तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

सोमवार, अप्रैल 06, 2026

दुनिया का पहला परमाणु बम छोड़ा था अश्वत्थामा ने

वैज्ञानिक मानते हैं कि महाभारत काल में परमाणु बम का प्रयोग हुआ था। एक शोधकार्य के अनुसार महाभारत के समय जो ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल किया गया था, वह परमाणु बम के समान ही था। संभवतः दुनिया का पहला परमाणु बम छोड़ा था अश्वत्थामा ने। रामायण काल में भी मेघनाद से युद्ध हेतु लक्ष्मण ने जब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि अभी इसका प्रयोग उचित नहीं, क्योंकि इससे पूरी लंका साफ हो जाएगी। यह अस्त्र रामायण काल में छूटने से बच गया, लेकिन महाभारत काल में कौरव और पांडवों के युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया।

महाभारत का युद्ध आज से लगभग 5,300 वर्ष पूर्व हुआ था। उस दौरान गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा ने भगवान कृष्ण के मना करने के बावजूद ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। असल में अपने पिता के मारे जाने के बाद अश्वत्थामा बदले की आग में जल रहा था। उसने पांडवों का समूल नाश करने की प्रतिज्ञा ली और चुपके से पांडवों के शिविर में पहुंचा और कृपाचार्य तथा कृतवर्मा की सहायता से उसने पांडवों के बचे हुए वीर महारथियों को मार डाला। केवल यही नहीं, उसने पांडवों के पांचों पुत्रों के सिर भी काट डाले। अंत में अर्जुन की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की उसे याद आई। पुत्रों की हत्या से दुखी द्रौपदी विलाप करने लगी। अर्जुन ने जब यह भयंकर दृश्य देखा तो उसका भी दिल दहल गया। उसने अश्वत्थामा के सिर को काटने की प्रतिज्ञा ली। अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर अश्वत्थामा वहां से भाग निकला। श्रीकृष्ण को सारथी बनाकर अर्जुन ने उसका पीछा किया। अश्वत्थामा को कहीं भी सुरक्षा नहीं मिली तो अंत में उसने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाना तो जानता था, पर उसे लौटाना नहीं जानता था। उस अति प्रचंड तेजोमय अग्नि को अपनी ओर आता देख अर्जुन भयभीत हो गया और उसने श्रीकृष्ण से विनती की। श्रीकृष्ण बोले, है अर्जुन! तुम्हारे भय से व्याकुल होकर अश्वत्थामा ने यह ब्रह्मास्त्र तुम पर छोड़ा है। इस ब्रह्मास्त्र से तुम्हारे प्राण घोर संकट में हैं। इससे बचने के लिए तुम्हें भी अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा, क्योंकि अन्य किसी अस्त्र से इसका निवारण नहीं हो सकता। दोनों द्वारा छोड़े गए इस ब्रह्मास्त्र के कारण लाखों लोगों की जान चली गई थी। अश्वत्थामा ने पांडवों के समूल नाश के लिए इस अस्त्र के एक रूप का उत्तरा के गर्भ पर भी प्रयोग किया था। जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब कृष्ण ने अश्वत्थामा से कहा- उत्तरा को परीक्षित नामक बालक के जन्म का वर प्राप्त है। उसका पुत्र तो होगा ही। यदि तेरे शस्त्र-प्रयोग के कारण मृत हुआ तो भी मैं उसे जीवित कर दूंगा। वह भूमि का सम्राट होगा और नीच अश्वत्थामा, तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ 3,000 वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध निःसृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।

बताते हैं कि रामायणकाल में जहां यह विभीषण और लक्ष्मण के पास यह अस्त्र था, वहीं महाभारतकाल में यह द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न और अर्जुन के पास था। अर्जुन ने इसे द्रोण से पाया था। द्रोणाचार्य को इसकी प्राप्ति राम जामदग्नेय से हुई थी। ऐसा भी कहा गया है कि अर्जुन को यह अस्त्र इंद्र ने भेंट किया था।


रविवार, अप्रैल 05, 2026

जनेऊ संस्कार का क्या महत्व है?

