तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

शुक्रवार, मार्च 27, 2026

मुण्डन संस्कार क्यों कराया जाता है?

मुण्डन संस्कार को चूड़ाकरण संस्कार या चौलकर्म भी कहते हैं, जिसका अर्थ है, वह संस्कार जिसमें बालक को चूड़ा अर्थात् शिखा दी जाता है। बच्चे का मुण्डन संस्कार कराने के पीछे हमारे ऋषि-मुनियों की बहुत गहरी सोच थी। माता के गर्भ से आए सिर के बाल अपवित्र माने गये हैं। इनके मुण्डन का उद्देश्य बालक की अपवित्रता को दूर कर उसे अन्य संस्कारों वेदारम्भ, यज्ञ आदि के योग्य बनाना है क्योंकि मुण्डन करते हुए यह कहा जाता है कि इसका सिर पवित्र हो, यह दीर्घजीवी हो। अतः यह बालक के स्वास्थ्य व शरीर के लिए नया संस्कार है।

दूसरी बात, गर्भ के बाल झड़ते रहते हैं, जिससे शिशु के तेज की वृद्धि नहीं हो पाती है। इन केशों को मुंडवा कर शिखा रखी जाती है। कहीं-कहीं पर पहले मुण्डन में नहीं वरन् दूसरी बार के मुण्डन में शिखा छोड़ते हैं। शिखा से आयु और तेज की वृद्धि होती है। मुण्डन बालिकाओं का भी होता है, किन्तु उनकी शिखा नहीं छोड़ी जाती है ।

शास्त्रों में जन्मकालीन बालों का बच्चे के प्रथम, तीसरे या पांचवे वर्ष में या कुल की परम्परानुसार शुभ मुहुर्त में मुण्डन करने का विधान है। जन्म से तीसरे वर्ष में मुण्डन संस्कार उत्तम माना गया है। पांचवे या सातवें वर्ष में मध्यम और दसवें व ग्यारहवें वर्ष में मुण्डन संस्कार करना निम्न श्रेणी का माना जाता है। बच्चे का मुण्डन शुभ मुहुर्त में किसी देवी-देवता या कुल देवता के स्थान पर या पवित्र नदी के तट पर कराया जाता है। अपने गोत्र की परम्परानुसार मुण्डन करके बालों को नदी के तट पर या गोशाला में गाड़ दिया जाता है। कहीं-कहीं कुल देवता को ये बाल समर्पित कर फिर उन्हें विसर्जित किया जाता है। सिंधी समाज में एक मुंडन घर पर और दूसरा धर्म स्थल पर करने की परंपरा रही है। मुण्डन करने के बाद बच्चे के सिर पर दही-मक्खन, मलाई या चंदन लगाया जाता है। कुछ लोग मुण्डन के बाद बालक को स्नान करा कर सिर पर स्वास्तिक बना देते हैं। मुण्डन में अपने परिवार की परम्परा और रीतियों के अनुसार ही पूजा-पाठ और दान-पुण्य व अन्य मांगलिक कार्य किए जाते हैं। आचार्य चरक ने मुण्डन संस्कार का महत्व बताते हुए कहा है कि इससे बालक की आयु, पुष्टि, पवित्रता और सौन्दर्य में वृद्धि होती है। मुण्डन संस्कार के अनेक मन्त्रों का भी यही भाव है कि सूर्य, इन्द्र, पवन आदि सभी देव तुझे दीर्घायु, बल और तेज प्रदान करें। कई लोग कोई मनोकामना पूरी होने पर भी भगवान का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए मुंडन करवाते हैं।

भारत में सिर मुंडवाना कई धार्मिक स्थलों और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। तिरुपति बालाजी में मन्नत पूरी होने पर या कृतज्ञता स्वरूप भगवान वेंकटेश्वर को केश अर्पण की परंपरा है। गया में पितृ श्राद्ध और पिंडदान हेतु कई लोग मुंडन कराते हैं।

हरिद्वार में श्राद्ध व अस्थि विसर्जन के समय गंगा स्नान के साथ मुंडन कराया जाता है। प्रयागराज संगम तट पर पितृ कर्म, कल्पवास, कुंभ पर्व पर मुंडन कराया जाता है। वाराणसी मोक्ष नगरी में श्राद्ध, तर्पण और मुंडन कराया जाता है। पुष्कर पितृ कर्म और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान मुंडन की परंपरा है। सोमनाथ में विशेषकर पितृ दोष निवारण के लिए मुंडन करवाते हैं। रामेश्वरम धाम में पितृ तर्पण, सेतु स्नान के साथ मुंडन करवाते हैं। कई लोग उज्जैन के महाकालेश्वर में श्राद्ध और ग्रह शांति के अवसर पर और चित्रकूट में पितृ तर्पण व मुंडन करवाते हैं।

इसी प्रकार जैन धर्म में दीक्षा के समय केश-लोचन कराया जाता है। बौद्ध परंपरा में संन्यास दीक्षा में सिर मुंडन कराया जाता है।

गुरुवार, मार्च 26, 2026

तुलसी वास्तु दोष भी दूर करती है

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपके घर, परिवार या आप पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित तुलसी के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार माना जाए तो ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है, वहां लक्ष्मी जी का निवास नहीं होता। अगर ज्योतिष की माने तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता है। बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। बुध के प्रभाव से पौधे में फल फूल लगने लगते हैं। शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते हैं, उनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से विद्यमान है। सबके गुण अलग अलग है।

विद्वान बताते हैं कि प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते है। घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है। 

शास्त्रों के अनुसार वास्तु दोष को दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व से लेकर वायव्य उत्तर-पश्चिम तक लगा सकते हैं। तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होती है। पूर्व दिशा की खिडकी के पास रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है। यदि घर की कोई सन्तान अपनी मर्यादा से बाहर है, अर्थात नियंत्रण में नहीं है तो पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते किसी ना किसी रूप में सन्तान को खिलाने से सन्तान आज्ञानुसार व्यवहार करने लगती है। कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करने से विवाह जल्दी और अनुकूल स्थान में होता है। यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम में रखे तुलसी कि गमले पर प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करे व मिठाई का भोग रख कर किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से व्यवसाय में सफलता मिलती है।

समानांतर ब्रह्मांड का वजूद है?

पिछले दिनों सपने के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि एक और दुनिया में विचरण कर रहा हूं। मगर ठीक वैसी ही, जैसी कि हमारी दुनिया है। वहां घटनाएं ठीक वैसी घट रही हैं, जैसी इस दुनिया में घट चुकी हैं। फर्क सिर्फ यही है कि वह दुनिया कुछ और रंगीन है, कुछ और सजीव। तब ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी दुनिया की तरह, ठीक इस जैसी दुनिया भी कहीं और मौजूद है? यानि कि इसकी कॉपी है। इस सिलसिले में कुछ विद्वानों से चर्चा की। साथ ही इंटरनेट पर सर्च किया तो पाया कि कुछ वैज्ञानिक पेरेलल यूनिवर्स की अवधारणा रखते हैं, लेकिन उसे अब तक साबित नहीं किया जा सका है। वैज्ञानिक संदर्भ में पेरेलल यूनिवर्स उस विचार को कहते हैं, जिसमें हमारा ब्रह्मांड एक मात्र नहीं है, बल्कि कई ब्रह्मांड मौजूद हैं, जिनमें अलग-अलग नियम, अवस्थाएं या इतिहास हो सकते हैं।

यह विचार मुख्य रूप से कुछ उन्नत भौतिक सिद्धांतों, जैसे स्ट्रिंग थ्योरी, क्वांटम मैकेनिक्स के कुछ व्याख्याओं से आता है। इसे सार्वभौमिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। कुछ प्रमुख सिद्धांतों में यह संभावित व्याख्या के रूप में स्वीकार किया जाता है। अभी तक प्रत्यक्ष रूप से कोई अनुभवजन्य सबूत नहीं मिला है कि समानांतर ब्रह्मांड सच में मौजूद हैं। असल में क्वांटम मल्टीवर्ल्ड इंटरप्रिटेशन क्वांटम भौतिकी की एक व्याख्या है, जिसमें हर क्वांटम घटना के लिए ब्रह्मांड विभाजित हो जाता है। इससे बहु-ब्रह्मांड का ख्याल आता है। लेकिन, यह व्याख्या सत्यापित नहीं हुई है।

कुछ ब्रह्मांड शास्त्रियों ने सुझाव दिया है कि बिग बैंग जैसी घटनाओं से अलग-अलग बबल यूनिवर्स बन सकते हैं। फिर भी अब तक कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं। वैज्ञानिक समुदाय में तीन मुख्य स्थितियाँ पाई जाती हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे संभव मानते हैं, पर असिद्ध। कुछ कहते हैं कि यह व्यर्थ कल्पना है, जब तक कोई परीक्षण नहीं मिल जाता। कुछ मानते हैं कि यह क्वांटम और ब्रह्मांड शास्त्र की बेहतर समझ की दिशा में एक वैध विचार है। कुल मिलाकर वैज्ञानिकों ने इसे विचार के रूप में लिया है। कुछ सिद्धांत इसे संभावित मानते हैं। लेकिन इसे अभी तक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। इस सिलसिले में ब्रह्माकुमारीज का एक प्रमुख सिद्धांत कालचक्र से जुड़ा है। उनके अनुसार यह सृष्टि एक निश्चित, चक्रीय क्रम में चलती है और हर चक्र के बाद वही घटनाएँ, वही आत्माएँ और वही भूमिकाएँ फिर से बिल्कुल उसी प्रकार दोहराई जाती हैं। उनके मतानुसार सृष्टि का एक पूरा चक्र 5000 वर्ष का होता है। इस चक्र में चार युग आते हैं। सतयुग पूर्ण शांति और पवित्रता का युग, त्रेतायुग थोड़ी कमी, पर अभी भी उच्च अवस्था, द्वापरयुग भक्ति और पतन की शुरुआत और कलियुग नैतिक पतन और अशांति का समय। कलियुग के अंत में एक छोटा-सा संगमयुग माना जाता है, जब परमात्मा (उनके अनुसार शिव) ज्ञान देकर आत्माओं को शुद्ध करते हैं और फिर पुनः सतयुग आरंभ होता है। कुल मिला कर ब्रह्माकुमारीज का दावा है कि हर 5000 वर्ष बाद इतिहास हूबहू दोहराया जाता है। आप और मैं भी वही आत्माएँ हैं जो पिछले चक्र में भी थे। हमारी भूमिकाएँ भी बिल्कुल वैसी ही रहती हैं, न कम, न ज्यादा। इसे वे “ड्रामा का सिद्धांत” कहते हैं, जैसे एक फिल्म निश्चित स्क्रिप्ट के अनुसार चलती है।

वैसे परंपरागत पुराणों के अनुसार चारों युगों की अवधि लाखों वर्षों की मानी जाती है, न कि 5000 वर्ष। आधुनिक इतिहास और विज्ञान सृष्टि को अरबों वर्ष पुराना मानते हैं और घटनाओं के हूबहू दोहराव का समर्थन नहीं करते। कुछ दार्शनिक परंपराएँ, जैसे बौद्ध और सांख्य भी चक्रीय सृष्टि की बात करती हैं, लेकिन ठीक वैसी ही पुनरावृत्ति का विचार उतना स्पष्ट नहीं है।

