तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

मंगलवार, जनवरी 06, 2026

क्या खुशबूदार अगरबत्ती से भगवान प्रसन्न होते हैं?

 

आमतौर पर जब भी हम अगरबत्ती या धूप खरीदते हैं तो यह ख्याल रखते हैं कि हमें कौन सी खुशबूू पसंद है? भाव भले ही भगवान को प्रसन्न करने का हो, मगर खुशबूू का चयन अपनी पसंद के अनुसार ही करते हैं। हाल ही किराने के दुकानदार से जब अगरबत्ती खरीद रहा था तो उसने दो तरह की अगरबत्तियां दिखाईं, एक सामान्य खुशबूू वाली सस्ती अगरबत्ती व दूसरी बेहतरीन खुशबूू वाली थोडी महंगी अगरबत्ती। मैने उनसे कहा कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए तो अगर नामक जडी वाली अगरबत्ती या धूप जलाई जाती है। उसमें भांति भांति की खुशबूू तो हम स्वयं अपने आनंद लेने के लिए जलाते हैं, भगवान के लिए नहीं। इस पर वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने कहा कि ऐसी बात नहीं है। खुशबूू का आनंद भगवान भी लेते हैं। खुशबूू वाली अगरबत्ती से भगवान अधिक प्रसन्न होते हैं। यह बात मेरे गले नहीं उतरी, मगर मैने इस विषय में डुबकी लगाने की सोची।

दरअसल भारतीय परंपरा में भगवान की पूजा के पांच उपचार बताए गए हैं, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य। शास्त्रों में यह नहीं कहा गया कि भगवान को किस ब्रांड या कितनी महंगी खुशबूूदार अगरबत्ती चाहिए। वस्तुतः भगवान को भाव प्रिय है, वस्तु नहीं। इस सिलसिले में भगवतगीता में कहा गया है कि “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति” अर्थात भाव से अर्पित की गई साधारण वस्तु भी भगवान स्वीकार करते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि अगर आपके पास भगवान को चढाने के लिए फूल नहीं हैं तो आप आंख मूंद कर कल्पना करें कि आपके पास फूल हैं और आप उन्हें भगवान को चढा रहे हैं, भगवान उन्हें भी स्वीकार करते हैं। स्पष्ट है कि भगवान फूल को नहीं भाव को देखते हैं। तो फिर सवाल उठता है कि हम खुशबूूदार अगरबत्ती क्यों जलाते हैं? ऐसी प्रतीत होता है कि भगवान को भले ही खुशबूूदार अगरबत्ती से कोई सरोकार नहीं, वह तो हम इसलिए जलाते हैं, ताकि मन की विक्षेपता शांत हो, वातावरण पवि़त्र बने, मन की प्रसन्नता से इंद्रियां एकाग्र हों, जिससे अहंकार और सांसारिक दुर्गंध यथा क्रोध, ईर्श्या, लोभ आदि का दहन हो। यानी सुगंधित धूप बाहरी से अधिक आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो खुशबू से मन शांत होता है। जब मन शांत होता है तो प्रार्थना सच्ची बनती है, ध्यान गहरा होता है, श्रद्धा स्वाभाविक होती है। यह स्थिति भक्त के लिए लाभकारी है, न कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई आवश्यकता।

ज्ञातव्य है कि कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने बार-बार कहा है कि भगवान धूप-दीप से नहीं, हृदय की निर्मलता से प्रसन्न होते हैं। भगवान खुशबू से नहीं, भावना से प्रसन्न होते हैं।

यहां एक पहलु भी गौर करने लायक है। हमारे यहां परंपरा है कि अमुक देवी-देवता को उनकी पसंद के अमुक गंध के अमुक फूल-फल व मिश्ठान्न अर्पित करते हैं। इससे तो यही अर्थ निकलता है कि वे हमारी ओर से अर्पित वस्तु को भोग करते हैं और प्रसन्न होते हैं। इस तथ्य से इस बात की पुष्टि होती है कि भगवान सुगंधित अगरबत्ती को स्वीकार करते हैं और प्रसन्न होते हैं।


रविवार, जनवरी 04, 2026

क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है?