जनेऊ संस्कार, जिसे उपनयन संस्कार भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह बालक के जीवन में शिक्षा और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। जनेऊ संस्कार में बालक को यज्ञोपवीत यानि जनेऊ धारण कराया जाता है। इसके साथ ही उसे गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है और उसे आधिकारिक रूप से “विद्यार्थी” घोषित किया जाता है। उपनयन यानि उप व नयन, इसका अर्थ होता है, गुरु के पास ले जाना, ज्ञान की ओर अग्रसर करना। परंपरागत रूप से ब्राह्मण बालक का 8 वर्ष के आसपास, क्षत्रिय का 11 वर्ष व वैष्य का 12 वर्ष की उम्र में जनेउ संस्कार होता है। हालांकि आजकल यह उम्र और परंपराएं परिवार अनुसार बदल जाती हैं।

अब जानते हैं कि जनेऊ का महत्व क्या है? जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो कई अर्थों का प्रतीक हैं। एक देव ऋण (ईश्वर के प्रति कर्तव्य),  दूसरा पितृ ऋण (पूर्वजों के प्रति कर्तव्य) और तीसरा ऋषि ऋण (ज्ञान देने वालों के प्रति कर्तव्य)। कुछ लोग इसे सत्त्व, रज और तम (तीन गुणों) का प्रतीक भी मानते हैं। इस संस्कार में पहले स्नान और शुद्धि की जाती है। फिर यज्ञ (हवन) होता है। फिर गुरु द्वारा जनेऊ धारण कराया जाता है। गायत्री मंत्र का उपदेश दिया जाता है। इसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्वयह है कि यह बचपन से जिम्मेदारी की ओर कदम है। यह व्यक्ति को अनुशासन, अध्ययन और धर्म पालन के लिए प्रेरित करता है। इसे “दूसरा जन्म” (द्विज) भी कहा जाता है। आज के समय में इसे कई लोग सांस्कृतिक परंपरा के रूप में निभाते हैं। कुछ इसे आध्यात्मिक अनुशासन की शुरुआत मानते हैं। वहीं कुछ लोग इसे जाति आधारित परंपरा मानकर इसकी आलोचना भी करते हैं। सिंधी समाज में ब्राह्मण परंपरागत रूप से जनेऊ संस्कार करते रहे हैं,

जबकि अधिकतर सिंधी व्यापारी, भाईबंद, लोहाणा आदि समुदायों में यह परंपरा आम तौर पर नहीं रही। यानी, यह पूरे सिंधी समाज का अनिवार्य संस्कार कभी नहीं रहा। सिंधी समुदाय में विवाह के अवसर पर भी प्रतीकात्मक रूप से जनेउ धारण करवाने की परंपरा है।


सोमवार, मार्च 30, 2026

श्रीकृष्ण के सिर पर मोर पंख क्यों?