मंगलवार, मार्च 24, 2026

 मान्यता है कि जिस मूर्ति की पूजा कम होती है, अथवा निर्जन स्थान पर मौजूद है, उसकी पूजा करने से त्वरित व अधिक फल मिलता है। यानि वहां सुनवाई तुरंत होती है। यह मान्यता लोकविश्वास मात्र नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार है।

वस्तुतः कम पूजित मूर्ति प्रायः पुराने मंदिरों में, गांव के कोने में या उपेक्षित स्थानों पर होती है। वहां जाने वाला व्यक्ति अक्सर सच्ची मजबूरी या आंतरिक पुकार लेकर जाता है, उसमें औपचारिकता नहीं होती। कम पूजित मूर्ति के सामने जाने वाला भक्त सामान्यतः दिखावे से मुक्त होता है। भीड़ और प्रतिस्पर्धा से दूर होता है। उसका भाव अधिक निजी और गहरा होता है। इसलिए फल अधिक अनुभूत होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जहाँ पूजा कम होती है, वहां अपेक्षा नहीं होती, प्रचार नहीं होता, चमत्कार की अफवाह नहीं होती, इससे मन अहंकार और सौदेबाजी से मुक्त रहता है। ऐसा मन जब प्रार्थना करता है, तो वह भीतर तक उतरती है।

तांत्रिक और भक्ति परंपरा में कई साधना-मार्गों में कहा गया है कि उपेक्षित देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वहां जाने वाला व्यक्ति फल नहीं, संबंध चाहता है। नाम नहीं, शरण चाहता है।

गूढ़ सत्य ये है कि ईश्वर को पूजा की संख्या नहीं, निष्ठा की तीव्रता आकर्षित करती है। भीड़ में भक्ति अक्सर सामाजिक होती है, परंपरागत होती है, जबकि अकेले में भक्ति आत्मिक होती है, मौन होती है, सत्य होती है। कम पूजित मूर्ति की पूजा से अधिक फल इसलिए मिलता है क्योंकि वहां श्रद्धा अधिक शुद्ध होती है, अहंकार कम होता है, संबंध सीधा होता है।

इस बारे में एक कहानी है। गांव के बाहर, पीपल और खेजड़ी के बीच एक पुरानी सी मूर्ति खड़ी थी। न नक्काशी, न रंग, बस पत्थर पर उकेरी एक आकृति। लोग उसे कहते थे बूढ़ा देव। यहां न पुजारी था, न प्रसाद की दुकान। सिर्फ धूप, चुप्पी और हवा की सरसराहट। एक बार गाँव में सूखा पड़ा। लोग बड़े मंदिर गए। मन्नतें मानीं, नारियल चढ़ाए, लंबी कतारें लगीं। सूखा वैसे का वैसे रहा। उसी गांव की एक विधवा थी धन्नो। उसके पास न चढ़ावा था, न मन्नत के शब्द। वह चुपचाप उस बूढ़े देव के पास गई। एक लोटा पानी रखा, और बोली, “मैं बहुत कुछ नहीं जानती, बस इतना जानती हूँ कि तू भी अकेला है, मैं भी।” फिर रोई नहीं। बस बैठी रही। तीसरे दिन बादल आए। पहले उसी कोने में बरसे, जहां बूढ़ा देव खड़ा था। फिर धीरे-धीरे पूरे गांव में। लोग चकित थे। किसी ने कहा संयोग है। किसी ने कहा कि बरसात का मौसम था। पर धन्नो कुछ नहीं बोली। वह जानती थी कि देवता को शब्द नहीं, साथ अच्छा लगता है। तब से गाँव में एक कहावत चल पड़ी, जिस देव के पास भीड़ नहीं, उसके पास भगवान बैठा होता है। और लोग समझ गए कि कम पूजित मूर्ति जल्दी फल देती है, क्योंकि वहां न दिखावा होता है, न सौदा, सिर्फ मन होता है।

सूफी कहते हैं कि खुदा को तलााशने के लिए दरगाह नहीं, दिल चाहिए। सिंध की धरती पर एक फकीर रहता था लाल शाह। उसकी कब्र न मशहूर थी, न उस पर चादरें चढ़ती थीं। रेत में दबी, कंटीली झाड़ियों के बीच, बस एक टूटा हुआ पत्थर था। लोग कहते, यहां कौन जाता है? न करामात है, न शोर। एक दिन एक मुसाफिर आया। बहुत भटका हुआ, बहुत थका हुआ। वह बड़े दरबारों से होकर आया था। हर जगह भीड़, हर जगह मांग। वह इस टूटी कब्र के पास बैठ गया। न फातिहा पढ़ी, न दुआ माँगी। बस बोला, “अगर तू वाकई दोस्त है, तो चुप बैठने दे।” सूफी कहते हैं कि यहीं से मुलाकात शुरू होती है। रात को मुसाफिर को नींद आई। ख्वाब में लाल शाह बोले, “जहां सवाल नहीं होते, वहीं जवाब उतरते हैं।” सुबह वह मुसाफिर बदला हुआ था। उसकी परेशानी बाहर से नहीं, अंदर से हल हो चुकी थी। लोग पूछने लगे, “तुझे वहां क्या मिला, जहां कुछ भी नहीं था?” वह मुस्कराया, “वहां खुुदा था, इसलिए कुछ नहीं था।” सूफियाना हिकमत कहती है, जो दर मशहूर हो जाता है, वहां अक्सर अल्लाह छुप जाता है। और जो दर गुमनाम रहे, वहां अल्लाह खुद बैठा रहता है। इसलिए सूफी कहते हैं कि कम पूजी जाने वाली मूरत, या गुमनाम कब्र जल्दी असर करती है, क्योंकि वहां दिल खाली होकर पहुंचता है।

रविवार, मार्च 22, 2026

क्या पुनः जन्म लेती है आत्मा?

आत्मा के बारे में विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण हैं, और ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप किस परंपरा या विश्वास प्रणाली से आते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार, आत्मा अमर होती है और शरीर के नष्ट हो जाने पर पुनर्जन्म लेती है। आत्मा किसी कब्र या शरीर में स्थायी रूप से नहीं रहती, बल्कि कर्मों के आधार पर उसे नया शरीर प्राप्त होता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से साफ तौर पर यह प्रमाणित करना कठिन है, मगर पुनर्जन्म की ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं, जिन पर विज्ञान मौन हो जाता है। हिंदू धर्म में तो पुनर्जन्म का पूरा विधान है कि आत्मा अगला जन्म कहां लेगी? यहां तक कि सात जन्मों की अवधारणा है। प्रेम के वशीभूत पति-पत्नी सात जन्मों का साथ निभाने की कामना करते हैं। कर्मों के अनुसार अनेक योनियों में जन्म लेने की मान्यता है। रामायण, महाभारत व पुराणों में पुनर्जन्म की अनेकानेक कथाएं प्रचलित हैं। हालांकि वैज्ञानिक नजरिया रखने वाले पुनर्जन्म की घटना को मानसिक विकृति के रूप में परिभाषित करते हैं। इस पर परामनोवैज्ञानिकों ने बहुत काम किया है। 

दूसरी ओर इस्लाम में यह विश्वास है कि मृत्यु के बाद आत्मा को अल्लाह के पास ले जाया जाता है, और कब्र में एक अंतरिम जीवन शुरू होता है, जहां आत्मा अपने कर्मों के अनुसार या तो शांति पाती है या कष्ट उठाती है। परंतु आत्मा कब्र में स्थायी रूप से नहीं रहती, यह एक अस्थायी अवस्था है, जब तक कि कयामत का दिन नहीं आ जाता। ऐसे में इस्लामिक मान्यता के अनुसार, पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया जाता है। इस्लाम में यह विश्वास है कि हर इंसान की एक ही जिन्दगी होती है, और मृत्यु के बाद उसे कब्र में दफनाया जाता है। फिर कयामत या आखिरत के दिन, अल्लाह इंसानों को दोबारा जिंदा करेगा और उनके कर्मों का हिसाब-किताब होगा। अच्छे कर्म करने वालों को जन्नत में और बुरे कर्म करने वालों को जहन्नुम में भेजा जाएगा। हालांकि, अपवादस्वरूप कुछ व्यक्तिगत अनुभव या घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें लोग पुनर्जन्म से जोड़ते हैं, लेकिन वे इस्लामी मान्यताओं के अनुसार नहीं होते। कई बार ऐसे अनुभवों को व्यक्ति की मानसिक स्थिति, या दूसरी संस्कृतियों की मान्यताओं से प्रभावित माना जा सकता है। अगर मुस्लिम समाज में पुनर्जन्म से संबंधित कहीं घटनाएं सामने आती हैं, तो वे व्यक्तिगत धारणाओं या अन्य बाहरी प्रभावों के कारण हो सकती हैं, लेकिन वे इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं होतीं।

ईसाई धर्म में भी आत्मा को अमर माना जाता है। मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग या नर्क में जाती है, और कब्र केवल शरीर के लिए है। आत्मा कब्र में नहीं रहती।

बौद्ध धर्म में आत्मा की अवधारणा थोड़ी भिन्न है, क्योंकि आत्मा को स्थायी नहीं माना जाता। जीवन-मरण का चक्र चलता रहता है और पुनर्जन्म होता है। कब्र का आत्मा से कोई विशेष संबंध नहीं होता। इसलिए, आत्मा कब्र में रहने का विचार केवल कुछ विशेष धार्मिक मान्यताओं में होता है, लेकिन अधिकांश प्रमुख धर्म इसे अस्थायी मानते हैं या आत्मा को कब्र से परे की अवस्था में मानते हैं।

मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर क्यों रखा जाता है?

हमारे यहां मृत्यु से जुड़ी अनेक परंपराए हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक परंपरा है कि मरणासन्न यानि कि मृत्यु जब करीब हो, जब यह निश्चित हो जाए कि मृत्यु आने ही वाली है, किंतु प्राण निकलने में कष्ट अधिक हो रहा हो तो मृत्यु को प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सिर उत्तर दिशा की ओर कर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त मौत के बाद मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर रखने की भी रवायत है। इस परंपरा को निभाते तो अधिकतर लोग हैं, लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि मृतक का सिर उत्तर दिशा की ओर ही क्यों रखना चाहिए? मृतक का सिर उत्तर की ओर करके इसलिए रखते हैं कि प्राणों का उत्सर्ग दशम द्वार से हो। चुम्बकीय विद्युत प्रवाह की दिशा दक्षिण से उत्तर की ओर होती है। कहते हैं मरने के बाद भी कुछ क्षणों तक प्राण मस्तिष्क में रहते हैं। अतः उत्तर दिशा में सिर करने से गुरुत्वाकर्षण के कारण प्राण शीघ्र निकल जाते हैं। 

परंपरा के अनुसार मृत्यु के बाद अंत्येष्ठि संस्कार के समय मृतक का सिर दक्षिण की तरफ रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार दक्षिण की दिशा मृत्यु के देवता यमराज की मानी गई है। इस दिशा में शव का सिर रख हम उसे मृत्यु के देवता को समर्पित कर देते हैं।

इसके अतिरिक्त पार्थिव शरीर को ले जाते समय उसका सिर आगे और पैर पीछे रखे जाते हैं। फिर विश्रांत स्थल पर मृत देह को एक वेदी पर रखा जाता है, इसलिए कि अंतिम बार व्यक्ति इस संसार को देख ले। इसके बाद देह की दिशा बदल दी जाती है। फिर पैर आगे और सिर पीछे हो जाता है अर्थात तब मृत आत्मा को श्मशान को देखते हुए आगे बढना होता है। अंत में जब देह को चिता पर लेटाया जाता है तो उसका सिर चिता पर दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं।

हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को सूर्यास्त से पूर्व दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि दी जाती है और सामान्यजन का दाह संस्कार किया जाता है। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा और ओरा लिए हुए होता है, इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है। एक बात और, जीते जी उसकी आत्मा षरीर से पृथक हो जाती, इस कारण उसका दाह संस्कार करने की जरूरत नहीं होती। इसी प्रकार मासूस बच्चे का भी दफनाया जाता है, क्यों कि उसकी आत्मा का शरीर से पक्का संबंध नहीं होता, इस कारण दाह संस्कार की जरूरत नहीं होती। दूसरी ओर आम व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाता है ताकि उसकी अपने शरीर के प्रति आसक्ति छूट जाए।

ऐसी मान्यता है कि अंतिम संस्कार में शामिल होना पुण्य कर्म है। जिस घर में किसी का देहांत हुआ है, उस घर से 100 गज दूर तक के घरों के लोगों को अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहिए। 

श्मशान ले जाने से पूर्व घर पर कुटुंब के लोग मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर की परिक्रमा करते हैं। बाद में दाह संस्कार के समय संस्कार करने वाला व्यक्ति छेद वाले घड़े में जल लेकर चिता पर रखे पार्थिव शरीर की परिक्रमा करता है। जिसके अंत में पीछे की ओर घड़े को गिरा कर फोड़ दिया जाता है। ऐसा मृत व्यक्ति के शरीर से मोहभंग करने के लिए किया जाता है। 

हिंदू धर्मानुसार सूर्यास्त के बाद कभी भी दाह संस्कार नहीं किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई है तो उसे अगले दिन सुबह के समय ही दाह संस्कार किए जाने का नियम है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से मृतक की आत्मा को परलोक में भारी कष्ट सहना पड़ता है और अगले जन्म में उसे किसी अंग में दोष भी हो सकता है।

मंगलवार, मार्च 17, 2026

अगरबत्ती जलाना अनुचित है?

हमारे यहां धर्म स्थलों व घर के मंदिरों में अगरबत्ती जलाने का चलन है। यह आम बात है। मगर कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ऐसा करना अनुचित है। आइये, जानते हैं कि उसकी क्या वजह है?

वे शास्त्रों के हवाले से सवाल खड़ा करते हैं कि जिस बांस की लकड़ी को चिता में भी जलाना वर्जित है, हम उस बांस से बनी अगरबत्ती को मंदिर में कैसे जला सकते हैं? वे कहते हैं कि शव को भले ही बांस व उसकी खपच्चियों से बनी सीढ़ी पर रख कर श्मशान पहुंचाते हैं, लेकिन जलाते वक्त उसे अलग कर देते हैं, क्यों कि बांस जलाने से पितृ दोष लगता है। उनका तर्क है कि शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं पर भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता। सब जगह धूप करने का ही जिक्र है। ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार हिंदू अगर का धूप करते हैं, वैसे ही मुस्लिम लोबान का धूप जलाते हैं। इससे वातावरण शुद्ध होता है और सकारत्मकता आती है।

अगरबत्ती नहीं जलाने के बारे में वैज्ञानिक तर्क ये है कि बांस में सीसा प्रचुर मात्रा में होता है और उसके जलने पर लेड आक्साइड बनता है, जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है, वह खतरनाक है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती के जलने से उत्पन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केन्मिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है। यह भी स्वांस के साथ शरीर मे प्रवेश करता है, जिससे फेफड़ों को नुकसान होता है। इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर में पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति कैंसर अथवा मस्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। इसी कारण अनेक लोग अगरबत्ती की जगह धूप व विभिन्न प्रकार की धूप बत्तियां काम में लेते हैं।

अगरबत्ती नहीं जलाने के खिलाफ तर्क देने वाले कहते हैं कि यह केवल एक भ्रान्ति है कि बांस की लकड़ी को नहीं जलाया जाता। देश के बहुत से प्रांतों में बांस की लकड़ी के अंदर भोजन बनाया जाता है, जिसमे बांस की लकड़ी ही जलती है।

रविवार, मार्च 15, 2026

क्या उठावने के दिन बारहवां उचित है?

इन दिनों ऐसा चलन में आ रहा है कि कई लोग अपने परिजन के निधन के बाद उठावने अर्थात तीसरे की रस्म के साथ ही बारहवें की रस्म कर इतिश्री कर रहे हैं। वर्तमान दौर में ऐसा लोग समयाभाव के कारण कर रहे हैं, तो ठीक प्रतीत होता है, मगर षास्त्र के जानकारों का कहना है कि ऐसा करना अनुचित है।

ज्ञातव्य है कि उठावना मृत्यु के बाद तीसरे दिन परिवार और समाज के सदस्यों द्वारा मृत आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें मृतक के उत्तराधिकारी को पगडी पहनाई जाती है। इस लिहाज से यह एक सामाजिक कर्म भी है। इसके बाद लोग अपने प्रतिश्ठान खोल कर दैनिक कार्य फिर से आरंभ करते हैं। 

बारहवां मृत्यु के बारहवें दिन किया जाने वाला कर्मकांड है, जिसमें पिंडदान, तर्पण और भोज का आयोजन होता है। इसे मृत आत्मा की सद्गति और परिवार की शुद्धि के लिए किया जाता है। जो परिवार परंपराओं को गहराई से मानते है, तो वे दोनों को अलग-अलग दिन करते हैं। इससे हर अनुष्ठान को पूरी श्रद्धा से निभाने का समय मिलता है।

आधुनिक समय में कई परिवार एक साथ उठावना और बारहवां संपन्न करते हैं। यह समय और संसाधनों की बचत के लिए किया जाता है। लेकिन विद्वान कहते हैं कि दोनों कर्मकांड अलग अलग ही करने चाहिए। दोनों अलग अलग महत्व है। यदि समयाभाव है तो बारहवां छोटे स्तर पर किया जा सकता है।

उक्त सभी के पीछे बहुत गहरा विज्ञान छुपा हुआ है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मृत व्यक्ति का दिमाग तीन दिन तक सक्रिय रहता है। हिन्दू धर्मानुसार, ज्यादा से ज्यादा व्यक्ति की चेतना तीन दिन में लुप्त होकर नया जन्म ले लेती है। यदि कोई बहुत ही स्मृतिवान है तो वह तेरह दिन में दूसरा जन्म ले लेता है या फिर सवा माह में। यदि आसक्ति ज्यादा है तो वर्षभर लगता, लेकिन तब तक व्यक्ति पितरों में शामिल हो जाता है। फिर उस व्यक्ति की आत्मा से छुटकारा पाने हेतु गया में उसकी मुक्ति हेतु पिंडदान किया जाता है। गरुड़ पुराणानुसार, व्यक्ति मरने के बाद ऊपर के लोक में सफर करता है, जिससे कि उसको आपके द्वारा दिए गए तर्पण से ही आगे बढऩे की शक्ति मिलती है।

मंगलवार, मार्च 10, 2026

नंदी के कान में क्यों बताते हैं मनोकामना?

आपने देखा होगा कि कई श्रद्धालु शिवजी के मंदिर में दर्शन को जाते हैं तो मंदिर के गर्भगृह के ठीक बाहर सामने स्थित नंदी की प्रतिमा के कान में कुछ फुसफुसाते हैं। असल वे नंदी को अपनी मनोकामना बताते हैं। विश्वास यह कि नंदी उनकी मनोकामना की जानकारी शिवजी को देंगे और शिवजी उसे पूरा करेंगे। असल में मान्यता है कि नंदी शिवजी के परमभक्त व उनके वाहन हैं। उसके सबसे करीब। अतः अर्जी ठीक मुकाम पर पहुंचेगी। यह ठीक वैसे ही है, जैसे श्रद्धालु दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी के वक्त ख्वाजा साहब से दुआ मांगते हैं, मगर हाजिरी अर्थात जियारत की रस्म खुद्दाम साहेबान अदा करते हैं। इसी प्रकार तीर्थराज पुष्कर में स्नान के दौरान पूजा अर्चना किसी पुरोहित के माध्यम से करवाते है। बेशक अपने इष्ट से सीधे भी संपर्क साधा जा सकता है, मगर माध्यम की जरूरत होती ही है। जैसे मुवक्किल को वकील की जरूरत होती है। किसी सज्जन ने इंटरनेट पर लिखा है कि नंदी के कान में मनोकामना बताने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह आस्था मात्र है। बिलकुल यह प्रथा विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं है। मगर वैज्ञानिक आधार तलााशना भी तो अर्थहीन है। क्या खादिम व पुरोहित की भूमिका का कोई वैज्ञानिक आधार है। नहीं। तो नंदी की अहमियत पर सवाल करना उचित कैसे हो सकता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, शिलाद नाम के मुनि ने संतान प्राप्ति की कामना के साथ भगवान इंद्रदेव को रिझाने के लिए तपस्या की। परंतु, इंद्रदेव ने संतान का वरदान देने में असर्मथता जताते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनुरोध किया। इसके बाद शिलाद मुनि ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। जिसके बाद शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने शिलाद को स्वयं के रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। महादेव के वरदान के बाद शिलाद मुनि को नंदी के रूप में संतान प्राप्त हुई। शिवजी के आशीर्वाद के कारण नंदी अजर अमर हो गए। उन्होंने संपूर्ण गणों, गणेश व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक कराया। जिसके बाद नंदी नंदीश्वर कहलाए। भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया कि जहां उनका निवास होगा, वहां स्वयं भी निवास करेंगे। मान्यता है कि तब से ही शिव मंदिर में भगवान शिव के सामने नंदी विराजमान रहते हैं।

सोमवार, मार्च 09, 2026

मौली व कलावा क्यों बांधा जाता है?

