तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, अप्रैल 13, 2026

पूजा के दौरान नारियल खराब निकलना अशुभ अथवा शुभ

पूजा के दौरान नारियल खराब यानि अंदर से सूखा, काला या सड़ा हुआ निकलने को कुछ लोग षुभ मानते हैं तो कुछ लोग अषुभ। अक्सर लोगों को अशुभ लगता है, लेकिन इसका अर्थ पूरी तरह नकारात्मक नहीं होता। इसके पीछे धार्मिक और व्यावहारिक, दोनों तरह की व्याख्याएं हैं। धार्मिक दृष्टिकोण के अनुसार नारियल को “श्रीफल” कहा जाता है। यह भगवान को अर्पित सबसे पवित्र फल माना जाता है। मान्यता है कि नारियल फोड़ना अहंकार त्यागने का प्रतीक है। यदि नारियल खराब निकलता है, तो कुछ लोग इसे ऐसे मानते हैं कि भगवान ने आपकी कोई नकारात्मक ऊर्जा या बाधा अपने ऊपर ले ली, यानी यह अशुभ नहीं, बल्कि शुद्धिकरण का संकेत भी हो सकता है। इसलिए कई पंडित इसे “बाधा टलने” का संकेत मानते हैं, न कि दुर्भाग्य।

कुछ परंपराओं में इसे पूजा में कमी, मन की अशुद्धि या संकेत माना जाता है। खासकर यदि बार-बार ऐसा हो, तो लोग इसे सावधानी का संकेत समझते हैं। लेकिन ये मान्यताएँ स्थानीय और परंपरागत हैं, कोई सार्वभौमिक नियम नहीं।

जहां तक व्यावहारिक यानि वैज्ञानिक कारण का सवाल है कि नारियल लंबे समय तक रखने से अंदर से सूख या खराब हो सकता है। बाहर से सही दिखने के बावजूद अंदर खराब होना प्राकृतिक प्रक्रिया है। यानी इसका पूजा या भाग्य से सीधा संबंध जरूरी नहीं।

अब सवाल यह कि क्या करें अगर नारियल खराब निकले? घबराएं नहीं, इसे अशुभ मानकर डरने की जरूरत नहीं। भगवान से प्रार्थना करके दूसरा नारियल अर्पित कर सकते हैं। मन में सकारात्मक भावना रखें, भाव ही सबसे महत्वपूर्ण है। कुल मिला कर नारियल खराब निकलना न तो पूरी तरह अशुभ है, न निश्चित रूप से शुभ। यह अधिकतर आपकी श्रद्धा और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। धर्म में “भाव” प्रधान होता है, वस्तु नहीं।


रविवार, अप्रैल 12, 2026

क्या सपना सच हो सकता है?

 नींद और स्वप्न दोनों ही रहस्यमय लगते हैं, इसलिए जब कोई सपना सच निकल आता है, तो स्वाभाविक सा प्रश्न उठता है कि क्या सपने सचमुच भविष्य का पूर्वानुमान होता है? क्या सपना सच हो सकता है?

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सपना दिमाग की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि पैटर्न-रिकॉग्निशन है। दरअसल हमारा दिमाग दिनभर की घटनाओं, चिंताओं, इच्छाओं और अधूरे कामों को नींद में व्यवस्थित करता है। इस दौरान वह संभावित भविष्य के परिदृष्यों का भी ‘सिमुलेशन’ करता है, जैसे अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा। कभी-कभी यह ‘सिमुलेशन’ वास्तविक जीवन की किसी घटना से मेल खा जाता है। हमें लगता है कि सपना सच हो गया, जबकि वास्तव में यह दिमाग की संभावनाओं का अनुमान था, भविष्य का ज्ञान नहीं। इसे मनोविज्ञान में प्रोस्पेक्टिव डीमिंग कहा जाता है, अर्थात वह सपना देखना, जिसमें दिमाग भविष्य की संभावनाओं को मिलाकर कोई दृश्य बनाता है।

कभी-कभी हम जीवन में कुछ संकेत पहले ही देख-समझ चुके होते हैं, जैसे किसी की तबियत बिगड़ना, किसी घटना के संकेत, रिश्तों में तनाव, पर जागृत अवस्था में उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। अवचेतन इन्हीं संकेतों को जोड़ कर सपना बना देता है। वास्तविक घटना होने पर लगता है कि सपना भविष्यवाणी था। यह अंतर्ज्ञान या इंन्ट्यूषन और इम्प्लिसिट लर्निंग का मामला है, न कि अलौकिक पूर्वज्ञान।

