तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

रविवार, मई 03, 2026

ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास?

कुछ लोग ज्योतिष को अंधविश्वास मानते हैं, वहीं ज्योतिष को विज्ञान मानने वालों की भी कमी नहीं है। इस सिलसिले में विस्तृत चर्चा के दौरान ज्योतिषी व हस्तरेखा विशेषज्ञ राजेन्द्र गुप्ता ने बताया कि ज्योतिष पूर्ण विज्ञान है, क्योंकि हमारी सनातन संस्कृति का आधार वेद है, जो पूर्ण विज्ञान है और ज्योतिष वेदों का छठा अंग माना जाता है। ज्योतिष दो शब्दों ज्योति प्लस अष्क से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है ज्योति पिंड और जो ज्ञान इन ज्योति पिंडों के जड़ चेतन के प्रभाव का अध्ययन करता है उसे ज्योतिष विज्ञान कहते हैं। सबसे पहले इसी विज्ञान ने ब्रह्माण्ड के नक्षत्रों, ग्रहों, राशियों के बारे में विस्तार से बताया। उसका गणितीय संयोजन प्रस्तुत किया, जो आज के खगोल विज्ञान का आधार बना। पृथ्वी पर होने वाली ऋतुओं, तिथि, समय, अंक, समुद्र में ज्वार-भाटे, सूर्य-चन्द्र ग्रहण या धरती पर पर होने वाले सृजन, विकार या विनाश का सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

ज्योतिष पर मुंह बनाने वाले मूढ़मति लोगों को सूर्य सिद्धांत को पढ़ लेना चाहिए, जिसमें न केवल पृथ्वी बल्कि सौरमंडल के ग्रहों का नियमन करने वाली गतियों, उनके प्रभाव आदि का विस्तार वैज्ञानिक आधार पेश किया गया है। लोग जिस न्यूटन का नाम लेते नहीं थकते, उसे भास्कराचार्य ने पहले ही सिद्ध कर दिया था। एक बार आप आर्यभट्ट, वराहमिहिर द्वारा बनाई गई वेधशालाओं के दर्शन ही कर लें, तो ज्योतिष गणना की सटीकता और भारतीय विज्ञान के मुरीद हो जाएंगे। आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने ज्योतिष का संवर्धन किया और अपने आधार से ठोस आधार प्रदान किए। भास्कराचार्य ने न्यूटन से बहुत पहले ही गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रतिपादन कर दिया था, जिसे उन्होंने अपने ग्रंथ सिद्धांतशिरोमणि में प्रस्तुत किया है। आकृष्ट शक्ति च महीतया, स्वस्थ गुरं स्वभिमुखं स्वंशवत्या,

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, जिससे वह अपने आस-पास की वस्तुओं को आकर्षित करती है।

आज से करीब दो हजार साल पहले वराहमिहिर ने 27 नक्षत्रों और 7 ग्रहों तथा ध्रुव-तारे को वेधने के लिए एक बड़े जलाशय में स्तंभ का निर्माण करवाया था, इसकी चर्चा भागवतपुराण में है, स्तंभ में सात ग्रहों के लिए सात मंजिलें और 27 नक्षत्रों के लिए 27 रोशनदान काले पत्थरों से निर्मित करवाए थे, इसके चारों तरफ 27 वेधशालाएं मंदिरों के रूप में बनी थीं।

अतः ज्योतिष की सार्थकता और सटीकता पर आंखें बंद करके विरोध करना अज्ञानी या अर्द्धज्ञानी का काम है। इसके पहले आपको वेदों, पुराणों, ज्योतिष शास्त्र का समझें। खास बात, जो लोग ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते, उनको अधिकार भी नहीं की पंचांग की गणना के आधार पर निर्धारित किए जाने वाले होली, दीपावली, बश्चों के नाम, शादियों के मुहूर्त आदि को मानें।