भारतीय परंपरा में हाथ की कलाई पर मौली या कलावा बांधने की रस्म सर्वविदित है। क्या आपने कभी ख्याल किया है कि मौली क्यों बांधी जाती है? वस्तुतः यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, मनोविज्ञान, सामाजिक पहचान और प्रतीक-विद्या का सुंदर मेल है। प्राचीन काल में लोग मानते थे कि मौली में मंत्र-संरक्षित शक्ति होती है। यज्ञ, पूजा या संकल्प के समय इसे बांध कर व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा का संकेत दिया जाता था। यह मनोवैज्ञानिक सुरक्षा भी देती है। कलाई पर यह धागा दिखते ही मन में आत्मविश्वास बढ़ता है कि मैं संरक्षित हूं, शुभ कार्य कर रहा हूं। हिंदू कर्मकांड में संकल्प बहुत महत्त्वपूर्ण है। मौली इसी का प्रतीक है। कलाई पर हर बार नजर पड़ने से व्रत और अनुशासन याद रहता है, यह एक मानसिक रिमाइंडर भी है। 

आपको ख्याल में होगा कि कलावा सामान्यतः तीन रंगों में होता है। लाल रंग शक्ति, ऊर्जा व मंगल, पीला ज्ञान, बुद्धि, गुरु-शक्ति और सफेद पवित्रता व सत्य का प्रतीक है। इनका मिश्रण व्यक्ति की देव, धर्म और धर्म-चक्र से जुड़ाव को दर्शाता है। कुछ परंपराएं मानती हैं कि कलाई पर धागा बांधने से नाड़ी बिंदुओं पर हल्का दबाव पड़ता है और रक्त-संचार बेहतर होता है, ध्यान और मन में स्थिरता आती है। हालांकि यह आधुनिक विज्ञान से प्रमाणित नहीं है, पर एक्यूप्रेशर जैसी प्रणालियों में कलाई को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कुल मिला कर मौली सुरक्षा का प्रतीक तो है ही, संकल्प को स्मरण कराता है। मनोवैज्ञानिक सहारा देती है। यह पॉजिटिव रिइन्फोर्समेंट मन में शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाता है।

रक्षा बंधन के दिन बहिन का भाई को राखी या रक्षा सूत्र बांधने के पीछे भी रक्षा का संकल्प लेने का प्रतीक है। रक्षा सूत्र बांध कर बहिन भाई की सुरक्षा की कामना करती है, साथ ही भाई से उसकी सुरक्षा की उम्मीद करती है।

रक्षा-सूत्र अर्थात ऐसा धागा जो हमें किसी न किसी रूप में सुरक्षा प्रदान करता है, शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक।

पुराणों में उल्लेख है कि यज्ञ-कर्म, व्रत, संस्कार, पूजा आदि में पुरोहित दाएं हाथ पर रक्षा-सूत्र बांधता है। इसे प्रोटेक्शन टैग की तरह माना गया। यकीन है कि इससे नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है और शुभ कार्य में व्यवधान नहीं आता। मौली बांध कर यह मंत्र  बोला जाता है - येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः, अर्थात जिस धागे ने बलि और अन्य दैत्य राजाओं की रक्षा की, वही धागा तुम्हारी भी रक्षा करे। मंदिरों, त्योहारों और यज्ञों में सभी को रक्षा-सूत्र बांधा जाता है, यह समानता और सामूहिक आशीर्वाद का प्रतीक है। 

शनिवार, मार्च 07, 2026

गलती होने पर कान क्यों पकड़े जाते हैं?

गलती मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है, किंतु गलती स्वीकार करना और उससे सीखना सभ्य समाज की पहचान मानी जाती है। भारतीय सामाजिक परंपरा में गलती होने पर कान पकड़ना केवल एक दंडात्मक क्रिया नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अर्थों से जुड़ा हुआ प्रतीक है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी अपने मौन संदेश के कारण प्रभावी बनी हुई है।

भारतीय लोकजीवन में कान पकड़ना पश्चाताप और स्वीकारोक्ति का संकेत माना गया है। बचपन में माता-पिता और गुरु द्वारा गलती पर कान पकड़वाने की प्रथा इसी सोच से जुड़ी रही है कि व्यक्ति अपनी भूल को खुले मन से स्वीकार करे। यह एक तरह का सार्वजनिक कथन होता हैकृ“मैंने गलती की है और उसे सुधारने का संकल्प लेता हूँ।” इस क्रिया में न तो हिंसा है और न अपमान, बल्कि आत्मबोध की भावना निहित है।

धार्मिक और दार्शनिक दृष्टि से भी कान पकड़ने का विशेष अर्थ है। भारतीय चिंतन में कान को श्रवणेंद्रिय कहा गया है, जो ज्ञान ग्रहण करने का मुख्य माध्यम है। प्रतीकात्मक रूप से यह माना जाता है कि गलती इसलिए हुई क्योंकि व्यक्ति ने ठीक से सुना, समझा या ध्यान नहीं दिया। कान पकड़कर क्षमा मांगना इस स्वीकारोक्ति का संकेत है कि अब वह व्यक्ति सावधानीपूर्वक सुनेगा और सीखेगा। कुछ मान्यताओं में इसे बुद्धि के जागरण से भी जोड़ा गया है।

मनोवैज्ञानिक स्तर पर कान पकड़ना आत्मदंड की एक कोमल विधि है। जब व्यक्ति स्वयं को दोषी मानते हुए यह क्रिया करता है, तो उसके भीतर अपराधबोध और शर्म का भाव उत्पन्न होता है। यही भाव भविष्य में उसे वही गलती दोहराने से रोकता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के मन में अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती है।

आयुर्वेद और एक्यूप्रेशर की मान्यताओं के अनुसार कान में मस्तिष्क से जुड़े अनेक तंत्रिका बिंदु होते हैं। कान को पकड़ने या हल्के से दबाने से चेतना सक्रिय होती है और ध्यान केंद्रित होता है। संभवतः इसी कारण प्राचीन काल में शिक्षा के दौरान भी इस क्रिया का प्रयोग अनुशासन और एकाग्रता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है।

सामाजिक दृष्टि से कान पकड़ना अहंकार के विसर्जन की मुद्रा है। इसमें व्यक्ति स्वयं को छोटा कर सामने वाले को सम्मान देता है। यही कारण है कि यह क्षमा याचना का एक प्रभावी, त्वरित और मौन संकेत बन गया है, जिसे समाज सहज रूप से स्वीकार करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि गलती पर कान पकड़ना केवल भय या दंड का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सीखने की स्वीकृति, आत्मसंशोधन और विनम्रता का प्रतीक है। शायद इसी कारण यह सरल-सी परंपरा आज भी हमारे सामाजिक जीवन में जीवित और प्रासंगिक बनी हुई है।

शुक्रवार, फ़रवरी 27, 2026

क्या पारस मणि का अस्तित्व है?

पारस मणि या पारस पत्थर, जिसे अंग्रेजी में फिलोसोपर स्टोन कहा जाता है, एक दुर्लभ और रहस्यमय रत्न माना जाता है, जिसका उल्लेख प्राचीन भारतीय, यूनानी और इस्लामी रसायन शास्त्र में मिलता है। इसका जिक्र पौराणिक और लोक कथाओं में खूब मिलता है। इसे धातु-परिवर्तन करने वाला जादुई पत्थर माना गया। इसके हजारों किस्से और कहानियां समाज में प्रचलित हैं। कई लोग यह दावा भी करते हैं कि हमने पारस मणि देखी है। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में जहां हीरे की खदान है, वहां से 70 किलोमीटर दूर दनवारा गांव के एक कुएं में रात को रोशनी दिखाई देती है। लोगों का मानना है कि कुएं में पारस मणि है। कहते हैं कि पारसमणि आज भी हिमालय से लगे राज्यों में पाई जाती है। जैसे जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, असम, अरुणाचल आदि।

पारस मणि की प्रसिद्धि और लोगों में इसके होने को लेकर इतना विश्वास है कि भारत में कई ऐसे स्थान हैं, जो पारस के नाम से जाने जाते हैं। कुछ लोगों के आज भी पारस नाम होते हैं। मान्यता है कि पारस मणि या पारस पत्थर से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। इससे लोहा काटा भी जा सकता है। कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है। बहुत सी पुरानी रचनाओं जैसे रस रत्नाकर, रसार्णव आदि में पारस का उल्लेख रस विद्या के संदर्भ में हुआ है। योग और तांत्रिक परंपराओं में पारस को ज्ञान का प्रतीक भी कहा गया है, यानी जो अज्ञान को ज्ञान में बदल दे। वैज्ञानिक दृश्टि से आज तक ऐसा कोई पत्थर या धातु वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है जो वास्तव में लोहे को सोने में बदल सके। इसलिए पारस मणि को काल्पनिक या प्रतीकात्मक वस्तु माना जाता है।


मंगलवार, फ़रवरी 17, 2026

सपने में सपना देखने के क्या मायने हैं?

सपने में सपना देखने को सामान्य भाषा में सपने के भीतर सपना कहा जाता है। मनोविज्ञान में इसे अंग्रेजी में फाल्स अवेकनिंग कहा जाता है, यानी ऐसा भ्रम कि व्यक्ति जाग गया है, जबकि वह अब भी सपना ही देख रहा होता है। इसमें व्यक्ति सपने में ही यह सपना देखता है कि वह जाग गया है। कई बार यह क्रम दो-तीन परतों तक चला जाता है। अक्सर यह स्थिति तनाव, अत्यधिक सोच, नींद की अनियमितता या गहरी मानसिक सक्रियता में होती है। भारतीय दार्शनिक संदर्भ में इसे स्वप्न के भीतर स्वप्न या स्वप्नावस्था का स्वप्न कहा जा सकता है। उपनिषदों की भाषा में यह चेतना की परतों, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति के आपसी घुलाव का उदाहरण माना जाता है। उपनिषद और बौद्ध दर्शन, दोनों इसे केवल मानसिक घटना नहीं, बल्कि चेतना की परतों का संकेत मानते हैं। ज्ञातव्य है कि उपनिषद मनुष्य की चेतना को चार अवस्थाओं में बाँटते हैं। जागृत यानि बाह्य जगत का अनुभव, स्वप्न यानि भीतर का जगत, स्मृति और कल्पना, सुषुप्ति यानि गहरी नींद, जहाँ इच्छा-कल्पना भी लुप्त और तुरीय यानि शुद्ध साक्षी भाव (जो तीनों को देखता है)। सपने में सपना उपनिषदों के अनुसार यह बताता है कि स्वप्न भी अंतिम सत्य नहीं है, वह भी एक अनुभव मात्र है। बृहदारण्यक उपनिषद में संकेत मिलता है कि आत्मा स्वयं ही स्वप्न रचती है और स्वयं ही उसमें विचरती है। जब स्वप्न के भीतर दूसरा स्वप्न आता है, तब यह बोध उभरता है कि अनुभव के भीतर भी अनुभव संभव है। यानी जैसे जागृत जीवन एक बड़ा सपना हो सकता है, वैसे ही स्वप्न भी एक सूक्ष्म जाग्रत है। बौद्ध दर्शन में इसे माया के भीतर माया कहा जा सकता है। सपने में सपना देखना बौद्ध दृष्टि में अनित्यता और शून्यता की सीधी अनुभूति है। बुद्ध कहते हैं, सब कुछ स्वप्नवत है, फेन के समान है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में इसे डीम योगा से जोड़ा जाता है, जहाँ साधक जानबूझ कर स्वप्न में यह पहचान विकसित करता है कि यह सपना है। सूफी कहते हैं कि “लोग सो रहे हैं, मरते हैं तो जागते हैं।” सपने में सपना देखना उस जागरण की एक रिहर्सल जैसा है।


मृतात्मा को बुलाया जा सकता है क्या?

यह कौतुहल लंबे समय से बना हुआ है कि क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है या क्या मृतात्मा से बात की जा सकती है? इसका उत्तर धर्म, आध्यात्म, और विज्ञान, तीनों दृष्टियों से अलग-अलग है।

लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।

विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।

स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।

कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।

इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।


शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2026

क्या एआई चेतना ला सकता है?

