनी जगह से नहीं हिले और हाथ का इशारा कर इनकार कर दिया।
ज्ञातव्य है कि उन्होंने उप नेता का पद स्वीकार करने से इंकार कर दिया था और कहा था कि मैं राजनीति में जरूर हूं, लेकिन स्वाभिमान से समझौता करना अपनी शान के खिलाफ समझता हूं। मैं उपनेता का पद स्वीकार नहीं करूंगा। उनके इस बयान पर खासा भी खासी चर्चा हुई कि देव दर्शन में सबसे पहले जाकर भगवान के यहां अर्जी लगाऊंगा कि हे भगवान, हिंदुस्तान की राजनीति में जितने भी भ्रष्ट नेता हैं उनकी जमानत जब्त करा दे, यह प्रार्थना पत्र दूंगा। भगवान को ही नहीं उनके दर्शन करने आने वाले भक्तों से भी कहूंगा कि राजस्थान को बचाओ। वसुंधरा का नाम लिए बिना उन पर हमला करते हुए जब वे बोले कि राजस्थान को चरागाह समझ रखा है। वसुंधरा और पार्टी हाईकमान की बेरुखी को वे कुछ इन शब्दों में बयान कर गए-लोग कहते हैं कि घनश्यामजी देव दर्शन यात्रा क्यों कर रहे हैं? घनश्यामजी किसके पास जाएं? सबने कानों में रुई भर रखी है। न कोई दिल्ली में सुनता है, न यहां। सारी दुनिया बोलती है, उस बात को भी नहीं सुनते।
उन्हें उम्मीद थी कि आखिरकार संघ पृष्ठभूमि के पुराने नेताओं का उन्हें सहयोग मिलेगा, मगर हुआ ये कि धीरे-धीरे सभी वसुंधरा शरणम गच्छामी होते गए। रामदास अग्रवाल, कैलाश मेघवाल और ओम माथुर जैसे दिग्गज धराशायी हुए तो तिवाड़ी अकेले पड़ गए। उन्हें साफ दिखाई देने लगा कि यदि वे हाशिये पर ही बैठे रहे तो उनका पूरा राजनीतिक केरियर की चौपट हो जाएगा। ऐसे में रामदास अग्रवाल की समझाइश से उनका दिमाग ठिकाने आ गया है।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, अगस्त 06, 2013

राजस्थान में चंद माह में सुधरे माहौल से जागी राहुल की उम्मीद

पिछले कुछ माह में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ओर से की गई मशक्कत के बाद बदले माहौल से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अब जा कर उम्मीद जागी है कि इस बार राजस्थान में फिर से कांग्रेस की सरकार बनाई जा सकती है, इसी कारण उन्होंने यहां पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है। इसी सिलसिले में उनके निर्देशन में बनी चुनाव अभियान समिति और घोषणा पत्र समिति को पूरी तरह से संतुलित बनाया गया और उसके बाद प्रदेश के सभी बड़े नेताओं की बैठक भी ली। इस बैठक में उनका सारा जोर इसी बात पर था कि राजस्थान में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित है, मगर उसके लिए सभी कांग्रेस नेताओं को एकजुट होना होगा। हालांकि सच्चाई यह भी है कि ऊपर भले ही वे गुटबाजी पर कुछ अंकुश लगाने में कामयाब हो जाएं, मगर निचले स्तर यदि खींचतान जारी रही तो परिणाम सुखद नहीं आ पाएंगे।
असल में आज से छह माह पहले तक जनता को ऐसा लग रहा था कि भाजपा बढ़त की स्थिति में हैं और आगामी सरकार भाजपा की ही बनेगी। भाजपाइयों को भी पूरा यकीन था कि अब वे सत्ता का काबिज होने ही जा रहे हैं। वस्तुत: इसकी एक वजह ये भी थी कि भ्रष्टाचार और महंगाई के कारण देशभर में यह माहौल बना कि कांग्रेस तो गई रसातल में। उसका प्रतिबिंब राजस्थान में भी दिखाई देने लगा। भाजपाई भी अति उत्साहित थी कि अब तो हम आ ही रहे हैं। रहा सवाल राज्य सरकार के कामकाज का तो वह था तो ठीकठाक, मगर उसका प्रोजेक्शन कमजोर था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी उम्मीद थी कि उन्होंने पिछले चार साल में जो जनहितकारी काम किए हैं, उसकी वजह से जनता उनके साथ रहेगी, मगर सर्वे से यह सामने आया कि आम जन तक कांग्रेस सरकार के कामकाज का प्रचार ठीक से नहीं हुआ है। इस पर खुद गहलोत ने कांग्रेस संदेश यात्रा निकालने का जिम्मा उठाया। प्रदेशभर के दौरे पर निकले गहलोत ने जनता को बताया कि सरकार ने उनके लिए कांग्रेस घोषणा पत्र के अनुरूप कितने काम किए हैं। साथ ही कुछ और लोकलुभावन योजनाओं पर भी अमल शुरू कर दिया। हालाकि इसी दौरान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे भी सुराज संकल्प यात्रा ले कर निकलीं, मगर वे जिस तरह से गहलोत पर निजी व झूठे आरोप लगाने लगी तो जनता में यह धारणा बनती गई कि पूरे चार साल राज्य से बाहर रहने के बाद अब वे फिर से सत्ता में आने के लिए ही ऐसे आरोप लगा रही हैं। उनके आरोपों की धार तो तेज रही, मगर उसकी मार उतनी नजर नहीं आई। जुमले उनके तगड़े थे, मगर वे केवल भाषणों में ही सुहावने नजर आए, धरातल पर उसकी गंभीरता कम रही। खुद भाजपाई भी मानने लगे हैं कि इस बार वसुंधरा की यात्रा पहले जैसी कामयाब नहीं रही है। एक और उल्लेखनीय पहलू ये रहा कि पिछले छह में जब सरकार के कार्यक्रमों की क्रियान्विति के परिणाम सामने आने लगे तो जनता को समझ में आ गया कि सरकार उनके लिए गंभीरता से उनके लिए काम कर रही है। स्वाभाविक रूप से विभिन्न वर्गों को मिल रहे आर्थिक लाभ से माहौल बदला है। हालांकि इससे चिढ़ कर वसुंधरा ने यह आरोप लगाना शुरू किया कि सरकार खजाना लुटा रही है, मगर उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है कि यह खजाना आखिरकार गरीब जनता के लिए ही तो उपयोग में आ रहा है। कुछ मिला कर अब माहौल साफ होने लगा है कि कांग्रेस सरकार से जनता उतनी नाखुश नहीं है, जितना की प्रचार किया गया था। अब तो मीडिया के सर्वे भी कहने लगे हैं कि राजस्थान में कांग्रेस व भाजपा टक्कर में हैं। यानि कि कुछ माह में कांग्रेस ने अपने ग्राफ में कुछ सुधार किया है। भाजपा को भी समझ में आ गया है कि उनके बहकावे में जनता नहीं आ रही है। अब वह कुछ नए हथकंडे खेलने पर विचार कर रही है, जिनकी कल्पना करना कम से कम कांग्रेस के बस की तो बात नहीं।
बहरहाल, राहुल गांधी को यह फीडबैक मिल चुका है कि सरकार का परफोरमेंस तो ठीक है और राज्य में माहौल भी प्रतिकूल नहीं है, मगर गुटबाजी जारी रही तो सरकार का लौटना मुश्किल होगा। इस कारण वे अब सारा जोर गुटबाजी समाप्त करने और सभी गुटों को संतुष्ट करने में जुट गए हैं। हाल ही घोषित चुनाव संचालन समिति और घोषणा पत्र समिति में जिस प्रकार मुख्य धारा से हट कर चल रहे नेताओं को शामिल गया है, उनको भी शामिल किए जाने से यह संदेश गया है कि राहुल किसी भी सूरत में केवल गुटबाजी के कारण सरकार गंवाना नहीं चाहते। डेमेज कंट्रोल में कुछ कामयाबी भी हासिल हुई है, इसका एक संकेत देखिए कि जेल में बंद पूर्व जलदाय मंत्री महिपाल मदेरणा की पुत्री दिव्या मदेरणा तक का सुर बदल गया है, जो कि अब तक सरकार को लगातार घेरती रही थीं। समझा जाता है कि आने वाले दिनों में गुटबाजी समाप्त करने के कुछ और कदम सामने आ सकते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, जुलाई 25, 2013

क्या फिर वसुंधरा की गोदी में बैठेंगे सिंघवी?