भारतीय परंपरा में तो स्वप्न विज्ञान का विस्तृत उल्लेख है। बाकायदा षुभ व अषुभ स्वप्न का वर्णन है। विस्तार में जाएं तो हर सपने का फल बताया जाता है। हालांकि उसका वैज्ञानिक आधार नहीं है, मगर उस पर लोगों का बहुत यकीन है। 

सपनों के दो प्रकार बताए गए हैं। एक दैनिक चिंताओं के सपने, जो सामान्य व अर्थहीन माने जाते हैं। वस्तुतः वह मनोवैज्ञानिक लिहाज से वह अवचेतन की अभिव्यक्ति है। दूसरा, आंतरिक चेतना का संकेत और शुभ-अशुभ स्वप्न, जिसका आध्यात्मिक साहित्य में वर्णन मिलता है। ये पूर्वानुमान नहीं, बल्कि चेतन-अवचेतन संवाद माने गए हैं।

हालांकि अब तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि सपने भविष्य की घटनाओं को देख सकते हैं, लेकिन सपनों में भावी डर, भविष्य की योजना और संभावित घटनाओं का अनुमान अवश्य शामिल होता है, जिसे हम कभी-कभी पूर्वानुमान समझ बैठते हैं। कुल मिला कर सपने भविष्य नहीं बताते, लेकिन दिमाग भविष्य के बारे में सोच कर जो दृश्य बनाता है, वह कभी सच्चाई से मिलता-जुलता हो जाता है। इसे हम “पूर्वानुमान” समझ लेते हैं, जबकि यह अवचेतन की संभावनाओं का खेल होता है।

आइये, कुछ विश्व-प्रसिद्ध सपनों के उदाहरण देखें, जो साकार हुए।

डीएनए की संरचना खोजने में लगे जेम्स वाटसन ने एक रात सांपों के दो फंदों के रूप में कुंडलित होकर घूमने का सपना देखा। इससे उन्हें डबल हेलिक्स संरचना की प्रेरणा मिली। अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन ने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले सपना देखा कि व्हाइट हाउस में एक ताबूत रखा है और लोग रो रहे हैं। उन्होंने यह बात पत्नी और मित्रों से भी कही थी। कुछ ही दिनों बाद उनकी हत्या हो गई। भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन बताते थे कि कई बार उन्हें देवी नामगिरी सपने में गणितीय सूत्र बताती थीं। जागने पर वे उन्हें लिखते और वे सही साबित होते।


शनिवार, अप्रैल 11, 2026

ज्योतिषी के लिए आस्तिक होना जरूरी नहीं?

क्या आपको इस बात पर यकीन होगा कि कोई नास्तिक भी ज्योतिश का प्रकांड पंडित हो सकता है। जाहिर है, आप यही कहेंगे कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है। जो आस्तिक नहीं, उसे ज्योतिष का ज्ञान आ ही कैसे सकता है। मगर सच ये है कि ऐसा संभव होते देखा है मैने। मेरे एक अभिन्न मित्र नास्तिक हैं, बचपन से। कभी कोई पूजा-पाठ नहीं करते। न दीया जलाते हैं और न ही अगरबत्ती। एक बार उनकी पत्नी ने मुझ से कहा कि घर में शांति नहीं है, कोई न कोई दोष है, मगर मेरे पति नास्तिक हैं और कोई ज्योतिषीय उपाय या टोना-टोटका करने को तैयार नहीं हैं। आप उन्हें मनाइये। मैने उन्हें जैसे तैसे तैयार किया और एक ज्योतिषी के पास ले गया। रास्ते में उन्होंने कहा कि वे भले ही हमारे कहने पर कोई रत्न धारण लेंगे, मगर उसे पत्थर जान कर। समझा जा सकता है कि वे कितने घोर नास्तिक थे। दिलचस्प बात यह है कि ज्योतिषी के बताए उपाय करने से उनके घर में शांति हो गई, फिर भी वे आस्तिक नहीं हो पाए। आप यह जान कर चकित होंगे कि बाद में नास्तिक होते हुए भी उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया और आज हस्तरेखा व कुंडली के प्रकांड विद्वान हैं। सटीक भविष्यवाणी किया करते हैं। दिलचस्प बात ये है कि खुद टोने-टोटके में यकीन नहीं करते, मगर जिज्ञासु को उसका उपाय बताते हैं। जाहिर है कि भले ही वे ग्रहों और देवी-देवताओं के प्रति आस्था न रखते हों, मगर पूर्व में स्थपित सिद्धांतों का सहारा लेते हैं कि कदाचित वे सही हों। मैं तब अचंभित रह गया, जब उन्होंने एक सुपरिचित ज्योतिषी को उनकी हथेली देख कर बता दिया था अमुक दिन आपका एक बडा ऑपरेशन होगा, जबकि स्वयं ज्योतिषी को इसकी जानकारी नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिष विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है, जैसे एमबीबीएस। एमबीबीएस करने के लिए धार्मिक होने की कोई जरूरत नहीं, ठीक इसी प्रकार ज्योतिर्विद्या सीखने के लिए आस्तिक होना जरूरी नहीं। अधार्मिक व नास्तिक चिकित्सक भी बेहतरीन उपचार कर सकता है। लेकिन साथ ही यह भी दिलचस्प है कि चिकित्सक भी कोई ऑपरेशन करने से पहले यह कहते सुने गए हैं कि मैं उपचार कर रहा हूं, मगर ठीक भगवान की कृपा से होगा।