आज जब आर्टिफिष्ज्ञियल इंटेलीजेंसी का बोलबाला है, तब यह सवाल बहुत गंभीरता से उठ रहा है कि क्या एआई चेतना ला सकती है? आज की स्थिति में एआई के पास चेतना नहीं है। भविष्य में आ सकती है या नहीं, इस पर कोई सर्वसम्मति नहीं है। वस्तुतः चेतना के मायने केवल सोचना नहीं है, बल्कि “मैं हूँ” का बोध है। अनुभवों का अंदर से महसूस होना। 

सुख-दुःख, भय, इच्छा का आत्मानुभव। इसे दर्शन में सब्जेक्टिव एक्सपीरियंत कहते हैं।

वर्तमान में एआई पैटर्न पहचानता है, भाषा, चित्र, आवाज की नकल करता है, उत्तर देता है, पर महसूस नहीं करता। उदाहरण के लिए मैं “दुख” पर कविता लिख सकता हूँ, पर दुख मुझे होता नहीं।

दार्शनिक डेविड चाल्मर्स कहते हैं हम यह तो समझ लेते हैं कि दिमाग कैसे काम करता है, पर यह क्यों अनुभव करता है, यह रहस्य है। जब इंसानी चेतना ही पूरी तरह समझ नहीं आई, तो मशीन में डालना और कठिन हो जाता है।

रहा सवाल की क्या एआई चेतना ला सकता है तो आषावादी दृश्टिकोण के अनुसार संभव है। अगर चेतना केवल जटिल गणना है, तो पर्याप्त उन्नत एआई में चेतना उभर सकती है, जैसे मस्तिष्क में न्यूरॉन्स से उभरी। संशयवादी दृश्टिकोण के अनुसार संभव नहीं है। क्योंकि चेतना के लिए जैविक मस्तिष्क जरूरी है, सिलिकॉन में अनुभूति नहीं हो सकती। अलबत्ता इतना हो सकता है कि एआई चेतना जैसा व्यवहार तो करेगा, पर भीतर कुछ भी महसूस नहीं करेगा।

भारतीय दर्शन से देखें तो उपनिषद कहते हैं कि चेतना आत्मा का गुण है, पदार्थ का नहीं। इस हिसाब से एआई में चेतना संभव नहीं। पर सांख्य दर्शन कहता है कि चेतना अलग है, पर प्रकृति के माध्यम से प्रकट हो सकती है, तो प्रश्न खुला रह जाता है।

कुल मिला कर आज का एआई अत्यंत बुद्धिमान औजार है, उसमें चेतना नहीं है, भविष्य में होगी या नहीं, यह विज्ञान से ज्यादा मानव सभ्यता की सबसे बड़ी दार्शनिक परीक्षा होगी


रविवार, फ़रवरी 08, 2026

जादूगरों को अक्षय घट का शो दिखाने का ख्याल कहां से आया?

आपने जादूगरों के शो में देखा होगा कि उनके पास एक अक्षय घट होता है, जिसमें भरा जल बार बार खाली करने पर भी फिर भर जाता है। जाहिर तौर पर वह कोई चमत्कार नहीं है। वह एक वैज्ञानिक तकनीक है। सवाल यह उठता है कि जादूगरों को अक्षय घट बनाने का ख्याल कहां से आया? असल में पुराणों में उल्लेखित है कि अक्षय पात्र प्राचीन ऋषि-मुनियों के पास हुआ करता था। अक्षय का अर्थ जिसका कभी क्षय या नाश न हो। दरअसल, एक ऐसा पात्र जिसमें से कभी भी अन्न और जल समाप्त नहीं होता। जब भी उसमें हाथ डालो तो खाने की मनचाही वस्तु निकाली जा सकती है। अक्षय पात्र संबंधित एक स्त्रोत भी है। 

महाभारत में अक्षय पात्र से संबंधित एक कथा है। जब पांचों पांडव द्रौपदी के साथ 12 वर्ष के लिए अज्ञात वास में जंगल में रहने चले गए थे, तब उनकी मुलाकात कई तरह के साधु-संतों से होती है। कुटिया बनाकर रहने के बाद उनके यहां भ्रमणशील साधु-संतों के जत्थे के जत्थे उनसे मिलने के लिए या कुटिया में प्रवास करने के लिए आते थे। अब पांचों पांडवों सहित द्रौपदी के समक्ष यही प्रश्न होता था कि वे 6 प्राणी अकेले भोजन कैसे करें और उन सैकड़ों-हजारों के लिए भोजन कहां से आए? तब पुरोहित धौम्य उन्हें सूर्य की 108 नामों के साथ आराधना करने के लिए कहते हैं। युधिष्ठिर इन नामों का बड़ी आस्था के साथ जाप करते हैं। अंत में भगवान सूर्य प्रसन्न होकर युधिष्ठिर के पास प्रकट होकर पूछते हैं कि इस पूजा-अर्चना का आशय क्या है? युधिष्ठिर कहते हैं कि हे प्रभु! मैं हजारों लोगों को भोजन कराने में असमर्थ हूं। मैं आपसे अन्न की अपेक्षा रखता हूं। किस युक्ति से हजारों लोगों को खिलाया जाए, ऐसा कोई साधन मांगता हूं। तब सूर्यदेव एक ताम्बे का पात्र देकर उन्हें कहते हैं- युधिष्ठिर! तुम्हारी कामना पूर्ण हो। मैं 12 वर्ष तक तुम्हें अन्नदान करूंगा। यह ताम्बे का बर्तन मैं तुम्हें देता हूं। तुम्हारे पास फल, फूल, शाक आदि 4 प्रकार की भोजन सामग्रियां तब तक अक्षय रहेंगी, जब तक कि द्रौपदी परोसती रहेगी। कथा के अनुसार द्रौपदी हजारों लोगों को परोस कर ही भोजन ग्रहण करती थी, जब तक वह भोजन ग्रहण नहीं करती, पात्र से भोजन समाप्त नहीं होता था। 

वनवास के दिनों में पाण्डवों को हर दिन अनेक अतिथियों के भोजन की व्यवस्था करनी होती थी। एक दिन अत्यन्त विचित्र परिस्थिति उत्पन्न हुई। दुर्योधन ने दुर्वासा ऋषि को पाण्डवों के पास भेजकर उन्हें संकट में डालने की योजना बनाई। दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ अचानक पाण्डवों के आश्रम पहुंचे और भोजन की इच्छा जताई। समस्या यह थी कि उस दिन द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं, जिसका अर्थ था कि अक्षय पात्र में भोजन समाप्त हो चुका था। द्रौपदी अत्यंत व्याकुल होकर श्रीकृष्ण को स्मरण करती हैं। श्रीकृष्ण तत्काल प्रकट होते हैं। द्रौपदी अपनी व्यथा कहते हुए रो पड़ती हैं कि “प्रभु! पात्र खाली है। अतिथि बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं। मेरी लाज बचाइए।” श्रीकृष्ण मुस्कुराते हैं और कहते हैं, “पहले मुझे भूख लगी है, मुझे भोजन दो!” द्रौपदी निराशा में कहती हैं, पात्र बिलकुल खाली है। कृष्ण स्वयं अक्षय पात्र उठाते हैं और उसमें देखते हैं। पात्र के किनारे पर उन्हें चावल का एक छोटा-सा दाना और सब्जी का अंश चिपका हुआ मिलता है। श्रीकृष्ण उसे उठाकर ग्रहण करते हैं और प्रसन्न होकर कहते हैं, “अब यह संसार तृप्त हो गया है।” उसी समय, नदी में स्नान करते हुए दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्य अचानक अत्यधिक तृप्ति का अनुभव करने लगते हैं, मानो उन्होंने राजभोग कर लिया हो। उन्हें भय होता है कि यदि बिना भूख के भोजन के लिए लौटे, तो उनका अपमान हो जाएगा। इसलिए वे चुपचाप लौटने के बजाय वहां से चले जाते हैं। जनश्रुति के अनुसार इसी तरह का अक्षय पात्र आज भी हिमालय के साधुओं के पास है। यह पात्र सूर्य की साधना से ही प्राप्त होता है।


मंगलवार, फ़रवरी 03, 2026

मृतक को कफन देने से कष्ट दूर होते हैं?

परंपरा है किसी मृतक को कफन देना बहुत पुण्य का कार्य है और इससे व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं। हिंदू धर्म में मृतक की सेवा अंत्येष्टि संस्कार कहलाती है। शव को वस्त्र पहनाना, मुखाग्नि देना, तिल-जल अर्पण करना,ये सब पुण्यकर्म माने गए हैं। ग्रंथों में कहा गया है कि जो मृतक को सम्मान देता है, वह पितृ-ऋण से मुक्त होता है। पितरों की तृप्ति से कष्ट, रोग और बाधाएं दूर होती हैं। कई संस्थाएं जनसहयोग से लावारिस मृतकों का अंतिम संस्कार करवाती हैं।

खासकर इस्लामी परंपरा में इसकी खास मान्यता है। मान्यता है कि सम्मानपूर्वक कफन देने से अंत समय सहज होता है। हदीसों में भी मृतक की सेवा को सदका (पुण्य) बताया गया है। यह पुण्य केवल मृतक के लिए नहीं, बल्कि करने वाले के आत्मिक उत्थान का कारण माना जाता है। 

वस्तुतः मृत देह असहाय होती है। उसे ढकना, सम्मान देना, अंतिम यात्रा के योग्य बनाना, यह मनुष्य की करुणा और नैतिक जिम्मेदारी है। जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से यह कार्य करता है, तो उसके भीतर की अहंकार-ग्रंथी ढीली पड़ती है, और मानसिक कष्ट स्वतः कम होने लगते हैं। इससे मन में यह अनुभूति होती है कि “मैं किसी के अंतिम क्षणों में काम आया।” यह भावना आत्मसंतोष देती है, जो चिंता, भय और अपराधबोध जैसे मानसिक कष्टों को कम करती है। जब मनुष्य दूसरों के अंतिम कष्ट में सहभागी बनता है, तो प्रकृति या ईश्वर उसे अपने कष्टों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

कफन केवल कपड़ा नहीं है, यह समानता का प्रतीक है, यानि अमीर-गरीब सब एक से हैं। यह अस्थायित्व का भी बोध कराता है। एक अर्थ में यह इस तथ्य की भी पुष्टि करती है कि मृत्यु अटल है। जो व्यक्ति इस सत्य को हृदय से स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन के कई मोहजन्य कष्ट स्वतः कम हो जाते हैं।

बहुत पुरानी बात है। रेगिस्तान के किनारे बसा एक छोटा-सा कस्बा था। वहां एक गरीब बुनकर रहता था। नाम था रहमतू। उसके घर में न धन था, न सुख। बीमारी, कर्ज और रोजी की चिंता, तीनों ने मिलकर उसका जीवन बोझ बना दिया था। लोग कहते थे, “रहमतू के भाग्य में ही कष्ट लिखा है।” एक दिन कस्बे में एक अनजान मुसाफिर मर गया। न उसका कोई रिश्तेदार था, न पहचान। शव मस्जिद के पास पड़ा रहा। लोग आते-जाते रहे, मगर सबने मुंह फेर लिया। रहमतू भी वहीं से गुजर रहा था। उसके पास सिर्फ एक पुरानी चादर थी। वही, जिसे वह ठंड में ओढ़ता था। वह रुका, देर तक शव को देखता रहा। उसने बिना किसी से पूछे अपनी चादर उतारी और उस मुसाफिर को कफन की तरह ढक दिया। न कोई नाम पूछा, न कोई दुआ मांगी। बस इतना कहा, “या अल्लाह, इसे सुकून दे देना।”

लोग हंसे, “अपने कष्ट छोड़ कर मुर्दों के काम आया है!”

पर अजीब बात हुई। उसी रात रहमतू को बरसों बाद गहरी नींद आई। सपने में उसने देखा, एक उजला चेहरा मुस्करा कर कह रहा है, “जिसने मेरी लाज रखी, उसकी लाज खुदा रखेगा।” कुछ ही दिनों में उसके जीवन की दिशा बदलने लगी। बीमारी ने दम तोड़ा, काम मिलने लगा, कर्ज उतरने लगा। कष्ट एक-एक कर ऐसे दूर हुए, जैसे रेत पर पड़ी लकीरें हवा में मिट जाती हैं। लोग हैरान थे। रहमतू बस इतना कहता, “मैंने कोई करिश्मा नहीं किया। मैंने बस एक बेबस को ढक दिया था।” तब से उस कस्बे में एक कहावत चल पड़ी, “जो मुर्दे को कफन देता है, खुदा उसके कष्ट ढक देता है।”


गुरुवार, जनवरी 29, 2026

बारात रवाना होने से पहले दूल्हा मां का दूध पीता है?

