तीसरी आंख

जिसे वह सब दिखाई देता है, जो सामान्य आंखों से नहीं दिखाई देता है

बुधवार, अक्तूबर 30, 2019

क्या वाकई मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है?

-तेजवानी गिरधर-
जब भी किसी काम की मजबूरी होती है तो महात्मा गांधी को याद किया जाता है। याद है न ये जुमला - मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। यह जुमला कब और किसने फैंका, कैसे ईजाद हुआ, इसका तो पता नहीं, मगर अब यह चरितार्थ हो गया है। संघ व भाजपा की जिस विचारधारा ने सदैव गांधीजी को निशाने पर रखा, वही आज उनकी पूजा करने लगी है। ऐसे में यह चौंकाने वाला सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि संघ व भाजपा गांधीजी को सिर पर उठाए घूम रहे हैं? जिन गांधीजी के राष्ट्रपिता होने पर सवाल उठाए जाते रहे, आज बड़े गर्व से उन्हीं को राष्ट्रपिता मान कर अभिनंदन किया जा रहा है? जिन गांधीजी को हिंदुस्तान के विभाजन का जिम्मेदार माना गया, जिन पर मुस्लिम तुष्टिकरण पर आरोप लगाया जाता रहा, वही आज प्रात: स्मरणीय कैसे हो गए? जिस भाजपा सरकार ने गांधीजी के समानांतर अथवा उनसे कहीं बड़ा करके सरदार वल्लभ भाई पटेल को खड़ा करने की भरपूर कोशिश की, आज वही गांधीजी की 150 वी जयंती को धूमधाम से मना रही है, देशभर में पदयात्राएं कर रहे है? गांधीजी की हत्या के लिए जिस विचारधारा पर आरोप लगाए जाते हैं, वही विचारधारा आज गांधीजी के सामने नतमस्तक है? यह बात पब्लिक डोमेन में है कि वर्षों से सत्ता में रही कांग्रेस की वजह से ही गांधीजी की जयंती व पुण्यतिथि मनाई जाती है, भाजपा तो हाल के कुछ वर्षों में ऐसा करने लगी है। आखिर यकायक ऐसा हो कैसे गया? क्या मजबूरी है?
आपको याद होगा कि हाल ही महात्मा गांधी 150 वी जयंती पर आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बकायदा लेख लिखकर गांधी के प्रति अपनी वैचारिक और कार्यशील प्रतिबद्धता को सार्वजनिक किया। संभवत: यह पहला मौका है कि संघ इस प्रकार खुल कर गांधीजी के साथ खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्वच्छता अभियान में गांधीजी को ही आगे रखा।
मसले का दूसरा पहलु ये है कि जहां मजलिसे-इतेहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन औवेसी का कहना है कि उन्हें गांधी का नाम लेने का कोई अधिकार नहीं है, तो कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा कि भाजपा वोटों के खातिर गांधी के नाम को भुना रही है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गांधी के साथ संघ का कोई जमीनी रिश्ता वास्तव में कायम है? भागवत ने गांधी के भारतीयता के विचार को जिस प्रकार रेखांकित किया है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि संघ कांग्रेस की तुलना में गांधीजी के अधिक नजदीक है। यह सर्वविदित है कि गांधीजी ने अपने पूरे दर्शन में भारतीयता को प्रमुखता प्रदान की। रामराज्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, मधनिषेध जैसे आधारों पर अपनी वैचारिकी खड़ी की। ये सभी आधार भारतीयों के लोकजीवन को हजारों साल से अनुप्राणित करते आ रहे हैं। राम भारतीय समाज के आदर्श पुरुष हैं और गांधी के प्रिय आराध्य। अब यह आसानी से समझा जा सकता है कि गांधी किस भारतीयता के धरातल पर खड़े थे। ऐसे में संघ का दावा है कि भले ही उसके बारे में जो भी धारणा हो, मगर संघ ने गांधीजी को अपने दैनिक दिनचर्या में शामिल कर रखा है। इसका प्रमाण ये है कि एक पक्के स्वयंसेवक और एक पक्के गांधीवादी की जीवन शैली लगभग एक समान है।
संघ का दावा है कि जिस प्रकार गांधीजी का सारा जोर सेवा कार्यों पर था, उसी के अनुरूप सेवा कार्यों के मामले में संघ दुनिया का सबसे बड़ा और व्यापक संगठन है। सेवा भारती, वनवासी कल्याण परिषद, एकल विद्यालय, परिवार प्रबोधन, विद्या भारती जैसे बीसियों अनुषांगिक संगठन दिन रात देश भर में सेवा के ऐसे ऐसे प्रकल्पों में जुटे हैं।
तस्वीर का दूसरा पहलु ये है कि संघ व भाजपा औपचारिक व घोषित रूप से भले ही आज गांधीजी की पूजा कर रहे हों, मगर इनकी विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाले कई लोग आज भी गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के प्रति श्रद्धा रखते हैं। भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे के बारे में सार्वजनिक रूप से दिए गए बयान से इसकी पुष्टि होती है। दूसरी ओर इस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह तल्ख टिप्पणी कभी नहीं भुलाई जा सकेगी कि वे निजी तौर पर साध्वी को कभी माफ नहीं करेंगे। इस अंतर्विरोध से भाजपा कैसे उबरेगी, यह तो उसी की चिंता का विषय है।
वैसे यह स्थिति वाकई सिर चकरा देने वाली है। तभी तो यह जुमला सामने आया कि भाजपा के मुख में गांधीजी व दिल में गोडसे है। इसी मसले पर एक लेखक का यह कथन भी विचारणीय है- नाथूराम गोडसे के साथ संघ का रिश्ता खोजने और थोपने वाले आलोचक गांधी के संग संघ का नाता भी खोजने की कोशिशें करें।
ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता में आने के लिए राजनीतिक कारणों से जो विचारधारा गांधीजी का विरोध करती रही, सत्तारूढ़ होने के बाद उसे समझ में आ गया कि देश में हम भले ही गांधीजी को गाली देते हैं, मगर पूरी दुनिया में गांधीजी की बड़ी मान्यता है, गांधी दर्शन की बड़ी महत्ता है। उसे नकारा नहीं जा सकता। यदि कोई ऐतिहासिक भूल हो गई तो उसे सुधारने में बुराई क्या है? तभी तो प्रख्यात चिंतक डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने एक लेख में लिखा है कि यदि वर्तमान सरकार, भाजपा और संघ गांधी का नाम आज ले रहे हैं तो उन्हें क्यों न लेने दें ? उनकी आंखें खुल रही हैं, दिल बड़ा हो रहा है, समझ गहरी हो रही है तो उसे वैसा क्यों न होने दें ? यह ठीक है कि इस सरकार को मोदी और शाह चला रहे हैं लेकिन हम यह न भूलें कि ये दोनों गुजराती हैं। वे गांधी और सरदार पटेल को कंधे पर उठा रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है?
कई लेखक ये मानते हैं कि हम गांधीजी को पूजते जरूर हैं, मगर हमारे में गांधीदर्शन कहां है? ऐसा लगता है कि गांधीजी की प्रासंगिकता, जो मजबूरी के रूप में उभर कर आई है, उसे बड़ी चतुराई से यह कह कर उपयोग किया जाने वाला है कि उन्होंने तो केवल गांधीजी को स्थापित मात्र किए रखा, जबकि हम उन्हें अपने जीवन में उतारने को आतुर हैं।

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