जनता दल यू के राष्ट्रीय महासचिव चंद्रराज सिंघवी के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर स्वार्थी होने का आरोप लगाते हुए पार्टी पद से इस्तीफा देने के साथ ही यह सवाल खड़ा हो गया है कि खुरापाती स्वभाव के चलते वे अब क्या करेंगे? उनके लिए सबसे मुफीद चुनावी मौसम में किस दल में जाएंगे? इससे भी बड़ा सवाल ये है कि उन्हें अब पचाएगा कौन?
सबको मालूम है कि सिंघवी पुराने कांग्रेसी चावल हैं। कांग्रेस की पोल पट्टी के विशेषज्ञ। राजनीति के शातिर खिलाड़ी। जमीन पर पकड़ हो न हो, जोड़तोड़ में माहिर हैं। उसी के दम पर राजनीति करते हैं। उनका उपयोग कितना सकारात्मक करेंगे, इससे कहीं अधिक कितना सामने वाले की बारह बजाएंगे, इसमें है। कांगे्रस में तो पहले से ही शातिरों की भरमार है। जब वहां दाल न गलती दिखी और वसुंधरा के उगते सूरज को सलाम कर दिया। वसुंधरा को भी ऐसे ही खुरापाती की जरूरत थी, जो कांगे्रस की लंका भेद सके। उन्होंने सिंघवी को खूब तवज्जो दी। सिंघवी की चवन्नी भी अठन्नी में चलने लगी। चाहे जिस को चूरण बांटने लगे। केडर बेस पार्टी के नेता व कार्यकर्ता भला ऐसे आयातित तत्व को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। विशेष रूप से संघ लॉबी को तो वे फूटी आंख नहीं सुहाते थे। आखिरकार उन्हें बाहर का रास्ता देखना पड़ा। राजनीति ही जिनका दाना-पानी हो, वे भला उसके बिना जिंदा कैसे रह सकते थे। दोनों बड़े राजनीतिक दलों से नाइत्तफाकी के बाद गैर कांग्रेस गैर भाजपा की राजनीति करने लगे। इधर-उधर घूम कर आखिर जदयू में जा कर टिके। जिस जदयू का राजस्थान में नामलेवा नहीं, उसे तो ऐसे नेता की जरूरत थी, सो वहां बड़ा सम्मान मिला। यकायक राष्ट्रीय क्षितिज पर आ गए। चूंकि वसुंधरा से उनका पुराना नाता था, इस कारण जदयू हाईकमान को भी लगता था कि वे राजस्थान में भाजपा से तालमेल में काम आएंगे। हालांकि यूं तो वे किरोड़ी लाल मीणा के साथ मिल कर तीसरे मार्चे की बिसात बिछाने लगे हुए थे, मगर उम्मीद कुछ ज्यादा नहीं थी। पिछले विधानसभा चुनावों में भी सिंघवी ने तीन पार्टियों का गठबंधन बनाया था, लेकिन उनके उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाए। जहां तक जदयू का सवाल है, उसके पास अभी कुशलगढ़ विधायक फतेह सिंह एकमात्र विधायक हैं। हालांकि जेडीयू और भाजपा ने आपसी तालमेल के साथ पिछला चुनाव लड़ा था,मगर इस बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुद्दा बना कर जदयू ने भाजपा से नाता तोड़ दिया तो अब यहां भी सिंघवी की उपयोगिता समाप्त हो गई। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने उनके बड़बोलेपन को बहाना बना कर पद से हटा दिया। अब उनके लिए जदयू में रहना बेमानी हो गया है। ऐसे में हर किसी की निगाह है कि अब वे कहां जाएंगे। कांग्रेस के खिलाफ इतना विष वमन कर चुके हैं कि वहां जा नहीं सकते। कांग्रेस भी ऐसे नेता को लेकर अपने यहां गंदगी नहीं करना चाहेगी। वैसे भी बदले समीकरणों में भाजपा से दूरी बनाने के बाद नीतीश की कांग्रेस से कुछ नजदीकी दिखाई देती है। जब से हटे ही नीतीश पर हमला बोल कर हैं तो वहां जाने की कोई संभावना नहीं है।