आपने देखा होगा कि भगवान श्रीकृष्ण के सभी चित्रों में सिर पर मोर पंख होता है। क्या कभी ख्याल आया कि ऐसा क्यों? वस्तुतः श्रीकृष्ण के सिर पर लगा मोर पंख केवल सजावट नहीं है, इसके पीछे गहरा धार्मिक, प्रतीकात्मक, दार्शनिक और प्राकृतिक अर्थ निहित है। परंपरा, पुराण, लोककथा और मनोविज्ञान, चारों स्तर पर इसके सुंदर अर्थ मिलते हैं। एक कथा के अनुसार एक दिन गोपियां श्रीकृष्ण के लिए फूल चुन रही थीं, ताकि वे उनके लिए सुंदर मुकुट बना सकें। श्रीकृष्ण यह देखकर मुस्कुरा उठे और बोले, “मेरे लिए इतने सुंदर फूल क्यों?” गोपियां बोलीं, “क्योंकि आप हमें प्रिय हैं।” कृष्ण ने उत्तर दिया, “जो भी बिना अहंकार के प्रेम देता है, मैं वही पहनता हूं।” तभी पास खड़ा मोर अपना सुंदर पंख गिरा देता है। श्रीकृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर लगा लिया। इसी क्षण से मोरपंख उनका प्रिय अलंकार बन गया। कथा है कि मथुरा-वृंदावन में मानसून आने पर मोर प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे। श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी बजानी शुरू की। बांसुरी की ध्वनि से मोर इतना मोहित हुए कि नाचते-नाचते उन्होंने अपना सुंदर पंख कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। कृष्ण ने उसे उठाया और सिर पर रख कर कहा, “यह मेरे मित्र का प्रेम है।” इसलिए उन्हें ‘मोर मुकुटधारी’ कहा जाता है।

ज्ञातव्य है कि पुराणों में मोर पंख को शुभ माना गया है। मोर पंख में तीन आंखों जैसे चिह्न होते हैं, जो कि ज्ञान, कर्म और भक्ति के प्रतीक हैं। मोर पंख सात रंगों से बना है, जो सात चक्रों और सात भावों का प्रतीक है। इसलिए इसे धारण करना धर्म, सौंदर्य और संतुलन का चिन्ह माना जाता है। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि श्रीकृष्ण अपने सिर पर वनमालाएं, वनफूल, तथा मोरपंख का अलंकार धारण करते थे। यह उनके साधारण, सहज, प्रकृति के निकट और सबके मित्र होने का संकेत है।

एक अन्य कथा कहती है कि जब कंस ने कृष्ण की पहचान करने के लिए दूत भेजे, तब नंदगांव के लोगों ने कृष्ण के सिर पर मोरपंख लगाया, ताकि वे साधारण ग्वालबाल की तरह लगें। यही ‘वेशभूषा’ बाद में उनकी अलंकार-परंपरा बन गई। मोरपंख का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि मोर पंख जितना सुंदर है, उतना ही हल्का, इसके पीछे यह शिक्षा दी जाती है कि सुंदरता का अहंकार नहीं होना चाहिए। भारतीय परंपरा में मोर पंख को नजर दोष हटाने वाला, सकारात्मक ऊर्जा देने वाला और दिव्य कंपन पैदा करने वाला माना गया है। यही वजह है कि इसे लोग घर के मंदिर में रखते हैं। मोर पंख में सकारात्मक ऊर्जा की वजह से ही तांत्रिक व ओझा झाडफूंक के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसी प्रकार जैन संतों की “पिच्छी” (या पिच्छिका) एक अत्यंत पवित्र और अहिंसक उपकरण है। यह मोर के गिरे हुए पंखों से बनाई जाती है, केवल स्वाभाविक रूप से झड़े हुए पंख, न कि किसी मोर को नुकसान पहुंचा कर। दिगम्बर और श्वेताम्बर परंपराओं में इसके आकार-विन्यास में कुछ अंतर हो सकते हैं, पर सामग्री मोरपंख ही होती है। जैन मुनि इसे अहिंसा के लिए प्रयोग करते हैं, जैसे बैठने से पहले छोटे जीवों को हटाने हेतु ताकि अनजाने में हिंसा न हो।

शनिवार, मार्च 28, 2026

अब भी संजीवनी बूटी मौजूद है?