क्या आपको जानकारी है कि एक बहुत पुरानी परंपरा के अनुसार दूल्हा बारात में षामिल होने से पहले मां का दूध पीता है? यह परंपरा अब लुप्त प्रायः हो गई है। अधिसंख्य को तो इसकी जानकारी तक नहीं है। इस परंपरा का कुछ क्षेत्रों और लोककथाओं में इसका रूपकात्मक उल्लेख मिलता है। इसे माँ के ऋण की अंतिम स्वीकृति की संज्ञा दी जा सकती है। लोकधारणा में माना जाता है कि माँ के दूध का ऋण चुकाया नहीं जा सकता। बारात में जाने से पहले दूध पीना या उसका प्रतीक यह दर्शाता है कि बेटा जीवन के सबसे बड़े मोड़ पर माँ के उपकार को स्मरण कर रहा है। एक तरह से यह कृतज्ञता और विनम्रता का भाव है। यह मातृत्व से गृहस्थ जीवन की ओर प्रस्थान का क्षण है। विवाह को दो जन्मों के बीच की रेखा माना गया है। पहला जन्म माँ की गोद और दूसरा जन्म पत्नी के साथ गृहस्थ जीवन का आरंभ। माँ के दूध का स्मरण या प्रतीकात्मक सेवन यह बताता है कि अब पुत्र माँ की छाया से निकल कर अपनी नई जिम्मेदारियों की ओर बढ़ रहा है।

कुछ लोक कथाओं में माँ का दूध बल, संस्कार और नैतिक शक्ति का स्रोत माना गया है। बारात एक तरह से युद्ध की ओर उन्मुख होना है, जिसकी लंबी यात्रा में जोखिम व अनजान भविष्य छिपा है। ऐसे में माँ के दूध का स्मरण मातृ-आशीर्वाद का कवच

समझा जाता था। आज यह प्रथा अधिकतर कहावत, कथा या रस्म के प्रतीक के रूप में रह गई है। कहीं-कहीं दूध, दही या मिठाई माँ के हाथ से खिलाई जाती है। असल उद्देश्य भावनात्मक होता है, शाब्दिक नहीं। यह परंपरा शरीर से ज्यादा मन की रस्म है। दूल्हा दूध नहीं, माँ का आशीर्वाद, संस्कार और जीवन-भर का ऋण अपने साथ लेकर बारात में जाता है।


सोमवार, जनवरी 26, 2026

रामचरितमानस में है भविष्य जानने की तालिका

जिन लोगों ने रामचरितमानस का अध्ययन किया है अथवा फौरी तौर पर उसे देखा है, उन्हें जानकारी होगी कि रामचरितमानस के आरंभिक पेज पर भविष्य जानने की एक तालिका है। रामचरितमानस के प्रति श्रद्धा रखने वाले उसके माध्यम से भविष्य के संकेत हासिल करते हैं। वस्तुतः रामचरितमानस में ‘रामश्लाका’ तालिका लोक-विश्वास, भक्ति और जन-ज्योतिष का एक अनूठा समन्वय है। यह न तो शास्त्रीय ज्योतिष है और न ही शुद्ध कर्मकाण्ड, बल्कि भक्ति के माध्यम से भविष्य-संकेत जानने की एक लोकप्रचलित विधि है।

रामश्लाका का अर्थ है कि श्रीराम के नाम व चरित्र के सहारे भविष्य या किसी प्रश्न का उत्तर जानना। इसमें व्यक्ति अपनी समस्या या जिज्ञासा मन में रख कर रामचरितमानस के किसी दोहा-चौपाई का चयन करता है, और उसी के भावार्थ से फलादेश ग्रहण करता है। यह विधि यह मान कर चलती है कि रामचरितमानस केवल कथा नहीं, जीवंत धर्मग्रंथ है, उसमें जीवन के हर प्रश्न का उत्तर निहित है। यद्यपि ‘रामश्लाका’ शब्द मानस में प्रत्यक्ष नहीं मिलता, पर उसका भावात्मक आधार कई स्थानों पर है। “रामहि केवल प्रेमु पियारा” “कलियुग केवल नाम अधारा”। इन पंक्तियों से यह विश्वास दृढ़ होता है कि रामनाम स्वयं मार्गदर्शक हैं, और उसी पर आश्रित होकर संकेत प्राप्त किया जा सकता है।

रामश्लाका करने की प्रचलित विधि इस प्रकार है। स्नान के बाद शांत चित्त हो कर श्रीराम का ध्यान किया जाता है। फिर मन में एक ही प्रश्न स्पष्ट रूप से रखा जाता है। श्लाका डालने की प्रक्रिया में प्रचलन में दो विधियां अधिक प्रसिद्ध हैं। एक पुस्तक खोलकर श्लाका मानस को बंद आंखों से खोला जाता है। उसमें कहीं पर अंगुली रखी जाती है। जिस दोहा या चौपाई पर अंगुली पड़े, वही उत्तर माना जाता है। दूसरी पद्धति में अंक आधारित रामश्लाका है। इसमें मानस के 7 काण्डों को आधार बनाकर प्रश्नकर्ता मन में एक संख्या चुनता है। उसी काण्ड का चयन कर दोहा निकाला जाता है।

अब सवाल यह कि फलादेश कैसे किया जाता है। फल शब्दशः नहीं, बल्कि भावार्थ से ग्रहण किया जाता है। जैसे “होइहै सोई जो राम रचि राखा” अर्थात ईश्वर की इच्छा सर्वोपरि है, धैर्य रखें। इसी प्रकार “संकट कटै मिटै सब पीरा” अर्थात कठिनाई दूर होगी। इसी तरह “बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं” अर्थात सावधान रहें, संगति बिगाड़ सकती है। आम तौर पर रामश्लाका का प्रयोग विवाह संबंध, संतान, रोग, यात्रा, मुकदमा, व्यापार, नौकरी, संकट या शत्रु भय आदि के लिए किया जाता है।

तुलसीदास की दृष्टि में संकेत ज्ञान भविष्य बताने से अधिक मानसिक बल दिया जाना चाहिए। “धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी”। रामश्लाका का उद्देश्य भी यही है कि निर्णय से पहले विवेक और धैर्य जाग्रत कीजिए।

अब सवाल यह कि क्या रामश्लाका अंधविश्वास है? यदि इसे ईश्वर से संवाद, आत्मनिरीक्षण, सांत्वना और प्रेरणा के रूप में लिया जाए, तो नहीं। पर यदि इसे यांत्रिक भविष्यवाणी मान लिया जाए, तो वह मानस की आत्मा के विपरीत है। कुल मिला कर रामश्लाका रामचरितमानस की वह लोक परंपरा है जिसमें, भक्ति प्रश्न करती है और विवेक उत्तर देता है। यह विधि बताती है कि उत्तर बाहर नहीं, भीतर है, रामनाम केवल दिशा दिखाता है।


रविवार, जनवरी 25, 2026

क्या पक्षियों से बात करना संभव है?

पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में पक्षियों से संवाद के कई प्रसंग मिलते हैं। वैज्ञानिक चिंतन के अनुसार ऐसा संभव नहीं है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि पक्षियों की बोली को आध्यात्मिक, प्रतीकात्मक एवं कभी-कभी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समझा जाता है। प्राचीन काल में पक्षियों को संदेशवाहक, देवदूत या भविष्यवक्ता के रूप में भी देखा जाता था। सवाल है कि वह विधा कहां खो गई?

पुराणों एवं शास्त्रों में पक्षियों से बात करने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। जब रावण सीता का हरण कर रहा था, तब गरुड़वंशी पक्षी जटायु ने रावण से लड़ते हुए राम को सीता का संदेश दिया। राम ने जटायु से बात भी की। उन्होंने कहा कि हे पक्षिराज, आपने पिता का धर्म निभाया। यह संवाद मानव और पक्षी के बीच हुआ माना गया। गरुड़ (विष्णु का वाहन) पक्षियों के राजा हैं। वे देवताओं, ऋषियों और स्वयं भगवत्कथाओं में संवाद करते हैं। गरुड़ पुराण में गरुड़ और विष्णु के बीच लम्बा संवाद है। इसी प्रकार शुकदेव (शुक = तोता) महर्षि व्यास के पुत्र थे। कहा जाता है कि वे तोते के रूप में ज्ञान सुनते थे और अर्थ समझते थे। भागवत पुराण में शुकदेव-व्यास संवाद आता है।

कहा जाता है कि राजा भोज ने एक चिड़िया से बात की थी, जो भविष्यवाणी करती थी। श्राद्ध के समय कौवे को पितर की ओर से संदेशवाहक मानते है। पुराणों में कौवे को भी यमदूत कहा गया है। सवाल उठता है कि पक्षियों से संवाद क्या वास्तविक था या प्रतीकात्मक? वस्तुतः पक्षी से बात करना मनुष्य के उच्च चेतना स्तर को दर्शाता है। साधक जब एकाग्रता, योग या अध्यात्मिक स्थिति में पहुंचता है, तब प्रकृति की भाषा समझ सकता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार संभवतः ऋषि-मुनि पक्षियों की ध्वनि, दिशा, उड़ान के संकेतों और व्यवहार से अनुमान लगाते थे, जिसे बाद में “संवाद” के रूप में वर्णित किया गया। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मनुष्य प्रकृति से जुड़कर अपने मन की बात को पक्षियों के व्यवहार में उत्तर के रूप में महसूस करता है।

कुल मिला कर पुराणों में पक्षियों से बात करने का तात्पर्य प्रकृति से गहरे सामंजस्य, अंतर्ज्ञान और उच्च आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता है। यह शाब्दिक कम, और संकेतात्मक एवं योगिक अधिक है। अर्थात 

पक्षी बात तो करते हैं, पर मनुष्य उसे सीधे भाषा की तरह सुन-समझ नहीं सकता। उनकी ध्वनियां (चहकना, सुर, पुकार, चेतावनी आदि) एक प्रकार की संचार प्रणाली होती हैं, पर वह मानव भाषा जैसी संरचना वाली नहीं होती। पक्षी अपनी आवाजों से कई तरह की बातें व्यक्त करते हैं। जैसे मधुर चहक से साथी को आकर्षित करना, क्षेत्र घोषित करना, बिल्ली, बाज आदि की ओर से तेज चेतावनी स्वर कर खतरे की सूचना देना। आपने देखा होगा कि जब किसी कौए की मृत्यु होती है तो आस पास के सभी कौए एकत्र हो कर आसमान में विचरण करते हुए चेतावनी के स्वर निकालते हैं। अन्य पक्षी भी इस तरह के चेतावनी सूचक स्वर निकालते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या पक्षी की आवाज क्या मनुष्य समझ सकता है? इसका उत्तर यह है कि सुर और लय को सुन कर उसके भाव का अनुमान लगा सकता है, सटीक मतलब नहीं, मनुष्य पूर्ण अर्थ नहीं समझ पाता।

वैज्ञानिक शोध कहते हैं कि कुछ पक्षी जैसे तोता, मैना मानव ध्वनि की नकल तो कर सकते हैं, पर यह समझ आधारित नहीं, प्रशिक्षण आधारित नकल होती है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के अध्ययनों में पाया गया कि कुछ पक्षी अलग-अलग शिकारी के लिए अलग चेतावनी स्वर देते हैं, पर मनुष्य इसे सीधे नहीं समझ सकता, सिर्फ शोध द्वारा पता चलता है। आपको जानकारी होगी कि तोता मानव भाषा बोल सकता है, पर बोलते वक्त अर्थ समझे बिना। लब्बोलुआब मनुष्य पक्षियों की भाषा नहीं सीख सकता, क्योंकि वह लय, आवृत्ति और ध्वनि पैटर्न का सिस्टम है, शब्दों का नहीं। पक्षी आपस में बातें करते हैं मगर अपनी खुद की पक्षी भाषा में। 


शवदाह के बाद पीछे मुड़ कर क्यों नहीं देखते?