यह कौतुहल लंबे समय से बना हुआ है कि क्या मृतात्मा को बुलाया जा सकता है या क्या मृतात्मा से बात की जा सकती है? इसका उत्तर धर्म, आध्यात्म, और विज्ञान, तीनों दृष्टियों से अलग-अलग है।

लगभग सभी धर्मों में माना गया है कि मृत आत्मा को बुलाना या उससे संपर्क करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हिंदू मत के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक या पितृलोक की यात्रा करती है। जब तक वह अपने अगले जन्म या मोक्ष की स्थिति में नहीं पहुंचती, तब तक उसे बाधित करना अधर्म माना जाता है। इसलिए “आत्मा बुलाना” जैसे प्रयोग प्लेन चिट बोर्ड करने को पाप या अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार इस्लाम में आत्माओं से संपर्क करना वर्जित है, क्योंकि माना जाता है कि आत्माओं के नाम पर अक्सर जिन्न या दुष्ट शक्तियां धोखा देती हैं। ईसाई मत में भी स्पिरिट कॉलिंग को निषिद्ध कहा गया है। आपको जानकारी होगी कि कुछ लोग प्लेन चिट बोर्ड के जरिए इच्छित मृतात्मा को बुलाने का दावा करते हैं, मगर उसमें मृतात्मा से संवाद संकेतों में होता है, जिसको पक्के तौर पर नहीं माना जा सकता कि मृतात्मा से वास्तव में संवाद हो रहा है।

विज्ञान के अनुसार अब तक कोई प्रमाण नहीं कि किसी मृत व्यक्ति की आत्मा को सचमुच बुलाया जा सकता है या उससे संपर्क संभव है।

स्पिरिट कॉलिंग, टेबल टर्निंग या ओइजा बोर्ड जैसे प्रयोग मनुष्य के अवचेतन मन और आटो-सजेशन से जुड़ी मानी जाती हैं, यानी दिमाग स्वयं वह अनुभव गढ़ लेता है।

कुछ साधक या तांत्रिक दावा करते हैं कि वे आत्माओं से संवाद कर सकते हैं, लेकिन ऐसे अनुभव प्रायः ऊर्जात्मक या मानसिक कंपन के रूप में होते हैं, न कि वास्तव में आत्मा के आगमन के रूप में। अधिकतर मामलों में यह भ्रम या मानसिक प्रभाव साबित हुआ है।

इस सिलसिले में मेरा अनुभव यह है कि मैं दरगाह के एक खादिम के हुजने में बैठा था। उन्होंने बताया कि वह अपने दिवंगत गुरू को उनकी कृपा पाने के लिए बुला सकते हैं। उन्होंने आंख बंद कर गुरू को याद किया और यकायक बहुत मोहक सुगंध पूरे हुजरे में फैल गई। उनका दावा था कि उनके गुरू हुजरे में आ गए हैं। इस बारे में मैने कुछ जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि आत्मा का अस्तित्व वायु रूप है, और उसका आव्हान करने पर वह गंध के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। इस बारे में मेरा एक अनुभव यह है कि जब मेरी माताश्री का निधन हुआ तो जिस कमरे में वे रहती थीं, वहां लगातार तीन दिन तक गुलाब की महक आती रही, जबकि वहां न तो कोई अगरबत्ती जलाई हुई थी और न ही किसी ने इत्र लगा रखा था।


रविवार, दिसंबर 21, 2025

नेत्रहीन अमूमन अच्छे गायक क्यों होते हैं?

आपने देखा होगा कि नेत्रहीन की कोई न कोई इन्द्री अधिक सक्रिय होती है। खासकर कंठ यानि स्वर इंन्द्री। नेत्रविहीन अमूमन बहुत सुमधुर गायक होते हैं। इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं। यह सार्वभौमिक नियम तो नहीं है, लेकिन कई नेत्रहीन लोग आवाज की बारीकियों को गहराई से सुन पाते हैं। उनका सारा ध्यान स्वर-इंद्री पर केन्द्रित हो जाता है। इसलिए वे अपने स्वर, सुर और ताल को बेहतर साध लेते हैं। संगीत का अभ्यास भी कई नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाता है। इसलिए मधुर कंठ उनकी “अतिरिक्त इन्द्रिय” नहीं, बल्कि बेहतर श्रवण-ध्यान और लगातार अभ्यास का परिणाम है। 