कहते हैं कि हिमालय में एक ऐसी बूटी पाई जाती है, जिसके बल पर मृत व्यक्ति को भी जिंदा किया जा सकता है। “संजीवनी बूटी” के बारे में हमारी जानकारी पुराणों, रामायण और कुछ स्थानीय परंपराओं से आती है। 

वाल्मिकी रामायण अनुसार मूर्च्छित लक्ष्मण के लिए हनुमानजी यह बूटी लेकर आए थे। जब लक्ष्मण मेघनाद (इंद्रजीत) के बाण से घायल होकर बेहोश हो गए थे, तो हनुमानजी को “संजीवनी बूटी” लाने के लिए हिमालय की द्रोणगिरि पर्वत भेजा गया। कहा जाता है, हनुमान पूरे पर्वत को ही उठा लाए क्योंकि उन्हें सही बूटी पहचान में नहीं आई। उस बूटी से लक्ष्मण फिर जीवित हो गए। इसका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इनमें जीवनदायिनी, पुनर्जीवित करने वाली या अत्यंत शक्तिशाली औषधीय गुण पाए जाते हैं।

इस बूटी के दम पर ही शुक्राचार्य ने देवासुर संग्राम में असुरों को जीवित कर दिया था। आजकल वैज्ञानिक पारे, गंधक और आयुर्वेद में उल्लेखित कई प्रकार की जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं और इसके चमत्कारिक परिणाम भी निकले हैं, लेकिन जहां तक सवाल संजीवनी बूटी का है तो यह शोध और खोज का विषय है। वैज्ञानिक दृष्टि से अब तक ऐसी किसी जड़ी-बूटी का पक्का प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि, उत्तराखंड और हिमालय के कई हिस्सों में कुछ दुर्लभ औषधीय पौधे हैं, जिनको “संजीवनी” नाम से जाना जाता है क्योंकि वे सूख जाने पर भी पानी मिलने पर फिर हरे हो जाते हैं और उनमें उच्च औषधीय गुण पाए जाते हैं। जिससे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति बढती है। इससे बुखार, थकान और मानसिक तनाव में राहत मिलती है। यह घाव भरने और कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने में सहायक होती है। इसी प्रकार ऑर्किड वर्ग की जड़ी उत्तराखंड, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश में पाई जाती है। चीनी व तिब्बती चिकित्सा में इसे “जीवनवर्धक औषधि” कहा जाता है। यह ऊर्जा, पाचन और प्रतिरक्षा को बढ़ाती है। यह षरीर में जीवन षक्ति संतुलित करती है। इसी प्रकार एरिथ्रिना इंडिका, जिसे हम पारिजात या भारतीय कोरल वृक्ष के रूप में जानते हैं। इसमें एनाल्जेसिक यानि दर्द निवारक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। कभी-कभी लोक चिकित्सा में इसे “संजीवनी वृक्ष” कहा जाता है। हिमालयी क्षेत्र में एंजेलिका ग्लौका जडी पाई जाती है। यह अत्यंत सुगंधित औषधीय पौधा है। तंत्रिका तंत्र और श्वसन तंत्र को सुदृढ़ करता है। 

इसी प्रकार जिनसेंग एक प्रसिद्ध चीनी औषधीय जड़ी है, जिसका उपयोग सदियों से ऊर्जा बढ़ाने, थकान घटाने और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए किया जाता है। इसको अक्सर “मल्टीविटामिन फॉर्मूले” में डाला जाता है, क्योंकि यह शरीर की जीवन शक्ति बढ़ाने में मदद करती है। लोकप्रिय ब्रांड रिवाइटल व एक्सप्लोड में यह पायी जाती है। मगर अत्यधिक सेवन से नींद न आना, उच्च रक्तचाप या बेचैनी जैसी समस्या हो सकती है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं को बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं लेना चाहिए। एस्टागेलस मेम्बरानासिइस जड़ी पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग होती है, जैसे कि इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए। पॉलीगोनम मल्टिफोरम जडी पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग होती है, विशेष रूप से “जीर्णता” को धीमा करने के लिए, बालों को काला करने, और लम्बी उम्र के लिए। परन्तु ये सभी पौधे रामायण की “संजीवनी” नहीं माने जा सकते, केवल प्रतीकात्मक रूप से उनसे जोड़े जाते हैं।

शुक्रवार, मार्च 27, 2026

मुण्डन संस्कार क्यों कराया जाता है?