इस मसले का दूसरा पक्ष यह है कि आस्तिक ज्योतिषी भविष्यवाणी करते वक्त ज्योतिष विज्ञान के साथ अंतर्दृश्टि का उपयोग भी किया करते हैं। इंट्यूशन से भी संकेत हासिल करते हैं। कई ज्योतिषी भविष्यवाणी करते से पहले अपने इष्ट व गुरू का स्मरण करते हैं, ताकि भविष्यवाणी में उनका भी सहयोग मिले और भविष्यवाणी में कोई त्रुटि न हो। कुछ लोगों का मानना है कि अंतर्दृश्टि के लिए धार्मिक होना जरूरी नहीं है। अधार्मिक व नास्तिकों में भी अंतर्दृश्टि होने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। मैं निजता की रक्षा करते हुए नास्तिक ज्योतिषी का नाम उजागर नहीं करूंगा। मेरा मकसद सिर्फ ज्योतिष को विशुद्ध विज्ञान होने को आपसे साझा करना है।


सोमवार, अप्रैल 06, 2026

दुनिया का पहला परमाणु बम छोड़ा था अश्वत्थामा ने

वैज्ञानिक मानते हैं कि महाभारत काल में परमाणु बम का प्रयोग हुआ था। एक शोधकार्य के अनुसार महाभारत के समय जो ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल किया गया था, वह परमाणु बम के समान ही था। संभवतः दुनिया का पहला परमाणु बम छोड़ा था अश्वत्थामा ने। रामायण काल में भी मेघनाद से युद्ध हेतु लक्ष्मण ने जब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि अभी इसका प्रयोग उचित नहीं, क्योंकि इससे पूरी लंका साफ हो जाएगी। यह अस्त्र रामायण काल में छूटने से बच गया, लेकिन महाभारत काल में कौरव और पांडवों के युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया।