आइये, अब दूसरा पक्ष जानते हैं। रीयल एस्टेट के जानकार रमेश टेहलानी ने एक पोस्ट में अपना मन्तव्य जाहिर किया है कि किसी समय में ज्योतिष सलाह कार्य करने के बहुत बाद में अनुभव किया कि ज्योतिष का असर उन्हीं पर होता है, जो इस पर विश्वास करते हैं। ज्योतिष न मानने वालो पर ग्रहों का कोई असर नहीं पड़ता। वे बताते हैं कि जब वे 17 साल के थे, तो ज्योतिष में गहरी रुचि हो गई थी। उन्होंने कई किताबें पढ़ीं और अनुभवी ज्योतिषियों से मिले। जब वे 18 की उम्र के थे, उस समय उनकी आय का स्त्रोत ज्योतिष सलाह कार्य था। इसी आय से उन्होंने एमबीए किया और फिर बैंक में नौकरी लगी।

उनकी बात को अनुभवसिद्ध मान लिया जाए तो भी सवाल उठता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जो ज्योतिष को नहीं मानते, उन पर ग्रहों का असर नहीं पडता? प्रकृति निरपेक्ष है। ग्रह निरपेक्ष होते हैं। वे उन्हें मानने या न मानने वालों पर समान रूप से असर डालते होंगे। जैसे सूर्य सभी पर समान रूप से तपिश डालता है, भला ऐसे कैसे हो सकता है कि उसे न मानने वाला उस तपिश से बच सकता है? बावजूद इसके अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा है कि ज्योतिष न मानने वालों पर ग्रह असर नहीं डालते तो जरूर कोई मर्म होगा। एक उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करते हैं। जैसे कई लोग अमुक दिन पर दाढी-बाल नहीं कटवाते, और ऐसे भी हैं, जो हर दिन दाढी-बाल कटवाते हैं, उन पर अमुक ग्रहों का असर क्यों नहीं पडता? हमारे यहां अधिसंख्य सैनिक प्रतिदिन दाढी बनाते हैं, उन पर ग्रह कुपित क्यों नहीं होते? एक बात और। ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि हस्तरेखाओं में भले ही कुछ भी लिखा हो, प्रबल कर्म से उनको बदला जा सकता है। इसके अनेक उदाहरण भी मौजूद हैं।


गुरुवार, अप्रैल 30, 2026

उसी तिथी पर श्राद्ध क्यों, जिस पर मृत्यु होती है?

 क्या आपने कभी विचार किया है कि श्राद्ध पक्ष में हम मृतात्मा को उसी तिथी पर श्राद्ध मनाते हुए ब्राह्मण को भोजन करवाते हैं, जिस पर उनकी मृत्यु हुई होती है? वस्तुतः हिंदू परंपरा में जिस तिथि (यानि चंद्र तिथि) पर मृत्यु हुई थी, उसी तिथि पर हर वर्ष श्राद्ध किए जाने के पीछे धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक तीनों तरह के कारण बताए गए हैं।

धार्मिक मान्यता है कि हिंदू पंचांग में तिथि केवल कैलेंडर का दिन नहीं है, बल्कि एक ऊर्जा-चक्र है। जिस तिथि को किसी व्यक्ति का देहांत होता है, उसी तिथि को उसका सूक्ष्म शरीर (यानि पितृ) विशेष रूप से सक्रिय माना जाता है। उस तिथि पर पितरों की सूक्ष्म उपस्थिति अधिक होती है। वे अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण, पिंडदान और भोजन दान (श्राद्ध) को स्वीकार कर पाते हैं। यह भी मान्यता है कि जिस तिथि को मृत्यु हुई, उसी दिन पितर लौकिक जीवन से परलोक की यात्रा पर जाते हैं। शास्त्र कहता है कि उस यात्रा-तिथि को किया गया तर्पण सबसे अधिक प्रभावकारी होता है। इसलिए हर साल वही तिथि “स्मृति-तिथि” बनती है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण भी है। निर्धारित तिथि पर श्राद्ध करने से परिवार में स्मरण, सम्मान और पीढ़ीगत जुड़ाव बना रहता है। हर वर्ष एक निश्चित दिन पर आयोजन होने से भूलने, टालने की संभावना कम होती है। इसका भावनात्मक पक्ष यह है कि किसी प्रिय व्यक्ति का निधन जिस दिन होता है, वह परिवार की स्मृति में गहराई से अंकित होता है। उसी दिन श्राद्ध करने से मन को शांति मिलती है।