वस्तुतः जब दृष्टि नहीं रहती, तो मस्तिष्क अपने उस हिस्से को उपयोग में लाता है जो पहले देखने में लगता था, और उसे सुनने, छूने, दिशा-ज्ञान या स्मृति जैसी गतिविधियों में लगा देता है। इसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहते हैं। उनकी श्रवण शक्ति अधिक प्रशिक्षित हो जाती है और वे सूक्ष्म ध्वनियों, स्वर के उतार-चढ़ाव को बेहतर पकड़ते हैं। स्पर्श व दिशा-ज्ञान (जैसे छड़ी से कंपन समझना, कमरे की ध्वनि-गूंज से दूरी आंकना) अधिक पैना होता है। स्मृति और ध्यान सामान्य लोगों की तुलना में बेहतर विकसित हो सकते हैं। वे किसी भी वस्तु को छू कर बता देते हैं, वह क्या है? यानि उनकी अंगुलियों की त्वचा बहुत संवेदना से भर जाती है। इसी संवेदना का उपयोग पढाई के लिए ब्रेल लिपी में उपयोग किया जाता है। ब्रेल लिपी दृष्टिबाधित (नेत्रहीन) व्यक्तियों के लिए विकसित एक स्पर्श आधारित लेखन प्रणाली है। इसे उंगलियों से छूकर पढ़ा जाता है। इसका आविष्कार लुई ब्रेल (स्वनपे ठतंपससम) ने 1824 में किया था।

मान्यता है कि उनकी छठी इन्द्री भी अधिक सक्रिय होती है। बहुत-से लोग नेत्रहीनों के बारे में यह अनुभव करते हैं कि वे किसी व्यक्ति की उपस्थिति, उसके भाव या कमरे का माहौल बहुत जल्दी भाँप लेते हैं। वास्तव में यह “छठी इन्द्रिय” नहीं, बल्कि सुपर-संवेदी अवलोकन है। यानी वे ध्वनि, चाल, सांसों की लय, हवा के दबाव, हल्के कंपन, गंध जैसे सूक्ष्म संकेतों पर अधिक ध्यान देते हैं, जिन्हें सामान्य व्यक्ति नजर पर निर्भर रहने के कारण अनदेखा कर देता है।


शुक्रवार, दिसंबर 12, 2025

घड़ी को कभी नहीं रुकने दीजिए

दोस्तो, नमस्कार। दीवाल घड़ी व हाथ घड़ी की सुई का रुक जाना वास्तु-शास्त्र, ज्योतिष और लोक-मान्यताओं में एक विशेष संकेत माना गया है। यह पूरी तरह आस्था पर आधारित विषय है, पर लोगों के अनुभवों में इसका एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी जुड़ा होता है। वास्तु के अनुसार घड़ी समय, ऊर्जा के प्रवाह और जीवन की गति का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए कहा जाता है कि घड़ी का रुकना ऊर्जा रुकने का संकेत है। घड़ी के रुकने को घर में गतिशीलता, प्रगति या सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होने का संकेत माना जाता है। वास्तु में कहा गया है कि “ठहरा हुआ समय” घर में नहीं रखना चाहिए। कई वास्तु विशेषज्ञ कहते हैं कि रुकी हुई घड़ी नकारात्मक कंपन पैदा करती है, जिससे घर का माहौल भारी लगने लगता है। ऐसी भी मान्यता है कि ईशान-उत्तर दिशा में लगी घड़ी का रुकना अधिक अशुभ है, क्योंकि ये दिशाएं सकारात्मक ऊर्जा, धन और अवसरों का प्रतीक मानी जाती हैं।

यहां घड़ी रुक जाए तो संकेत माना जाता है कि कार्यों में देरी, अवसर चूकने या आर्थिक बाधा आ सकती है। लोक मान्यताओं में घड़ी का रुक जाना अक्सर यह संकेत माना गया जाता है कि घर में कोई परिवर्तन या घटना होने वाली है। जैसे कोई महत्वपूर्ण समाचार, यात्रा, निर्णय आदि।

कुछ लोग मानते हैं कि जब घर के किसी सदस्य के जीवन में अचानक तनाव, उलझन या असंतुलन बढ़ता है तो “घड़ी रुकना” उसका प्रतीक माना जाता है। रुकी घड़ी को विवाह, गृह-प्रवेश या नए काम की शुरुआत में प्रतिकूल माना गया है। इसके अतिरिक्त बंद हो चुकी खराब घडी को घर में नहीं रखने की सलाह दी जाती है।