महाभारत का युद्ध आज से लगभग 5,300 वर्ष पूर्व हुआ था। उस दौरान गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा ने भगवान कृष्ण के मना करने के बावजूद ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। असल में अपने पिता के मारे जाने के बाद अश्वत्थामा बदले की आग में जल रहा था। उसने पांडवों का समूल नाश करने की प्रतिज्ञा ली और चुपके से पांडवों के शिविर में पहुंचा और कृपाचार्य तथा कृतवर्मा की सहायता से उसने पांडवों के बचे हुए वीर महारथियों को मार डाला। केवल यही नहीं, उसने पांडवों के पांचों पुत्रों के सिर भी काट डाले। अंत में अर्जुन की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की उसे याद आई। पुत्रों की हत्या से दुखी द्रौपदी विलाप करने लगी। अर्जुन ने जब यह भयंकर दृश्य देखा तो उसका भी दिल दहल गया। उसने अश्वत्थामा के सिर को काटने की प्रतिज्ञा ली। अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर अश्वत्थामा वहां से भाग निकला। श्रीकृष्ण को सारथी बनाकर अर्जुन ने उसका पीछा किया। अश्वत्थामा को कहीं भी सुरक्षा नहीं मिली तो अंत में उसने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाना तो जानता था, पर उसे लौटाना नहीं जानता था। उस अति प्रचंड तेजोमय अग्नि को अपनी ओर आता देख अर्जुन भयभीत हो गया और उसने श्रीकृष्ण से विनती की। श्रीकृष्ण बोले, है अर्जुन! तुम्हारे भय से व्याकुल होकर अश्वत्थामा ने यह ब्रह्मास्त्र तुम पर छोड़ा है। इस ब्रह्मास्त्र से तुम्हारे प्राण घोर संकट में हैं। इससे बचने के लिए तुम्हें भी अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा, क्योंकि अन्य किसी अस्त्र से इसका निवारण नहीं हो सकता। दोनों द्वारा छोड़े गए इस ब्रह्मास्त्र के कारण लाखों लोगों की जान चली गई थी। अश्वत्थामा ने पांडवों के समूल नाश के लिए इस अस्त्र के एक रूप का उत्तरा के गर्भ पर भी प्रयोग किया था। जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब कृष्ण ने अश्वत्थामा से कहा- उत्तरा को परीक्षित नामक बालक के जन्म का वर प्राप्त है। उसका पुत्र तो होगा ही। यदि तेरे शस्त्र-प्रयोग के कारण मृत हुआ तो भी मैं उसे जीवित कर दूंगा। वह भूमि का सम्राट होगा और नीच अश्वत्थामा, तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ 3,000 वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध निःसृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।

बताते हैं कि रामायणकाल में जहां यह विभीषण और लक्ष्मण के पास यह अस्त्र था, वहीं महाभारतकाल में यह द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न और अर्जुन के पास था। अर्जुन ने इसे द्रोण से पाया था। द्रोणाचार्य को इसकी प्राप्ति राम जामदग्नेय से हुई थी। ऐसा भी कहा गया है कि अर्जुन को यह अस्त्र इंद्र ने भेंट किया था।


रविवार, अप्रैल 05, 2026

जनेऊ संस्कार का क्या महत्व है?

जनेऊ संस्कार, जिसे उपनयन संस्कार भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह बालक के जीवन में शिक्षा और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। जनेऊ संस्कार में बालक को यज्ञोपवीत यानि जनेऊ धारण कराया जाता है। इसके साथ ही उसे गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है और उसे आधिकारिक रूप से “विद्यार्थी” घोषित किया जाता है। उपनयन यानि उप व नयन, इसका अर्थ होता है, गुरु के पास ले जाना, ज्ञान की ओर अग्रसर करना। परंपरागत रूप से ब्राह्मण बालक का 8 वर्ष के आसपास, क्षत्रिय का 11 वर्ष व वैष्य का 12 वर्ष की उम्र में जनेउ संस्कार होता है। हालांकि आजकल यह उम्र और परंपराएं परिवार अनुसार बदल जाती हैं।

अब जानते हैं कि जनेऊ का महत्व क्या है? जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो कई अर्थों का प्रतीक हैं। एक देव ऋण (ईश्वर के प्रति कर्तव्य),  दूसरा पितृ ऋण (पूर्वजों के प्रति कर्तव्य) और तीसरा ऋषि ऋण (ज्ञान देने वालों के प्रति कर्तव्य)। कुछ लोग इसे सत्त्व, रज और तम (तीन गुणों) का प्रतीक भी मानते हैं। इस संस्कार में पहले स्नान और शुद्धि की जाती है। फिर यज्ञ (हवन) होता है। फिर गुरु द्वारा जनेऊ धारण कराया जाता है। गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है। इसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्वयह है कि यह बचपन से जिम्मेदारी की ओर कदम है। यह व्यक्ति को अनुशासन, अध्ययन और धर्म पालन के लिए प्रेरित करता है। इसे “दूसरा जन्म” (द्विज) भी कहा जाता है। आज के समय में इसे कई लोग सांस्कृतिक परंपरा के रूप में निभाते हैं। कुछ इसे आध्यात्मिक अनुशासन की शुरुआत मानते हैं। वहीं कुछ लोग इसे जाति आधारित परंपरा मानकर इसकी आलोचना भी करते हैं। सिंधी समाज में ब्राह्मण परंपरागत रूप से जनेऊ संस्कार करते रहे हैं,

जबकि अधिकतर सिंधी व्यापारी, भाईबंद, लोहाणा आदि समुदायों में यह परंपरा आम तौर पर नहीं रही। यानी, यह पूरे सिंधी समाज का अनिवार्य संस्कार कभी नहीं रहा। सिंधी समुदाय में विवाह के अवसर पर भी प्रतीकात्मक रूप से जनेउ धारण करवाने की परंपरा है।


सोमवार, मार्च 30, 2026

श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंख क्यों?