रहा सवाल वसुंधरा का तो वे चूंकि येन-केन-प्रकारेन सत्ता पर काबिज होना चाहती हैं, सो संभव है वे उन्हें फिर से पपोलने लगें। जाहिर तौर पर न सही, गुप्त रूप से तो वे उनका काम कर ही सकते हैं। तीसरे मोर्चे की कवायद के चलते संभव है दिखाई तो किरोड़ी लाल मीणा के साथ दें, मगर ज्यादा संभावना इसी बात की है कि वे वसुंधरा से गुप्त समझौता कर लेंगे। जानते हैं कि गर उनकी सत्ता आई तो मलाई खाने को मिल सकती है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, जुलाई 24, 2013

कटारिया का मुद्दा तो निकला भाजपा के हाथ से

राजस्थान में विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया को सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में जमानत मिलने से भाजपा का वह ख्वाब टूट गया है, जिसके आधार पर वह प्रदेशभर में आंदोलन का मूड बना रही थी।
असल में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा जानती थीं कि उनकी सुराज संकल्प यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व कांग्रेस को घेरने की उनकी कोशिशें दम तोड़ रही हैं। हालांकि वे रोजाना नए-नए आरोप जड़ती जा रही हैं और गहलोत को भ्रष्ट साबित करने की नाकाम कोशिश कर रहीं है, मगर  गहलोत की व्यक्तिगत छवि बेदाग होने के कारण सारे वार खाली जा रहे हैं। वे समझ रही हैं कि वे सरकार की जनोपयोगी योजनाओं के सामने ऐसे आरोपों से चुनावी माहौल नहीं बना पा रही हैं। उलटे उन पर कांग्रेस का एक ही वार काफी भारी पड़ रहा था कि पूरे चार साल तो वे गायब रहीं और चुनाव आते ही आरोपों की झड़ी लगा रही हैं। चार साल गायब रहने का उनके पास कोई जवाब था भी नहीं।  ऐसे में वह किसी ऐसे मौके की तलाश कर रही थी, जिससे राजस्थान की जनता को उद्वेलित किया जा सके। यूं भी भाजपा की चुनावी रणनीति मुद्दे को उछालने की रहती है, ऐसे में उन्हें कोई ऐसा मौका चाहिए था। संयोग से सीबीआई ने उसे वह मौका दे दिया। सीबीआई ने कटारिया को एनकाउंटर का आरोपी बनाया और ऐसे में उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई। वसुंधरा ये सोचने लगीं कि जैसे ही कटारिया को गिरफ्तार किया जाएगा, वे पूरे प्रदेश में कांगे्रेस के दमन चक्र को मुद्दा बना कर आंदोलन छेड़ देंगी, जिससे भाजपा कार्यकर्ता तो लामबंद व वार्म अप होगा ही, जनता की भावनाएं भी भड़काई जा सकेंगी। और इसी कारण बार-बार कहती रहीं कि सरकार कटारिया को झूठा फंसा रही है, सरकार उन्हें भी किसी झूठे मामले में उलझाने की कोशिश कर सकती है, मगर वे किसी से डरने वाली नहीं हैं। असल में वे कटारिया की गिरफ्तारी होने पर किए जाने वाले आंदोलन की पृष्ठभूमि बना रही थीं, मगर उनकी सोच धरी की धरी रह गई, जब कटारिया का जमानत मंजूर हो गई। अब वसुंधरा के पास जनता को उद्वेलित करने का फिलहाल कोई मौका नहीं है। ऐसे में संभव है भाजपा नरेन्द्र मोदी ब्रांड पैंतरा खेल सकती है। इसका इशारा कांग्रेसी नेता कर भी चुके हैं।