इसका सांस्कृतिक एवं पारिवारिक कारण भी है। भारतीय घरों में कुल परंपरा का बड़ा महत्व है। हर व्यक्ति का अपना वार्षिक श्राद्ध-दिवस होना परिवार की वंशावली को व्यवस्थित रखता है। पुराने समय में लोग पूरी तरह कृषि-आधारित जीवन जीते थे। निश्चित तिथि पर श्राद्ध होने से आस-पड़ोस व रिश्तेदारों को भी पता रहता था कि किस घर में कब वर्ष-श्राद्ध है, कब अमावस्या-श्राद्ध या महालया होगा।

यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के वर्ष के अतिरिक्त वर्षों में पितृपक्ष (यानि महालया) के दौरान श्राद्ध करवाना चाहे तो वह भी मान्य है। लेकिन पारंपरिक व्यवस्था में व्यक्तिगत श्राद्ध उसी मृत्यु-तिथि पर किया जाता है।

सोमवार, अप्रैल 27, 2026

एक ही जगह व समय पर होने वाले बच्चों का भाग्य अलग क्यों?

एक ही अस्पताल, एक ही वार्ड, यहां तक कि एक ही समय पर जन्म लेने वाले बच्चों का भाग्य बिल्कुल अलग क्यों होता है, यह प्रश्न सदियों से ज्योतिष, दर्शन और मनोविज्ञान में चर्चा का विषय है। वस्तुतः कुंडली समय व स्थान के आधार पर बनाई जाती है, ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो जन्म-क्षण एक जैसा होने पर भी लग्न भिन्न हो सकती है। उसकी वजह यह है कि जन्म का सटीक समय सेकंड तक रिकॉर्ड नहीं होता। एक दो मिनट का अंतर भी लग्न, नवांश आदि में बड़ा अंतर ला देता है। लग्न हर 2-2.5 घंटे में बदलता है, नवांश चार्ट हर 13-14 मिनट में बदलता है। इससे दोनों के जीवनपथ, संघर्ष, अवसर, मानसिकता सब बदल जाते हैं। सटीक जन्मस्थान बराबर होने पर भी ‘जन्म-पार्थिव कारक’ अलग होते हैं। ज्योतिष में केवल ग्रह ही नहीं, बल्कि

कुल-परिवार, वातावरण, संस्कार, कर्मसंचय भी महत्वपूर्ण होते हैं। दो बच्चों का जन्मस्थान एक हो सकता है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति, शिक्षा का माहौल, पालन-पोषण अलग होने से भाग्यफल पूरी तरह बदल जाता है।

वेदांत और पारंपरिक ज्योतिष कहता है कि प्रत्येक जीव अपने पूर्व जन्म के संस्कार लेकर आता है। इसलिए भले ही दो लोग एक ही समय पर जन्में, उनके पूर्व जन्म के कर्मसंचय अलग होते हैं। इससे एक को अवसर जल्दी मिलता है, एक को संघर्ष ज्यादा, एक का मन रचनात्मक होता है और दूसरा साहसवादी होता है। ये सब ग्रहों की एक ही स्थिति होने पर भी फल को अलग बना देते हैं, क्योंकि कर्मसंस्कार अलग होते हैं।

एक बात और। दो बच्चों की महादशाएं तो समान हो सकती हैं, परंतु 

अंतर्दशा, प्रत्यंतर, सूक्ष्म दशा का प्रारंभ कुछ सेकंडों के अंतर से बदल जाता है। इससे पूरे जीवन में घटनाओं के समय अलग-अलग हो जाते हैं और यहीं से भाग्य का अंतर शुरू हो जाता है।