आपने देखा होगा कि भगवान श्रीकृष्ण के सभी चित्रों में सिर पर मोर पंख होता है। क्या कभी ख्याल आया कि ऐसा क्यों? वस्तुतः श्रीकृष्ण के सिर पर लगा मोर पंख केवल सजावट नहीं है, इसके पीछे गहरा धार्मिक, प्रतीकात्मक, दार्शनिक और प्राकृतिक अर्थ निहित है। परंपरा, पुराण, लोककथा और मनोविज्ञान, चारों स्तर पर इसके सुंदर अर्थ मिलते हैं। एक कथा के अनुसार एक दिन गोपियां श्रीकृष्ण के लिए फूल चुन रही थीं, ताकि वे उनके लिए सुंदर मुकुट बना सकें। श्रीकृष्ण यह देखकर मुस्कुरा उठे और बोले, “मेरे लिए इतने सुंदर फूल क्यों?” गोपियां बोलीं, “क्योंकि आप हमें प्रिय हैं।” कृष्ण ने उत्तर दिया, “जो भी बिना अहंकार के प्रेम देता है, मैं वही पहनता हूं।” तभी पास खड़ा मोर अपना सुंदर पंख गिरा देता है। श्रीकृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर लगा लिया। इसी क्षण से मोरपंख उनका प्रिय अलंकार बन गया। कथा है कि मथुरा-वृंदावन में मानसून आने पर मोर प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे। श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी बजानी शुरू की। बांसुरी की ध्वनि से मोर इतना मोहित हुए कि नाचते-नाचते उन्होंने अपना सुंदर पंख कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। कृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर रख कर कहा, “यह मेरे मित्र का प्रेम है।” इसलिए उन्हें ‘मोर मुकुटधारी’ कहा जाता है।

ज्ञातव्य है कि पुराणों में मोर पंख को शुभ माना गया है। मोर पंख में तीन आंखों जैसे चिह्न होते हैं, जो कि ज्ञान, कर्म और भक्ति के प्रतीक हैं। मोर पंख सात रंगों से बना है, जो सात चक्रों और सात भावों का प्रतीक है। इसलिए इसे धारण करना धर्म, सौंदर्य और संतुलन का चिन्ह माना जाता है। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि श्रीकृष्ण अपने सिर पर वनमालाएं, वनफूल, तथा मोरपंख का अलंकार धारण करते थे। यह उनके साधारण, सहज, प्रकृति के निकट और सबके मित्र होने का संकेत है।

एक अन्य कथा कहती है कि जब कंस ने कृष्ण की पहचान करने के लिए दूत भेजे, तब नंदगांव के लोगों ने कृष्ण के सिर पर मोरपंख लगाया, ताकि वे साधारण ग्वालबाल की तरह लगें। यही ‘वेशभूषा’ बाद में उनकी अलंकार-परंपरा बन गई। मोरपंख का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मोर पंख जितना सुंदर है, उतना ही हल्का, इसके पीछे यह शिक्षा दी जाती है कि सुंदरता का अहंकार नहीं होना चाहिए। भारतीय परंपरा में मोर पंख को नजर दोष हटाने वाला, सकारात्मक ऊर्जा देने वाला और दिव्य कंपन पैदा करने वाला माना गया है। यही वजह है कि इसे लोग घर के मंदिर में रखते हैं। मोर पंख में सकारात्मक ऊर्जा की वजह से ही तांत्रिक व ओझा झाडफूंक के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसी प्रकार जैन संतों की “पिच्छी” (या पिच्छिका) एक अत्यंत पवित्र और अहिंसक उपकरण है। यह मोर के गिरे हुए पंखों से बनाई जाती है, केवल स्वाभाविक रूप से झड़े हुए पंख, न कि किसी मोर को नुकसान पहुंचा कर। दिगम्बर और श्वेताम्बर परंपराओं में इसके आकार-विन्यास में कुछ अंतर हो सकते हैं, पर सामग्री मोरपंख ही होती है। जैन मुनि इसे अहिंसा के लिए प्रयोग करते हैं, जैसे बैठने से पहले छोटे जीवों को हटाने हेतु ताकि अनजाने में हिंसा न हो।

शनिवार, मार्च 28, 2026

अब भी संजीवनी बूटी मौजूद है?