वास्तव में घड़ी के रुकने की वजह साधारण होती है बैटरी का खत्म होना,

मगर जब किसी व्यक्ति का मन पहले से परेशान हो, तो घड़ी का रुकना उसे अशुभ संकेत लगेगा। अतः रुकी हुई घड़ी तुरंत चलवा दें या हटा दें

वास्तुविद बताते हैं कि घड़ी हमेशा पूर्व-उत्तर दिशा में सबसे उपयुक्त है।

टिक-टिक साफ सुनाई दे, तो यह प्रगति का सूचक माना जाता है। घडी का एक उपयोग यह भी है कि यदि मकान में सीढी एंटी क्लॉक वाइज हो तो उसका वास्तु दोश दूर करने के लिए सीढी के मोड पर घडी लगाई जाती है।


सोमवार, दिसंबर 08, 2025

मुस्लिम तीन बार गले क्यों मिलते हैं?

आम तौर पर आपने देखा होगा कि ईद या अन्य मौकों पर मुस्लिम एक दूसरे को षुभकामना देते हैं, तो तीन बार गले मिलते हैं। यह रवायत क्यों है? क्या एक बार ही गले मिलना पर्याप्त नहीं है? 

जानकार लोग बताते हैं कि असल में मुसलमानों के तीन बार गले मिलने की परंपरा इस्लामी शिक्षाओं में सीधे अनिवार्य नहीं है, लेकिन यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा बन गई है, विशेषकर ईद जैसे त्योहारों पर। इसके पीछे कुछ मानवीय, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कारण होते हैं। पहली बार गले मिलना एक-दूसरे से मिलने की खुशी व्यक्त करना। दूसरी बार दिलों में आपसी रंजिश मिटाना। तीसरी बार आपसी संबंध को मजबूत करना और दुआ देना। यह मानवीय भावनाओं को दर्शाता है कि हम सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि दिल से एक-दूसरे से जुड़े हैं। हालाँकि तीन बार गले मिलना कुरान या हदीस में अनिवार्य नहीं बताया गया, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप और कुछ अन्य जगहों पर यह रिवाज के तौर पर विकसित हो गया है। यह व्यक्ति को यह अनुभव कराता है कि सामने वाला उसे सचमुच अहमियत दे रहा है। कुल जमा यह इस्लाम का धार्मिक आदेश नहीं है, बल्कि एक सामाजिक रिवाज है, जो खासकर भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी मुसलमानों में ज्यादा प्रचलित है। दुनिया के कई मुस्लिम देशों में लोग एक ही बार गले मिलते हैं या सिर्फ सलाम करके मुबारकबाद दे देते हैं।

चर्चा के दौरान अंजुमन दरगाह तारागढ के सचिव सैयद रब नवाज ने जानकारी दी कि कोई नियम नहीं है, मगर षीया समुदाय में परंपरागत रूप से दो बार गले मिलने की परंपरा है। 


शुक्रवार, नवंबर 21, 2025

क्या गायब हुआ जा सकता है?

गायब या अंतर्ध्यान शब्द के मायने है, अदृश्य होना। इसका उल्लेख आपने शास्त्रों, पुराणों आदि में सुना होगा। अनेक देवी-देवताओं, महामानवों व ऋषि-मुनियों से जुड़े प्रसंगों में इसका विवरण है कि वे आह्वान करने पर प्रकट भी होते हैं, साक्षात दिखाई देते हैं और अंतर्ध्यान भी हो जाते हैं। मौजूदा वैज्ञानिक युग में यह वाकई अविश्वनीय है। विज्ञान आज तक भी इस पुरातन कला को समझ नहीं पाया है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर काम किया है और सिद्धांततः यह मानते हैं कि ऐसा संभव है, मगर कोई भी ऐसा कर नहीं पाया है। बताते हैं कि ओशो ने दुनिया के चंद शीर्ष वैज्ञानिकों की टीम बना कर इस पर काम किया था और उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कामयाबी मिल जाएगी।