मुण्डन संस्कार को चूड़ाकरण संस्कार या चौलकर्म भी कहते हैं, जिसका अर्थ है, वह संस्कार जिसमें बालक को चूड़ा अर्थात् शिखा दी जाता है। बच्चे का मुण्डन संस्कार कराने के पीछे हमारे ऋषि-मुनियों की बहुत गहरी सोच थी। माता के गर्भ से आए सिर के बाल अपवित्र माने गये हैं। इनके मुण्डन का उद्देश्य बालक की अपवित्रता को दूर कर उसे अन्य संस्कारों वेदारम्भ, यज्ञ आदि के योग्य बनाना है क्योंकि मुण्डन करते हुए यह कहा जाता है कि इसका सिर पवित्र हो, यह दीर्घजीवी हो। अतः यह बालक के स्वास्थ्य व शरीर के लिए नया संस्कार है।

दूसरी बात, गर्भ के बाल झड़ते रहते हैं, जिससे शिशु के तेज की वृद्धि नहीं हो पाती है। इन केशों को मुंडवा कर शिखा रखी जाती है। कहीं-कहीं पर पहले मुण्डन में नहीं वरन् दूसरी बार के मुण्डन में शिखा छोड़ते हैं। शिखा से आयु और तेज की वृद्धि होती है। मुण्डन बालिकाओं का भी होता है, किन्तु उनकी शिखा नहीं छोड़ी जाती है ।

शास्त्रों में जन्मकालीन बालों का बच्चे के प्रथम, तीसरे या पांचवे वर्ष में या कुल की परम्परानुसार शुभ मुहुर्त में मुण्डन करने का विधान है। जन्म से तीसरे वर्ष में मुण्डन संस्कार उत्तम माना गया है। पांचवे या सातवें वर्ष में मध्यम और दसवें व ग्यारहवें वर्ष में मुण्डन संस्कार करना निम्न श्रेणी का माना जाता है। बच्चे का मुण्डन शुभ मुहुर्त में किसी देवी-देवता या कुल देवता के स्थान पर या पवित्र नदी के तट पर कराया जाता है। अपने गोत्र की परम्परानुसार मुण्डन करके बालों को नदी के तट पर या गोशाला में गाड़ दिया जाता है। कहीं-कहीं कुल देवता को ये बाल समर्पित कर फिर उन्हें विसर्जित किया जाता है। सिंधी समाज में एक मुंडन घर पर और दूसरा धर्म स्थल पर करने की परंपरा रही है। मुण्डन करने के बाद बच्चे के सिर पर दही-मक्खन, मलाई या चंदन लगाया जाता है। कुछ लोग मुण्डन के बाद बालक को स्नान करा कर सिर पर स्वास्तिक बना देते हैं। मुण्डन में अपने परिवार की परम्परा और रीतियों के अनुसार ही पूजा-पाठ और दान-पुण्य व अन्य मांगलिक कार्य किए जाते हैं। आचार्य चरक ने मुण्डन संस्कार का महत्व बताते हुए कहा है कि इससे बालक की आयु, पुष्टि, पवित्रता और सौन्दर्य में वृद्धि होती है। मुण्डन संस्कार के अनेक मन्त्रों का भी यही भाव है कि सूर्य, इन्द्र, पवन आदि सभी देव तुझे दीर्घायु, बल और तेज प्रदान करें। कई लोग कोई मनोकामना पूरी होने पर भी भगवान का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए मुंडन करवाते हैं।

भारत में सिर मुंडवाना कई धार्मिक स्थलों और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। तिरुपति बालाजी में मन्नत पूरी होने पर या कृतज्ञता स्वरूप भगवान वेंकटेश्वर को केश अर्पण की परंपरा है। गया में पितृ श्राद्ध और पिंडदान हेतु कई लोग मुंडन कराते हैं।

