तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, फ़रवरी 04, 2011

...इसलिए नहीं जुड़ रही युवा पीढ़ी संघ के संग

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी में इन दिनों अजमेर में चल रही बैठकों में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि संगठन को मजबूत करने के लिए अधिकाधिक युवाओं को जोड़ा जाए और शाखाओं का विस्तार किया जाए। वजह साफ है कि पिछले कुछ वर्षों से संघ के प्रति आकर्षण कम होने से संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या कम होने से शिथिलता आती जा रही है, जो कि सांप्रदायिकता के आरोप से कहीं ज्यादा चिंताजनक है।
वस्तुत: संघ के प्रति युवकों के आकर्षण कम होने का सिलसिला हाल ही में शुरू नहीं हुआ है अथवा अचानक कोई कारण नहीं उत्पन्न हुआ है, जो कि आकर्षण कम होने के लिए उत्तरदायी हो। पिछले करीब 15 साल के दरम्यान संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या में गिरावट महसूस की गई है। यह गिरावट इस कारण भी संघ के नीति निर्धारकों को ज्यादा महसूस होती है, क्योंकि जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उसी अनुपात में युवा जुड़ नहीं पाया है। भले ही यह सही हो कि जो स्वयंसेवक आज से 10-15 साल पहले अथवा उससे भी पहले जुड़ा, वह टूटा नहीं है, लेकिन नया युवा उतने उत्साह के साथ नहीं जुड़ रहा, जिस प्रकार पहले जुड़ा करता था। इसके अनेक कारण हैं।
मोटे तौर पर देखा जाए तो इसकी मुख्य वजह है टीवी और संचार माध्यमों का विस्तार, जिसकी वजह से पाश्चात्य संस्कृति का हमला बढ़ता ही जा रहा है। यौवन की दहलीज पर पैर रखने वाली हमारी पीढ़ी उसके ग्लैमर से सर्वाधिक प्रभावित है। गांव कस्बे की ओर, कस्बे शहर की तरफ और शहर महानगर की दिशा में बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि भौतिकतावादी और उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण शहरी स्वच्छंदता गांवों में भी प्रवेश करने लगी है। युवा पीढ़ी का खाना-पीना व रहन-सहन तेजी से बदल रहा है। बदलाव की बयार में बह रहे युवाओं को किसी भी दृष्टि से संघ की संस्कृति अपने अनुकूल नहीं नजर आती। संघ के स्वयंसेवकों में आपस का जो लोक व्यवहार है, वह किसी भी युवा को आम जिंदगी में कहीं नजर नहीं आता। व्यवहार तो दूर की बात है, संघ का अकेला डे्रस कोड ही युवकों को दूर किए दे रहा है।
जब से संघ की स्थापना हुई है, तब से लेकर अब तक समय बदलने के साथ डे्रस कोड में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। सच्चाई तो ये है कि चौड़े पांयचे वाली हाफ पैंट ही मजाक की कारक बन गई है। यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि अपने आप को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी मानने वालों के प्रति आम लोगों में श्रद्धा की बजाय उपहास का भाव है और वे स्वयंसेवकों को चड्ढा कह कर संबोधित करते हैं। स्वयं सेवकों को भले ही यह सिखाया जाता हो कि वे संघ की डे्रस पहन कर और हाथ में दंड लेकर गर्व के साथ गलियों से गुजरें, लेकिन स्वयं सेवक ही जानता है कि वह हंसी का पात्र बन कर कैसा महसूस करता है। हालत ये है कि संघ के ही सियासी चेहरे भाजपा से जुड़े नेता तक संघ के कार्यक्रम में हाफ पैंट पहन कर जाने में अटपटा महसूस करते हैं, लेकिन अपने नंबर बढ़ाने की गरज से मजबूरी में हाफ पैंट पहनते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले संघ में ड्रेस कोड में कुछ बदलाव करने पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोर गु्रप ने ऐसा करने का साहस नहीं जुटाया है। उसे डर है कि कहीं ऐसा करने से स्वयंसेवक की पहचान न खो जाए। ऐसा नहीं है कि डे्रस कोड की वजह से दूर होती युवा पीढ़ी की समस्या से केवल संघ ही जूझ रहा है, कांग्रेस का अग्रिम संगठन सेवादल तक परेशान है। वहां भी ड्रेस कोड बदलने पर चर्चा हो चुकी है।
जहां तक संघ पर सांप्रदायिक आरोप होने का सवाल है, उसकी वजह से भी युवा पीढ़ी को संघ में जाने में झिझक महसूस होती है, चूंकि व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता का माहौल ज्यादा बन गया है। भले ही भावनाओं के ज्वार में हिंदू-मुस्लिम दंगे होने के कारण ऐसा प्रतीत होता हो कि दोनों संप्रदाय एक दूसरे के विपरीत हैं, लेकिन व्यवहार में हर हिंदू व मुसलमान आपस में प्रेम से घुल-मिल कर ही रहना चाहता है। देश भले ही धार्मिक कट्टरवाद की घटनाओं से पीडि़त हो, मगर आम जनजीवन में कट्टरवाद पूरी तरह अप्रासंगिक है। युवकों को इस बात का भी डर रहता है कि यदि उन पर सांप्रदायिक संगठन से जुड़े होने का आरोप लगा तो उनका कैरियर प्रभावित होगा। आज बढ़ती बेरोजगारी के युग में युवकों को ज्यादा चिंता रोजगार की है, न कि हिंदू राष्ट के लक्ष्य को हासिल करने की और न ही राष्ट्रवाद और राष्ट्र की। असल में राष्ट्रीयता की भावना और जीवन मूल्य जितनी तेजी से गिरे हैं, वह भी एक बड़ा कारण हैं। युवा पीढ़ी को लगता है कि संघ में सिखाए जाने वाले जीवन मूल्य कहने मात्र को तो अच्छे नजर आते हैं, जब कि व्यवहार में भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। सुखी वह नजर आता जो कि शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार पर चल रहा है, ईमानदार तो कष्ट ही कष्ट ही झेलता है।
जरा, राजनीति के पहलु को भी देख लें। जब तक संघ के राजनीतिक मुखौटे भाजपा से जुड़े लोगों ने सत्ता नहीं भोगी थी, तब तक उन्हें सत्ता के साथ आने वाले अवगुण छू तक नहीं पाए थे, लेकिन जैसे ही सत्ता का स्वाद चख लिया, उनके चरित्र में ही बदलाव आ गया है। इसकी वजह से संघ व भाजपा में ही दूरियां बनने लगी हैं। संघर्षपूर्ण व यायावर जिंदगी जीने वाले संघ के प्रचारकों को भाजपा के नेताओं से ईष्र्या होती है। हिंदूवादी मानसिकता वाले युवा, जो कि राजनीति में आना चाहते हैं, वे संघ से केवल इस कारण थोड़ी नजदीकी रखते हैं, ताकि उन्हें चुनाव के वक्त टिकट आसानी से मिल जाए। बाकी संघ की संस्कृति से उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता। अनेक भाजपा नेता अपना वजूद बनाए रखने के लिए संघ के प्रचारकों की सेवा-चाकरी करते हैं। कुछ भाजपा नेताओं की केवल इसी कारण चलती है, क्योंकि उन पर किसी संघ प्रचारक व महानगर प्रमुख का आशीर्वाद बना हुआ है। प्रचारकों की सेवा-चाकरी का परिणाम ये है कि प्रचारकों में ही भाजपा नेताओं के प्रति मतभेद हो गए हैं। संघ व पार्टी की आर्थिक बेगारियां झेलने वाले भाजपा नेता दिखाने भर को प्रचारक को सम्मान देते हैं, लेकिन टिकट व पद हासिल करते समय अपने योगदान को गिना देते हैं। भीतर ही भीतर यह माहौल संघ के नए-नए स्वयंसेवक को खिन्न कर देता है। जब स्वयं स्वयंसेवक ही कुंठित होगा तो वह और नए युवाओं को संघ में लाने में क्यों रुचि लेगा। ऐसा नहीं है कि संघ के कर्ताधर्ता इन हालात से वाकिफ न हों, मगर समस्या इतनी बढ़ गई है कि अब इससे निजात कठिन ही प्रतीत होता है।
एक और अदृश्य सी समस्या है, महिलाओं की आधी दुनिया से संघ की दूरी। भले ही संघ के अनेक प्रकल्पों से महिलाएं जुड़ी हुई हों, मगर मूल संगठन में उन्हें कोई स्थान नहीं है। इस लिहाज से संघ को यदि पुरुष प्रधान कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। संघ ने महिलाओं की भी शाखाएं गठित करने पर कभी विचार नहीं किया। आज जब कि महिला सशक्तिकरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं, संघ का महिलाओं को न जोडऩे की वजह से संघ उतना मजबूत नहीं हो पा रहा, जितना कि होना चाहिए।
बहरहाल, देखना ये है कि देश के बदलते हालात में भगवा आतंकवाद के आरोप से तिलमिलाया संघ शाखाओं के विस्तार व युवा स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ाने के लिए क्या कारगर उपाय करता है।

गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

मोहन भागवत जी, क्या आप दरगाह जियारत करेंगे?

परम आदरणीय श्री मोहन भागवत जी,
इन दिनों ऐतिहासिक अजमेर शहर देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा की  च्आत्माज् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के नाते आपकी गरिमामय मौजूदगी का गवाह बन रहा है। दुनिया भर को सांप्रदायिक सौहाद्र्र का संदेश देने वाला यह शहर इस बात का भी गवाह रहा है कि राजा हो या रंक, हर कोई दोनों अंतर्राष्ट्रीय धर्मस्थलों तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी जरूर देता है। ऐसे में आमजन में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या आप भी इन स्थलों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगे। जहां तक पुष्कर का सवाल है, अगर वहां जाते हैं तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, या यूं कहिए कि उसमें कुछ भी असहज नहीं लगेगा, क्योंकि आप हिंदूवादी संगठन के अगुवा हैं, मगर क्या दरगाह जाएंगे, यह सवाल जरूर तनिक चौंकाने वाला हो सकता है। यह कदाचित संघ से जुड़े लोगों की मन:स्थिति को कुछ असहज भी कर सकता है कि कैसा बेहूदा सवाल उठाया जा रहा है? मगर सवाल तो सवाल है। अनुकूल जमीन पर हवा, पानी, धूप मिलते ही खुद-ब-खुद उगता है। बस फर्क सिर्फ उसे दबा देने अथवा उजागर करने का है।
वस्तुत: आप देश के सबसे बड़े हिंदूवादी व राष्ट्रवादी संगठन के शीर्षस्थ नेता हैं। देश के एक प्रमुख सत्ता केन्द्र हैं। इन दिनों चूंकि दरगाह बम ब्लास्ट में कुछ संघनिष्ठों के शामिल होने के आरोप लग रहे हैं और संघ इस वजह से लगाए जा रहे भगवा आतंकवाद के आरोप को सिरे से नकार रहा है, अत: यह सवाल बिलकुल सहज और प्रासंगिक है। यह इसलिए भी स्वाभाविक है कि बम ब्लास्ट मामले में संघ के प्रमुख पदाधिकारी इन्द्रेश कुमार भी आरोप के घेरे में आए तो संघ और भाजपा ने कड़ा ऐतराज किया। राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने तो इन्द्रेश कुमार का बचाव करते हुए यहां तक कहा कि सरकार उन्हें झूठा फंसाने का षड्यंत्र रच रही है। यह एक ऐसे व्यक्तित्व को बदनाम करने की साजिश है, जिसने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के माध्यम से सभी मजहबों में भाईचारा कायम करने के लिए सेतु का काम किया है। जाहिर है संघ  केवल कथनी में ही नहीं, अपितु करनी में भी इन्द्रेश कुमार के माध्यम से राष्ट्रवादी मुस्लिमों को अपने करीब करने में जुटा हुआ है। कुछ मुस्लिम जुड़े भी हैं। वैसे भी संघ की अवधारणा है कि हिंदू कोई धर्म नहीं, अपितु एक संस्कृति है, जीवन पद्धति है, जिसमें यहां पल रहे सभी धर्मावलम्बी शामिल हैं।
इसी संदर्भ में संघ के ही एक प्रमुख विचारक के विचार देखिए। उन्होंने लिखा है कि आजादी से पूर्व संघ के संस्थापक डॉ0 केशवराव बलिराम हेडगेवार की सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि इस देश का सबसे प्राचीन समाज यानि हिन्दू समाज राष्ट्रीय स्वाभिमान से शून्य प्राय: आत्म विस्मृति में डूबा था। इसी परिप्रेक्ष्य में संघ का उद्देश्य हिन्दू संगठन यानि इस देश के प्राचीन समाज में राष्ट्रीय स्वाभिमान, नि:स्वार्थ भावना व एकजुटता का भाव निर्माण करना बना। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित ही है कि डॉ. हेडगेवार का यह विचार सकारात्मक सोच का परिणाम था। किसी के विरोध में या किसी क्षणिक विषय की प्रतिक्रिया में से यह कार्य नहीं खड़ा हुआ। अत: इस कार्य को मुस्लिम विरोधी या ईसाई विरोधी कहना संगठन की मूल भावना के ही विरुद्ध हो जायेगा। हिन्दू संगठन शब्द सुनकर जिनके मन में इस प्रकार के पूर्वाग्रह बन गये हैं, उनके लिए संघ को समझना कठिन ही होगा। हिन्दू के मूल स्वभाव उदारता व सहिष्णुता के कारण दुनिया के सभी मत-पंथों को भारत में प्रवेश व प्रश्रय मिला। भारत में अनेक मत-पंथों के लोग रहने लगे। भारत में सभी पंथों का सहज रहना यहां के प्राचीन समाज (हिन्दू) के स्वभाव के कारण है। उस हिन्दुत्व के कारण है जिसे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी जीवन पद्धति कहा है, केवल पूजा पद्धति नहीं। संघ की प्रार्थना में प्रार्थना में मातृभूमि की वंदना, प्रभु का आशीर्वाद, संगठन के कार्य के लिए गुण, राष्ट्र के परम वैभव (सुख, शांति, समृद्धि) की कल्पना की गई है। प्रार्थना में हिन्दुओं का परम वैभव नहीं कहा है, राष्ट्र का परम वैभव कहा है।
उन महाशय के ये विचार जाहिर करते हैं कि संघ मुसलमानों को अपने से अलग करके नहीं मान रहा, भले ही उनकी पूजा पद्धति भिन्न है। आज जब कि इसी पूजा पद्धति की बिना पर कांग्रेस संघ को मुस्लिमों के विरुद्ध खड़ा माना रही है, आपके समक्ष यह चुनौती है कि आप अजमेर की सरजमीं से यह संदेश दें कि उसके आरोप निराधार हैं। कि संघ मुस्लिमों अथवा उनके धर्मस्थलों के प्रति घृणा का भाव नहीं रखता। विशेष रूप से सूफी मत की इस कदीमी दरगाह के प्रति, जो कट्टरवादी इस्लाम से अलग हट कर सभी धर्मों में भाईचारे का संदेश दे रही है।
यदि आपके दरगाह जियारत करने के सवाल को बेहूदा माना जाता है तो इसकी क्या वजह है कि दरगाह में जियारत को आने वालों में मुसलमानों की तुलना में हिंदू ही अधिक होते हैं? क्या उन्हें पता नहीं है कि उन्हें यहां सिर नहीं झुकाना चाहिए।
इसी सिलसिले में बम विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार असीमानंद के उस इकबालिया बयान पर गौर कीजिए कि बम विस्फोट किया ही इस मकसद से गया था कि दरगाह में हिंदुओं को जाने से रोका जाए। दरगाह बम विस्फोट की बात छोड़ भी दें तो आज तक किसी भी हिंदू संगठन ने ऐसे कोई निर्देश जारी करने की हिमाकत नहीं की है कि हिंदू दरगाह में नहीं जाएं। वे जानते हैं कि उनके कहने को कोई हिंदू मानने वाला नहीं है। वजह साफ है। चाहे हिंदू ये कहें कि ईश्वर एक ही है, मगर उनकी आस्था छत्तीस करोड़ देवी-देवताओं में भी है। बहुईश्वरवाद के कारण ही हिंदू धर्म लचीला है। और इसी वजह से हिंदू धर्मावलम्बी कट्टरवादी नहीं हैं। उन्हें शिवजी, हनुमानजी और देवीमाता के आगे सिर झुकाने के साथ पीर-फकीरों की मजरों पर भी मत्था टेकने में कुछ गलत नजर नहीं आता। रहा सवाल मुस्लिमों का तो वह खड़ा ही बुत परस्ती के खिलाफ है। ऐसे में भला हिंदू कट्टरपंथियों का यह तर्क कहां ठहरता है कि अगर हिंदू मजारों पर हाजिरी देता है तो मुस्लिमों को भी मंदिर में दर्शन करने को जाना चाहिए। सीधी-सीधी बात है मुस्लिम अपने धर्म का पालन करते हुए हिंदू धर्मस्थलों पर नहीं जाता, जब कि हिंदू इसी कारण मुस्लिम धर्म स्थलों पर चला जाता है, क्यों कि उसके धर्म विधान में देवी-देवता अथवा पीर-फकीर को नहीं मानने की कोई हिदायत नहीं है।
बहरहाल, आज जब कि संघ मुस्लिम विरोधी और भगवा आतंकवाद के आरोप से मुक्त होने को तत्पर है, भले ही वह घर-घर जा कर खुलासा करे, मगर संघ प्रमुख होने के नाते आपके लिए यह विचारणीय है कि अजमेर में अपनी मौजूदगी का लाभ उठाएंगे या नहीं? क्या दरगाह जियारत करके अथवा दरगाह में सिर्फ औपचारिकता मात्र के लिए श्रद्धा सुमन अर्पित करके कोई उदाहरण पेश करेंगे? क्या भाजपा से जुड़े मुस्लिमों व खादिमों अपनी जमात में गर्व से सिर उठाने का मौका देंगे? या फिर इस सवाल को अनुत्तरित ही छोड़ देंगे?
-गिरधर तेजवानी