भले ही सामान्य जन्मपत्री समान लगे, परंतु चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, अष्टकवर्ग के अंक, भिन्न ग्रहों का बल, भाव के अंष्ज्ञ, इनमें छोटा सा अंतर भी पूरी भविष्यवाणी बदल देता है। केपी और नाड़ी ज्योतिष में सेकंड के स्तर तक अंतर माने जाते हैं। व्यक्तित्व जन्म के बाद के परिवेश से बनता है। अवसरों की उपलब्धता भाग्य को बदल देती है। सोच और प्रतिक्रियाएं एक ही घटना को दो लोग अलग तरह से लेते हैं।

कुल जमा भाग्य समान नहीं, सम्भावनाएं समान होती हैं। जन्म केवल शुरुआती ढांचा देता है, लेकिन मनुष्य का चुनाव, कर्म, दिशा भाग्य को आकार देते हैं। संक्षेप में एक ही समय पर जन्मे बच्चों का भाग्य अलग होता है क्योंकि जन्म का समय सूक्ष्म रूप से अलग होता है, लग्न एवं विभाजित कुंडलियाँ बदल जाती हैं, पूर्व-जन्म कर्मसंस्कार अलग होते हैं, पालन-पोषण और परिवेश अलग होता है, दशाएं-उपदशाएं अलग-अलग समय पर चलती हैं, ग्रहों का बल और अंश सूक्ष्म रूप से भिन्न होता है। परिवार और वातावरण अलग होते हैं, भले ही जन्म समय समान हो, पर एक बच्चा संपन्न परिवार में जा रहा है, दूसरा संघर्षशील परिवार में, किसी के माता-पिता का स्वभाव अलग है, किसी को शिक्षा, अवसर, पोषण अलग मिलेगा। किसे कितना प्रेम मिला, किसे कितनी सुरक्षा मिली, किस पर कितना अनुशासन या स्वतंत्रता हुई, ये सब भविष्य पर गहरा असर डालते हैं।

इसे यूं भी समझा जा सकता है कि दो पेड़ एक ही दिन लगाए जा सकते हैं, लेकिन मिट्टी, पानी और धूप अलग हो तो उनकी बढ़त भी अलग हो जाती है। इसी प्रकार पास-पास पैदा हुए दो नवजात शिशुओं की जीवन यात्रा दो नदियों की तरह अपनी-अपनी दिशा पकड़ लेती है।


शुक्रवार, अप्रैल 24, 2026

क्या है चरण स्पर्श करने की कीमिया?

भारतीय परंपरा में प्राचीनकाल से माता-पिता, गुरुओं, बडे बुजुर्गों आदि के चरण स्पर्श करने का चलन है। ऐसी मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति कितना ही क्रोधी स्वभाव का हो, अपवित्र भावनाओं वाला हो, यदि उसके भी चरण स्पर्श किये जाते हैं, तो उसके मुख से आषीर्वाद, दुआएं, सदवचन ही निकलता है। वस्तुतः मनुष्य के शरीर में उत्तरी ध्रुव यानि सिर से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर दक्षिणी धु्रव यानी पैरों में ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। हाथों और पैरों की अंगुलियों और अंगूठों के पोरों में यह ऊर्जा सर्वाधिक रूप से रहती है। सामान्य तौर पर जब हम किसी का चरण स्पर्श करते हैं, उसके हाथ सजह ही हमारे सिर पर जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे ज्ञान, बुद्धि और विवेक का विकास सहज होने लगता है। आपकी जानकारी में होगा कि जब भी हम मंदिर जाते हैं, तो वहां ताम्रपात्र में रखा तुलसी दल, केसर, चंदन से बना चरणामृत प्रसाद के रूप में पाते हैं। भगवान का चरणामृत वह तत्व है जो ऊर्जा, उत्साह, शक्ति और दीर्घायु प्रदान करता है। चरणों की महिमा देखिए, गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या श्राप के कारण पत्थर की मूरत बन गई थी और भगवान के चरण स्पर्श से शाप मुक्त होकर वापिस मानव रूप में आ गई। 