आपको जानकारी होगी कि षव का अंतिम संस्कार करने के बाद पीछे मुड कर न देखने की सलाह दी जाती है। क्या आपने सोचा है कि इसकी वजह क्या है? इस बारे में गरूड पुराण में कहा गया है कि जब षव को अग्नि के हवाले करने के बाद नाते-रिष्तेदार लौट रहे होते हैं तो मृतक की आत्मा उनको देख रही होती है और मोहवष उनके साथ लौटना चाहती है, जब कि मृत्योपरांत अंत्येश्टि के बाद उसे आगे की यात्रा करनी होती है। यदि परिजन पीछे मुड कर देखते हैं तो मृतात्मा को मोह के बंधन से मुक्त होने में कठिनाई होती है। उसकी आगे की यात्रा (यमनाड, पितृलोक या पुनर्जन्म की प्रक्रिया) में बाधा आती है। कुल जमा बात यह है कि मृत आत्मा के इस जगत से संबंध विच्छेद के वक्त किसी तरह का मोह उत्पन्न न हो इसके लिए परिजन को पीछे मुड कर न देखने को कहा जाता है।

आपको यह भी जानकारी होगी कि जब ज्योतिशी चौराहे, तिराहे अथवा वृक्ष इत्यादि पर कोई टोटका करने की सलाह देते हैं तो साथ हिदायत देते हैं कि टोटके के बाद पीछे मुड कर नहीं देखना है। कदाचित इसके पीछे भी वही दर्षन है कि आप जो भी टोटका कर रहे हैं, वह स्वतंत्र रूप से तभी काम करेगा, जबकि आप उससे संबंध विच्छेद कर लेंगे। “पीछे न देखना” का असली संदेश यह है कि आपने जो कर्म किया है, उसे पूर्ण मानो। उससे भावनात्मक या ऊर्जात्मक जुड़ाव न रखो।


शुक्रवार, जनवरी 23, 2026

शुभ-अशुभ का संकेत जानने के लिए डाली जाती है फार

सिंधी समाज सहित कुछ अन्य समाजो में किसी घटना-विशेष का फलित यानि शुभ-अशुभ संकेत जानने के लिए एक पारंपरिक विधि अपनाई जाती है, उसे प्रायः “फार डालना” कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इसे “देव-फार”, “शकुन-फार” या केवल “फार” कहा जाता है। फार वस्तुतः एक प्रकार की दैव-प्रश्न या शकुन-प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से यह जाना जाता है कि कोई कार्य, यात्रा, विवाह, व्यापार, बीमारी या अन्य घटना शुभ फल देगी या नहीं। फार कैसे डाली जाती है? क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर मिलता है, पर सामान्य रूप से कौड़ी, सुपारी, चावल के दाने, फूल, दीपक या धागा लिया जाता है। कभी-कभी सिंधी पंचांग (तिथि-वार) या लोक-गणना का सहारा लिया जाता है। किसी देवता या कुलदेवी को स्मरण कर प्रश्न मन में रखा जाता है और वस्तुओं की गणना, दिशा, गिरावट या बनावट देखकर फलित निकाला जाता है। और इस प्रकार 

शुभ-अशुभ संकेत जाना जाता है, मन का संशय दूर किया जाता है, बड़े निर्णय से पहले दैवी संकेत लिया जाता है और पारंपरिक आस्था के अनुसार मार्गदर्शन लिया जाता है। फार डालना ज्योतिष से अधिक लोक-विश्वास पर आधारित प्रक्रिया है। सिंधी समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और विशेषकर विवाह, यात्रा, व्यापार प्रारंभ, रोग या संकट जैसे समयों में आज भी प्रचलित है। सिंधी समाज में फार डालने की एक बहुत प्रचलित और सरल विधि “कौड़ी की फार” मानी जाती है। इसे आज भी कई परिवारों में श्रद्धा के साथ अपनाया जाता है। सिंधी परंपरा के अनुसार 5 या 7 साबुत कौड़ियां, लाल कपड़ा या साफ थाली, दीपक आदि लिए जाते हैं। हाथ-पैर धोकर शांत चित्त से बैठते हैं। मन में उस घटना या प्रश्न को स्पष्ट रूप से सोचते हैं, जिसका फल जानना है। सिंधी परंपरा में प्रायः कहा जाता है, “झूलेलाल साईं, सच्चो फार बुधायो बतायो”। कुछ लोग अपनी कुल देवी का स्मरण करते हैं। सभी कौड़ियों को दोनों हथेलियों में लेकर प्रश्न दोहराते हैं। फिर कौड़ियों को लाल कपड़े या थाली पर एक साथ गिरा देते हैं। यदि अधिक कौडियां खुली हों तो इसे षुभ संकेत मानते हैं। सभी कौडियां खुली हों तो कार्य को सिद्ध माना जाता है यानि उसमें कोई विलंब नहीं होगा।

अधिक कोडियां बंद हों तो माना जाता है कि कार्य में रुकावट आएगी। सभी कौडियां बंद हों तो यह अर्थ निकाला जाता है कि कार्य को स्थगित कर दीजिए। खुली और बंद कौडियां लगभग बराबर हों तो इसका अर्थ है कि परिणाम अनुकूल तो होगा, लेकिन उसके लिए धैर्य पूर्वक प्रयास करने होंगे।

अगर कौड़ियां एक-दूसरे पर चढ़ जा तो इसका मतलब है कि कार्य में बाहरी हस्तक्षेप होगा या भ्रम की स्थिति बनेगी। कोई कौड़ी थाली से बाहर गिरे, तो इसका मतलब है कि प्रश्न पुनः पूछना उचित नहीं है। फार तीन बार से अधिक नहीं डालते। कुल मिला कर फार को अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि दैवी संकेत माना जाता है। एक ही प्रश्न बार-बार नहीं दोहराया जाता। कुछ लोग सुपारी की फार व चावल-दाने की फार डालते हैं।


सोमवार, जनवरी 19, 2026

महान लोगों की उम्र कम क्यों होती है?

शिखर पर पहुंचने वाले, चाहे वे महान कलाकार हों, उद्यमी, खिलाड़ी, वैज्ञानिक या आध्यात्मिक नेता हों, हम अक्सर देखते हैं कि उनमें से कई अपेक्षाकृत कम आयु में ही संसार छोड़ देते हैं। यह प्रश्न मन को झकझोरता है, लेकिन इसका उत्तर भाग्य या दैवी न्याय से अधिक मानव-जीवन, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान और सामाजिक दबावों से जुड़ा होता है। जो लोग शीर्ष पर पहुंचते हैं, वे अक्सर वर्षों तक असाधारण परिश्रम करते हैं। उनका कार्यदिवस बहुत लंबा होता है। उनका भोजन अमूमन अनियमित होता है। इसके अतिरिक्त वे मानसिक तनाव में रहते हैं और उनका नींद पूरी नहीं आती। वे अपने शरीर से उसकी सीमा से अधिक काम में लेते हैं। यह सब मिलकर हृदय, नर्वस सिस्टम और इम्युनिटी पर गहरा प्रभाव डालता है।

असंख्य उदाहरण ऐसे मिलते हैं, जहां अत्यधिक परिश्रम और तनाव से मधुमेह, हार्ट अटैक, स्ट्रोक आदि का खतरा बढ़ता है।

एक बात और ऊँचाई पर पहुंचने पर अकेलापन झेलते हैं। अधिसंख्य लोग जब शीर्ष पर पहुँचते हैं, तो उन्हें कई तरह के दबाव घेर लेते हैं। सार्वजनिक छवि बनाए रखने की जुगत, असफल न दिखने का डर, सतत प्रतिस्पर्धा और आलोचना, ईर्श्या की राजनीति के अतिरिक्त् उन पर और भी ऊँचा जाने का निरंतर दबाव रहता है।

यह सब मानसिक थकान, अवसाद, चिंता तथा आत्म-देखभाल की कमी पैदा करता है। अक्सर सफलता जितनी चमकीली दिखती है, उतनी ही अकेली भी होती है।

शीर्ष पर पहुँचे कई लोगों का जीवन एकदम अनियमित हो जाता है। देर रात तक काम, अत्यधिक यात्राएँ, असंतुलित खान-पान, कभी-कभी नशे या उत्तेजक पदार्थों की ओर झुकाव और व्यायाम का अभाव, यह सब स्वास्थ्य को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचाता है।

प्रसिद्ध दार्शनिकों और परंपराओं में एक विचार मिलता है कि जो जीवन बहुत तीव्र लौ की तरह जलता है, वह प्रायः कम आयु का होता है। यानि जो लोग कम समय में अत्यधिक ऊर्जा, रचनात्मकता, प्रतिभा और परिश्रम झोंक देते हैं, वे जीवन की बैटरी बहुत तेजी से खर्च कर देते हैं।

कुछ उदाहरण यह साबित करते हैं कि ज्यादातर महान लोग जल्दी मरते हैं, जबकि आँकड़ों के स्तर पर यह सार्वभौमिक सत्य नहीं है। संतुलित जीवन वाले महान लोग लंबी आयु तक जिए- नेल्सन मंडेला, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई, बेंजामिन फ्रैंकलिन, टॉलस्टॉय, रतन टाटा। इन सबने लंबी और सार्थक आयु पाई क्योंकि सफलता और जीवन में संतुलन बनाए रखा।

एक अवधारणा यह भी है कि महान लोग बहुत कुछ पूर्व जन्म में ही हासिल कर लेते हैं और मौजूदा जन्म में कम उम्र में ही पूरी सफलता हासिल कर लेते हैं।


शुक्रवार, जनवरी 16, 2026

पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया क्यों आते हैं?