मंगलवार, जनवरी 25, 2011

उमर गलत तो भाजपा भी कहां सही है

इन दिनों श्रीनगर के लालचौक पर भाजयुमो की ओर से 26 जनवरी को तिरंगा झंडा फहराने के ऐलान को लेकर राजनीति अपने पूरे उबाल पर है। एक ओर जहां भाजयुमो व भाजपा ने इसे राष्ट्रवाद से जोड़ कर प्रतिष्ठा व राष्ट्रीय अस्मिता का सवाल बना रखा है, वहीं जम्मू-कश्मीर सरकार ने भाजयुमो कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए राज्य की सीमाएं सील कर दी हैं। इस बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस बयान से कि गणतंत्र दिवस जैसे मौके पर पार्टियों को विभाजनकारी एजेंडे को बढ़ावा नहीं देना चाहिए और उन्हें राजनीतिक फायदा उठाने से बचना चाहिए, को लेकर भाजपा उबल पड़ी है।
यह सही है कि भारत में कोई भी कहीं पर भी तिरंगा फहराने के लिए स्वतंत्र है और इसके लिए उसे किसी की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है। तिरंगा फहराना हमारा हक है और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक भी। भारतीय जनता पार्टी की यह दलील वाकई पूरी तरह जायज है, लेकिन इसे जिन हालात में ऐसा करने की जिद है, वह समस्या के समाधान की बजाय उसे उलझाने वाली ज्यादा है।
जहां तक जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की भूमिका का सवाल है, उनका यह कहना कि लालचौक पर तिरंगा फहराने से दंगा हो जाएगा और उसके लिए भाजपा जिम्मेवार होगी, बेशक उग्रवादियों के आगे घुटने टेकने वाला है। यह साफ है कि सरकार का हालात पर कोई नियंत्रण नहीं है। भले ही उन्होंने कानून-व्यवस्था के लिहाज से ऐसा वक्तत्व दिया था, मगर ऐसा कहने से जाहिर तौर पर भाजपाई और उग्र हो गए। वे अगर ये कहते कि तिरंगा फहराना गलत नहीं, वे भी यह चाहते हैं कि कोई भी तिरंगा फहराये, किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, मगर चूंकि अभी हालात ठीक नहीं हैं, इस कारण अभी भाजपाइयों को संयम बरतना चाहिए तो कदाचित भाजपा को अपनी राजनीतिक मुहिम के प्रति जनसमर्थन बनाने का मौका नहीं मिलता। भाजपा को यह मुद्दा बनाने का मौका उमर के बयान से अधिक उस बयान से भी मिला, जो कि आतंकियों ने चुनौती के रूप में दिया था। उस चुनौती को किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। ऐसे में राष्ट्रीय एकता व अस्मिता के लिहाज से भाजपा का रुख निस्संदेह पूरी तरह से सही है और उसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं है।
मगर... मगर इन सब के बावजूद यदि हम सिक्के का दूसरा पहलू नजरअंदाज करेंगे तो यह सब कुछ समझने के बावजूद नासमझ बनने का नाटक ही कहलाएगा। असल में जम्मू-कश्मीर की समस्या आज अचानक पैदा नहीं हुई है। यह विभाजन के साथ ही पैदा हुई और जाहिर तौर पर इसके लिए तत्कालीन हालात और जाहिर तौर पर आजादी में अग्रणी भूमिका अदा करने वाली कांग्रेस जिम्मेदार है। वस्तुत: यह केवल राष्ट्रीय समस्या नहीं, बल्कि इसकी गुत्थी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में उलझी हुई है। इसका समाधान स्वयं भाजपानीत सरकार भी नहीं निकाल पाई थी। जब तक भाजपा विपक्ष रही तब तो उसे केवल देश और देश के अंदर के हालात का पता था, मगर जब उसे सत्ता में आने का मौका मिला तो उसे भी पूरी दुनिया नजर आने लगी। उसे भी समझ में आने लगा कि अंतर्राष्ट्रीय कारणों से उलझी राष्ट्रीय समस्याएं सुलझाने में कितने अंतर्राष्ट्रीय दबाव झेलने पड़ते हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण ये है कि भाजपा सरकार को विमान के हाईजैक होने पर भारतीय यात्रियों को बचाने की खातिर आतंकवादियों को छोडऩे के लिए मौके पर जाना पड़ा था। सत्ता में रह चुकी भाजपा को यह भी अहसास होगा कि अरसे तक आग में धधक रहे जम्मू-कश्मीर में अब जा कर स्थिति थोड़ी संभली है। यदि यह सच है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अंग है तो यह भी उतना ही कठोर सच है कि वहां के हालात राष्ट्रवाद के नाम पर भावनाएं भुना कर छेडख़ानी करने के नहीं हैं। अव्वल तो भाजपा को जम्मू कश्मीर में राज करने का मौका मिलना नहीं है, गर मिल भी जाए तो उसे भी पता लग जाएगा कि जितनी आसानी से वे लाल चौक पर तिरंगा फहराने की बात करते हैं, उतना आसान काम है नहीं। और उससे भी बड़ी बात ये कि वे तो राष्ट्रीय अस्मिता के नाम पर एक दिन के लिए वहां झंडा फहरा कर दिल की आग शांत कर आएंगे, बाकी के तीन सौ चौंसठ दिन की आग तो वहां के लोगों को झेलनी होगी।
असल में जम्मू-कश्मीर में पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी का खैरियत से गुजर जाना पिछले दो दशकों से राष्ट्रीय चिंता का विषय रहता है। अलगाववादियों के जुलूसों पर फायरिंग के चलते पिछले कुछ महीनों के दौरान ठंडे कश्मीर में आग धधक-धधक कर जलती रही है। हिंसा का वह दौर, जिसने करीब-करीब मुख्यमंत्री उमर अब्दु्ल्ला की कुर्सी ले ही ली थी, बड़ी मुश्किल से शांत हुआ है। हाल में उस राज्य में कुछ सकारात्मक संकेत नजर आए हैं। अमन की दिशा में लोगों ने एक बड़ा कदम उठाया है। नेशनल कांफ्रेंस और मुफ्ती सईद की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच लंबे अरसे बाद संवाद फिर शुरू होने जा रहा है। अब्दुल गनी भट और सज्जाद लोन जैसे अलगाववादी नेताओं ने आतंकवादी हिंसा पर कुछ जोखिम भरे वक्तव्य दिए हैं। हिंसा के लंबे दौर के बाद सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल और केंद्र सरकार के वार्ताकारों के प्रयासों से जम्मू कश्मीर के हालात कुछ सामान्य हुए हैं। एक बार बमुश्किल कुर्सी बचाने में सफल रहे उमर अब्दुल्ला भी शायद अब किसी किस्म का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। वस्तुत: तिरंगा झंडा न फहराने देने को जहां भाजपा सहित हर भारतीय देश विरोधी समझता है, वहीं जम्मू-कश्मीर सरकार की नजर में फिलहाल वह देश हित में है। भाजपा राष्ट्रीय स्वाभिमान और अस्मिता का सवाल बना रही है, मगर उमर की नजर में मौजूदा हालात में कानून-व्यवस्था बनाए रखना ज्यादा प्रासंगिक है। मौजूदा हालात में प्रत्क्षत: भले ही भाजपा इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही हो, मगर उसके पीछे छिपा राजनीतिक एजेंडा भी किसी वे छिपा नहीं है।  हालांकि मुद्दा आधारित राजनीति में माहिर भाजपाइयों को यह बात गले नहीं उतरेगी और वे अपनी जिद पर अड़े रहेंगे, मगर देशप्रेम के नाम पर यह यात्रा निकालने से कोई बड़ा देश हित सिद्ध होने वाला नहीं है। अव्वल तो उमर भाजपाइयों को घुसने नहीं देंगे। गर घुस भी गए तो तिरंगा भारी भरकम सुरक्षा इंतजामों में ही फहराया जा सकेगा। इससेे तस्वीर चाहे बदले न बदले, हंगामा करने का मकसद तो पूरा हो ही जाएगा। और उस हंगामे को तो वहां की सरकार को ही भुगतना होगा।