इस बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक नैनो किरणों पर काम कर रहे हैं। इस सिलसिले में एक लबादा बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे पहनने के बाद उस पर नैनो किरणें डालने पर दिखाई देना बंद हो जाता है। कुछ वैज्ञानिक इस पर भी काम कर रहे हैं कि विशेष तापमान व दबाव यदि मनुष्य के आसपास क्रियेट किया जाए तो वह अदृश्य हो सकता है। कुछ प्रयोग कनाडा, जापान और अमेरिका में चल रहे हैं। जापान के वैज्ञानिक डॉ. सुसुमु ताची ने ऐसा “इनविजिबिलिटी क्लोक” बनाया था, जो कैमरा और प्रोजेक्टर से पीछे की पृष्ठभूमि को आगे दिखा देता है। यानी पहनने वाला लगभग गायब सा दिखाई देता है। यह तकनीक कुछ सैन्य वाहनों और ड्रोन में प्रयोग की जा रही है। यह परिवेश के रंग और प्रकाश को नकल कर आंखों को भ्रमित करती है।

जानकारी के अनुसार एक उपकरण बनाया जा चुका है, जिसके भीतर रखी वस्तु एक दिशा से तो दिखाई देती है, मगर दूसरी दिशा से नहीं दिखाई देती। एक उपकरण, जिसका नाम फोटोनिक क्रिस्टल बताया गया है, वह वस्तुओं को दिखाई देने में बाधक बनता है, अर्थात अदृश्य कर देता है। प्रसंगवश एक शब्द ख्याल में आता है- मृग मरीचिका। कहते हैं न कि रेगिस्तान में तेज धूप में किरणों की तरंगों में दूर से हिरण को ऐसा आभास होता है कि वहां समुद्र है या पानी है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है। अर्थात हिरण को दृष्टि भ्रम होता है। हो सकता है कि कल इसी प्रकार का दृष्टि भ्रम बना कर आदमी को अदृश्य किया जा सके। 

एक जानकारी ये भी है कि देवी देवता सशरीर प्रकट हो सकते हैं, जो कि पंचमहाभूत से बने हैं, मगर अन्य आत्माएं वायु अथवा प्रकाश के रूप में विचरण करती हैं और उसका आभास भी करवा सकती हैं। भारतीय ग्रंथों में कई पात्रों के अदृश्य होने का उल्लेख मिलता है। जैसे हनुमानजी, जो इच्छा से आकार बदल सकते थे (सूक्ष्म रूप धारण करना)। 

बताते हैं कि हिमालयों की पहाडियों में एक जड़ी पाई जाती है, जिसे मुंह में रखने पर आदमी दिखाई देना बंद हो जाता है। मगर इसके भी प्रमाणिक उदाहरण हमारे संज्ञान में नहीं हैं। इसी प्रकार जनश्रुति है कि एक पक्षी विशेष का पंख अपने पास रखने वाला व्यक्ति दूसरों को दिखाई नहीं देता, मगर इसके भी पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।

गायब हो जाने के संबंध में कुछ रहस्यमयी किस्से जानकारी में आए हैं। बताते हैं कि एक महिला क्रिस्टीन जांसटन और उनके पति एलन जांसटन 1975 की गर्मियों में उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर गए थे। वहां एलन अचानक गायब हो गए। बाद में पुलिस तेज घ्रांण शक्ति वाले कुत्ते ले कर खोजने गई तो जिस स्थान से एलन गायब हुए थे, वहां पर आ कर कुत्ते रुक गए। 

एक किस्सा ये भी है। अमेरिका के टेनेसी स्थित गैलेटिन के निवासी डेविड लांग 23 सितम्बर, 1808 को दोपहर में घर से बाहर निकले। उनकी मुलाकात उनके एक न्यायाधीश मित्र आगस्टस पीक से हुई। शिष्टाचार के बाद जैसे ही डेविड लांग आगे बढ़ा तो वह अचानक गायब हो गया।

इसी प्रकार पूरी बस्ती ही गायब होने का भी किस्सा है। घटना अगस्त 1930 की बताई जाती है। कनाडा के चर्चिल थाने के पास अंजिकुनी नामक एस्किमो की बस्ती थी। एक दिन अचानक पूरी बस्ती के लोग न जाने कहां गायब हो गए। 