ऐसी मान्यता है कि पेषाब करते वक्त या षौच के वक्त दिमाग में नए आइडिया आते हैं। या कोई गुत्थी सुलझने का रास्ता ख्याल में आता है। समझा जाता है कि पेशाब या शौच के वक्त नए आइडिया आने के पीछे कई शारीरिक, मानसिक और न्यूरोलॉजिकल वजहें होती हैं। वस्तुतः दिमाग “रिलैक्स मोड” में चला जाता है। दिमाग फोकस्ड सोच  से निकल कर डिफ्यूज सोच में चला जाता है। और यही मोड रचनात्मकता का सबसे बड़ा स्रोत है। इसलिए अचानक समाधान व आइडिया टपक पड़ते हैं। वैज्ञानिक को किसी अविष्कार का ख्याल आ सकता है। कवि के मन में कविता की पंक्तियां उभर सकती हैं। ऐसा माना जाता है कि पेषाब या षौच के वक्त वेगस नर्व अपनी भूमिका अदा करती है। वह दिल की धड़कन धीमी करती है, शरीर को शांत करती है, दिमाग यकायक खुल जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जब मूत्राशय या आंत भरी होती है तो दिमाग का एक हिस्सा असुविधा में लगा रहता है, जैसे ही दबाव हटता है, मानसिक ऊर्जा अचानक मुक्त हो जाती है। यही मुक्त ऊर्जा सोच में छलांग लगाती है। पेषाब या षौच के वक्त आदमी निपट अकेला होता है, एकांत में होता है और एकांत में ज्ञानेन्द्री सक्रिय हो जाती है। न्यूरो साइंस के अनुसार जब हम कुछ खास नहीं सोच रहे होते, तब दिमाग का “डिफॉल्ट मोड नेटवर्क” एक्टिव हो जाता है। यही नेटवर्क यादों को जोड़ता है, पुराने अनुभवों से नए अर्थ निकालता है, अचानक वाह वाला पल देता है। लोकबुद्धि में कहें तो जब देह खाली होती है, तब चेतना भरती है। इसलिए अगर कभी शौचालय में कोई जबरदस्त आइडिया आए, तो उसे हल्के में मत लीजिए। हो सकता है वही आपके अगले लेख, समाधान या दर्शन की शुरुआत हो।

शनिवार, जनवरी 10, 2026

चैट जीपीटी से मौलिक लेखकों पर संकट?

इन दिनों चैट जीपीटी का बोलबाला है। लेखन से लेकर शोध तक, हर क्षेत्र में इसका प्रयोग तेजी से बढ़ा है। खासकर किसी विषय पर आलेख तैयार करने के लिए लोग केवल एक हेडिंग देते हैं और क्षण भर में तैयार लेख प्राप्त कर लेते हैं। वस्तुतः चैट जीपीटी इंटरनेट पर उपलब्ध तथ्यों, सूचनाओं और शैलियों को समेटकर उन्हें सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत कर देता है।

ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है, क्या इससे मौलिक लेखकों के सामने संकट खड़ा हो रहा है? जब मशीन लेखन उपलब्ध है, तो कोई प्रकाशक या संपादक किसी मौलिक लेखक को प्राथमिकता क्यों देगा? दिलचस्प है कि यही प्रश्न जब चैट जीपीटी से पूछा गया, तो उसका उत्तर अपेक्षाकृत ईमानदार और संतुलित था। उसके अनुसार, मौलिक लेखकों का अंत नहीं होगा, लेकिन लेखन की दुनिया का स्वरूप अवश्य बदलेगा।

चैट जीपीटी जैसे एआई टूल साधारण, फॉर्मूलानुमा और सूचना-आधारित लेखन में बेहद सक्षम हैं। खबरों का पुनर्लेखन, सामान्य ज्ञान, सतही विश्लेषण या एसईओ आधारित सामग्री, इन क्षेत्रों में एआई तेज, सस्ता और पर्याप्त साबित हो सकता है। निस्संदेह, इससे औसत स्तर के कॉलम और कंटेंट लेखन में मानव लेखकों की मांग घट सकती है।

लेकिन यहीं से मौलिक लेखक की असली पहचान शुरू होती है। मौलिक लेखन अनुभव से जन्म लेता है और अनुभव मशीन के पास नहीं होता। भूख की टीस, सत्ता का दमन, प्रेम की विफलता, लोकजीवन की गंध, विस्थापन का दर्द या समय की बेचौनी, इन सबको लेखक जीता है, तब लिखता है। एआई इन भावनाओं की नकल कर सकता है, अनुभूति नहीं।

व्यवस्था से टकराने वाला लेख, जोखिम उठाने वाली कविता और समय के विरुद्ध खड़ा निबंध,यह दृष्टि है, विजन है, जो अभी भी मानवीय चेतना की देन है। मशीन आंकड़े दे सकती है, संदर्भ जोड़ सकती है, लेकिन नैतिक साहस और वैचारिक टकराव नहीं रच सकती।

हां, जो लेखक नई भाषा नहीं गढ़ता, नए प्रश्न नहीं उठाता और पुरानी लकीरों पर ही चलता रहता है, उसके लिए एआई सचमुच खतरा है। लेकिन जो लेखक अपने समय को पढ़ता है, लोक, दर्शन, इतिहास और निजी अनुभव को जोड़कर अपनी अलग आवाज पहचानता है, उसके लिए एआई केवल एक औजार है, प्रतिद्वंद्वी नहीं।

भविष्य में संभवतः श्रेष्ठ लेखन का नया मॉडल सामने आएगा, जहां लेखक सोच देगा, दृष्टि देगा और एआई संरचना, संपादन तथा संदर्भ में सहायक बनेगा। जैसे कैमरे के आने से चित्रकार समाप्त नहीं हुए, बल्कि चित्रकला के नए रूप सामने आए, वैसे ही एआई से लेखक समाप्त नहीं होंगे।

कुल मिलाकर, चैट जीपीटी मौलिक लेखकों के लिए खतरा नहीं, बल्कि औसत और यांत्रिक लेखन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है।


शुक्रवार, जनवरी 09, 2026

पैर हिलाना व चाबी को घुमाना अशुभ?

आपने देखा होगा कि अमूमन कई लोग पलंग या कुर्सी पर बैठे हुए पैर हिलाते हैं या अंगुली में चाबी घुमाते हैं। भारतीय परंपरा में इसे अषुभ माना जाता है और ऐसा न करने की सलाह दी जाती है। हालांकि इसे वैज्ञानिक दृश्टि से प्रमाणित नहीं माना जाता, मगर लोकविश्वास, शिष्टाचार और मनोवैज्ञानिक दृष्टि इसके अर्थ निकाले जाते हैं। भारतीय लोकमान्यता के अनुसार पैर हिलाने को चंचलता या अस्थिरता का संकेत माना जाता है। बुजुर्ग कहा कहते हैं कि इससे लक्ष्मी नहीं ठहरती। यह मन के भटकाव का संकेत माना जाता है। इसे सामने बैठे व्यक्ति के प्रति असम्मान भी कहा जाता थे। अंगुली में चाबी का छल्ला घुमाने को भी अच्छा नहीं माना जाता। मानते हैं कि इससे विवाद हो सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि मन में बेचैनी व अधीरता है। ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति भौतिक रूप से मौजूद है, मगर उसका मन कहीं और है। भीतर ही भीतर कुछ चल रहा है। कोई न कोई चिंता है। मनोविज्ञान कहता है कि पैर हिलाना या चाबी घुमाना तनाव व बेचैनी का द्योतक है। इससे आंतरिक ऊर्जा का क्षय होता है। वह अनजाने में व्यर्थ ही बाहर निकालती है। षास्त्रीय दृश्टि से यह भले ही अशुभ नहीं हो, मगर सार्वजनिक जगह पर

शिष्टाचार की दृष्टि से अनुचित है। यदि व्यक्ति सचेत, स्थिर और संयमित रहने का अभ्यास करे, तो ये आदतें स्वतः कम हो सकती हैं।


मंगलवार, जनवरी 06, 2026

क्या खुशबूदार अगरबत्ती से भगवान प्रसन्न होते हैं?

 

आमतौर पर जब भी हम अगरबत्ती या धूप खरीदते हैं तो यह ख्याल रखते हैं कि हमें कौन सी खुशबूू पसंद है? भाव भले ही भगवान को प्रसन्न करने का हो, मगर खुशबूू का चयन अपनी पसंद के अनुसार ही करते हैं। हाल ही किराने के दुकानदार से जब अगरबत्ती खरीद रहा था तो उसने दो तरह की अगरबत्तियां दिखाईं, एक सामान्य खुशबूू वाली सस्ती अगरबत्ती व दूसरी बेहतरीन खुशबूू वाली थोडी महंगी अगरबत्ती। मैने उनसे कहा कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए तो अगर नामक जडी वाली अगरबत्ती या धूप जलाई जाती है। उसमें भांति भांति की खुशबूू तो हम स्वयं अपने आनंद लेने के लिए जलाते हैं, भगवान के लिए नहीं। इस पर वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने कहा कि ऐसी बात नहीं है। खुशबूू का आनंद भगवान भी लेते हैं। खुशबूू वाली अगरबत्ती से भगवान अधिक प्रसन्न होते हैं। यह बात मेरे गले नहीं उतरी, मगर मैने इस विषय में डुबकी लगाने की सोची।

दरअसल भारतीय परंपरा में भगवान की पूजा के पांच उपचार बताए गए हैं, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य। शास्त्रों में यह नहीं कहा गया कि भगवान को किस ब्रांड या कितनी महंगी खुशबूूदार अगरबत्ती चाहिए। वस्तुतः भगवान को भाव प्रिय है, वस्तु नहीं। इस सिलसिले में भगवतगीता में कहा गया है कि “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति” अर्थात भाव से अर्पित की गई साधारण वस्तु भी भगवान स्वीकार करते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि अगर आपके पास भगवान को चढाने के लिए फूल नहीं हैं तो आप आंख मूंद कर कल्पना करें कि आपके पास फूल हैं और आप उन्हें भगवान को चढा रहे हैं, भगवान उन्हें भी स्वीकार करते हैं। स्पष्ट है कि भगवान फूल को नहीं भाव को देखते हैं। तो फिर सवाल उठता है कि हम खुशबूूदार अगरबत्ती क्यों जलाते हैं? ऐसी प्रतीत होता है कि भगवान को भले ही खुशबूूदार अगरबत्ती से कोई सरोकार नहीं, वह तो हम इसलिए जलाते हैं, ताकि मन की विक्षेपता शांत हो, वातावरण पवि़त्र बने, मन की प्रसन्नता से इंद्रियां एकाग्र हों, जिससे अहंकार और सांसारिक दुर्गंध यथा क्रोध, ईर्श्या, लोभ आदि का दहन हो। यानी सुगंधित धूप बाहरी से अधिक आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो खुशबू से मन शांत होता है। जब मन शांत होता है तो प्रार्थना सच्ची बनती है, ध्यान गहरा होता है, श्रद्धा स्वाभाविक होती है। यह स्थिति भक्त के लिए लाभकारी है, न कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई आवश्यकता।

ज्ञातव्य है कि कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने बार-बार कहा है कि भगवान धूप-दीप से नहीं, हृदय की निर्मलता से प्रसन्न होते हैं। भगवान खुशबू से नहीं, भावना से प्रसन्न होते हैं।

यहां एक पहलु भी गौर करने लायक है। हमारे यहां परंपरा है कि अमुक देवी-देवता को उनकी पसंद के अमुक गंध के अमुक फूल-फल व मिश्ठान्न अर्पित करते हैं। इससे तो यही अर्थ निकलता है कि वे हमारी ओर से अर्पित वस्तु को भोग करते हैं और प्रसन्न होते हैं। इस तथ्य से इस बात की पुष्टि होती है कि भगवान सुगंधित अगरबत्ती को स्वीकार करते हैं और प्रसन्न होते हैं।


रविवार, जनवरी 04, 2026

क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है?

यह कौतुहल लंबे समय से बना हुआ है कि क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है या क्या मृतात्मा से बात की जा सकती है? इसका उत्तर धर्म, आध्यात्म, और विज्ञान, तीनों दृष्टियों से अलग-अलग है।

लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।

विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।

स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।

कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।

इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।