सोमवार, जनवरी 24, 2011

शराब की लत तो वसुंधरा ने ही लगाई थी

जोधपुर व पाली में हाल ही जहरीली शराब से कई लोगों की मौत नि:संदेह दुखद है और शासन-प्रशासन की ढि़लाई और पुलिस व आबकारी विभाग की मिलीभगत का परिणाम है, मगर इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे किस मुंह से सरकार पर जम कर बरस रही हैं, यह सवाल हर एक की जुबान पर है। इसकी एक मात्र वजह ये है कि राजे के राज में ही शराब की नदियां बहाई गई थीं। शराब को सहज सुलभ करवा कर लोगों को शराब का आदी उन्होंने ही बनाया था।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि अशोक गहलोत पर खजाना खाली होने पर रोने का उलाहना देने वाली श्रीमती राजे ने ही सरकार का खजाना बढ़ाने के लिए गली-गली में शराब की दुकानें खुलवा दी थीं। तुर्रा ये कि खजाना खाली होने का रोना रोने की बजाय खजाना भरने का तरीका आना चाहिए। तब ये जुमला आम था कि बच्चे के रोने पर डेयरी बूथ पर दूध भले ही पीने को न मिले, मगर गम गलत करने के लिए आदमी को शराब हर गली के नुक्कड़ पर सहज सुलभ है। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि उन्हीं के राज में यह आदेश जारी हुआ था कि शराब की दुकानों के आसपास पुलिस वाले न फटकें, क्योंकि इससे शराब का धंधा खराब होता है। तर्क ये दिया गया कि लोग पुलिस के डर से शराब की दुकान पर चढऩे से कतराते हैं। इससे राजस्व में कमी आती है। इस सर्कूलर का परिणाम ये हुआ कि लोग शराब की दुकानों के पास ही बैठ कर बेधडक़ मदहोश होते थे और पुलिस उनका मुंह ताकती रहती थी।
तब खुद को सबसे ज्यादा सच्चरित्र और राष्ट्रवादी बताने वाले भाजपाइयों की बोलती बंद थी। जब भी शराब की दुकानों के सिलसिले में बात चलती थी तो भाजपाई इधर-उधर बगलें झांकते थे। किसी संभ्रांत महिला के बारे में इस तरह की टिप्पणी भले ही अशोभनीय लगे, मगर खुद वसुंधरा राजे तक के बारे में एट पीम नो सीएम कह कर परिहास किया जाता था। यह जुमला भले ही कांग्रेस की ओर से उछाला गया, मगर इसे सुन कर भाजपाई भी मंद-मंद मुस्कराते थे।
तब कांग्रेस बहुत चिल्लाई, मगर राजे ने उसकी एक नहीं सुनी। आज राजे यह कह कर गहलोत सरकार की आलोचना कर रही है कि गली-गली में बीयर बार खुल गए हैं, तो क्या यह सच नहीं है कि उनके राज में गली-गली में शराब के ठेके दे दिए गए थे? आज श्रीमती राजे यह कह कर मौजूदा सरकार की खिंचाई कर रही हैं कि शराब की दुकानें तो आठ बजे बंद करवा दीं, मगर बीयर बार आधी रात तक खोलने की छूट दी हुई है। यानि कि वे यह कहना चाहती हैं कि बीयर बार भी आठ बजे ही बंद कर दी जानी चाहिए। ऐसा कह कर वे शराब की दुकानें जल्द बंद करने के निर्णय का समर्थन कर रही हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि अशोक गहलोत ने आते ही सबसे पहले शराब की दुकानें रात आठ बजे बंद करने का जो कठोर कदम उठाया और शराब पी कर वाहन चलाने वालों पर जो सख्ती बरती, उसकी सराहना हर एक की जुबान पर है। विशेष रूप से महिलाओं को तो बेहद खुशी है कि रात आठ बजे शराब की दुकानें बंद होने से उन्हें काफी राहत मिली है।
रहा सवाल अवैध और जहरीली शराब का तो वह राजे के राज में भी धड़ल्ले से बिकती थी और आज भी बिक रही है। तब न राजे उस पर अंकुश लगा पाई थीं और न ही आज गहलोत सरकार कुछ कर पा रही है। शराब की तस्करी पहले भी होती थी और आज भी हो रही है। कुछ विशेष मोहल्लों में शराब पहले भी बनती थी और थडिय़ों पर बिकती थी और आज भी वैसा ही है। इसके ये मायने नहीं है कि चूंकि राजे के राज में शराब की नदियां बहती थीं तो आज भी उसके समंदर होने चाहिए, मगर कम से कम राजे को तो आलोचना का अधिकार नहीं दिया जा सकता, जिन्होंने खुद लोगों को शराब पीने का आदी बनाया।

गुरुवार, जनवरी 20, 2011

पहले सरकारी डॉक्टरों से तो जेनेरिक दवाई लिखवा लीजिए !