इसी प्रकार 1885 में वियतनाम में सैनिकों की छह सौ सैनिकों की एक टुकड़ी ने सेगॉन शहर की ओर कूच किया। कोई एक मील दूर जाने पर वह पूरी टुकड़ी गायब हो गई। आज तक उस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है। अनुमान यही लगाया गया कि धरती से इतर कोई और ग्रह है, जहां के प्राणी लोगों को पकड़ कर ले जाते हैं।

वस्तुओं के गायब हो जाने के किस्से भी आम हैं। आप के साथ भी ऐसा हो चुका होगा। जैसे किसी स्थान विशेष पर रखी वस्तु आप लेने जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलती। आपको अचरज होता है कि वह कहां गायब हो गई। कुछ समय बाद जब फिर देखते हैं तो वह वहीं मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ समय के लिए गायब हो जाती है। ऐसा भ्रम की वजह से भी हो सकता है।

आपने ऐसे मदारियों को भी करतब दिखाते हुए देखा होगा कि वे गुलाब जामुन या कोई मिठाई मांगने पर हवा में हाथ धुमा कर वह वस्तु पेश कर देते हैं। हालांकि यह ऐसे जादू के रूप में माना जाता है, जिसके पीछे कोई तकनीक काम करती है, जबकि आम मान्यता है कि मदारी कुछ समय के लिए मांगी गई वस्तु किसी दुकान या ठेले से मंगवाते हैं और कुछ समय बाद वह वस्तु वापस वहीं पहुंच जाती है, जहां से मंगाई गई है।

मंगलवार, नवंबर 11, 2025

क्या गायब हुआ जा सकता है?

गायब या अंतर्ध्यान शब्द के मायने है, अदृश्य होना। इसका उल्लेख आपने शास्त्रों, पुराणों आदि में सुना होगा। अनेक देवी-देवताओं, महामानवों व ऋषि-मुनियों से जुड़े प्रसंगों में इसका विवरण है कि वे आह्वान करने पर प्रकट भी होते हैं, साक्षात दिखाई देते हैं और अंतर्ध्यान भी हो जाते हैं। मौजूदा वैज्ञानिक युग में यह वाकई अविश्वनीय है। विज्ञान आज तक भी इस पुरातन कला को समझ नहीं पाया है। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर काम किया है और सिद्धांततः यह मानते हैं कि ऐसा संभव है, मगर कोई भी ऐसा कर नहीं पाया है। बताते हैं कि ओशो ने दुनिया के चंद शीर्ष वैज्ञानिकों की टीम बना कर इस पर काम किया था और उन्हें पूरी उम्मीद थी कि कामयाबी मिल जाएगी।

इस बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वैज्ञानिक नैनो किरणों पर काम कर रहे हैं। इस सिलसिले में एक लबादा बनाने की कोशिश की जा रही है, जिसे पहनने के बाद उस पर नैनो किरणें डालने पर दिखाई देना बंद हो जाता है। कुछ वैज्ञानिक इस पर भी काम कर रहे हैं कि विशेष तापमान व दबाव यदि मनुष्य के आसपास क्रियेट किया जाए तो वह अदृश्य हो सकता है। कुछ प्रयोग कनाडा, जापान और अमेरिका में चल रहे हैं। जापान के वैज्ञानिक डॉ. सुसुमु ताची ने ऐसा “इनविजिबिलिटी क्लोक” बनाया था, जो कैमरा और प्रोजेक्टर से पीछे की पृष्ठभूमि को आगे दिखा देता है। यानी पहनने वाला लगभग गायब सा दिखाई देता है। यह तकनीक कुछ सैन्य वाहनों और ड्रोन में प्रयोग की जा रही है। यह परिवेश के रंग और प्रकाश को नकल कर आंखों को भ्रमित करती है।

जानकारी के अनुसार एक उपकरण बनाया जा चुका है, जिसके भीतर रखी वस्तु एक दिशा से तो दिखाई देती है, मगर दूसरी दिशा से नहीं दिखाई देती। एक उपकरण, जिसका नाम फोटोनिक क्रिस्टल बताया गया है, वह वस्तुओं को दिखाई देने में बाधक बनता है, अर्थात अदृश्य कर देता है। प्रसंगवश एक शब्द ख्याल में आता है- मृग मरीचिका। कहते हैं न कि रेगिस्तान में तेज धूप में किरणों की तरंगों में दूर से हिरण को ऐसा आभास होता है कि वहां समुद्र है या पानी है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है। अर्थात हिरण को दृष्टि भ्रम होता है। हो सकता है कि कल इसी प्रकार का दृष्टि भ्रम बना कर आदमी को अदृश्य किया जा सके। 