जहां तक कटारिया के मुकदमे का सवाल है, उनको जमानत मिलते ही ये सवाल उठने लगे हैं कि यह कैसे हो गया। इस बारे में जयपुर के एक पत्रकार निरंजन परिहार ने तो बाकायदा प्रायोजित न्यूज आइटम बना कर खुलासा करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि कटारिया को फांसने के मामले में सीबीआई बगलें झांक रही है और सबूतों के मामले में सीबीआई झूठी साबित हो रही है।
मुंबई की विशेष अदालत में चल रहे इस केस में कटारिया को आरोपी बना कर उनके खिलाफ चार्जशीट भी पेश कर दी, लेकिन अब अपने लगाए आरोपों को वह साबित नहीं कर पा रही है। ऐसा लग रहा है कि अपनी जलाई गुई आग में सीबीआई खुद झुलस रही है। इसके पीछे तर्क ये दिया है कि सीबीआई की कहानी झूठी है। वे कहते हैं कि कुख्यात अपराधी सोहराबुद्दीन की मौत के मामले में कटारिया के खिलाफ लगाए गए आरोप में सिर्फ एक बात कही गई है कि 27 दिसम्बर, 2005 से 30 दिसम्बर, 2005 तक आईपीएस ऑफिसर डीजी वणजारा उदयपुर के सर्किट हाउस में रुके थे। उसी दौरान राजस्थान के तत्कालीन गृहमंत्री कटारिया का भी स्टाफ भी वहीं पर रुका हुआ था। जिन तारीखों की घटनाओं का हवाला देकर सीबीआई ने कटारिया को फांसने की चार्जशीट तैयार की है, उन दिनों वे मुंबई में भारतीय जनता पार्टी के राष्ठ्रीय अधिवेशन में भाग लेने के लिए मुंबई आए हुए थे। खुद निरंजन परिहार के साथ वे सहारा समय टेलीविजन चैनल के स्टूडिय़ो में भी एक लाइव कार्यक्रम में उपस्थित थे, जिसकी प्रसारण की तारीख को सीबीआई झुठला नहीं सकती।
सिद्धराज लोढ़ा के समाचार पत्र शताब्दी गौरव, गोविंद पुरोहित के जागरूक टाइम्स, सुरेश गोयल के प्रात:काल सहित मुंबई के विभिन्न समाचार पत्रों में उन तारीखों के दौरान कटारिया के मुंबई के विभिन्न कार्यक्रमों की खबरें और तस्वीरें भी छपी हैं, सीबीआई उन्हें गलत साबित नहीं कर सकती। उन्हीं दिनों मुंबई में माथुर भी बीजेपी अधिवेशन में मौजूद थे। सीबीआई द्वारा बताए जा रहे दिनों में दोनों नेताओं के उदयपुर में नहीं होने की बात साबित हो चुकी है। यहां तक कि दोनों नेताओं के मुंबई आने-जाने के टिकट और कटारिया के गोवा यात्रा के सबूत भी मौजूद हैं।
उनकी इन बातों में कितनी सच्चाई है ये तो कोर्ट में होने वाली कार्यवाही से पता लगेगी, मगर केवल इन तारीखों के आधार पर ही सीबीआई ने बेवकूफी की होगी, ये समझ से परे हैं। जरूर उसके पास कोई आधार होगा। भले ही कटारिया को जमानत मिलने से परिहार को ये न्यूज आइटम बनाने का मौका मिला गया, मगर वसुंधरा वे मौका तो नहीं मिल पाया, जिसको वे भुनाने की कोशिश में थीं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, जुलाई 20, 2013

अन्ना और मीडिया में से कौन सच्चा, कौन झूठा?