नागौर में बेहतरीन जिला कलेक्टर के रूप में ख्याति अर्जित करने के बाद हाल ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक बने डॉ. समित शर्मा ने ऐलान किया है कि सरकारी के साथ-साथ निजी अस्पतालों के चिकित्सकों को भी जेनेरिक दवाई लिखने को बाध्य किया जाएगा। कहने को तो यह बयान बड़ा सुकून देता है, मगर ऐसा लगता है कि शर्मा जी को जमीनी हकीकत ही पता नहीं है। हालत ये है कि आज भी सरकारी डाक्टरों को जेनेरिक दवाई लिखने में जोर आता है। सरकार और निदेशालय उन्हीं पर सख्ती नहीं आजमा पाए हैं।
अपने एक बयान में खुद शर्मा जी ने माना है कि जेनेरिक दवाइयों के खिलाफ माहौल बनाने में चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों ने ही अहम भूमिका अदा की है। उसमें अगर यह जोड़ दिया जाए कि सत्ता के दलालों की ताकत बिना ऐसे लोग भूमिका अदा ही नहीं कर सकते तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसकी वजह साफ है कि ब्रांडेड दवाइयां लिखने पर बतौर कमीशन डॉक्टरों तक हिस्सा पहुंचता है। ऐसे में वे भला जेनेरिक दवाई क्यों लिखेंगे। और सरकारी तनख्वाह के अतिरिक्त कमीशन से मिलने वाली राशि से ही डॉक्टर मनपसंद की जगहों पर तैनात होते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। हालांकि कहने को सरकार बार-बार डॉक्टरों पर जेनेरिक दवाई लिखने का दबाव बना रही है, लेकिन वस्तुस्थिति ये है कि उसे अभी पूरी कामयाबी नहीं मिली है। मेडिकल माफिया का एक बड़ा समूह सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ा रहा है। सख्ती का आलम ये है कि किसी भी डॉक्टर के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही नहीं की जा सकी है। असल बात तो ये है कि वह डॉक्टरों की कमी से ही जूझ रही है। ऐसे में भला वह सख्त कदम कैसे उठा सकती है।
यदि यह मान भी लिया जाए कि वह डॉक्टरों से जेनेरिक दवाई लिखवाने में कामयाब हो गई है तो भी नतीजा ढ़ाक के तीन पात है। मार्केट में जेनेरिक दवाई पूरी तरह से उपलब्ध ही नहीं है। मरीज चाह कर भी जेनेरिक दवाई से वंचित है। उसे कई दुकानों के धक्के खाने पड़ते हैं। उतनी मशक्कत करने को कोई तैयार ही नहीं है। आम मरीज को तो पता ही नहीं है कि ये जेनेरिक दवाई होती क्या है। इससे भी बड़ी सच्चाई ये है कि खुद पढ़े-लिखे मरीज में ही जेनेरिक दवाई के प्रति विश्वास नहीं है। वह खुद ही ब्रांडेड दवाई ले कर जल्द से जल्द ठीक होना चाहता है। इस कारण पर्ची पर जेनेरिक दवाई लिखी भी हो तो वह मेडिकल स्टोर से मांग करता है कि जेनेरिक दवाइयों के कॉम्बीनेशन वाली किसी ब्रांडेड कंपनी की दवाई दे दे। इस जमीनी हकीकत के बाद भी शर्माजी अगर ये भभकी देते हैं कि अब प्राइवेट डाक्टरों को भी जेनेरिक दवाई लिखने के लिए बाध्य किया जाएगा, महज कल्पना ही दिखाई देती है।
शर्मा जी का एक तर्क यह है कि जेनेरिक दवाई पूरी तरह से असरकारक होती है। इसका कोई ठोस आधार नहीं है। हालांकि यह सही है कि मेडिकल माफिया जेनेरिक दवाई को घटिया बता कर माहौल खराब कर रहा है, लेकिन इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जेनेरिक दवाई कम असरकारक ही पाई गई है। इसकी वजह ये है कि जो कंपनियां जेनेरिक दवाई बना रही हैं, वे आलू-चालू सी मानी जाती हैं। उनके पास दवाई बनाने के अत्याधुनिक संसाधन ही नहीं हैं। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे कि जेनेरिक दवाई से तो मरीज ठीक नहीं हुआ और ब्रांडेड कंपनी की दवाई से ठीक हो गया। शर्मा जी का यह तर्क खूबसूरत तो है कि सस्ती होने के कारण जेनेरिक दवाई की गुणवत्ता में कमी नहीं आती, मगर ऐसा कहने का आधार कुछ भी नहीं है। माना कि जेनेरिक दवाई के साथ कमीशन का चक्कर नहीं है और उसके विज्ञापन आदि पर भी खर्च नहीं होता, मगर वह गुणवत्ता के लिहाज से अच्छी ही होती है, इसकी क्या गारंटी है? जब तक सरकार इस बारे में कोई पुख्ता इंतजाम नहीं करेगी और आम जनता में विश्वास कायम नहीं करेगी, जेनेरिक दवाइयों के बारे में दी जा रही तमाम दलीलें काम नहीं आने वाली हैं।