आपको ख्याल में होगा कि प्राचीन समय में जब ऋषि, मुनि या संतजन किसी राज दरबार में आते थे तो राजा महाराजा पहले शुद्ध जल से उनके पैर धोते थे। उसके बाद ही चरण स्पर्श की परंपरा पूर्ण करते थे। चरण स्पर्श से पहले चरण धोने के पीछे संभवत, यह वैज्ञानिक कारण रहा होगा कि चरण में एकत्रित विद्धुत चुंबकीय उर्जा चल कर आने से अत्यधिक तीव्रता से प्रवाहित और गर्म होती है। शीतल जल से धोने से यह सामान्य अवस्था में आ जाती है। एक बात और। किसी के पैर छूने का मतलब है, उसके प्रति समर्पण भाव जगाना। जब मन में समर्पण का भाव आता है, तो अहंकार खत्म हो जाता है। पैर छूना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा नहीं है। यह एक वैज्ञानिक क्रिया है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ी है। पैर छूने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि बड़ों के स्वभाव की अच्छी बातें भी हमारे अंदर उतर जाती है।

पैर छूने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे शारीरिक कसरत होती है। झुक कर पैर छूने से हमारी कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। घुटने के बल बैठकर पैर छूने से हमारे शरीर के जोड़ों पर बल पड़ता है, जिससे जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है। साष्टांग प्रणाम की विधि में शरीर के सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए सीधे तन जाते हैं, जिससे शरीर का स्ट्रेस दूर होता है। इसके अतिरिक्त झुकने से सिर का रक्त प्रवाह व्यवस्थित होता है, जो हमारी आंखों के साथ ही पूरे शरीर के लिए लाभदायक है।


गुरुवार, अप्रैल 23, 2026

पेन को पकडने का सही तरीका क्या है?

 मनोवैज्ञानिकों में यह सवाल चर्चा का मुद्दा रहा है कि पेन पकडने का सही तरीका क्या है? ज्योतिष व सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार लिखते समय पेन को चारों अंगुलियां व अंगूठा स्पर्श करना चाहिए। इससे आपकी लेखनी में सभी ग्रहों का सहयोग होता है और उसमें पूर्णता आती है। यह एक आदर्श स्थिति है। वैसे मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अगर पेन या पेंसिल पकड़ते समय आपका अंगूठा आपकी तर्जनी अंगुली के ऊपर आता है तो यह दर्शाता है कि आप बहुत कलात्मक हैं। बहुत छोटी-छोती बातें आपको परेशान या खुश करती है। अंगूठे के तर्जनी अंगुली को ढकने की मुद्रा का अर्थ यह है कि आप अपने जीवन में असामान्य इच्छाएं रखते हैं। आपको खुश रहने के लिए दूसरों की जरूरत पड़ती है, आप अकेले नहीं रह सकते। ऐसे लोग बहुत ज्यादा सोचने वाले होते हैं।

तर्जनी और अध्यमा अंगुली के बीच पेन पकडने वाले लोग अपने सामाजिक जीवन का बहुत लाभ उठाते हैं। मांफ करना, भूलना और फिर अपने रास्ते पर आगे बढना, यही इनका मूलमंत्र है। ये किसी के साथ कोई ईर्ष्या या द्वेष नहीं रखते। सच्चा और ईमानदार इंसान होना आपकी खूबी भी है और खामी भी। इसके अलावा आपके भीतर जो जिज्ञासा है उसे शांत करना भी बहुत मुश्किल है। आपको सबकुछ जानना है, चाहे उसका आपसे संबंध हो या नहीं। वैसे तो आप बहुत बातूनी हैं, अपनी बात दिल में नहीं रखते, लेकिन जब किसी से दिल की बात कहनी होती है तो आप अपनी भावनाओं को दबाकर रखना ही सही मानते हैं।

अंगूठे के ऊपर अंगुलिया रखकर लिखने वाले लोग बहुत चुस्त और सचेत होते हैं, इस खूबी की वजह से ये अपनी अलग पहचान भी रखते हैं। ये अपनी वास्तविक भावनाएं किसी को नहीं बता पाते।

यदि अंगूठा सभी अंगुलियों को ढकता है तो इसका अर्थ है कि आप अत्यधिक टैलेंटेड हैं, आपके भीतर एक अलग सा आकर्शण है, जो दूसरों को आपकी ओर खींच लाता है। 