एक जानकारी ये भी है कि देवी देवता सशरीर प्रकट हो सकते हैं, जो कि पंचमहाभूत से बने हैं, मगर अन्य आत्माएं वायु अथवा प्रकाश के रूप में विचरण करती हैं और उसका आभास भी करवा सकती हैं। भारतीय ग्रंथों में कई पात्रों के अदृश्य होने का उल्लेख मिलता है। जैसे हनुमानजी, जो इच्छा से आकार बदल सकते थे (सूक्ष्म रूप धारण करना)। 

बताते हैं कि हिमालयों की पहाडियों में एक जड़ी पाई जाती है, जिसे मुंह में रखने पर आदमी दिखाई देना बंद हो जाता है। मगर इसके भी प्रमाणिक उदाहरण हमारे संज्ञान में नहीं हैं। इसी प्रकार जनश्रुति है कि एक पक्षी विशेष का पंख अपने पास रखने वाला व्यक्ति दूसरों को दिखाई नहीं देता, मगर इसके भी पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।

गायब हो जाने के संबंध में कुछ रहस्यमयी किस्से जानकारी में आए हैं। बताते हैं कि एक महिला क्रिस्टीन जांसटन और उनके पति एलन जांसटन 1975 की गर्मियों में उत्तरी ध्रुव की यात्रा पर गए थे। वहां एलन अचानक गायब हो गए। बाद में पुलिस तेज घ्रांण शक्ति वाले कुत्ते ले कर खोजने गई तो जिस स्थान से एलन गायब हुए थे, वहां पर आ कर कुत्ते रुक गए। 

एक किस्सा ये भी है। अमेरिका के टेनेसी स्थित गैलेटिन के निवासी डेविड लांग 23 सितम्बर, 1808 को दोपहर में घर से बाहर निकले। उनकी मुलाकात उनके एक न्यायाधीश मित्र आगस्टस पीक से हुई। शिष्टाचार के बाद जैसे ही डेविड लांग आगे बढ़ा तो वह अचानक गायब हो गया।

इसी प्रकार पूरी बस्ती ही गायब होने का भी किस्सा है। घटना अगस्त 1930 की बताई जाती है। कनाडा के चर्चिल थाने के पास अंजिकुनी नामक एस्किमो की बस्ती थी। एक दिन अचानक पूरी बस्ती के लोग न जाने कहां गायब हो गए। 

इसी प्रकार 1885 में वियतनाम में सैनिकों की छह सौ सैनिकों की एक टुकड़ी ने सेगॉन शहर की ओर कूच किया। कोई एक मील दूर जाने पर वह पूरी टुकड़ी गायब हो गई। आज तक उस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है। अनुमान यही लगाया गया कि धरती से इतर कोई और ग्रह है, जहां के प्राणी लोगों को पकड़ कर ले जाते हैं।

वस्तुओं के गायब हो जाने के किस्से भी आम हैं। आप के साथ भी ऐसा हो चुका होगा। जैसे किसी स्थान विशेष पर रखी वस्तु आप लेने जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलती। आपको अचरज होता है कि वह कहां गायब हो गई। कुछ समय बाद जब फिर देखते हैं तो वह वहीं मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ समय के लिए गायब हो जाती है। ऐसा भ्रम की वजह से भी हो सकता है।

आपने ऐसे मदारियों को भी करतब दिखाते हुए देखा होगा कि वे गुलाब जामुन या कोई मिठाई मांगने पर हवा में हाथ धुमा कर वह वस्तु पेश कर देते हैं। हालांकि यह ऐसे जादू के रूप में माना जाता है, जिसके पीछे कोई तकनीक काम करती है, जबकि आम मान्यता है कि मदारी कुछ समय के लिए मांगी गई वस्तु किसी दुकान या ठेले से मंगवाते हैं और कुछ समय बाद वह वस्तु वापस वहीं पहुंच जाती है, जहां से मंगाई गई है।