आयोग ने निकाल दी सवर्णों के हंगामे की हवा

हाल ही अन्य पिछड़ा वर्ग के सर्वे फार्म को लेकर जो बवाल खड़ा हुआ था, राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने उसकी हवा पूरी तरह से निकाल दी है। आयोग ने साफ कर दिया है कि उसकी ओर से सवर्ण जातियों के संदर्भ में कोई सर्वे किया ही नहीं जा रहा, तो ऐसे काल्पनिक सर्वे पर हंगामे का औचित्य ही क्या है। आयोग ने इस सिलसिले में बाकायदा एक प्रेस रिलीज जारी किया है, मगर अफसोसनाक पहलू ये है कि सर्वे में पूछे गए सवालों को घटिया बता कर सवर्णों को भडक़ाने वाले और बाद में सवर्णों के भडक़ जाने पर उसकी खबरें सुर्खियों में छापने वाले मीडिया ने उसे प्रकाशित ही नहीं किया। यदि किसी अखबार ने प्रकाशित भी किया होगा तो किसी कोने-खोचरे में दिया होगा, ताकि वह नजर में ही नहीं आए।
आयोग ने जो प्रेस रिलीज जारी किया है, उसमें साफ तौर पर कहा गया है कि सवर्णों के बारे में इस प्रकार का सर्वे उसके क्षेत्राधिकार में ही नहीं आता है, अपितु उसके लिए अलग से आर्थिक पिछड़ा वर्ग आयोग है। आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति पी. के. तिवारी का कहना है कि जो सर्वे फार्म जिला कलेक्टरों को भेजा गया है, उसका सवर्ण जातियों से तो कोई संबंध ही नहीं है।
ऐसा लगता है कि जो सर्वे फार्म एक अखबार में छपा, वह प्रताप फाउंडेशन के प्रवक्ता महावीर सिंह की ओर से ही उपलब्ध करवाया गया होगा, जिसके बारे में संबंधित रिपोर्टर ने पूरी छानबीन की ही नहीं और बाईलाइन फ्रंट पर छपने के चक्कर में जल्दबाजी में सवर्णों को भडक़ाने  का काम कर दिया। खबर छपने के बाद जाहिर तौर पर सवर्ण भडक़े भी और उन्होंने बाकायदा आयोग के दफ्तर पर हंगामा भी किया। आखिरकार आयोग के अध्यक्ष को स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। अहम सवाल ये भी है कि जो सर्वे फार्म जिला कलेक्टरों को भेजा गया है, वह महावीर सिंह के हाथ आया कहां से? यदि आ भी गया तो उन्होंने यह कह कर गुमराह कैसे किया कि वह ब्राह्मण, वैश्य व राजपूत वर्ग से संबंधित है? लगता है कि उन्हें भी नेतागिरी करने की जल्दी थी कि कहीं किसी और नेता के हाथ वह सर्वे फार्म आ जाएगा तो हंगामे का श्रीगणेश करने का श्रेय ले जाएगा।
उल्लेखनीय है कि कथित रूप से ब्राह्मण, राजपूत व वैश्य वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़ों का पता लगाने के लिए भेजे गए सर्वे फार्म में पूछे गए सवालों को ही पिछड़ा करार देते हुए आपत्ति दर्ज कराई गई थी  कि वे अपमानजनक हैं। प्रताप फाउंडेशन के प्रवक्ता महावीर सिंह ने तो बाकायदा यह तक आरोप लगाया कि ऐसे सवाल पूछ कर सरकार गरीब राजपूतों को आरक्षण का लाभ देने से वंचित करना चाहती है। इसी प्रकार एक समाजशास्त्री प्रो. राजीव गुप्ता ने अपनी विद्वता का परिचय देते हुए कहा था कि सरकार भले ही किसी को उसका अधिकार दे या न दे, मगर उसके सम्मान व स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ न करे। दूसरी ओर राज्य पिछड़ा आयोग के सदस्य सचिव ए. के. हेमकार का कहना था कि सर्वे फार्म के सवाल आपत्तिजनक नहीं हैं और ओबीसी में शामिल किए जाने के मापदंड हैं, जो कि पहले से ही निर्धारित हैं। मगर दुर्भाग्य से उन्होंने तब ही यह स्पष्ट नहीं किया कि जिस सर्वे फार्म को लेकर आपत्ति की जा रही है, उसका सवर्णों से कोई ताल्लुक ही नहीं है और इसी कारण विवाद को बढऩे को जगह मिल गई।