हरिद्वार में श्राद्ध व अस्थि विसर्जन के समय गंगा स्नान के साथ मुंडन कराया जाता है। प्रयागराज संगम तट पर पितृ कर्म, कल्पवास, कुंभ पर्व पर मुंडन कराया जाता है। वाराणसी मोक्ष नगरी में श्राद्ध, तर्पण और मुंडन कराया जाता है। पुष्कर पितृ कर्म और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान मुंडन की परंपरा है। सोमनाथ में विशेषकर पितृ दोष निवारण के लिए मुंडन करवाते हैं। रामेश्वरम धाम में पितृ तर्पण, सेतु स्नान के साथ मुंडन करवाते हैं। कई लोग उज्जैन के महाकालेश्वर में श्राद्ध और ग्रह शांति के अवसर पर और चित्रकूट में पितृ तर्पण व मुंडन करवाते हैं।

इसी प्रकार जैन धर्म में दीक्षा के समय केश-लोचन कराया जाता है। बौद्ध परंपरा में संन्यास दीक्षा में सिर मुंडन कराया जाता है।

गुरुवार, मार्च 26, 2026

तुलसी वास्तु दोष भी दूर करती है

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपके घर, परिवार या आप पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित तुलसी के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार माना जाए तो ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है, वहां लक्ष्मी जी का निवास नहीं होता। अगर ज्योतिष की माने तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता है। बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। बुध के प्रभाव से पौधे में फल फूल लगने लगते हैं। शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते हैं, उनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से विद्यमान है। सबके गुण अलग अलग है।

विद्वान बताते हैं कि प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते है। घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है। 

शास्त्रों के अनुसार वास्तु दोष को दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व से लेकर वायव्य उत्तर-पश्चिम तक लगा सकते हैं। तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होती है। पूर्व दिशा की खिडकी के पास रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है। यदि घर की कोई सन्तान अपनी मर्यादा से बाहर है, अर्थात नियंत्रण में नहीं है तो पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते किसी ना किसी रूप में सन्तान को खिलाने से सन्तान आज्ञानुसार व्यवहार करने लगती है। कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करने से विवाह जल्दी और अनुकूल स्थान में होता है। यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम में रखे तुलसी कि गमले पर प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करे व मिठाई का भोग रख कर किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से व्यवसाय में सफलता मिलती है।

समानांतर ब्रह्मांड का वजूद है?

पिछले दिनों सपने के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि एक और दुनिया में विचरण कर रहा हूं। मगर ठीक वैसी ही, जैसी कि हमारी दुनिया है। वहां घटनाएं ठीक वैसी घट रही हैं, जैसी इस दुनिया में घट चुकी हैं। फर्क सिर्फ यही है कि वह दुनिया कुछ और रंगीन है, कुछ और सजीव। तब ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी दुनिया की तरह, ठीक इस जैसी दुनिया भी कहीं और मौजूद है? यानि कि इसकी कॉपी है। इस सिलसिले में कुछ विद्वानों से चर्चा की। साथ ही इंटरनेट पर सर्च किया तो पाया कि कुछ वैज्ञानिक पेरेलल यूनिवर्स की अवधारणा रखते हैं, लेकिन उसे अब तक साबित नहीं किया जा सका है। वैज्ञानिक संदर्भ में पेरेलल यूनिवर्स उस विचार को कहते हैं, जिसमें हमारा ब्रह्मांड एक मात्र नहीं है, बल्कि कई ब्रह्मांड मौजूद हैं, जिनमें अलग-अलग नियम, अवस्थाएं या इतिहास हो सकते हैं।