जन लोकपाल के लिए आंदोलन छेडऩे वाले समाजसेवी अन्ना हजारे एक बार फिर अपने बयान को लेकर विवाद में आ गए हैं। पहले उनके हवाले से छपा कि वे नरेंद्र मोदी को सांप्रदायिक नहीं मानते, दूसरे दिन जैसे ही इस खबर ने मीडिया में सुर्खियां पाईं तो वे पलटी खा गए और बोले कि उन्होंने कभी सांप्रदायिकता पर मोदी को क्लीन चिट नहीं दी। उन्होंने कहा कि मीडिया ने उनके बयान को गलत रूप में छापा।
ज्ञातव्य है कि मध्यप्रदेश में जनतंत्र यात्रा के आखिरी दिन गत बुधवार को इंदौर पहुंचे अन्ना ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर सांप्रदायिक विचारधारा के नेता होने के सियासी आरोपों पर कहा कि मोदी के सांप्रदायिक नेता होने का अब तक कोई सबूत मेरे सामने नहीं आया है। बाद में बयान बदल कर कहा कि मैं कैसे कह सकता हूं कि मोदी सांप्रदायिक नहीं हैं? वे सांप्रदायिक हैं। उन्होंने कभी गोधरा कांड की निंदा नहीं की।
असल में विवाद हुआ ही इस कारण कि जब अन्ना से पूछा गया कि क्या आप मोदी को सांप्रदायिक मानते हैं, तो उन्होंने सीधा जवाब देने की बजाय चालाकी से कह दिया कि मोदी के सांप्रदायिक नेता होने का अब तक कोई सबूत मेरे सामने नहीं आया है। यही चालाकी उलटी पड़ गई। उनका यह कहना कि सबूत नहीं है, अर्थात बिना सबूत के वे मोदी को सांप्रदायिक कैसे कह दें। उन्होंने सीधे-सीधे मोदी को सांप्रदायिक करार देने अथवा न देने की बजाय यह जवाब दिया। कदाचित वे सीधे-सीधे यह कह देते कि वे मोदी को सांप्रदायिक मानते हैं, तो प्रतिप्रश्न उठ सकता था कि आपके पास क्या सबूत है, लिहाजा घुमा कर जवाब दिया। उसी का परिणाम निकला कि मीडिया ने उसे इस रूप में लिया कि अन्ना मोदी को सांप्रदायिक नहीं मानते। स्पष्ट है कि कोई भी अतिरिक्त चतुराई बरतते हुए मीडिया के सवाल का जवाब घुमा कर देगा, तो फिर मीडिया उसका अपने हिसाब से ही अर्थ निकालेगा। इसे मीडिया की त्रुटि माना जा सकता है, मगर यदि जवाब हां या ना में होता तो मीडिया को उसका इंटरपिटेशन करने का मौका ही नहीं मिलता। हालांकि मीडिया को भी पूरी तरह से निर्दोष नहीं माना जा सकता। कई बार वह भी अपनी ओर से घुमा-फिरा कर सामने वाले के मुंह में जबरन शब्द ठूंसता नजर आता है, ऐसे में शब्दों का कमतर जानकार उलझ जाता है। इसका परिणाम ये निकलता है कि कई बार राजनेताओं को यह कह पल्लू झाडऩे का मौका मिल जाता है कि उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा था, मीडिया ने उसका गलत अर्थ निकाला है।
वैसे अन्ना के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। वे कई बार अस्पष्ट जवाब देते हैं, नतीजतन उसके गलत अर्थ निकलते ही हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि हिंदी भाषा की जानकारी कुछ कम होने के कारण वे कहना क्या चाहते हैं और कह कुछ और जाते हैं। कई बार जानबूझ कर मीडिया को घुमाते हैं। उनके प्रमुख सहयोगी रहे अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी आम आदमी पार्टी को समर्थन देने अथवा न देने के मामले में भी वे कई बार पलटी खा चुके हैं। कभी कहते हैं कि उनके अच्छे प्रत्याशियों को समर्थन