मंगलवार, जनवरी 18, 2011

जिस दर पर है बम फोडऩे का इल्जाम, उसी दर से है बरी होने की ख्वाहिश


दरगाह ख्वाजा साहब का दर भी कितना कमाल का दर है, जिस दर पर बम फोडऩे का इल्जाम है आरएसएस नेता इन्द्रेश कुमार पर, उसी दर से इल्तजा है बरी होने की। फौरी तौर पर भले ही यह लगता हो कि इन्द्रेश कुमार की सलामती की दुआ तो छत्तीसगढ़ हज कमेटी व मदरसा बोर्ड के सदर सलीम रजा ने मांगी है, मगर क्या इस बात पर यकीन किया जा सकता है इन्द्रेश कुमार को बताए बिना ही वे यहां दुआ मांगने आ गए होंगे। गर आए भी हैं तो क्या ये कम बात है कि उसी दर से उनके सलामत होने की उम्मीद की जा रही है, जिसे सलामत न रहने देने के लिए बम ब्लास्ट करने की कोशिश का उन पर इल्जाम लगा हुआ है। और अगर दुआ कबूल हो गई तो वाकई ये कमाल हो जाएगा। असल में ख्वाजा साहब की बारगाह के बारे में ऐसा यकीन है कि यहां अकीदत और शिद्दत से की गई हर दुआ कुबूल होती है। फिर भले ही वो इसी मुकाम पर बम फोडऩे के इल्जाम में क्यों न फंसा हो।
ये तो हुई रूहानी बात, मगर सलीम राज ने जिस मकसद से आस्ताना शरीफ पर चादर चढ़ाई है, उसके तौर-तरीके के पीछे क्या राज छिपा है, इसको लेकर कई तरह की सवाली अबाबीलें उडऩे लगी हैं। अव्वल तो ये नौटंकी नजर आती है। गर इन्द्रेश कुमार की सलामती की खातिर दुआ मांगने ही आए थे तो सिर्फ ख्वाजा साहब के सामने ही तो सवाल करना था, उसे सबके सामने इजहार करके सवाल क्यों खड़े कर गए? ये तो वो ही हुआ न कि तस्वीर बदले न बदले, हंगामा जरूर खड़ा होना चाहिए। क्या इससे ये शक नहीं होता कि राज को इन्द्रेश कुमार ने ही भेजा होगा, ताकि पूरे मुल्क में यह संदेश जाए कि मुस्लिमों को भी यकीन नहीं कि वे दरगाह में बम फोडऩे की हरकत करवा सकते हैं और उन पर लग रहा इल्जाम कुछ फीका पड़ जाए? या फिर राज ने यह सब महज दोस्ती की खातिर ही किया है? दुआ मंजूर हुई तो भले ही इन्द्रेश कुमार बरी हो जाएं, मगर राज की इस तरह की सियासी ख्वाहिश से खैरियत से बैठे चंद मुस्लिम नेता तो सवालों की गिरफ्त में आ ही गए हैं।
अव्वल तो जियारत करवाने वाले खादिम व कांग्रेस नेता शेखजादा जुल्फिकार चिश्ती की ही बोलती बंद है। उन्हें यह कह कर बचना पड़ रहा है कि उन्हें तो पता ही नहीं था कि सलीम राज इन्द्रेश कुमार की ओर से चादर पेश करने आए थे। उनकी बात पर यकीन हो भी जाए, मगर राज के साथ आए राजस्थान वक्फ बोर्ड के साबिक सदर व भाजपा नेता सलावत खां और कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश महामंत्री नईम खान तो ये कहने की हालत में भी नहीं हैं कि उन्हें क्या पता कि वे इन्द्रेश कुमार की सलामती के लिए चादर चढ़ाने आए हैं। और तो और जयपुर बैठे प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री मुमताज मसीह तक संदेह के दायरे में आ गए हैं कि उन्होंने राज को शानदार तरीके से जियारत करवाने के लिए सिफारिश करते हुए नईम खान को क्यों भेजा? क्या वे ये नहीं जानते थे कि सलीम राज किस मकसद से अजमेर शरीफ जा रहे हैं? और अगर वाकई इन सभी को धोखे में रख कर सलीम ने यहां चादर चढ़ाई है तो उनसे बड़ा सियासतदान मिलना मुश्किल है। वाकई वे दाद के काबिल हैं। ढ़ेर सारे सवाल खड़े कर जाने वाले ऐसे गुरू घंटाल से सिर्फ एक ही सवाल-उन्होंने अपने मकसद का खुलासा जियारत करने बाद क्यों किया? सवाल और भी मगर उसका जवाब वे खुद ही दे गए हैं, और वो ये कि अगर वे जोर दे कर कह रहे हैं कि इन्द्रेश कुमार संघ से जुड़े होते हुए भी हिंदू-मुस्लिम एकता का हिमायती हैं, माने.......माने, ऐसा कह कर उन्होंने जाने-अनजाने संघ के और नेताओं को तो हिंदू-मुस्लिम एकता के खिलाफ ठहरा ही दिया है।