एक समय था जब अलग-अलग तरह के पेन होते थे और तो और सभी पेन को पकडने का तरीका भी उतना ही अलग हुआ करता था। 

एक मान्यता यह भी है कि यदि पेन पकडते समय तर्जनी अंगुली पृथक होती है तो परिवार की एकता टूटती है, उसमें बंटवारे की स्थिति उत्पन्न होती है। इस मान्यता के अनुसार कोई भी वस्तु पकडते वक्त अंगुली अलग नहीं होनी चाहिए। कदाचित यह मान्यता सामुद्रिक शास्त्र से आई है।


मंगलवार, अप्रैल 21, 2026

क्या भगवान के नाम पर नाम रखना गुनाह है?

आजकल बच्चों के नाम अलग तरह से रखे जाने लगे हैं। कोई संस्कृत भाषा का नाम तलाशता है तो कोई अंग्रेजीदां। कोई महाभारत कालीन या रामायण कालीन पात्रों के नाम रखता है तो कोई अत्याधुनिक अंग्रेजी नाम रखता है। जैसे भीष्म, कुन्ती, कर्ण, युधिष्ठिर, भीम, नकुल, कौस्तुभ या अर्जुन और दशरथ, सीताराम, लक्ष्मण, हनुमान इत्यादि। कुछ साल पहले रमेश, वैभव, अनिल, मुकेश टाइप के नाम रखे जाते थे। नए चलन में आदि, अयान, आर्यन इत्यादि टाइप के नाम रखे जाने लगे हैं। कुछ पीछे चलें तो अमूमन भगवान के नामों में से कोई नाम रखा जाता था। जैसे राम लाल, राम दास, राम चन्द्र, गणेशी लाल, कृपाशंकर इत्यादि। अर्थात भगवान के नाम के साथ लाल या दास जोड़ा जाता था। हालांकि कुछ लोग गोविंद, सुरेन्द्र जैसे नाम भी रखते रहे हैं। जहां तक भगवान के नामों में से कोई नाम रखने की परंपरा का सवाल है, उसके पीछे कारण ये रहता होगा कि किसी को पुकारने के बहाने भगवान का नाम तो उच्चारण में आएगा। सोच यह भी रहती होगी कि ऐसा करने भगवान का स्मरण आने से उनके गुण हमारे में भी आ जाएंगे। हालांकि हकीकत ये है कि जब भी हम किसी को भगवान के किसी नाम से पुकारते हैं, तो वह केवल हमारी जुबान पर होता है, उसका उच्चारण करते वक्त भगवान की छवि हमारे जेहन में नहीं होती। 

इस बारे में एक दिलचस्प जानकारी आयतुल कुर्सी से मिली। आयतुल कुर्सी कुरान की एक आयत है, जो भूत-प्रेत आदि को भगाने या उससे बचाव के लिए पढ़ी जाती है। उसके दूसरे जुमले में कहा गया है कि वही हमेशा जिंदा और बाकी रहने वाला है। हय्य के मानी अरबी ज़ुबान में जिसको कभी मौत न आये, हमेशा जिंदा रहने वाला और कय्यूम के माने हैं, जो खुद कायम रहे और दूसरों को भी कायम रखता और संभालता हो और कय्यूम अल्लाह तआला की ख़ास सिफत है, जिसमें कोई भी उस का शरीक नहीं क्योंकि जो चीज़ें अपने बाक़ी रहने में दूसरे की मोहताज हों, वो किसी दूसरे को क्या संभाल सकती हैं। इसलिए किसी इंसान को क़य्यूम कहना जायज़ नहीं, बल्कि अब्दुल कय्यूम अर्थात कय्यूम का बंदा कहना चाहिए। जो लोग अब्दुल कय्यूम की जगह सिर्फ कय्यूम बोलते हैं, वे गुनाहगार होते हैं। यही वजह है कि खुदा की ओर संकेत करने वाले नामों के साथ कोई न कोई लफ्ज जरूर जोड़ा जाता है।