देंगे तो कभी कहते हैं समर्थन देने का सवाल ही नहीं उठता। इंदौर में भी उन्होंने ये कहा कि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी एक सियासी दल है। लिहाजा मैं इस पार्टी का भी समर्थन नहीं कर सकता। इसके पीछे तर्क ये दिया कि भारतीय संविधान उम्मीदवारों को समूह में चुनाव लडऩे की इजाजत नहीं देता। जनता को संविधान की मूल भावना के मुताबिक निर्वाचन की पार्टी आधारित व्यवस्था को खत्म करके खुद अपने उम्मीदवार खड़े करना चाहिए। केजरीवाल के बारे उनसे अनगिनत बार सवाल किए जा चुके हैं, मगर बेहद रोचक बात ये है कि मीडिया और पूरा देश आज तक नहीं समझ पाया है कि वे क्या चाहते हैं और क्या करने वाले हैं? अब इसे भले ही समझने वालों की नासमझी कहा जाए, मगर यह साफ है कि अन्ना के जवाबों में कुछ न कुछ गोलमाल है। इसी कारण कई बार तो यह आभास होने लगता है कि देश जितना उन्हें समझदार समझता है, उतने वे हैं नहीं। मीडिया भी मजे लेता प्रतीत होता है। वह उन्हें राजनीतिक व सामाजिक विषयों का विशेषज्ञ मान कर ऐसे-ऐसे सवाल करता है, जिसके बारे में न तो उनको जानकारी है और न ही समझ। और इसी कारण अर्थ के अनर्थ होते हैं। बीच में तो जब उनकी लोकप्रियता का ग्राफ आसमान की ऊंचाइयां छू रहा था, तब तो मीडिया वाले देश की हर छोटी-मोटी समस्या के जवाब मांगने पहुंच जाते थे। ऐसे में कई बार ऊटपटांग जवाब सामने आते थे। और फिर पूरा मीडिया उनके पोस्टमार्टम में जुट जाता था। विशेष रूप से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया, जिसे हर वक्त चटपटे मसाले की जरूरत होती है। वह चटपटा इस कारण भी हो जाता था कि शब्दों के सामान्य जानकार के बयानों के बाल की खाल शब्दों के खिलाड़ी निकालते थे। ताजा विवाद भी शब्दों का ही हेरफेर है।
लब्बोलुआब, अन्ना एक ऐसे आदर्शवादी हैं, जिनकी बातें लगती तो बड़ी सुहावनी हैं, मगर न तो वैसी परिस्थितियां हैं और न ही व्यवस्था। और बात रही व्यवस्था बदलने की तो यह महज कपड़े बदलने जितना आसान भी नहीं है। इसी कारण अन्ना के आदर्शवाद ने कई बार मुंह की खाई है। जनलोकपाल के लिए हुए बड़े आंदोलन में तो उनकी अक्ल ही ठिकाने पर आ गई। एक ओर वे सारे राजनीतिज्ञों को पानी-पानी पी कर कोसते रहे, पूरे राजनीतिक तंत्र को भ्रष्ट बताते रहे, मगर बाद में समझ में आया कि यदि उन्हें अपनी पसंद का लोकपाल बिल पास करवाना है तो लोकतंत्र में एक ही रास्ता है कि राजनीतिकों का सहयोग लिया जाए। जब ये कहा जा रहा था कि कानून तो लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए जनप्रतिनिधि ही बनाएंगे, खुद को जनता का असली प्रतिनिधि बताने वाले महज पांच लोग नहीं, तो उन्हें बड़ा बुरा लगता था, मगर बाद में उन्हें समझ में आ गया कि अनशन और आंदोलन करके माहौल और दबाव तो बनाया जा सकता है, वह उचित भी है, मगर कानून तो वे ही बनाने का अधिकार रखते हैं, जिन्हें वे बड़े ही नफरत के भाव से देखते हैं। इस कारण वे उन्हीं राजनीतिज्ञों के देवरे ढोक रहे थे, जिन्हें वे सिरे से खारिज कर चुके थे। आपको याद होगा कि अपने-आपको पाक साफ साबित करने के लिए उन्हें समर्थन देने को आए