यह विचार मुख्य रूप से कुछ उन्नत भौतिक सिद्धांतों, जैसे स्ट्रिंग थ्योरी, क्वांटम मैकेनिक्स के कुछ व्याख्याओं से आता है। इसे सार्वभौमिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। कुछ प्रमुख सिद्धांतों में यह संभावित व्याख्या के रूप में स्वीकार किया जाता है। अभी तक प्रत्यक्ष रूप से कोई अनुभवजन्य सबूत नहीं मिला है कि समानांतर ब्रह्मांड सच में मौजूद हैं। असल में क्वांटम मल्टीवर्ल्ड इंटरप्रिटेशन क्वांटम भौतिकी की एक व्याख्या है, जिसमें हर क्वांटम घटना के लिए ब्रह्मांड विभाजित हो जाता है। इससे बहु-ब्रह्मांड का ख्याल आता है। लेकिन, यह व्याख्या सत्यापित नहीं हुई है।

कुछ ब्रह्मांड शास्त्रियों ने सुझाव दिया है कि बिग बैंग जैसी घटनाओं से अलग-अलग बबल यूनिवर्स बन सकते हैं। फिर भी अब तक कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं। वैज्ञानिक समुदाय में तीन मुख्य स्थितियाँ पाई जाती हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे संभव मानते हैं, पर असिद्ध। कुछ कहते हैं कि यह व्यर्थ कल्पना है, जब तक कोई परीक्षण नहीं मिल जाता। कुछ मानते हैं कि यह क्वांटम और ब्रह्मांड शास्त्र की बेहतर समझ की दिशा में एक वैध विचार है। कुल मिलाकर वैज्ञानिकों ने इसे विचार के रूप में लिया है। कुछ सिद्धांत इसे संभावित मानते हैं। लेकिन इसे अभी तक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध या मान्यता प्राप्त नहीं माना जाता। इस सिलसिले में ब्रह्माकुमारीज का एक प्रमुख सिद्धांत कालचक्र से जुड़ा है। उनके अनुसार यह सृष्टि एक निश्चित, चक्रीय क्रम में चलती है और हर चक्र के बाद वही घटनाएँ, वही आत्माएँ और वही भूमिकाएँ फिर से बिल्कुल उसी प्रकार दोहराई जाती हैं। उनके मतानुसार सृष्टि का एक पूरा चक्र 5000 वर्ष का होता है। इस चक्र में चार युग आते हैं। सतयुग पूर्ण शांति और पवित्रता का युग, त्रेतायुग थोड़ी कमी, पर अभी भी उच्च अवस्था, द्वापरयुग भक्ति और पतन की शुरुआत और कलियुग नैतिक पतन और अशांति का समय। कलियुग के अंत में एक छोटा-सा संगमयुग माना जाता है, जब परमात्मा (उनके अनुसार शिव) ज्ञान देकर आत्माओं को शुद्ध करते हैं और फिर पुनः सतयुग आरंभ होता है। कुल मिला कर ब्रह्माकुमारीज का दावा है कि हर 5000 वर्ष बाद इतिहास हूबहू दोहराया जाता है। आप और मैं भी वही आत्माएँ हैं जो पिछले चक्र में भी थे। हमारी भूमिकाएँ भी बिल्कुल वैसी ही रहती हैं, न कम, न ज्यादा। इसे वे “ड्रामा का सिद्धांत” कहते हैं, जैसे एक फिल्म निश्चित स्क्रिप्ट के अनुसार चलती है।

वैसे परंपरागत पुराणों के अनुसार चारों युगों की अवधि लाखों वर्षों की मानी जाती है, न कि 5000 वर्ष। आधुनिक इतिहास और विज्ञान सृष्टि को अरबों वर्ष पुराना मानते हैं और घटनाओं के हूबहू दोहराव का समर्थन नहीं करते। कुछ दार्शनिक परंपराएँ, जैसे बौद्ध और सांख्य भी चक्रीय सृष्टि की बात करती हैं, लेकिन ठीक वैसी ही पुनरावृत्ति का विचार उतना स्पष्ट नहीं है।