तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, मार्च 13, 2017

उत्तर प्रदेश में मोदी सुनामी का असर राजस्थान पर भी पड़ेगा?

उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत से जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  और मजबूत हुए हैं, वहीं अनुमान है कि उसका असर राजस्थान पर भी पड़ सकता है। हालांकि राजनीति में जोड़ बाकी गुणा भाग का योग आखिर में क्या निकलेगा, इस बारे में पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता, मगर कयासों से कुछ कुछ इशारे तो मिल ही जाते हैं। जैसे ही जीत का ऐलान हुआ, उसके दूसरे ही दिन बधाई के होर्डिंग्स में मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ ओम प्रकाश माथुर का फोटो चस्पा दिखाई दिया। संभव है यह कृत्य माथुर के निजी समर्थकों का हो, मगर इसी के साथ इस चर्चा को बल मिला है कि राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। माथुर के एक पक्के समर्थक ने तो बाकायदा वाट्स ऐप पर यह चर्चा छेड़ दी है कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है और उनके स्थान पर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भेजा जाएगा व राजस्थान के मुख्यमंत्री ओम प्रकाश माथुर होंगे। हो सकता है कि यह अफवाह ही हो, मगर भाजपा में कुछ न कुछ पक रहा है, इसके संकेत तो मिल ही रहे हैं।
हालांकि राजस्थान विधानसभा चुनाव में अभी तकरीबन दो साल बाकी हैं, मगर उत्तर प्रदेश में चली मोदी लहर राजस्थान पर क्या असर डालेगी, राजनीतिक पंडित इस पर नजर जमाए हुए हैं। कोई माने या न माने, मगर भाजपा खेमे में एक कौतुहल तो बना हुआ ही है कि क्या अगला चुनाव वसुंधरा के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा? यद्यपि खुद वसुंधरा राजे ने अपनी सरकार के तीन साल पूरे होने पर मनाए जा रहे जश्र के दौरान साफ इशारा किया कि अगला चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनके बीच जिस तरह की कैमेस्ट्री है, उसे देखते हुए कम से कम राजनीतिक प्रेक्षक तो इस बात में संशय ही मानते हैं कि भाजपा उनके चेहरे पर दाव खेलेगी।
हालांकि यह कहना बिलकुल अनुचित होगा कि वसुंधरा राजे का मौजूदा कार्यकाल असफल रहा है, मगर यह एक आम धारणा सी बनती जा रही है कि राजस्थान में वसुंधरा राजे के साथ भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। कम से कम इतना तो तय है कि जनता ने कांग्रेस की सत्ता पलट कर भाजपा को जिस तरह का बंपर समर्थन दिया, उसके अनुरूप यह सरकार खरी नहीं उतरी है। समझा जा सकता है कि जिस मतदाता ने कांग्रेस को हाशिये पर ला खड़ा किया, भाजपा से कितनी अधिक उम्मीदें रही होंगी। हालात जस के तस हैं, सुराज जैसा कुछ कहीं नजर नहीं आता। स्वयं भाजपा के कार्यकर्ता भी मौन स्वीकृति देते दिखाई देते हैं कि वसुंधरा का यह कार्यकाल उनके पिछले कार्यकाल से बेहतर नहीं है। उसकी एक बड़ी वजह भी है। वो यह कि पिछली बार वे अपने आकर्षक चेहरे के दम पर भाजपा को सत्ता में लेकर आई थीं, इस कारण उनके कदमों व निर्णयों में स्वच्छंदता दिखाई देती थी। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व उन पर हावी नहीं था। उलटा ये कहना ज्यादा उचित रहेगा कि वे ही हावी थीं। सर्वविदित है कि जब कुछ कारणों से वे सत्ता च्युत हुईं और उन पर दबाव बनाया गया कि नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ दें तो उन्होंने एकाएक उस निर्देश को मानने से इंकार कर दिया था। बमुश्किल पद छोड़ा। और ऐसा छोड़ा कि उस पद पर किसी को बैठाया ही नहीं जा सका। फिर जब चुनाव नजदीक आए तो विकल्प के अभाव में भाजपा को फिर से उन्हीं को नेतृत्व सौंपना पड़ा।
समझा जा सकता है कि तब वे कितनी ताकतवर थीं।  मगर अब स्थिति उलट है। केन्द्र में भाजपा सत्ता में है और वह भी नरेन्द्र मोदी जैसे चमत्कारिक नेतृत्व के साथ, ऐसे में हर राजनीतिक फैसले से पहले वसुंधरा को केन्द्र की ओर ताकना पड़ता है। स्वाभाविक रूप से वे इस बार स्वच्छंदता के साथ काम नहीं कर पाई हैं। हालांकि इस बार वे जबदस्त बहुमत के साथ सत्ता में हैं, मगर ये माना जाता है कि यह चमत्कार मोदी लहर की वजह से हुआ। लोकसभा चुनाव में भी जब पच्चीस की पच्चीस सीटें भाजपा ने जीतीं और उसका श्रेय वसुंधरा ने लेने की कोशिश की तो नरेन्द्र मोदी को यह नहीं सुहाया था। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में राजस्थान को प्रतिनिधित्व दिलाने में भी वसुंधरा की नहीं चली। बताया जाता है कि तब से ही दोनों के बीच ट्यूनिंग बिगड़ी हुई है। सच क्या है ये तो पार्टी नेतृत्व ही जानें, मगर चर्चाएं तो यहां तक होने लगीं थीं कि मोदी उनके स्थान पर किसी और को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपना चाहते हैं।
इस सिलसिले में वरिष्ठ भाजपा नेता ओमप्रकाश माथुर का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है। उत्तर प्रदेश के परिणामों ने एक बार फिर चर्चा को गरम कर दिया है। यूं भूपेन्द्र सिंह यादव का भी नाम चर्चा में आया है। सिक्के का दूसरा पहलु ये है कि वसुंधरा को हटाना इतना आसान भी नहीं, जितना कहना आसान है। वस्तुस्थिति ये है कि ग्राउंड पर वसुंधरा ने अपनी पकड़ बना रखी है। हालांकि उनका चेहरा अब पहले की तुलना में निस्तेज हुआ है, मगर फिर भी उनके मुकाबले किसी और चेहरे में चमक नहीं है। बताया जाता है कि बावजूद इसके वसुंधरा के रूप में क्षेत्रीय क्षत्रप की मौजूदगी मोदी को पसंद नहीं। पार्टी की भी यही सोच है कि चुनाव तो मोदी के नाम पर ही लड़ा जाना चाहिए। और ऐसा तभी संभव है जब किसी और को जो कि मोदी का नजदीकी हो, उसे आगे लाया जाए।
इन हालातों के बीच जब पिछले दिनों जब वसुंधरा राजे ने यह कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव भी उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो यह किसी दुस्साहस से कम नहीं था। आज भी जो फेस वैल्यू वसुंधरा की है, वैसी किसी और भाजपा नेता की नहीं। यह बात खुद वसुंधरा भी जानती हैं और इसी कारण बड़ी हिम्मत के साथ कह दिया। हो सकता है कि उन्होंने ऐसा कंकर फैंक कर उठने वाली लहर को नापने के लिए किया हो, मगर फिलहाल मोदी खेमे से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अलबत्ता रूठे भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी ने आपत्ति की, मगर उस पर किसी ने गौर नहीं किया। बेशक, फिलवक्त शांति है, मगर आगे कुछ भी हो सकता है।
-तेजवानी गिरधर
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