राजनेताओं को उनके समर्थकों ने धक्के देकर बाहर निकाल दिया था, मगर बाद में हालत ये हो गई है कि समर्थन हासिल करने के लिए राजनेताओं से अपाइंटमेंट लेकर उनको समझा रहे थे कि उनका लोकपाल बिल कैसे बेहतर है? पहले जनता जनार्दन को संसद से भी ऊपर बता रहे थे, बाद में समझ में आ गया कि कानून जनता की भीड़ नहीं, बल्कि संसद में ही बनाया जाएगा। यहां भी शब्दों का ही खेल था। यह बात ठीक है किसी भी लोकतांत्रिक देश में लोक ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। चुनाव के दौरान वही तय करता है कि किसे सत्ता सौंपी जाए। मगर संसद के गठन के बाद संसद ही कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था होती है। उसे सर्वोच्च होने अधिकार भले ही जनता देती हो, मगर जैसी कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, उसमें संसद व सरकार को ही देश को गवर्न करने का अधिकार है। जनता का अपना कोई संस्थागत रूप नहीं है। अन्ना ऐसी ही जनता के अनिर्वाचित प्रतिनिधि हैं, जिनका निर्वाचित प्रतिनिधियों से टकराव होता ही रहेगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, जुलाई 19, 2013

भाजपा वाजपेयी के नाम को भी भुनाएगी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके दौर व नीतियों को लगभग भुला चुकी भाजपा भले ही अब गुजरात में मुख्यमंत्री की अगुवाई में हिंदूवादी एजेंडे पर चलने को कृतसंकल्प है, लेकिन अब भी उसे वाजपेयी की उपयोगिता नजर आती है। वह उनके नाम को भी भुनाने के चक्कर में है। कदाचित यही वजह है भाजपा की प्रचार समिति के प्रमुख नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में गठित बहुप्रतिक्षित इलेक्शन कमेटी में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और डॉ. मुरली मनोहर जोशी के साथ अटल बिहारी वाजपेयी को भी शामिल किया गया है। इसी तरह कुल बीस समितियों की समीक्षा का काम भी मोदी के नेतृत्व में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह, लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी करेंगे। कैसी विचित्र बात है कि अटल बिहारी वाजपेयी का स्वास्थ्य बेहद खराब है और पिछले कुछ महीनों से घर से तो क्या कमरे से बाहर नहीं निकले हैं। लेकिन पार्टी ने उनके नाम को मोदी की समिति में बनाकर रखा है। साफ है कि वह उनके नाम का इस्तेमाल चुनाव के दौरान भी करना चाहती है। यानि कि भाजपा को जितनी उपयोगिता हिंदूवादी वोटों को खींचने केलिए मोदी की लगती है, उतनी उपयोगिता उसे अल्पसंख्यकों को रिझाने के लिए सर्वमान्य नेता वाजपेयी की भी नजर आती है। ऐसा प्रतीत होता है भाजपा का रिमोट कंट्रोल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मोदी को आगे करने के बाद लगातार हो रहे विवाद और वोटों के धु्रवीकरण की संभावना को देखते हुए मोदी को फ्रीहैंड देने में झिझक रही है और साथ ही अटल-आडवाणी युग की छाया को साथ रखते हुए वाजपेयी को भी आइकन बनाना चाहता है। उसके इस अंतर्विरोध का चुनाव परिणाम पर क्या असर होगा, ये तो पता नहीं, मगर भाजपा कार्यकर्ता जरूर दिग्भ्रमित हो सकता है।
-तेजवानी गिरधर