इसका मतलब ये है कि इस्लाम में खुदा की किसी खासियत वाले नाम को रखने की मनाही है। मकसद यही है कि खुदा के नाम की मर्यादा या पाकीजगी के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो। ठीक इसी तरह जो लोग राम दास, राम लाल आदि नाम रखते थे, उसके पीछे वजह ये रहती होगी कि अकेले भगवान के नाम पर नाम रखने की बजाय उसका दास या लाल कहा जाए। वाकई यह सोच बहुत ही गहरी है। हम भला भगवान के बराबर कैसे हो सकते हैं।


शनिवार, अप्रैल 18, 2026

कपूर में छिपे हैं चमत्कारी गुण

कपूर हमें एक सामान्य सा पदार्थ लगता है। यह हर घर में होता है। खासकर घर के मंदिर में। लेकिन इसमें चमत्कारी गुण मौजूद हैं। कर्पूर या कपूर उडऩशील दिव्य वानस्पतिक द्रव्य है। कर्पूर जलाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। इसे अक्सर आरती के बाद या आरती करते वक्त जलाया जाता है, जिससे वातावरण में सुगंध फैल जाती है और मन एवं मस्तिष्क को शांति मिलती है। कपूर को संस्कृत में कर्पूर, फारसी में काफूर और अंग्रेजी में कैंफर कहते हैं। वास्तु एवं ज्योतिष शास्त्र में भी कपूर का बहुत महत्व और उपयोग के बारे में बताया गया है। मान्यता है कि देवी-देवताओं के समक्ष कर्पूर जलाने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन सुबह और शाम घर में संध्या वंदन के समय कपूर जरूर जलाएं। वस्तुतः कपूर जलाने से सकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है। यदि आप चाहते हैं कि घर में सकारात्मक उर्जा और शांति-समृद्धि बनी रहे तो प्रतिदिन सुबह और शाम कर्पूर को घी में भिगोकर जलाएं और संपूर्ण घर में उसकी खुशबू फैलाएं। ऐसा करने से घर की नकारात्मक उर्जा नष्ट हो जाएगी। दुःस्वप्न नहीं आएंगे और घर में अमन शांति बनी रहेगी है।

इससे देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि हमें शायद पितृदोष है या काल सर्पदोष है। दरअसल, यह राहु और केतु का प्रभाव मात्र है। इसको दूर करने के लिए घर के वास्तु को ठीक करें। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो प्रतिदिन सुबह, शाम और रात्रि को तीन बार घी में भिगोया हुआ कर्पूर जलाएं। घर के शौचालय और बाथरूम में कर्पूर की 2-2 टिकियां रख दें। बस इतना उपाय ही काफी है।

ज्योतिश षास्त्र के अनुसार आकस्मिक घटना या दुर्घटना का कारण राहु, केतु और शनि होते हैं। इसके अलावा हमारी तंद्रा और क्रोध भी दुर्घटना का कारण बनते हैं। इसके लिए रात्रि में हनुमान चालीसा का पाठ करने के बाद कर्पूर जलाएं। प्रतिदिन सुबह और शाम जिस घर में कर्पूर जलता रहता है, उस घर में किसी भी प्रकार की आकस्मिक घटना और दुर्घटना नहीं होती। रात्रि में सोने से पूर्व कर्पूर जलाकर सोना तो और भी लाभदायक है।

वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह भी ज्ञात हुआ है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता। यदि घर के किसी स्थान पर वास्तु दोष निर्मित हो रहा है तो वहां कर्पूर की 2 टिकियां रख दें। जब वह टिकियां गलकर समाप्त हो जाए तब दूसरी दो टिकिया रख दें। इस प्रकार बदलते रहेंगे तो वास्तुदोष निर्मित नहीं होगा।

सलाह दी जाती है कि पानी में कर्पूर के तेल की कुछ बूंदों को डाल कर नहाएं। यह आपको तरोताजा तो रखेगा ही आपके भाग्य को भी चमकाएगा। यदि इस में कुछ बूंदें चमेली के तेल की भी डाल लेंगे तो इससे राहु, केतु और शनि का दोष नहीं रहेगा।

 


https://youtu.be/1bqmmsc0PgY