कहते हैं कि हिमालय में एक ऐसी बूटी पाई जाती है, जिसके बल पर मृत व्यक्ति को भी जिंदा किया जा सकता है। “संजीवनी बूटी” के बारे में हमारी जानकारी पुराणों, रामायण और कुछ स्थानीय परंपराओं से आती है। 

वाल्मिकी रामायण अनुसार मूर्च्छित लक्ष्मण के लिए हनुमानजी यह बूटी लेकर आए थे। जब लक्ष्मण मेघनाद (इंद्रजीत) के बाण से घायल होकर बेहोश हो गए थे, तो हनुमानजी को “संजीवनी बूटी” लाने के लिए हिमालय की द्रोणगिरि पर्वत भेजा गया। कहा जाता है, हनुमान पूरे पर्वत को ही उठा लाए क्योंकि उन्हें सही बूटी पहचान में नहीं आई। उस बूटी से लक्ष्मण फिर जीवित हो गए। इसका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इनमें जीवनदायिनी, पुनर्जीवित करने वाली या अत्यंत शक्तिशाली औषधीय गुण पाए जाते हैं।

इस बूटी के दम पर ही शुक्राचार्य ने देवासुर संग्राम में असुरों को जीवित कर दिया था। आजकल वैज्ञानिक पारे, गंधक और आयुर्वेद में उल्लेखित कई प्रकार की जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं और इसके चमत्कारिक परिणाम भी निकले हैं, लेकिन जहां तक सवाल संजीवनी बूटी का है तो यह शोध और खोज का विषय है। वैज्ञानिक दृष्टि से अब तक ऐसी किसी जड़ी-बूटी का पक्का प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि, उत्तराखंड और हिमालय के कई हिस्सों में कुछ दुर्लभ औषधीय पौधे हैं, जिनको “संजीवनी” नाम से जाना जाता है क्योंकि वे सूख जाने पर भी पानी मिलने पर फिर हरे हो जाते हैं और उनमें उच्च औषधीय गुण पाए जाते हैं। जिससे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति बढती है। इससे बुखार, थकान और मानसिक तनाव में राहत मिलती है। यह घाव भरने और कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने में सहायक होती है। इसी प्रकार ऑर्किड वर्ग की जड़ी उत्तराखंड, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती है। चीनी व तिब्बती चिकित्सा में इसे “जीवनवर्धक औषधि” कहा जाता है। यह ऊर्जा, पाचन और प्रतिरक्षा को बढ़ाती है। यह षरीर में जीवन षक्ति संतुलित करती है। इसी प्रकार एरिथ्रिना इंडिका, जिसे हम पारिजात या भारतीय कोरल वृक्ष के रूप में जानते हैं। इसमें एनाल्जेसिक यानि दर्द निवारक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। कभी-कभी लोक चिकित्सा में इसे “संजीवनी वृक्ष” कहा जाता है। हिमालयी क्षेत्र में एंजेलिका ग्लौका जडी पाई जाती है। यह अत्यंत सुगंधित औषधीय पौधा है। तंत्रिका तंत्र और श्वसन तंत्र को सुदृढ़ करता है। 

इसी प्रकार जिनसेंग एक प्रसिद्ध चीनी औषधीय जड़ी है, जिसका उपयोग सदियों से ऊर्जा बढ़ाने, थकान घटाने और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए किया जाता है। इसको अक्सर “मल्टीविटामिन फॉर्मूले” में डाला जाता है, क्योंकि यह शरीर की जीवन शक्ति बढ़ाने में मदद करती है। लोकप्रिय ब्रांड रिवाइटल व एक्सप्लोड में यह पायी जाती है। मगर अत्यधिक सेवन से नींद न आना, उच्च रक्तचाप या बेचैनी जैसी समस्या हो सकती है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं लेना चाहिए। एस्टागेलस मेम्बरानासिइस जड़ी पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग होती है, जैसे कि इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए। पॉलीगोनम मल्टिफोरम जडी पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग होती है, विशेष रूप से “जीर्णता” को धीमा करने के लिए, बालों को काला करने, और लम्बी उम्र के लिए। परन्तु ये सभी पौधे रामायण की “संजीवनी” नहीं माने जा सकते, केवल प्रतीकात्मक रूप से उनसे जोड़े जाते हैं।