अब जानते हैं कि जनेऊ का महत्व क्या है? जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो कई अर्थों का प्रतीक हैं। एक देव ऋण (ईश्वर के प्रति कर्तव्य), दूसरा पितृ ऋण (पूर्वजों के प्रति कर्तव्य) और तीसरा ऋषि ऋण (ज्ञान देने वालों के प्रति कर्तव्य)। कुछ लोग इसे सत्त्व, रज और तम (तीन गुणों) का प्रतीक भी मानते हैं। इस संस्कार में पहले स्नान और शुद्धि की जाती है। फिर यज्ञ (हवन) होता है। फिर गुरु द्वारा जनेऊ धारण कराया जाता है। गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है। इसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्वयह है कि यह बचपन से जिम्मेदारी की ओर कदम है। यह व्यक्ति को अनुशासन, अध्ययन और धर्म पालन के लिए प्रेरित करता है। इसे “दूसरा जन्म” (द्विज) भी कहा जाता है। आज के समय में इसे कई लोग सांस्कृतिक परंपरा के रूप में निभाते हैं। कुछ इसे आध्यात्मिक अनुशासन की शुरुआत मानते हैं। वहीं कुछ लोग इसे जाति आधारित परंपरा मानकर इसकी आलोचना भी करते हैं। सिंधी समाज में ब्राह्मण परंपरागत रूप से जनेऊ संस्कार करते रहे हैं,
जबकि अधिकतर सिंधी व्यापारी, भाईबंद, लोहाणा आदि समुदायों में यह परंपरा आम तौर पर नहीं रही। यानी, यह पूरे सिंधी समाज का अनिवार्य संस्कार कभी नहीं रहा। सिंधी समुदाय में विवाह के अवसर पर भी प्रतीकात्मक रूप से जनेउ धारण करवाने की परंपरा है।