रामश्लाका का अर्थ है कि श्रीराम के नाम व चरित्र के सहारे भविष्य या किसी प्रश्न का उत्तर जानना। इसमें व्यक्ति अपनी समस्या या जिज्ञासा मन में रख कर रामचरितमानस के किसी दोहा-चौपाई का चयन करता है, और उसी के भावार्थ से फलादेश ग्रहण करता है। यह विधि यह मान कर चलती है कि रामचरितमानस केवल कथा नहीं, जीवंत धर्मग्रंथ है, उसमें जीवन के हर प्रश्न का उत्तर निहित है। यद्यपि ‘रामश्लाका’ शब्द मानस में प्रत्यक्ष नहीं मिलता, पर उसका भावात्मक आधार कई स्थानों पर है। “रामहि केवल प्रेमु पियारा” “कलियुग केवल नाम अधारा”। इन पंक्तियों से यह विश्वास दृढ़ होता है कि रामनाम स्वयं मार्गदर्शक हैं, और उसी पर आश्रित होकर संकेत प्राप्त किया जा सकता है।
रामश्लाका करने की प्रचलित विधि इस प्रकार है। स्नान के बाद शांत चित्त हो कर श्रीराम का ध्यान किया जाता है। फिर मन में एक ही प्रश्न स्पष्ट रूप से रखा जाता है। श्लाका डालने की प्रक्रिया में प्रचलन में दो विधियां अधिक प्रसिद्ध हैं। एक पुस्तक खोलकर श्लाका मानस को बंद आंखों से खोला जाता है। उसमें कहीं पर अंगुली रखी जाती है। जिस दोहा या चौपाई पर अंगुली पड़े, वही उत्तर माना जाता है। दूसरी पद्धति में अंक आधारित रामश्लाका है। इसमें मानस के 7 काण्डों को आधार बनाकर प्रश्नकर्ता मन में एक संख्या चुनता है। उसी काण्ड का चयन कर दोहा निकाला जाता है।
अब सवाल यह कि फलादेश कैसे किया जाता है। फल शब्दशः नहीं, बल्कि भावार्थ से ग्रहण किया जाता है। जैसे “होइहै सोई जो राम रचि राखा” अर्थात ईश्वर की इच्छा सर्वोपरि है, धैर्य रखें। इसी प्रकार “संकट कटै मिटै सब पीरा” अर्थात कठिनाई दूर होगी। इसी तरह “बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं” अर्थात सावधान रहें, संगति बिगाड़ सकती है। आम तौर पर रामश्लाका का प्रयोग विवाह संबंध, संतान, रोग, यात्रा, मुकदमा, व्यापार, नौकरी, संकट या शत्रु भय आदि के लिए किया जाता है।
तुलसीदास की दृष्टि में संकेत ज्ञान भविष्य बताने से अधिक मानसिक बल दिया जाना चाहिए। “धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी”। रामश्लाका का उद्देश्य भी यही है कि निर्णय से पहले विवेक और धैर्य जाग्रत कीजिए।
अब सवाल यह कि क्या रामश्लाका अंधविश्वास है? यदि इसे ईश्वर से संवाद, आत्मनिरीक्षण, सांत्वना और प्रेरणा के रूप में लिया जाए, तो नहीं। पर यदि इसे यांत्रिक भविष्यवाणी मान लिया जाए, तो वह मानस की आत्मा के विपरीत है। कुल मिला कर रामश्लाका रामचरितमानस की वह लोक परंपरा है जिसमें, भक्ति प्रश्न करती है और विवेक उत्तर देता है। यह विधि बताती है कि उत्तर बाहर नहीं, भीतर है, रामनाम केवल दिशा दिखाता है।
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